बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९१७ |
| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९१७ | | :--- | :--- |
| संस्कृत | हिन्दी |
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| स्तत्साहश्यप्रत्ययश्च; सर्वमन्धपरम्परेति प्रसज्येत सर्वज्ञशास्त्रप्रणयनादि; न चैतदिष्यते; अकृताभ्यागमकृतविप्रणाशदोषौ तु प्रसिद्धतरौ क्षणवादे । | रूप-विशेषकथन और उसीका सादृश्यज्ञान होगा; तब तो सर्वज्ञ बुद्धके शास्त्रप्रणयनादि सब-के-सब अन्धपरम्परा ही हैं—ऐसा कहनेका प्रसंग होगा और यह बात इष्ट नहीं है; इस क्षणिकवादमें बिना कियेकी प्राप्ति और किये हुएका नाश—ये दो दोष तो अत्यन्त प्रसिद्ध हैं। |
| दृष्टव्यपदेशहेतुः पूर्वोत्तरसहित एक एव हि शृङ्खलावत् प्रत्ययो जायत इति चेत्, 'तेनेदं सदृशम्' इति च; न वर्तमानातीतयोर्भिन्नकालत्वात्—तत्र वर्तमानप्रत्यय एकः शृङ्खलावयवस्थानीयः, अतीतश्चापरः, तौ प्रत्ययौ भिन्नकालौ; तदुभयप्रत्ययविषयस्पृक् चेच्छृङ्खलाप्रत्ययः, ततः क्षणद्वयव्यापित्वादेकस्य विज्ञानस्य पुनः क्षणवादहानिः; ममतवतादिविशेषानुपपत्तेश्च सर्वसंव्यवहारलोपप्रसङ्गः । | पूर्वदृष्टके निर्देशका हेतु पूर्वोत्तर प्रत्ययसे युक्त शृङ्खलाके समान एक ही ज्ञान होता है तथा 'उसके समान यह है' ऐसा भी प्रत्यय होता है—यदि यह कहो तो ठीक नहीं, क्योंकि वर्तमान और भूत तो भिन्न काल हैं—उनमें शृङ्खलाका अवयवरूप एक वर्तमान प्रत्यय है और दूसरा अतीत प्रत्यय है। वे दोनों प्रत्यय भिन्नकालिक हैं; यदि वह शृङ्खलाके समान प्रत्यय उन दोनों प्रत्ययोंके विषयोंको स्पर्श करनेवाला है तो एक ही विज्ञानके दो क्षणोंमें व्यापक होनेके कारण पुनः क्षणिकवादकी हानि होती है तथा मेरा-तेरा आदि भेदकी उपपत्ति न होनेके कारण सम्पूर्ण व्यवहारके लोपका प्रसङ्ग उपस्थित होता है। |
| सर्वस्य च स्वसंवेद्यविज्ञानमात्रत्वे, विज्ञानस्य च स्वच्छावबो- | सब स्वसंवेद्य विज्ञानमात्र होनेपर तथा विज्ञानको स्वच्छ ज्ञानप्रकाश- |
९१८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| ९१८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| धावभासमात्रस्वाभाव्याभ्युपगमात्, तद्दर्शिनश्चान्यस्याभावे, अनित्यदुःखशून्यानात्मत्वाद्यनेकरूपकल्पनानुपपत्तिः। न च दाडिमादेशिव विरुद्धानेकांशवत्त्वं विज्ञानस्य, स्वच्छावभासस्वाभाव्याद् ज्ञानस्य। अनित्यदुःखादीनां विज्ञानांशत्वे च सति—अनुभूयमानत्वाद् व्यतिरिक्तविषयत्वप्रसङ्गः।<br><br>अथ अनित्यदुःखाद्यात्मकत्वमेव विज्ञानस्य, तदा तद्वियोगाद् विशुद्धिकल्पनानुपपत्तिः; संयोगिमलवियोगाद्धि विशुद्धिर्भवति, यथा आदर्शप्रभृतीनाम्; न तु स्वाभाविकेन धर्मेण कस्यचिद् वियोगो दृष्टः; न ह्यग्नेः स्वाभाविकेन प्रकाशेन औष्ण्येन वा वियोगो | स्वरूप माननेपर यदि उसके साक्षी किसी अन्य पदार्थकी सत्ता नहीं मानी जायगी तो उसमें अनित्यत्व, दुःखत्व, शून्यत्व और अनात्मत्व आदि अनेकों कल्पनाओंकी उपपत्ति नहीं हो सकेगी। अनार आदिके समान विज्ञान बहुत-से विरुद्ध अंशोंसे युक्त हो—ऐसी बात भी है नहीं, क्योंकि विज्ञान तो स्वच्छ प्रकाशस्वरूप है। यदि अनित्य दुःखादिको विज्ञानका अंश माना जाय तो अनुभूत होनेवाले होनेके कारण उन्हें किसी दूसरेका विषय माननेका प्रसङ्ग होगा।<sup>१</sup><br><br>और यदि विज्ञानको अनित्य दुःखादिरूप ही माना जाय तो उनकी निवृत्तिद्वारा उसकी विशुद्धिकी कल्पना करनी सम्भव नहीं है, क्योंकि विशुद्धि तो लगे हुए मलको दूर करनेसे ही होती है, जैसे कि दर्पणादिकी; किंतु अपने स्वाभाविक धर्मसे किसीका भी वियोग होता नहीं देखा जाता; अग्निका अपने स्वाभाविक प्रकाश अथवा उष्णतासे वियोग |
१. क्योंकि विज्ञान ही अनुभव करनेवाला और अनित्यत्वादि विज्ञानके अंश ही उसके अनुभवके विषय हों—यह सम्भव नहीं है। कारण प्रमेय और प्रमाणका अंशांशिभाव अथवा धर्म-धर्मिभाव किसी भी प्रकार नहीं हो सकता, वे अवश्य पृथक्-पृथक् ही होने चाहिये।
| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थे | ९१९ |
| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थे | ९१९ |
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| संस्कृत-मूलम् | हिन्दी-अनुवाद |
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| दृष्टः; यदपि पुष्पगुणानां रक्तत्वादीनां द्रव्यान्तरयोगेन वियोजनं दृश्यते, तत्रापि संयोगपूर्वत्वमनुमीयते—बीजभावनया पुष्पफलादीनां गुणान्तरोत्पत्तिदर्शनात्; अतो विज्ञानस्य विशुद्धिकल्पनानुपपत्तिः । | होता कभी नहीं देखा गया; पुष्पके गुण लालिमादिका जो अन्य द्रव्योंके योगसे वियोग होता देखा जाता है, वहाँ भी उनकी संयोगपूर्वताका अनुमान किया जाता है, क्योंकि बीजकी भावनासे (संस्कारसे) पुष्प एवं फलादिमें अन्य गुणोंकी उत्पत्ति होती देखी जाती है; अतः [ अनित्य दुःख आदिको विज्ञानका स्वरूप माननेपर ] विज्ञानके विशुद्ध (दुःखादिरहित) होनेकी कल्पना असम्भव होगी। |
| विषयविषय्याभासत्वं च यन्मलं परिकल्प्यते विज्ञानस्य, तदप्यन्यसंसर्गाभावानुपपन्नम्; न ह्यविद्यमानेन विद्यमानस्य संसर्गः स्यात्; असति चान्यसंसर्गे यो धर्मो यस्य दृष्टः, स तत्स्वभावत्वान्न तेन वियोगमर्हति—यथाग्नेरौष्ण्यम्, सवितुर्वा प्रभा; तस्मादनित्यसंसर्गेण मलिनत्वं तद्विशु- | विज्ञानके विषय और विषयीरूपसे प्रकाशित होनारूप जिस मलकी कल्पना की जाती है, वह भी दूसरेका संसर्ग न होनेपर सम्भव नहीं है; और जो पदार्थ है ही नहीं, उससे किसी विद्यमान वस्तुका संसर्ग हो नहीं सकता;¹ इस प्रकार यदि किसी दूसरेका संसर्ग नहीं है तो जो जिसका धर्म देखा गया है, वह उसका स्वभाव होनेके कारण उससे वियुक्त नहीं हो सकता; जैसे अग्निकी उष्णता और सूर्यकी प्रभा; अतः अनित्य वस्तुओंके संसर्गसे विज्ञानकी |
१. विज्ञानवादीके मतमें विज्ञानसे भिन्न किसी अन्य वस्तुकी सत्ता है ही नहीं, इसलिये विद्यमान वस्तु विज्ञानका किसी भी अविद्यमान पदार्थसे संसर्ग होना सर्वथा असम्भव है।
९२० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| ९२० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| द्विश्च विज्ञानस्येतीयं कल्पना अन्धपरम्परैव प्रमाणशून्येत्यवगम्यते । | मलिनता और [ उनके वियोगसे ] विशुद्धि होती है—यह कल्पना अन्धपरम्परा ही है तथा इसका कोई प्रमाण भी नहीं है—ऐसा ज्ञात होता है। | | यदपि तस्य विज्ञानस्य निर्वाणं पुरुषार्थं कल्पयन्ति, तत्रापि फलाश्रयानुपपत्तिः; कण्टकविद्धस्य हि कण्टकवेधजनितदुःखनिवृत्तिः फलम्; न तु कण्टकविद्धमरणे तद्दुःखनिवृत्तिफलस्याश्रय उपपद्यते; तद्वत् सर्वनिर्वाणे, असति च फलाश्रये, पुरुषार्थकल्पना व्यर्थैव; यस्य हि पुरुषशब्दवाच्यस्य सत्त्वस्य आत्मनो विज्ञानस्य चार्थः परिकल्प्यते, तस्य पुनः पुरुषस्य निर्वाणे; कस्यार्थः पुरुषार्थ इति स्यात् । | इसके सिवा उस विज्ञानका निर्वाण ही पुरुषार्थ है—ऐसी जो वे कल्पना करते हैं, उसमें भी कोई उस फलका आश्रय होना सम्भव नहीं है; जो कांटेसे बिंधा हुआ है, उसीको कण्टकवेधजनित दुःखकी निवृत्तिरूप फल मिल सकता है; यदि कण्टकविद्ध मर जाय तो वह उस दुःखनिवृत्तिरूप फलका आश्रय नहीं हो सकता; इसी प्रकार सबकी निवृत्ति हो जानेपर कोई फलका आश्रय न रहनेके कारण पुरुषार्थकी कल्पना करना व्यर्थ ही है; क्योंकि जिस 'पुरुष' शब्दवाच्य जीव, आत्मा अथवा विज्ञानका अर्थ कल्पना किया जाता है, उस पुरुषका ही निर्वाण हो जानेपर किसके अर्थको 'पुरुषार्थ' ऐसा कहा जायगा । | | यस्य पुनरस्त्यनेकार्थदर्शी विज्ञानव्यतिरिक्त आत्मा, तस्य दृष्टस्मरणदुःखसंयोगवियोगादि | हां, जिसके मतमें अनेकों अर्थोंका साक्षी विज्ञानसे व्यतिरिक्त कोई आत्मा है, उसके सिद्धान्तानुसार देखे हुएका स्मरण, दुःखके संयोग- |
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९२१
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९२१
| सर्वमेवोपपन्नम्, अन्यसंयोगनिमित्तं कालुष्यम्, तद्वियोगनिमित्ता च विशुद्धिरिति । शून्यवादिपक्षस्तु सर्वप्रमाणविप्रतिषिद्ध इति तन्निराकरणाय नादरः क्रियते ॥७॥ | वियोगादि, दूसरेके संयोगके कारण होनेवाली मलिनता और उसके वियोगसे होनेवाली शुद्धि—ये सभी हो सकते हैं। किंतु शून्यवादीका पक्ष तो सभी प्रमाणोंसे विरुद्ध है, अतः उसके निराकरणके लिये और प्रयत्न नहीं किया जाता ॥७॥ |
आत्मा जन्म और मरणके साथ देहेन्द्रियरूप पापको ग्रहण और त्याग करता है
| यथैवैहैकस्मिन् देहे स्वप्नो भूत्वा मृत्यो रूपाणि कार्यकारणान्यतिक्रम्य स्वप्ने स्वे आत्मज्योतिष्यास्ते, एवम्— | जिस प्रकार यहां एक देहमें स्वप्न होकर आत्मा मृत्युके रूप देह और इन्द्रियोंका अतिक्रमण कर स्वप्नमें अपने आत्मज्योतिःस्वरूपमें ही स्थित रहता है, उसी प्रकार— |
स वा अयं पुरुषो जायमानः शरीरमभिसम्पद्यमानः पाप्मभिः सँसृज्यते स उत्क्रामन् म्रियमाणः पाप्मनो विजहाति ॥ ८ ॥
वह यह पुरुष जन्म लेते समय शरीरको आत्मभावसे प्राप्त होता हुआ पापोंसे (देह और इन्द्रियोंसे) संश्लिष्ट हो जाता है तथा मरते समय—उत्क्रमण करते समय पापोंको त्याग देता है ॥ ८ ॥
| स वै प्रकृतः पुरुषोऽयं जायमानः—कथं जायमानः? इत्युच्यते— शरीरं देहेन्द्रियसंघातमभिसम्पद्यमानः, शरीरे आत्मभावमापद्यमान इत्यर्थः, पाप्मभिः पाप्मसमवायिभिर्धर्माधर्माश्रयैः कार्यकारणै- | वह यह प्रकृत पुरुष जन्म लेते समय; किस प्रकार जन्म लेते समय ? सो बतलाया जाता है— शरीर यानी देहेन्द्रियसंघातको प्राप्त होता हुआ अर्थात् शरीरमें आत्मभाव करता हुआ, पापोंसे अर्थात् पापके समवायी कारण धर्म और अधर्मके आश्रयभूत देह |
९२२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४
| ९२२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४ |
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| रित्यर्थः, संसृज्यते संयुज्यते, स एवोत्क्रामञ्छरीरान्तरमूर्ध्वं क्रामन् गच्छन् म्रियमाण इत्येतस्य व्याख्यानमुत्क्रामन्निति। <br><br> तानेव संश्लिष्टान् पाप्मरूपान् कार्यकरणलक्षणान्, विजहाति तैर्वियुज्यते, तान् परित्यजति। | और इन्द्रियोंसे संसृष्ट—संयुक्त हो जाता है। तथा वही उत्क्रमण करते समय—शरीरान्तरप्राप्तिके लिये ऊपरकी ओर जाते समय, श्रुतिमें ‘म्रियमाणः’ (मरते समय) इस पदकी ही व्याख्या ‘उत्क्रामन्’ इस पदसे की गयी है, उन संश्लिष्ट देहेन्द्रियरूप पापरूपोंको त्याग देता है उनसे वियुक्त हो जाता है अर्थात् उन्हें छोड़ देता है। | | यथायं स्वप्नजाग्रद्वृत्त्योर्वर्तमाने एवैकस्मिन् देहे पाप्मरूपकार्यकरणोपादानपरित्यागाभ्यामनवरतं संचरति धिया समानः सन्, तथा सोऽयं पुरुषः उभाविहलोकपरलोकौ जन्ममरणाभ्यां कार्यकरणोपादानपरित्यागौ अनवरतं प्रतिपद्यमानः, आ संसारमोक्षात्संचरति। तस्मात् सिद्धमस्य आत्मज्योतिषोऽन्यत्वं कार्यकरणरूपेभ्यः पाप्मभ्यः, संयोगवियोगाभ्याम्, न हि तद्धर्मत्वे सति, तैरेव संयोगो वियोगो वा युक्तः ॥८॥ | जिस प्रकार यह जीव, इस एक वर्तमान शरीरमें ही बुद्धिकी समानताको प्राप्त होकर स्वप्न और जाग्रत् दोनों वृत्तियोंमें पापरूप देह तथा इन्द्रियोंका ग्रहण और त्याग करता हुआ निरन्तर संचार करता रहता है, उसी प्रकार यह पुरुष जन्म और मरणके द्वारा देहेन्द्रियका निरन्तर ग्रहण और त्याग करता हुआ इहलोक और परलोक दोनोंमें तबतक संचार करता रहता है, जबतक इस संसार-बन्धनसे मुक्त नहीं हो जाता। अतः इन संयोग और वियोगके कारण इस आत्मज्योतिका देहेन्द्रियरूप पापोंसे अन्यत्व सिद्ध होता है; उन्हींका धर्म होनेपर तो इसका उन्हींसे संयोग या वियोग होना बन ही नहीं सकता ॥ ८ ॥ |
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९२३
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९२३
आत्माके दो स्थानोंका वर्णन
| ननु न स्तोऽस्योभौ लोकौ, यौ जन्ममरणाभ्यामनुक्रमेण संचरति स्वप्नजागरिते इव, स्वप्नजागरिते तु प्रत्यक्षमवगम्येते, न त्विहलोकपरलोकौ केनचित् प्रमाणेन, तस्मादेते एव स्वप्नजागरिते इहलोकपरलोकौ । इत्युच्यते— | किंतु स्वप्न और जाग्रत्के समान यह पुरुष जन्म और मरणके द्वारा क्रमशः जिनमें संचार करता है, इसके वे दोनों लोक तो हैं नहीं; स्वप्न और जाग्रत् तो प्रत्यक्ष जाने जाते हैं, किंतु इहलोक और परलोकका तो किसी भी प्रमाणसे ज्ञान नहीं होता, अतः ये स्वप्न और जागरित ही इहलोक और परलोक हैं। इसपर कहा जाता है— |
तस्य वा एतस्य पुरुषस्य द्वे एव स्थाने भवत इदं च परलोकस्थानं च संध्यं तृतीयँ स्वप्नस्थानं तस्मिन् संध्ये स्थाने तिष्ठन्नेते उभे स्थाने पश्यतीदं च परलोकस्थानं च। अथ यथाक्रमोऽयं परलोकस्थाने भवति तमाक्रममाक्रम्योभयान् पाप्मन आनन्दाँश्च पश्यति स यत्र प्रस्वपित्यस्य लोकस्य सर्वावतो मात्रामपादाय स्वयं विहत्य स्वयं निर्माय स्वेन भासा स्वेन ज्योतिषा प्रस्वपित्यत्रायं पुरुषः स्वयं ज्योतिर्भवति ॥ ९ ॥
उस इस पुरुषके दो ही स्थान हैं—यह लोक और परलोकसम्बन्धी स्थान; तीसरा स्वप्नस्थान संध्यस्थान है। उस संध्यस्थानमें स्थित रहकर यह इस लोकरूप स्थान और परलोकस्थान—इन दोनोंको देखता है। यह पुरुष परलोकस्थानके लिये जैसे साधनसे सम्पन्न होता है, उस साधनका आश्रय लेकर यह पाप (पापका फलरूप दुःख) और आनन्द दोनों-
९२४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| ९२४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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हीको देखता है। जिस समय यह सोता है, उस समय इस सर्ववान् लोककी मात्रा (एकदेश) को लेकर, स्वयं ही इस स्थूलशरीरको अचेत करके तथा स्वयं अपने वासनामय देहको रचकर, अपने प्रकाशसे अर्थात् अपने ज्योतिःस्वरूपसे शयन करता है; इस अवस्थामें यह पुरुष स्वयं ज्योतिःस्वरूप होता है ॥ ९ ॥
| तस्यैतस्य पुरुषस्य वै द्वे एव स्थाने भवतः, न तृतीयं चतुर्थं वा, के ते ? इदं च यत् प्रतिपन्नं वर्तमानं जन्म शरीरेन्द्रियविषयवेदनाविशिष्टं स्थानं प्रत्यक्षतोऽनुभूयमानम्, परलोक एव स्थानं परलोकस्थानम्—तच्च शरीरादिवियोगोत्तरकालानुभाव्यम्। | उस इस पुरुषके निश्चय दो ही स्थान होते हैं; न तो तीसरा होता है और न चौथा ही। वे कौन-से हैं ? यह जो प्राप्त वर्तमान जन्म है, अर्थात् जो शरीर, इन्द्रिय, विषय और वेदनायुक्त प्रत्यक्षतया अनुभव होनेवाला स्थान है तथा परलोक-स्थान—जिसमें परलोक ही स्थान है; वह शरीरादिके वियोगके पश्चात् अनुभव होनेवाला है। | | ननु स्वप्नोऽपि परलोकः, तथा च सति द्वे एवेत्यवधारणमयुक्तम्। | शङ्का—किंतु स्वप्न भी तो परलोक है और यदि ऐसी बात है तो दो ही इस प्रकार निश्चय करना उचित नहीं है। | | न, कथं तर्हि ? संध्यं तत्—इहलोकपरलोकयोर्यः संधिस्तस्मिन् भवं संध्यं यत् तृतीयं तत् स्वप्नस्थानम्, तेन स्थानद्वित्वावधारणम्, न हि ग्रामयोः संधिस्तावेव ग्रामावपेक्ष्य तृतीयत्वपरिगणनमर्हति। | समाधान—ऐसी बात नहीं है, तो फिर कैसी बात है ? वह संध्य है—इहलोक और परलोककी जो संधि है, उसमें रहनेवाला जो तीसरा संध्यस्थान है, वह स्वप्नस्थान है। इसीसे स्थानोंके दो होनेका निश्चय किया गया है; क्योंकि दो ग्रामोंकी संधि उन ग्रामोंकी अपेक्षा तृतीयरूपसे गिनने योग्य नहीं मानी जाती। |
ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९२५
| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९२५ |
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| संस्कृत-शङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ (हिन्दी) |
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| कथं पुनस्तस्य परलोकस्थानस्यास्तित्वमवगम्यते ? यदपेक्ष्य स्वप्नस्थानं संध्यं भवेत्—यतस्तस्मिन् संध्ये स्वप्नस्थाने तिष्ठन् भवन् वर्तमानः एते उभे स्थाने पश्यति; के ते उभे ? इदं च परलोकस्थानं च । तस्मात् स्तः स्वप्नजागरितव्यतिरेकेणोभौ लोकौ, यौ धिया समानः सन्ननुसंचरति जन्ममरणसंतानप्रबन्धेन । | किंतु उस परलोकस्थानके अस्तित्वका ज्ञान कैसे होता है ? जिसकी अपेक्षासे स्वप्नस्थान संध्यस्थान होता है ? [ इसका उत्तर देते हैं ] क्योंकि उस संध्य स्वप्नस्थानमें स्थित अर्थात् वर्तमान रहकर पुरुष इन दोनों स्थानोंको देखता है; वे दोनों स्थान कौन-से हैं?—यह लोकरूप स्थान और परलोकस्थान । अतः स्वप्न और जागरितसे भिन्न दोनों लोक हैं ही, जिनमें कि अपनी बुद्धिकी समानताको प्राप्त होकर पुरुष जन्म-मरणपरम्पराके क्रमसे निरन्तर संचार करता रहता है । |
| (स्वप्नस्थपुरुषस्योभयस्थानावलोकनप्रकारः)<br>कथं पुनः स्वप्ने स्थितः सन्नुभौ लोकौ पश्यति किमाश्रयः, केन विधिना ? इत्युच्यते—<br>अथ कथं पश्यति ? इति शृणु—यथाक्रम आक्रामत्यनेनेत्याक्रमः—आश्रयोऽवष्टम्भ इत्यर्थः । यादृश आक्रमोऽस्य, सोऽयं यथाक्रमः; अयं पुरुषः परलोकस्थाने प्रतिपत्तव्ये निमित्ते, यथाक्रमो भवति यादृशेन परलोकप्रतिपत्तिसाधनेन विद्याकर्मपूर्वप्रज्ञालक्षणेन युक्तो | किंतु पुरुष स्वप्नमें स्थित रहकर किस प्रकार, किस आश्रयमें रहकर और किस विधिसे दोनों लोकोंको देखता है ? सो बतलाया जाता है—अब वह किस प्रकार देखता है ? सो सुनो—'यथाक्रम,' जिससे जीव आक्रमण करता है, उसे आक्रम—आश्रय अर्थात् अवष्टम्भ ( आधार ) कहते हैं । इस जीवका जैसा आक्रम हो, उसके अनुसार यह 'यथाक्रम' कहलाता है; यह पुरुष अपने प्राप्त करने योग्य परलोकस्थानरूप निमित्तमें जैसे आक्रमवाला होता है अर्थात् विद्या, कर्म और पूर्वप्रज्ञारूप जिस प्रकारके परलोकप्राप्तिके साधनसे |
९२६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| ९२६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| भवतीत्यर्थः; तमाक्रमं परलोकस्थानायोन्मुखीभूतं प्राप्ताङ्कुरीभावमिव बीजं तमाक्रममाक्रम्यावष्टभ्याश्रित्योभयान् पश्यति—बहुवचनं धर्माधर्मफलानेकत्वात्—उभयानुभयप्रकारानित्यर्थः। | युक्त होता है, उस आक्रमको--अङ्कुरभावको प्राप्त हुए बीजके समान परलोकस्थानके प्रति उन्मुख हुए उस आक्रमको आक्रान्त कर, उसका अवष्टम्भ अर्थात् आश्रय लेकर दोनों लोकोंको देखता है। 'उभयान्' इस पदमें बहुवचन धर्माधर्मके फलोंकी अनेकताके कारण है।^१ उभयान् अर्थात् उभय प्रकारके। | | कांस्तान् ? पाप्मनः पापफलानि—न तु पुनः साक्षादेव पाप्मनां दर्शनं सम्भवति, तस्मात् पापफलानि दुःखानीत्यर्थः—आनन्दांश्च धर्मफलानि सुखानीत्येतत्, तानुभयान् पाप्मन आनन्दांश्च पश्यति जन्मान्तरदृष्टवासनामयान्; यानि च प्रतिपत्तव्यजन्मविषयाणि क्षुद्रधर्माधर्मफलानि, धर्माधर्मप्रयुक्तो देवतानुग्रहाद् वा पश्यति। | उनको किनको ? पापोंको अर्थात् पापके फलोंको। साक्षात् पापोंका ही दर्शन होना तो सम्भव है नहीं, इसलिये पापोंके फल अर्थात् दुःखोंको और आनन्दोंको अर्थात् धर्मके फलरूप सुखोंको-इन जन्मान्तरदृष्ट वासनाओंके कार्य पाप (दुःख) और आनन्द दोनोंहीको देखता है। इनके सिवा, जो प्राप्त होनेवाले जन्मोंसे सम्बद्ध धर्म और अधर्मके क्षुद्र फल हैं, उन्हें भी धर्माधर्मसे प्रेरित होकर अथवा देवताके अनुग्रहसे देखता है। | | तत् कथमवगम्यते परलोकस्थानभावितपाप्मानन्ददर्शनं स्वप्ने ? | किंतु यह कैसे जाना जाता है कि स्वप्नमें परलोकस्थानमें होनेवाले सुखदुःखोंका दर्शन होता है; | | इत्युच्यते—यस्मादिह जन्मन्यननुभाव्यमपि पश्यति बहु; न च स्वप्नो नामापूर्वं दर्शनम्; | सो बतलाया जाता है-क्योंकि जिनका इस जन्ममें अनुभव नहीं हो सकता, ऐसी भी बहुत-सी बातें देखता है; और स्वप्न अपूर्वदर्शन हो--ऐसी बात है नहीं, |
१. क्योंकि वे दोनों लोक हैं तो धर्माधर्मके परिणाम ही।
| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९२७ |
| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९२७ | | :--- | :--- | | पूर्वदृष्टस्मृतिर्हि स्वप्नः प्रायेण;<br>तेन स्वप्नजागरितस्थानव्यतिरे-<br>केण इत उभौ लोकौ ।<br>यदादित्यादिबाह्यज्योतिषाम-<br>भावेऽयं कार्यकारणसंघातः पुरुषः<br>येन व्यतिरिक्तेन आत्मना ज्यो-<br>तिषा व्यवहरतीत्युक्तम्—तदेव<br>नास्ति, यद् आदित्यादिज्योति-<br>षामभावगमनम्, यत्रेदं विविक्तं<br>स्वयंज्योतिरूपलभ्येत; येन सर्व-<br>दैवायं कार्यकारणसंघातः संसृष्ट<br>एवोपलभ्यते तस्मादसत्समो-<br>ऽसन्नेव वा स्वेन विविक्तस्वभा-<br>वेन ज्योतीरूपेणात्मेति । अथ<br>क्वचिद् विविक्तः स्वेन ज्योती-<br>रूपेणोपलभ्येत बाह्याध्यात्मिक-<br>भूतभौतिकसंसर्गशून्यः, ततो<br>यथोक्तं सर्वं भविष्यतीत्येतदर्थ-<br>माह—<br>स यः प्रकृत आत्मा यत्र<br>यस्मिन् काले प्रस्वपिति प्रकर्षेण<br>स्वापमनुभवति; तदा किमुपादानः | अधिकतर तो पहले देखे हुएकी<br>स्मृतिका नाम ही स्वप्न है । अतः<br>दोनों लोक स्वप्न और जागरित-<br>स्थानोंसे भिन्न हैं ।<br>जिन आदित्यादि बाह्यज्योति-<br>योंके अभावमें यह देहेन्द्रियसंघात-<br>रूप पुरुष जिस अपनेसे भिन्न<br>आत्मज्योतिके द्वारा व्यवहार करता<br>है—ऐसा कहा गया है, सो उन<br>आदित्यादि ज्योतियोंका जो अभाव<br>होना है, जहां कि इस विशुद्ध<br>स्वयंज्योति आत्माकी उपलब्धि<br>होती है, वह स्थान ही नहीं है;<br>क्योंकि यह देहेन्द्रियसंघात सर्वदा<br>बाह्यज्योतियोंसे संश्लिष्ट ही देखा<br>जाता है; अतः अपने विविक्तस्वभाव<br>ज्योतीरूपसे यह आत्मा असत्के<br>समान अर्थात् असत् ही है । यदि<br>यह कभी बाह्य, आध्यात्मिक तथा<br>भूत और भौतिक पदार्थोंके संसर्गसे<br>शून्य अपने विशुद्ध ज्योतिःस्वरूपसे<br>उपलब्ध होता, तो ऊपर कहा हुआ<br>सब कुछ हो सकता था—इसलिये<br>श्रुति कहती है—<br>जो प्रकृत आत्मा है, वह जिस<br>समय 'प्रस्वपिति'--प्रकर्षतया स्वाप<br>(निद्रा) का अनुभव करता है, उस<br>समय वह किस उपादानवाला होकर |
९२८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| ९२८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| केन विधिना स्वपिति संध्यं स्थानं प्रतिपद्यते ? इत्युच्यते— अस्य दृष्टस्य लोकस्य जागरितलक्षणस्य, सर्वावतः सर्वमवतीति सर्वावानयं लोकः कार्यकरणसंघातो विषयवेदनासंयुक्तः, सर्वावत्त्वमस्य व्याख्यातमन्नत्रयप्रकरणे “अथो अयं वा आत्मा” इत्यादिना । सर्वा वा भूतभौतिकमात्रा अस्य संसर्गकारणभूता विद्यन्त इति सर्ववान्, सर्ववानेव सर्वावान्, तस्य सर्वावतो मात्रामेकदेशमवयवम्, अपादायापच्छिद्य आदाय गृहीत्वा—दृष्टजन्मवासनावासितः सन्नित्यर्थः स्वयमात्मनैव विहत्य देहं पातयित्वा निःसम्बोधमापाद्य—जागरिते ह्यादित्यादीनां चक्षुरादिष्वनुग्रहो देहव्यवहारार्थः, देहव्यवहारश्चात्मनो धर्माधर्मफलोपभोगप्रयुक्तः, तद्धर्माधर्मफलोपभोगोपरमणमस्मिन् देहे आत्मकर्मोपरमकृतमित्यात्मास्य | किस विधिसे सोता यानी संध्यस्थानको प्राप्त होता है ! सो बतलाया जाता है--इस जागरितरूप दृष्ट लोककी सर्वावान्--जो सबका अवन (पालन) करता है, वह यह लोक अर्थात् विषय एवं सुखदुःखादि वेदनायुक्त देहेन्द्रियसंघात, इसके सर्वावत्त्वकी व्याख्या “अथो अयं वा आत्मा” इत्यादि वाक्यद्वारा अन्नत्रयके प्रकरणमें कर दी गयी है । अथवा सम्पूर्ण भूत भौतिक मात्रा [अध्यात्मादि भागोंके साथ] इसके संसर्गकी कारणभूता है, इसलिये यह सर्ववान् है और सर्ववान् ही ‘सर्वावान्’ कहा गया है, उस सर्वावान्की मात्रा--एकदेश अर्थात् अवयवका अपादान--अपच्छेदन--आदान अर्थात् ग्रहण कर यानी दृष्ट जन्मकी वासनाओंसे सम्पन्न हो, स्वयं अर्थात् आप ही देहको विहत—चेतनाशून्य कर--जागरित अवस्थामें ही देहके व्यवहारके लिये चक्षु आदि इन्द्रियोंमें आदित्यादिका उपकार होता है और देहका व्यवहार आत्माके धर्मा-धर्मके फलोपभोगके कारण होता है, तथा इस देहमें वह धर्माधर्मके फलोपभोगकी उपरति आत्माके कर्मकी उपरतिका कारण है, इसलिये आत्मा |
ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ ९२९
ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ ९२९
| विहन्तेत्युच्यते—स्वयं निर्माय निर्माणं कृत्वा वासनामयं स्वप्नदेहं मायामयमिव, निर्माणमपि तत्कर्मापेक्षत्वात् स्वयंकर्तृकमुच्यते—स्वेन आत्मीयेन, भासा मात्रोपादानलक्षणेन भासा दीप्त्या प्रकाशेन, सर्ववासनात्मकेन अन्तःकरणवृत्तिप्रकाशेनेत्यर्थः—सा हि तत्र विषयभूता सर्ववासनामयी प्रकाशते, सा तत्र स्वयं भा उच्यते—तेन स्वेन भासा विषयभूतेन, स्वेन च ज्योतिषा तद्विषयिणा विविक्तरूपेण अलुप्तदृक्स्वभावेन तद् भारूपं वासनात्मकं विषयीकुर्वन् प्रस्वपिति । यदेवं वर्तनम्, तत् प्रस्वपितीत्युच्यते । | इसका हनन करनेवाला कहा जाता है—तथा स्वयंनिर्माण कर—मायामयके समान वासनामय स्वप्नदेह रचकर [शयन करता है।] देहका निर्माण भी आत्माके कर्मोंकी अपेक्षासे है, इसलिये वह आत्मकर्तृक कहा गया है। स्वकीय यानी अपने भाससे—मात्रोपादानरूप भास—दीप्ति अर्थात् प्रकाशसे यानी सर्ववासनात्मक अन्तःकरणवृत्तिरूप प्रकाशसे, क्योंकि वह सर्ववासनामयी वृत्ति ही वहाँ विषयभूता होकर प्रकाशित होती है, उस अवस्थामें वह स्वयं भा (प्रकाश) कही जाती है। उस अपनी विषयभूता भासे तथा उसको विषय करनेवाली विशुद्धरूपा ^१अलुप्तदृक्स्वभावा आत्मज्योतिसे उस अपने वासनात्मक प्रकाशस्वरूपको विषय करता हुआ प्रस्वाप (शयन) करता है। इस प्रकार जो रहना है, वही 'प्रस्वपिति' ऐसा कहा जाता है। | | अत्रैतस्यामवस्थायाम् एतस्मिन् काले, अयं पुरुष आत्मा, स्वयमेव विविक्तज्योतिर्भवति—बाह्याध्यात्मिकभूतभौतिकसंसर्गरहितं ज्योतिर्भवति । | यहाँ—इस अवस्थामें—इस कालमें यह पुरुष अर्थात् आत्मा स्वयं ही विशुद्धज्योतिःस्वरूप होता है अर्थात् बाह्य आध्यात्मिक भूत एवं भौतिक संसर्गसे रहित ज्योति होता है। |
१. जिसके बोधस्वरूप या साक्षीस्वभावका कभी लोप नहीं हुआ है।
बृ० उ० ५६—
९३० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| ९३० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| नन्वस्य लोकस्य मात्रोपादानं कृतम्, कथं तस्मिन् सत्यत्रायं पुरुषः स्वयंज्योतिर्भवतीत्युच्यते ?<br><br>नैष दोषः; विषयभूतमेव हि तत्, तेनैव चात्रायं पुरुषः स्वयंज्योतिर्दर्शयितुं शक्यः; न त्वन्यथासति विषये कस्मिंश्चित् सुषुप्तकाल इव; यदा पुनः सा भा वासनात्मिका विषयभूता उपलभ्यमाना भवति, तदा असिः कोशादिव निष्कृष्टः सर्वसंसर्गरहितं चक्षुरादिकार्यकरणव्यावृत्तस्वरूपमलुप्तदृगात्मज्योतिः स्वेन रूपेणावभासयद् गृह्यते। तेनात्रायं पुरुषः स्वयंज्योतिर्भवतीति सिद्धम् ॥९॥ | शङ्का— किंतु इसने तो इस लोककी [विषय-वेदनासंयुक्त] मात्राको ग्रहण किया है; फिर उसके रहते हुए यह पुरुष स्वयंज्योति होता है—ऐसा कैसे कहा जाता है ?<br><br>समाधान— यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि वह मात्रा तो विषयभूता ही होती है। इसीलिये यहाँ यह पुरुष [ आत्मा ] 'स्वयंज्योतिः' स्वरूपसे दिखाया जा सकता है, नहीं तो सुषुप्तावस्थाके समान, जब कि कोई भी विषय नहीं रहता, इस स्वयंज्योतिका दर्शन नहीं कराया जा सकता। और जिस समय कि वह वासनात्मिका ज्योति विषयभूता होकर उपलब्ध होती है, उस समय म्यानसे निकाली हुई तलवारके समान सर्वसंसर्गशून्य, चक्षु आदि कार्य-करणसे व्यावृत्तस्वरूप तथा जिसके बोध-स्वभावका कभी लोप नहीं होता, वह आत्मज्योति अपने स्वरूपसे प्रकाश करती हुई स्वयं गृहीत होती है। अतः यह सिद्ध हुआ कि इस अवस्थामें यह पुरुष स्वयंज्योति होता है ॥ ९॥ |
स्वप्नावस्थामें रथादिका अभाव है, इसलिये उस समय आत्मा स्वयंज्योति है
| नन्वत्र कथं पुरुषः स्वयंज्योतिर्येन जागरित इव ग्राह्यग्राहका- | शङ्का— किंतु इस अवस्थामें पुरुष स्वयंज्योति कैसे हो सकता है? क्योंकि जागरितके समान इस समय |
ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ ९३१
ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ ९३१
| संस्कृत मूल / भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
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| दिलक्षणःसर्वो व्यवहारो दृश्यते, चक्षुराद्यनुग्राहकाश्च आदित्याद्या लोकास्तथैव दृश्यन्ते यथा जागरिते—तत्र कथं विशेषावधारणं क्रियते—अत्रायं पुरुषः स्वयंज्योतिर्भवतीति ? | भी ग्राह्य-ग्राहकादिरूप सारा व्यवहार देखा जाता है तथा चक्षु आदि इन्द्रियोंके उपकारक आदित्यादि लोक भी उसी प्रकार देखे जाते हैं, जैसे कि जागरित-अवस्थामें देखे जाते थे, फिर 'इस अवस्था में यह पुरुष स्वयंज्योति होता है' इस प्रकार विशेषरूपसे निश्चय क्यों किया जाता है ? |
| उच्यते—वैलक्षण्यात् स्वप्नदर्शनस्य; जागरिते हि इन्द्रियबुद्धिमनआलोकादिव्यापारसंकीर्णमात्मज्योतिः; इह तु स्वप्ने इन्द्रियाभावात् तदनुग्राहकादित्याद्यालोकाभावाच्च विविक्तं केवलं भवति तस्माद् वैलक्षणम् । | समाधान-बतलाते हैं—क्योंकि स्वप्नदर्शनकी जागरितसे विलक्षणता है, जागरित-अवस्थामें आत्म-ज्योति इन्द्रिय, बुद्धि, मन और आलोकादि व्यापारसे व्याप्त रहती है किंतु यहां स्वप्नमें तो इन्द्रियोंके अभाव तथा उनके उपकारक आदित्यादिके प्रकाशके अभावके कारण वह विशुद्ध अर्थात् केवल रहती है, इसलिये यह विलक्षण है। |
| ननु तथैव विषया उपलभ्यन्ते स्वप्नेऽपि, यथा जागरिते; तत्र कथमिन्द्रियाभावाद् वैलक्षण्यमुच्यत इति ?<br><br>शृणु— | शङ्का—किंतु जिस प्रकार जागरितमें दिखायी देते हैं उसी प्रकार स्वप्नमें भी विषयोंकी उपलब्धि होती ही है, फिर इन्द्रियोंके अभावके कारण ही उसकी विलक्षणता क्यों बतायी जाती है ?<br><br>समाधान—सुनो— |
९३२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४
| ९३२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४ |
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न तत्र रथा न रथयोगा न पन्थानो भवन्त्यथ रथान् रथयोगान् पथः सृजते न तत्रानन्दा मुदः प्रमुदो भवन्त्यथानन्दान्मुदः प्रमुदः सृजते । न तत्र वेशान्ताः पुष्करिण्यः स्रवन्त्यो भवन्त्यथ वेशान्तान् पुष्करिणीः स्रवन्तीः सृजते स हि कर्ता ॥ १० ॥
उस अवस्था में न रथ हैं, न रथमें जोते जानेवाले [अश्वादि] हैं और न मार्ग ही हैं। परंतु वह रथ, रथमें जोते जानेवाले [अश्वादि] और रथके मार्गोंकी रचना कर लेता है। उस अवस्था में आनन्द, मोद और प्रमोद भी नहीं हैं, किंतु वह आनन्द, मोद और प्रमोदकी रचना कर लेता है। वहाँ छोटे-छोटे कुण्ड, सरोवर और नदियाँ नहीं हैं; वह कुण्ड, सरोवर और नदियोंकी रचना कर लेता है—वही उनका कर्ता है ॥ १० ॥
| न तत्र विषयाः स्वप्ने रथादिलक्षणाः; तथा न रथयोगाः, रथेषु युज्यन्ते इति रथयोगा अश्वादयः, तत्र न विद्यन्ते; न च पन्थानो रथमार्गा भवन्ति । अथ रथान् रथयोगान् पथश्च सृजते स्वयम् । | वहाँ—उस स्वप्नावस्था में रथादिरूप विषय नहीं हैं और न रथयोग हैं, जो रथमें जोते जाते हैं, वे रथयोग अर्थात् अश्वादि वहाँ मौजूद नहीं हैं; और न पथ-रथके मार्ग ही हैं। किंतु यह रथ, रथयोग और मार्गोंकी स्वयं रचना कर लेता है। | | कथं पुनः सृजते रथादिसाधनानां वृक्षादीनामभावे ? | शङ्का—किंतु रथादिके साधन वृक्षादिका अभाव होनेपर भी यह उनकी रचना कैसे कर लेता है ? | | उच्यते—ननूक्तम् 'अस्य लोकस्य सर्ववतो मात्रामपादाय स्वयं विहत्य स्वयं निर्माय' इति; अन्तःकरणवृत्तिरस्य लोकस्य वासना- | समाधान—बतलाते हैं, ऐसा कहा हे न कि 'इस सर्वावान् लोककी मात्राको लेकर अपनेको चेतनाशून्य कर तथा दूसरा शरीर रचकर' इत्यादि; सो अन्तःकरणकी वृत्ति ही इस |
| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९३३ |
| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९३३ |
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| मात्रा तामपादाय, रथादिवासना-<br>रूपान्तःकरणवृत्तिस्तदुपलब्धि-<br>निमित्तेन कर्मणा चोद्यमाना<br>दृश्यत्वेन व्यवतिष्ठते; तदुच्यते—<br>स्वयं निर्मायेति; तदेवाह—<br>रथादीन् सृजत इति । | लोककी वासनाकी मात्रा है, उसे<br>लेकर रथादिकी वासनारूपा जो<br>अन्तःकरणकी वृत्ति है, वह उसकी<br>उपलब्धिके निमित्तभूत कर्मसे प्रेरित<br>होकर दृश्यरूपसे स्थित होती है।<br>उसीको 'स्वयं निर्माय' इस प्रकार<br>कहा है और उसीको 'रथादीन्<br>सृजते' इन शब्दोंसे कहा है। | | न तु तत्र, करणं वा करणानु-<br>ग्राहकाणि वा आदित्यादिज्यो-<br>तींषि, तदवभास्यां वा रथादयो<br>विषया विद्यन्ते; तद्वासनामात्रं<br>तु केवलं तदुपलब्धिकर्मनिमित्त-<br>चोदितोद्भूतान्तःकरणवृत्त्याश्रयं<br>दृश्यते । तद् यस्य ज्योतिषो<br>दृश्यतेऽलुप्तदृशः, तदात्म-<br>ज्योतिस्तत्र केवलमसिमिव कोशाद्<br>विविक्तम् । | उस अवस्थामें इन्द्रिय, इन्द्रियों-<br>के अनुग्राहक आदित्यादि प्रकाश<br>अथवा उनसे प्रकाश्य रथादि विषय<br>भी नहीं हैं, उनकी उपलब्धिके हेतु-<br>भूत जो कर्म हैं, उन कर्मरूप<br>निमित्तसे प्रेरित जो अन्तःकरणकी<br>उद्भूत वृत्ति है, उसके आश्रित<br>रहनेवाली केवल उनकी वासना-<br>मात्र तो देखी जाती है। वह जिस<br>नित्यज्ञानस्वरूप ज्योतिको दिखायी<br>देती है, वह आत्मज्योति इस<br>अवस्थामें म्यानसे निकाली हुई<br>तलवारके समान शुद्ध होती है। | | तथा न तत्रानन्दाः सुखवि-<br>शेषाः, मुदो हर्षाः पुत्रादिलाभ-<br>निमित्ताः, प्रमुदस्त एव प्रकर्षो-<br>पेताः; अथ चानन्दादीन् सृजते । | इसी प्रकार उस समय आनन्द-<br>सुखविशेष, मुद्-पुत्रादिकी प्राप्तिसे<br>होनेवाले हर्ष और प्रमुद्-प्रकर्षको<br>प्राप्त हुए वे हर्ष भी नहीं हैं; किंतु<br>यह आनन्दादिको रच लेता है। | | तथा न तत्र वेशान्ताः पल्वलाः,<br>पुष्करिण्यस्तडागाः, स्रवन्त्यो नद्यो | तथा उस अवस्थामें न वेशान्त-<br>पल्वल (छोटी तलैया), न पुष्करिणी<br>तडाग और न स्रवन्ती-नदियाँ ही |
९३४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४
| ९३४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४ |
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| संस्कृत-भाष्यम् | हिन्दी-अनुवाद |
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| भवन्ति; अथ वेशान्तादीन् सृजते| वासनामात्ररूपान्, यस्मात् स हि कर्ता; तद्वासनाश्रयचित्तवृत्त्युद्भवनिमित्तकर्महेतुत्वेनेत्यवोचाम तस्य कर्तृत्वम्; न तु साक्षादेव तत्र क्रिया सम्भवति, साधनाभावात्। | है; किंतु यह उन वासनामात्ररूपी पल्वलादिकी रचना कर लेता है क्योंकि वही कर्ता है; उन विषयोंकी वासनाकी आश्रयभूता जो चित्तवृत्ति है उसके परिणामके कारण होनेवाले जो कर्म हैं, उनके कारण ही उसका कर्तृत्व बतलाया गया है, साक्षात्रूपसे ही उसमें क्रियाका होना सम्भव नहीं है; क्योंकि उसके पास क्रियाके साधनोंका अभाव है। |
| न हि कारकमन्तरेण क्रिया सम्भवति; न च तत्र हस्तपादादीनि क्रियाकारकाणि सम्भवन्ति; यत्र तु तानि विद्यन्ते जागरिते, तत्र आत्मज्योतिरवभासितैः कार्यकारणै रथादिवासनाश्रयान्तःकरणवृत्त्युद्भवनिमित्तं कर्म निर्वर्त्यते; तेनोच्यते—स हि कर्तेति; | कारकके बिना क्रियाका होना सम्भव नहीं है और वहां क्रियाके कारक हाथ-पैर आदि हैं नहीं; जहाँ जागरित-अवस्थामें वे रहते हैं वहाँ आत्मज्योतिसे प्रकाशित देह और इन्द्रियोंके द्वारा रथादिकी वासनाओंकी आश्रयभूता अन्तःकरणकी वृत्तिका उत्थानसे होनेवाला कर्म निष्पन्न हो सकता है, इसीसे ऐसा कहा जाता है कि वही कर्ता है। |
| तदुक्तम्—'आत्मनैवायं ज्योतिषास्ते पल्ययते कर्म कुरुते' इति; | और इसीसे 'वह आत्मज्योतिसे ही बैठता, इधर-उधर जाता, कर्म करता और फिर लौट आता है' |
| तत्रापि न परमार्थतः स्वतः कर्तृत्वं चैतन्यज्योतिषोऽवभासकत्वव्यतिरेकेण- यच्चैतन्यात्मज्योतिषा- | ऐसा कहा है; वहाँ भी अवभासक होनेके सिवा इस चैतन्यज्योतिका वास्तवमें स्वतः कोई कर्तृत्व नहीं है; क्योंकि आत्मा अन्तःकरणके द्वारा चैतन्यात्म- |
| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९३५ |
| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९३५ |
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| न्तःकरणद्वारेणावभासयति कार्यकारणानि, तदवभासितानि कर्मसु व्याप्रीयन्ते कार्यकारणानि, तत्र कर्तृत्वमुपचर्यत आत्मनः । यदुक्तम्—'ध्यायतीव लेलायतीव' इति, तदेवानूद्यते—'स हि कर्ता' इतीह हेत्वर्थम् ॥१०॥ | ज्योतिसे देह और इन्द्रियोंको प्रकाशित करता है और उससे प्रकाशित हुई देह और इन्द्रियां कर्ममें प्रवृत्त होती हैं, इसीसे उनमें आत्माके कर्तृत्वका उपचार किया जाता है। ऊपर जो 'मानो ध्यान करता है, मानो अत्यन्त चञ्चल होता है' ऐसा कहा है, उसीका कर्तृत्वमें हेतु दिखानेके लिये यहाँ 'वही कर्ता है' इस प्रकार अनुवाद किया गया है ॥ १० ॥ |
स्वप्नसृष्टिके विषयमें प्रमाणभूत मन्त्र
तदेते श्लोका भवन्ति । स्वप्नेन शारीरमभिप्रहत्या सुप्तः सुप्तानभिचाकशीति । शुक्रमादाय पुनरैति स्थानँ हिरण्मयः पुरुष एकहँसः ॥ ११ ॥
इस विषयमें ये श्लोक हैं—आत्मा स्वप्नके द्वारा शरीरको निश्चेष्ट कर स्वयं न सोता हुआ सोये हुए समस्त पदार्थोंको प्रकाशित करता है । वह शुद्ध-इन्द्रियमात्रारूपको लेकर पुनः जागरित स्थानमें आता है। हिरण्मय (ज्योतिःस्वरूप) पुरुष अकेला ही [ दोनों स्थानोंमें ] जानेवाला है ॥ ११ ॥
| तदेते—एतस्मिन्नुक्तेऽर्थ एते श्लोका मन्त्रा भवन्ति—<br>स्वप्नेन स्वप्नभावेन, शारीरं शरीरम्, अभिप्रहत्य निश्चेष्टमापाद्यासुप्तः स्वयमसुप्तहगादिशक्तिस्वाभाव्यात्, सुप्तान् वासनाकारोद्भूतानन्तःकरणवृत्त्याश्रयान् वा- | इस उक्त अर्थमें ये श्लोक—मन्त्र हैं—<br>स्वप्नसे—स्वप्नभावसे शारीर—शरीरको अभिप्रहत्य-निश्चेष्ट कर स्वयं अलुप्तज्ञानादिशक्तिस्वरूप होनेके कारण असुप्त रहकर सुप्त अर्थात् वासनारूपसे उद्भूत अन्तःकरणवृत्ति- |
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९३६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४
९३६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४
| ह्याध्यात्मिकान् सर्वानिव भावान् स्वेन रूपेण प्रत्यस्तमितान् सुप्तान्; अभिचाकशीति, अलुप्तया आत्मदृष्ट्या पश्यत्यवभासयतीत्यर्थः ।<br><br>शुक्रं शुद्धं ज्योतिष्मदिन्द्रियमात्रारूपम्, आदाय गृहीत्वा, पुनः कर्मणे जागरितस्थानमैत्यागच्छति, हिरण्मयो हिरण्मय इव चैतन्यज्योतिःस्वभावः, पुरुषः, एकहंसः—एक एव हन्तीत्येकहंसः—एको जाग्रत्स्वप्नेहलोकपरलोकादीन् गच्छतीत्येकहंसः ॥ ११ ॥ | के आश्रित बाह्य और आध्यात्मिक सभी भावोंको, जो अपने स्वरूपसे प्रत्यस्तमित अर्थात् सोये रहते हैं, प्रकाशित करता है। तात्पर्य यह है कि उन्हें अपनी अलुप्त आत्मदृष्टिसे देखता अर्थात् अवभासित करता है।<br><br>तथा शुक्र—शुद्ध ज्योतिष्मान् इन्द्रियमात्रारूपको ग्रहणकर वह पुनः कर्म अर्थात् जागरित स्थानमें आ जाता है। वह हिरण्मय—हिरण्मयके समान चैतन्यज्योतिःस्वरूप पुरुष एकहंस है; अकेला ही हन्ति-चलता है, इसलिये एक हंस है। वह अकेला ही जाग्रत्, स्वप्न तथा इहलोक-परलोकादिमें जाता है, इसलिये एकहंस है ॥ ११ ॥ |
प्राणेन रक्षन्नवरं कुलायं बहिष्कुलायादमृतश्चरित्वा । स ईयतेऽमृतो यत्र कामँ हिरण्मयः पुरुष एकहँसः ॥ १२ ॥
इस निकृष्ट शरीरकी प्राणसे रक्षा करता हुआ वह अमृतधर्मा शरीरसे बाहर विचरता है। वह अकेला विचरनेवाला हिरण्मय अमृत पुरुष जहां वासना होती है, वहाँ चला जाता है ॥ १२ ॥
| तथा प्राणेन पञ्चवृत्तिना रक्षन् परिपालयन्–अन्यथा मृतभ्रान्तिः स्यात, अवरं निकृष्टमनेकाशुचिसंघातत्वादत्यन्तबीभत्सम्, कुलायम् | इसी प्रकार प्राणापानादि पाँच वृत्तियोंवाले प्राणसे रक्षण-परिपालन करता हुआ, नहीं तो मरनेकी भ्रान्ति हो जाती, अतः इस अवर-निकृष्ट-अनेकों अपवित्र वस्तुओंका संघात होनेके कारण अत्यन्त बीभत्स कुलाय |