भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 675, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 675
ब्राह्मण २ ]शाङ्करभाष्यार्थ६६५
संस्कृत मूलहिन्दी भाष्यार्थ
इत्येवमपवर्गाख्यामन्तरालावस्थां परिकल्प्योत्तरग्रन्थसम्बन्धं कुर्वन्ति ।चाहिये। इस प्रकार वे अपवर्गसंज्ञक अन्तरालावस्थाकी कल्पना करके आगेके ग्रन्थका सम्बन्ध लगाते हैं।
तत्र वक्तव्यम्--विशीर्णेषु करणेषु विदेहस्य परमात्मदर्शनश्रवणमनननिदिध्यासनानि कथमिति; समवनीतप्राणस्य हि नाममात्रावशिष्टस्येति तैरूच्यते ।इसमें हमें यह कहना है कि इन्द्रियोंके उच्छिन्न हो जानेपर जो देहहीन हो गया है, उसके द्वारा परमात्मदर्शन तथा श्रवण, मनन एवं निदिध्यासन किस प्रकार किये जा सकते हैं ? इसपर वे कहते हैं कि जिसके प्राण लीन हो गये हैं और जो नाममात्र अवशिष्ट रह गया है, उसीका विद्यामें अधिकार है; क्योंकि श्रुतिके द्वारा पहले कहा गया है कि 'वह मरकर पड़ा रहता है।'
‘मृतः शेते’ इति ह्युक्तम् ।
न मनोरथेनाप्येतदुपपादयितुं शक्यते । अथ जीवन्नेवाविद्यामात्रावशिष्टो भोज्यादपावृत्त इति परिकल्प्यते, तत्तु किन्निमित्तमिति वक्तव्यम् ।किंतु मनोरथमात्रसे भी इस बातका उपपादन नहीं किया जा सकता। और यदि ऐसी कल्पना की जाय कि भोज्यवर्गसे व्यावृत्त अविद्यामात्रावशिष्ट जीवित पुरुष ही विद्याका अधिकारी है तो यह बतलाना चाहिये कि वह किस कारणसे भोज्यवर्गसे व्यावृत्त होता है।^१
समस्तद्वैतैकत्वात्मप्राप्तिनिमित्तमिति यद्युच्यते, तत् पूर्वमेव निराकृतम् । कर्मसहितेन द्वैतै-यदि यह कहा जाय कि इसका कारण समस्त द्वैतैकत्वरूप आत्मदर्शनकी प्राप्ति है तो इसका पहले ही निराकरण किया जा चुका है।^२

१. क्योंकि बिना सम्यग्दर्शनके भोज्यवर्गसे वैराग्य नहीं हो सकता।
२. क्योंकि अपरविद्यासमुच्चित कर्म हिरण्यगर्भके भोगकी प्राप्ति करानेवाला है, वह भोज्यवर्गसे निवृत्त करनेवाला नहीं है—यह बात पहले अध्यायमें कही जा चुकी है।