बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 935, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९२१
| सर्वमेवोपपन्नम्, अन्यसंयोगनिमित्तं कालुष्यम्, तद्वियोगनिमित्ता च विशुद्धिरिति । शून्यवादिपक्षस्तु सर्वप्रमाणविप्रतिषिद्ध इति तन्निराकरणाय नादरः क्रियते ॥७॥ | वियोगादि, दूसरेके संयोगके कारण होनेवाली मलिनता और उसके वियोगसे होनेवाली शुद्धि—ये सभी हो सकते हैं। किंतु शून्यवादीका पक्ष तो सभी प्रमाणोंसे विरुद्ध है, अतः उसके निराकरणके लिये और प्रयत्न नहीं किया जाता ॥७॥ |
आत्मा जन्म और मरणके साथ देहेन्द्रियरूप पापको ग्रहण और त्याग करता है
| यथैवैहैकस्मिन् देहे स्वप्नो भूत्वा मृत्यो रूपाणि कार्यकारणान्यतिक्रम्य स्वप्ने स्वे आत्मज्योतिष्यास्ते, एवम्— | जिस प्रकार यहां एक देहमें स्वप्न होकर आत्मा मृत्युके रूप देह और इन्द्रियोंका अतिक्रमण कर स्वप्नमें अपने आत्मज्योतिःस्वरूपमें ही स्थित रहता है, उसी प्रकार— |
स वा अयं पुरुषो जायमानः शरीरमभिसम्पद्यमानः पाप्मभिः सँसृज्यते स उत्क्रामन् म्रियमाणः पाप्मनो विजहाति ॥ ८ ॥
वह यह पुरुष जन्म लेते समय शरीरको आत्मभावसे प्राप्त होता हुआ पापोंसे (देह और इन्द्रियोंसे) संश्लिष्ट हो जाता है तथा मरते समय—उत्क्रमण करते समय पापोंको त्याग देता है ॥ ८ ॥
| स वै प्रकृतः पुरुषोऽयं जायमानः—कथं जायमानः? इत्युच्यते— शरीरं देहेन्द्रियसंघातमभिसम्पद्यमानः, शरीरे आत्मभावमापद्यमान इत्यर्थः, पाप्मभिः पाप्मसमवायिभिर्धर्माधर्माश्रयैः कार्यकारणै- | वह यह प्रकृत पुरुष जन्म लेते समय; किस प्रकार जन्म लेते समय ? सो बतलाया जाता है— शरीर यानी देहेन्द्रियसंघातको प्राप्त होता हुआ अर्थात् शरीरमें आत्मभाव करता हुआ, पापोंसे अर्थात् पापके समवायी कारण धर्म और अधर्मके आश्रयभूत देह |