भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 692, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 692
६८२बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ३

| न, तस्यापि नित्यकर्मफलत्वाभ्युपगमे कर्मफलसमानजातीयत्वोपपत्तेः परिशेषानुपपत्तिः ।<br><br>तस्मादन्यथाप्युपपत्तेः क्षीणा श्रुतार्थापत्तिः । उत्पत्त्याप्तिविकारसंस्काराणामन्यतममपि नित्यानां कर्मणां फलमुपपद्यत इति क्षीणा श्रुतार्थापत्तिः । | सिद्धान्ती—ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि यदि उसे भी नित्य कर्मोंका फल माना जायगा तो उसमें भी कर्मफलसे सजातीयताकी उपपत्ति होनेसे परिशेषकी उपपत्ति नहीं हो सकेगी। इससे भिन्न प्रकारसे भी नित्यकर्मोंके फलकी उपपत्ति हो सकती है, इसलिये वहीं यह श्रुतार्थापत्ति क्षीण हो जाती है। तात्पर्य यह है कि उत्पत्ति, आप्ति, विकार और संस्कारोंमेंसे कोई भी नित्यकर्मोंका फल हो सकता है, इसलिये उन्हींमें यह श्रुतार्थापत्ति क्षीण हो जाती है। | | चतुर्णामन्यतम एव मोक्ष इति चेत् ? | पूर्व०—यदि ऐसा मानें कि मोक्ष भी इन चारोंमेंसे ही कोई एक है तो ? | | न तावदुत्पाद्यो नित्यत्वात्, अत एवाविकार्यः, असंस्कार्यश्चात एवासाधनद्रव्यात्मकत्वाच्च, साधनात्थकं हि द्रव्यं संस्क्रियते, यथा पात्राज्यादि प्रोक्षणादिना न च संस्क्रियमाणः, संस्कारनिर्वर्त्यो वा यूपा- | सिद्धान्ती—नहीं, वह नित्य है, इसलिये उत्पाद्य नहीं हो सकता और इसी कारण विकार्य भी नहीं हो सकता और इसी कारणसे तथा साधनात्मक द्रव्य न होनेसे संस्कार्य भी नहीं हो सकता, क्योंकि संस्कार साधनात्मक द्रव्यका ही होता है, जैसे प्रोक्षणादिसे पात्र और घृत आदि। मोक्ष न तो संस्कृत किया जानेवाला है और न यूपादि-के समान संस्कारद्वारा निष्पन्न होने- |