बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 677, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६६७
| "तद्यो यो देवानाम्" (बृ० उ० १ । ४ । १०) इत्याद्या श्रुत्या । तस्मादत्यन्तनिकृष्टा शास्त्रबाह्यैवेयं कल्पना । प्रकृतं तु वर्तयिष्यामः । तत्र केन प्रयुक्तं ग्रहातिग्रहलक्षणं बन्धनमित्येतन्निर्दिधारयिषया आह— | द्वारा ब्रह्मविद्याका उपदेश सभीके पुरुषार्थसाधनके लिये किया गया है । अतः यह कल्पना अत्यन्त निकृष्ट और शास्त्रविरुद्ध ही है । अब हम प्रकृत विषयका अनुसरण करेंगे । यहाँ, यह निश्चय करनेके लिये कि वह ग्रहातिग्रहरूप बन्धन किसकी प्रेरणासे प्राप्त हुआ है ? श्रुति कहती है— |
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याज्ञवल्क्येति होवाच यत्रास्य पुरुषस्य मृतस्याग्निं वागप्येति वातं प्राणश्चक्षुरादित्यं मनश्चन्द्रं दिशः श्रोत्रं पृथिवीग्ँ शरीरमाकाशमात्मौषधीर्लोमानि वनस्पतीन् केशा अप्सु लोहितं च रेतश्च निधीयते क्कायँ तदा पुरुषो भवतीत्याहर सोम्य हस्तमार्तभागावामेवैतस्य वेदिष्यावो न नावेतत् सजन इति । तौ होत्क्रम्य मन्त्रयाञ्चक्राते तौ ह यदूचतुः कर्म हैव यदूचतुरथ यत् प्रशशग्ँसतुः कर्म हैव तत् प्रशशग्ँसतुः पुण्यो वै पुण्येन कर्मणा भवति पापः पापेनेति ततो ह जारत्कारव आर्तभाग उपरराम ॥ १३ ॥
'हे याज्ञवल्क्य !' ऐसा आर्तभागने कहा 'जिस समय इस मृतपुरुषकी वाक् अग्निमें लीन हो जाती है तथा प्राण वायुमें, चक्षु आदित्यमें, मन चन्द्रमामें, श्रोत्र दिशामें, शरीर पृथिवीमें, हृदयाकाश भूताकाशमें, लोम ओषधियोंमें और केश वनस्पतियोंमें लीन हो जाते हैं तथा लोहित और वीर्य जलमें स्थापित हो जाते हैं, उस समय यह पुरुष कहाँ रहता है ?' [याज्ञवल्क्य—] 'हे प्रियदर्शन आर्तभाग ! तू मुझे अपना हाथ पकड़ा, हम दोनों ही इस प्रश्नका उत्तर जानेंगे; यह प्रश्न जनसमुदायमें होने योग्य नहीं है।'