भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 685, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 685

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थे ६७५


न्यथा स्वभावः। दृष्टं ह्यन्यशक्तित्वेन निर्ज्ञातानामपि पदार्थानां विषदध्यादीनां विद्यामन्त्रशर्करादिसंयुक्तानामन्यविषये सामर्थ्यम्। तथा कर्मणोऽप्यस्त्विति चेत् ?उसका दूसरा स्वभाव है। यह बात देखी गयी है कि जो अन्य शक्तिवाले माने गये हैं, उन विष एवं दधि आदि पदार्थोंका विद्या, मन्त्र एवं शर्करादिसे संयुक्त होनेपर अन्य विषयमें सामर्थ्य हो जाता है। इसी प्रकार विद्यासहित कर्मका भी अन्य स्वभाव हो सकता है—ऐसा माना जाय तो !
न, प्रमाणाभावात्। तत्र हि कर्मण उक्तविषयव्यतिरेकेण विषयान्तरे सामर्थ्यास्तित्वे प्रमाणं न प्रत्यक्षं नानुमानं नोपमानं नार्थापत्तिर्न शब्दोऽस्ति।सिद्धान्ती—ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि इसमें कोई प्रमाण नहीं है। यहाँ कर्मके उक्त विषयोंसे भिन्न किसी अन्य विषयमें सामर्थ्य होनेका न प्रत्यक्ष प्रमाण है, न अनुमान है, न उपमान है, न अर्थापत्ति है और न शब्दप्रमाण है।
ननु फलान्तराभावे चोदनान्यथानुपपत्तिः प्रमाणमिति। न हि नित्यानां कर्मणां विश्वजिन्यायेन फलं कल्प्यते, नापि श्रुतंपूर्व०—किंतु [नित्य और निष्काम कर्मोंका मोक्षके सिवा] कोई अन्य फल न होनेपर किसी अन्य कारणसे इनकी विधिकी उपपत्ति न होना ही इसमें [अर्थापत्ति] प्रमाण है। [तात्पर्य यह है कि] नित्य-कर्मोंका विश्वजित्न्यायसे तो कोई फल कल्पना किया नहीं जाता और उनका कोई

१. 'विश्वजिता यजेत'—विश्वजित्यागसे यजन करे—इस वाक्यमें याग-कर्तव्यतारूप विधि देखी जाती है। इस विधिका कोई नियोज्य पुरुष होना चाहिये अर्थात् यह बतलाना चाहिये कि विश्वजित् यागसे कौन यजन करे। तो वहाँ 'स स्वर्गः स्यात् सर्वान् प्रत्यविशिष्टत्वात्' अर्थात् 'जहाँ किसी कर्मका कोई विशिष्ट फल न बतलाया गया हो, वहाँ उसका फल स्वर्ग ही समझना चाहिये, क्योंकि स्वर्ग सभी कर्मोंका सामान्य फल है, इस न्यायसे स्वर्गकाम (स्वर्गकी इच्छावाला) ही विश्वजित् यागका नियोज्य है—ऐसी कल्पना कर ली जायगी। यही विश्वजित्-न्याय है।