भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 682, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 682
६७२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

| [शुभाशुभकर्मक्षये एव मोक्षसम्भवः]<br><br>तत्र संसरतां मुच्यमानानां च कार्यकारणानां स्वकारणसंसर्गे समाने मुक्तानामत्यन्तमेव पुनरनुपादानम्; संसरतां तु पुनः पुनरुपादानं येन प्रयुक्तानां भवति, तत् कर्म इत्यवधारितं विचारणापूर्वकम्। तत्तक्षये च नामावशेषेण सर्वोत्सादो मोक्षः। तच्च पुण्यपापाख्यं कर्म, 'पुण्यो वै पुण्येन कर्मणा भवति पापः पापेन' (बृ० उ० ३ । २ । १३) इत्यवधारितत्वात्, एतत्कृतः संसारः। | उनमें संसारबन्धनको प्राप्त और मुक्त होते हुए देह और इन्द्रियोंका अपने कारणसे संसर्ग होना समान होनेपर भी मुक्त पुरुषोंको उनका पुनः सर्वथा अग्रहण होता है; और जिसकी प्रेरणासे संसारमें आनेवाले पुरुषोंको उनका पुनर्ग्रहण होता है, वह कर्म है—ऐसा विचारपूर्वक निर्णय किया गया है। उस (कर्म) का क्षय हो जानेपर जो नाममात्र शेष रहकर बाकी सबका उच्छेद हो जाता है, उसे मोक्ष कहते हैं। वह कर्म पुण्य और पाप संज्ञावाला है; क्योंकि 'पुण्यकर्मसे पुण्यशरीरयुक्त होता है और पापकर्मसे पापशरीरयुक्त' ऐसा पहले निश्चय किया गया है; इसका किया हुआ ही संसार है। | | [मोक्षस्य पुण्यफलत्वनिरासायोत्तरब्राह्मणम्]<br><br>तत्रापुण्येन स्थावरजङ्गमेषु स्वभावदुःखबहुलेषु नरकतिर्यक्प्रेतादिषु च दुःखमनुभवति पुनः पुनर्जायमानो म्रियमाणश्चेत्येतद् राजवर्त्मवत् सर्वलोकप्रसिद्धम्। यस्तु शास्त्रीयः 'पुण्यो वै पुण्येन कर्मणा भवति' तत्रैवादरः क्रियत | उनमें पापकर्मसे जिनमें स्वभावतः ही दुःखकी अधिकता है, उन नरक, तिर्यक् एवं प्रेतादि स्थावरजङ्गमयोनियोंमें पुनः-पुनः जन्म और मरणको प्राप्त होता हुआ पुरुष दुःख अनुभव करता है—यह बात राजमार्गके समान समस्त जगत्में प्रसिद्ध है। यहाँ श्रुति 'पुण्यो वै पुण्येन कर्मणा भवति' इस वाक्यसे प्रतिपादित जो शास्त्रीय मार्ग है, उसीमें आदर करती है। पुण्यकर्म ही |

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