बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 691, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ६८१
| न हि पुरुषेच्छाविषयाणां कर्मफलानामेतावत्त्वं नाम केनचिद् असर्वज्ञेनावधृतम्, तत्साधनानां वा पुरुषेच्छानां वा अनियतदेशकालनिमित्तत्वात्, पुरुषेच्छाविषयसाधनानां च पुरुषेष्टफलप्रयुक्तत्वात् । प्रतिप्राणि चेच्छावैचित्र्यात् फलानां तत्साधनानां चानन्त्यसिद्धिः। तदानन्त्याच्चाशक्यमेतावत्त्वं पुरुषैर्ज्ञातुम् । अज्ञाते च साधनफलैतावत्त्वे कथं मोक्षस्य परिशेषसिद्धिरिति । | पुरुषकी इच्छाके विषयभूत कर्मफलोंकी इयत्ताका किसी भी असर्वज्ञ जीवने निश्चय नहीं किया; क्योंकि उनके साधन अथवा पुरुषकी इच्छाओंके देश, काल और निमित्त नियत नहीं हैं; कारण, वे पुरुषकी इच्छाके विषय और उनके साधन पुरुषके इष्ट फलोंद्वारा प्रेरित हैं। अतः प्रत्येक प्राणीकी इच्छाओंमें विचित्रता रहनेके कारण उनके साधन और फलोंकी अनन्तताकी भी सिद्धि होती है। उनकी अनन्तता होनेके कारण पुरुषोंको उनकी इयत्ताका ज्ञान होना असम्भव है तथा साधन और फलोंकी इयत्ताका ज्ञान न होनेपर मोक्षकी परिशेषता कैसे सिद्ध हो सकती है ? | | कर्मफलजातिपारिशेष्यमिति चेत् — सत्यपि इच्छाविषयाणां तत्साधनानां चानन्त्ये, कर्मफलजातित्वं नाम सर्वेषां तुल्यम् । मोक्षस्त्वकर्मफलत्वात् परिशिष्टः स्यात्। तस्मात् परिशेषात् स एव युक्तः कल्पयितुमिति चेत् ? | पूर्व०—कर्मफलोंकी जातिकी परिशेषता तो सिद्ध हो ही सकती है ? इच्छाके विषय और उनके साधन अनन्त होनेपर भी उन सबमें कर्मफलजातित्व तो समान ही है किंतु मोक्ष कर्मफल है नहीं, अतः वही अवशिष्ट होना चाहिये; इसलिये परिशेषतः उसीको नित्य कर्मोंका फल कल्पना करना उचित है—यदि ऐसा मानें तो ? |