भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 683, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 683

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६७३


| इह श्रुत्या। पुण्यमेव च कर्म सर्वपुरुषार्थसाधनमिति सर्वे श्रुति-स्मृतिवादाः। मोक्षस्यापि पुरुषार्थत्वात् तत्साध्यता प्राप्ता। यावद्यावत्पुण्योत्कर्षः तावत्तावत्फलोत्कर्षप्राप्तिः; तस्मादुत्तमेन पुण्योत्कर्षेण मोक्षो भविष्यतीत्या-शङ्का स्यात्, सा निवर्तयितव्या। ज्ञानसहितस्य च प्रकृष्टस्य कर्मण एतावती गतिः, व्याकृतनाम-रूपास्पदत्वात् कर्मणस्तत्फलस्य च, न त्वकार्ये नित्येऽव्याकृत-धर्मिणि अनामरूपात्मके क्रिया-कारकफलस्वभाववर्जिते कर्मणो व्यापारोऽस्ति; यत्र च व्यापारः स संसार एवेत्यस्यार्थस्य प्रदर्श-नाय ब्राह्मणमारभ्यते। | समस्त पुरुषार्थोंका साधक है—ऐसा समस्त श्रुति-स्मृतियोंका सिद्धान्त है। अतः पुरुषार्थ होनेके कारण मोक्षका भी उस पुण्यकर्मसे साध्य होना प्राप्त होता है जितनी-जितनी पुण्यकी उत्कृष्टता होती है, उतनी-उतनी ही फलकी उत्कृष्टता प्राप्त होती है; इसलिये ऐसी आशङ्का हो सकती है कि उत्तम पुण्योत्कर्षसे मोक्ष प्राप्त होगा, सो इसकी निवृत्ति करनी चाहिये। ज्ञानसहित प्रकृष्ट कर्मकी तो इतनी (संसारमात्र) ही गति है; क्योंकि कर्म और उसके फलके आश्रय व्याकृत नाम-रूप ही हैं। जो किसी-का कार्य नहीं है, उस नित्य अव्या-कृतधर्मा, नामरूपरहित, क्रिया-कारकफलस्वभावहीन मोक्षमें कर्म-का कोई व्यापार नहीं हो सकता; और जहाँ व्यापार है, वहाँ संसार ही है—इस बातको प्रदर्शित करने-के लिये ही यह ब्राह्मण आरम्भ किया जाता है। | | यत्तु कैश्चिदुच्यते—विद्यासहितं<br><sub>विद्यासहितस्य</sub> कर्म निरभिसन्धि विष-कर्मण एव दध्यादिवत् कार्यान्तर- | कुछ लोगोंका जो कथन है कि फलाकाङ्क्षासे रहित होकर किया हुआ विद्यासहित कर्म विष और दधि आदिके समान कार्यान्तरका आरम्भ |

बृ० उ० ४३—