बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 676, कुल 1402 में से
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| ६६६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
|---|
| संस्कृत-भाष्यम् | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| कत्वात्मदर्शनेन सम्पन्नो विद्वान् मृतः समवनीतप्राणो जगदात्मत्वं हिरण्यगर्भस्वरूपं वा प्राप्नुयात्, असमवनीतप्राणो भोज्याज्जीवन्नेव वा व्यावृत्तो विरक्तः परमात्मदर्शनाभिमुखः स्यात् । न चोभयम् एकप्रयत्ननिष्पाद्येन साधनेन लभ्यम् । हिरण्यगर्भप्राप्तिसाधनं चेत्, न ततो व्यावृत्तिसाधनम्। परमात्माभिमुखीकरणस्य भोज्याद् व्यावृत्तेः साधनं चेत्, न हिरण्यगर्भप्राप्तिसाधनम् । न हि यद् गतिसाधनं तद् गतिनिवृत्तेरपि । | कर्मसहित द्वैतैकत्वरूप आत्मदर्शनसे सम्पन्न हुआ विद्वान् मरनेपर प्राणोंके लीन हो जानेपर या तो जगदात्मभावको प्राप्त हो जायगा और या हिरण्यगर्भस्वरूप हो जायगा; अथवा जबतक उसके प्राणोंका लय नहीं होगा तबतक वह जीवित रहता हुआ ही भोज्यवर्गसे व्यावृत्त यानी विरक्त रहकर परमात्मदर्शनके अभिमुख होगा। दोनों फल एक ही प्रयत्नसे निष्पन्न होनेवाले साधनसे प्राप्त नहीं हो सकते। यदि वह प्रयत्न हिरण्यगर्भकी प्राप्तिका साधन होगा तो उससे व्यावृत्त होनेका साधन नहीं हो सकता; और यदि वह परमात्माके सम्मुख करने और भोज्यवर्गसे विरक्ति करानेका साधन होगा तो हिरण्यगर्भकी प्राप्तिका साधन नहीं हो सकता; क्योंकि जो गतिका साधन होता है, वही गतिकी निवृत्तिका भी साधन नहीं होता। |
| अथ मृत्वा हिरण्यगर्भं प्राप्य ततः समवनीतप्राणो नामावशिष्टः परमात्मज्ञानेऽधिक्रियते, ततोऽस्मदाद्यर्थं परमात्मज्ञानोपदेशोऽनर्थकः स्यात् । सर्वेषां हि ब्रह्मविद्या पुरुषार्थायोपदिश्यते— | यदि कहो कि वह मरकर हिरण्यगर्भको प्राप्त होनेके पश्चात् लीनप्राण और नाममात्रावशिष्ट होकर परमात्मज्ञानका अधिकारी होता है तो हम लोगोंके लिये तो परमात्मज्ञानका उपदेश व्यर्थ ही होगा। किंतु “तद्यो यो देवानाम्” इत्यादिश्रुतिके |