भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 686, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 686
६७६बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ३

| फलमस्ति; चोद्यन्ते च तानि; पारिशेष्यान्मोक्षस्तेषां फलमिति गम्यते; अन्यथा हि पुरुषा न प्रवर्तेरन् । | श्रुत फल भी है नहीं; तथा उनकी विधि है ही; इसलिये परिशेषतः मोक्ष ही उनका फल है—ऐसा जाना जाता है। नहीं तो पुरुषोंकी उनमें प्रवृत्ति ही नहीं होगी। | | ननु विश्वजिन्न्‍याय एव आयातो मोक्षस्य फलस्य कल्पितत्वात् । मोक्षे वान्यस्मिन् वा फलेऽकल्पिते पुरुषा न प्रवर्तेरन्निति मोक्षः फलं कल्प्यते श्रुतार्थापत्त्या, यथा विश्वजिति। नन्वेवं सति कथमुच्यते विश्वजिन्न्‍यायो न भवतीति । फलं च कल्प्यते विश्वजिन्न्‍यायश्च न भवतीति विप्रतिषिद्धमभिधीयते । | सिद्धान्ती— तब तो यहाँ भी विश्वजित्न्याय ही आ जाता है; क्योंकि मोक्षरूप फलकी कल्पना की गयी है। मोक्ष अथवा किसी अन्य फलकी कल्पना न करनेपर पुरुषोंकी प्रवृत्ति नहीं होगी, इसीसे विश्वजित्यागके स्वर्गरूप फलके समान यहाँ 'श्रुतार्थापत्ति'से मोक्षरूप फलकी कल्पना की जाती है। किंतु ऐसी स्थितिमें यह कैसे कहा जाता है कि यहाँ विश्वजित्न्याय नहीं है। फलकी कल्पना भी की जाती है और विश्वजित्न्याय भी नहीं है—यह कथन तो विरुद्ध है। | | मोक्षः फलमेव न भवतीति चेन्न; प्रतिज्ञाहानात्। कर्म कार्यान्तरं विषदध्यादिवदारभत इति | यदि कहो कि मोक्ष तो किसीका फल ही नहीं है तो यह भी ठीक नहीं; क्योंकि इससे तुम्हारी प्रतिज्ञा भङ्ग होती है। तुमने यह प्रतिज्ञा की है कि विष और दधि आदिके समान |


१. जहाँ कोई बात स्वीकार किये बिना किसी श्रुत अर्थमें आपत्ति या अनुपपत्ति आती हो, वहाँ उसे स्वीकार करना पड़ता है—यही श्रुतार्थापत्ति प्रमाण है। मोक्षरूप फल स्वीकार किये बिना नित्यकर्मोंमें किसीकी प्रवृत्ति न होनेसे उसकी विधि व्यर्थ हो जायगी, इसलिये श्रुतार्थापत्ति प्रमाणसे वह स्वीकार करना पड़ता है।