बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 689, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ ६७९
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| अदृष्टनिवृत्तिकल्पनानुपपत्तेः । यथा अवघातेन व्रीहीणां तुषनिवृत्तौ गम्यमानायाम् अग्निहोत्रादिनित्यकर्मकार्या अदृष्टा न कल्प्यते तुषनिवृत्तिः। तद्वदज्ञाननिवृत्तिरपि नित्यकर्मकार्या अदृष्टा न कल्प्यते । ज्ञानेन विरुद्धत्वं चासकृत् कर्मणामवोचाम। यदविरुद्धं ज्ञानं कर्मभिस्तद्देवलोकप्राप्तिनिमित्तमित्युक्तम्; "विद्यया देवलोकः" (१।५।१६) इति श्रुतेः। | जब साक्षात् अनुभव होती है, तो अदृष्टफलके रूपमें निवृत्तिकी कल्पना करनी उपयुक्त नहीं है। जिस प्रकार [ मुसलसे ] कूटनेपर धानके तुषकी निवृत्ति होती है—यह स्पष्टतया ज्ञात होनेपर ऐसी कल्पना नहीं की जाती कि वह अग्निहोत्रादि नित्यकर्मोंका अदृष्ट कार्य है। इसी प्रकार अज्ञाननिवृत्ति भी नित्यकर्मोंका कार्य एवं अदृष्ट फल है—ऐसी कल्पना नहीं की जाती। ज्ञानसे कर्मोंका विरोध है—यह तो हम अनेकों बार कह चुके हैं। जो ज्ञान कर्मोंसे अविरुद्ध है, वह तो "विद्यासे देवलोककी प्राप्ति होती है" इस श्रुतिके अनुसार देवलोककी प्राप्तिका कारण है—ऐसा पहले बतलाया गया है। |
| किञ्चान्यत्, कल्प्ये च फले नित्यानां कर्मणां श्रुतानां यत् कर्मभिर्विरुध्यते द्रव्यगुणकर्मणां कार्यमेव न भवति, किं तत् कल्प्यताम्, यस्मिन् कर्मणः सामर्थ्यमेव न दृष्टम् ? किं वा यस्मिन् दृष्टं सामर्थ्यम्, यच्च कर्मणां फलम् अविरुद्धम्, तत् कल्प्यताम् ? इति । पुरुषप्रवृत्तिजननायावश्यं | इसके सिवा, यदि श्रुति-प्रतिपादित नित्य कर्मोंके फलकी कल्पना करनी ही है तो जो कर्मोंसे विरुद्ध स्वभाववाला है—जो द्रव्य, गुण और कर्मोंका कार्य ही नहीं हो सकता तथा जिसमें कर्मका सामर्थ्य ही नहीं देखा गया, क्या उसीकी कल्पना करनी चाहिये अथवा जिसमें कर्मोंका सामर्थ्य देखा गया है तथा जो कर्मोंका अविरुद्ध फल है, उसकी कल्पना की जाय ? यदि पुरुषोंकी प्रवृत्ति करानेके लिये कर्मफलकी |