बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 934, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ९२० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| द्विश्च विज्ञानस्येतीयं कल्पना अन्धपरम्परैव प्रमाणशून्येत्यवगम्यते । | मलिनता और [ उनके वियोगसे ] विशुद्धि होती है—यह कल्पना अन्धपरम्परा ही है तथा इसका कोई प्रमाण भी नहीं है—ऐसा ज्ञात होता है। | | यदपि तस्य विज्ञानस्य निर्वाणं पुरुषार्थं कल्पयन्ति, तत्रापि फलाश्रयानुपपत्तिः; कण्टकविद्धस्य हि कण्टकवेधजनितदुःखनिवृत्तिः फलम्; न तु कण्टकविद्धमरणे तद्दुःखनिवृत्तिफलस्याश्रय उपपद्यते; तद्वत् सर्वनिर्वाणे, असति च फलाश्रये, पुरुषार्थकल्पना व्यर्थैव; यस्य हि पुरुषशब्दवाच्यस्य सत्त्वस्य आत्मनो विज्ञानस्य चार्थः परिकल्प्यते, तस्य पुनः पुरुषस्य निर्वाणे; कस्यार्थः पुरुषार्थ इति स्यात् । | इसके सिवा उस विज्ञानका निर्वाण ही पुरुषार्थ है—ऐसी जो वे कल्पना करते हैं, उसमें भी कोई उस फलका आश्रय होना सम्भव नहीं है; जो कांटेसे बिंधा हुआ है, उसीको कण्टकवेधजनित दुःखकी निवृत्तिरूप फल मिल सकता है; यदि कण्टकविद्ध मर जाय तो वह उस दुःखनिवृत्तिरूप फलका आश्रय नहीं हो सकता; इसी प्रकार सबकी निवृत्ति हो जानेपर कोई फलका आश्रय न रहनेके कारण पुरुषार्थकी कल्पना करना व्यर्थ ही है; क्योंकि जिस 'पुरुष' शब्दवाच्य जीव, आत्मा अथवा विज्ञानका अर्थ कल्पना किया जाता है, उस पुरुषका ही निर्वाण हो जानेपर किसके अर्थको 'पुरुषार्थ' ऐसा कहा जायगा । | | यस्य पुनरस्त्यनेकार्थदर्शी विज्ञानव्यतिरिक्त आत्मा, तस्य दृष्टस्मरणदुःखसंयोगवियोगादि | हां, जिसके मतमें अनेकों अर्थोंका साक्षी विज्ञानसे व्यतिरिक्त कोई आत्मा है, उसके सिद्धान्तानुसार देखे हुएका स्मरण, दुःखके संयोग- |