भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 674, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 674
६६४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

| द्भावान्मोक्षश्चोपपद्यते । स च मोक्षो ग्रहातिग्रहरूपाणामिहैव प्रलयः, प्रदीपनिर्वाणवत् । यत्तद् ग्रहातिग्रहाख्यं बन्धनं मृत्युरूपम्, तस्य यत् प्रयोजकं तत्स्वरूपनिर्धारणार्थमिदमारभ्यते-याज्ञवल्क्येति होवाच । | कारण उससे मोक्ष होना सम्भव है। वह मोक्ष दीपकके शान्त हो जानेके समान ग्रहातिग्रहरूपोंका यहीं प्रलय हो जाना है। वह जो ग्रहातिग्रहसंज्ञक मृत्युरूप बन्धन है, उसका जो प्रयोजक है, उसके स्वरूपका निश्चय करनेके लिये 'याज्ञवल्क्येति होवाच' यह कण्डिका आरम्भ की जाती है। | | अत्र केचिद्वर्णयन्ति-ग्रहातिग्रहस्य सप्रयोजकस्य विनाशेऽपि किल न मुच्यते; नामावशिष्टोऽविद्यया ऊषरस्थानीयया स्वात्मप्रभवया परमात्मनः परिच्छिन्नो भोज्याच्च जगतो व्यावृतः उच्छिन्नकामकर्मो अन्तराले व्यप्रतिष्ठते । तस्य परमात्मैकत्वदर्शनेन द्वैतदर्शनमपनेतव्यमित्यतः परं परमात्मदर्शनमारब्धव्यम्, | यहाँ कुछ (ज्ञान-कर्मसमुच्चयवादी) लोग यों कहते हैं-प्रयोजकोंके सहित ग्रहातिग्रहका नाश हो जानेपर भी विद्वान् मुक्त नहीं होता; स्वात्मासे उत्पन्न ऊषरस्थानीया अविद्याके द्वारा परमात्मासे परिच्छिन्न तथा भोज्य जगत्‌से व्यावृत वह नाममात्रावशिष्ट विद्वान् काम और कर्मोंका उच्छेद हो जानेसे अन्तरालावस्थामें रहता है ।^२ परमात्मैकत्वदर्शनके द्वारा उसकी द्वैतदृष्टिको निवृत्त करना है, इसलिये आगे परमात्मदर्शनका आरम्भ करना |


१. यह लेशाविद्या उसके बन्धनकी हेतु नहीं होती; इसलिये इसे ऊषरस्थानीया कहा है।
२. तात्पर्य यह है कि ज्ञान-कर्मसमुच्चयका अनुष्ठान करनेसे काम-कर्मादि प्रयोजकोंके सहित स्थूल-सूक्ष्म दोनों देहोंका नाश हो जानेपर भी यद्यपि उसे मुक्ति नहीं मिलती तो भी पुनः बन्धनकी योग्यता न रहनेके कारण वह मुक्ति और बन्धनके बीचकी अवस्थामें रहता है।