बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 933, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 933
| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थे | ९१९ |
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| संस्कृत-मूलम् | हिन्दी-अनुवाद |
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| दृष्टः; यदपि पुष्पगुणानां रक्तत्वादीनां द्रव्यान्तरयोगेन वियोजनं दृश्यते, तत्रापि संयोगपूर्वत्वमनुमीयते—बीजभावनया पुष्पफलादीनां गुणान्तरोत्पत्तिदर्शनात्; अतो विज्ञानस्य विशुद्धिकल्पनानुपपत्तिः । | होता कभी नहीं देखा गया; पुष्पके गुण लालिमादिका जो अन्य द्रव्योंके योगसे वियोग होता देखा जाता है, वहाँ भी उनकी संयोगपूर्वताका अनुमान किया जाता है, क्योंकि बीजकी भावनासे (संस्कारसे) पुष्प एवं फलादिमें अन्य गुणोंकी उत्पत्ति होती देखी जाती है; अतः [ अनित्य दुःख आदिको विज्ञानका स्वरूप माननेपर ] विज्ञानके विशुद्ध (दुःखादिरहित) होनेकी कल्पना असम्भव होगी। |
| विषयविषय्याभासत्वं च यन्मलं परिकल्प्यते विज्ञानस्य, तदप्यन्यसंसर्गाभावानुपपन्नम्; न ह्यविद्यमानेन विद्यमानस्य संसर्गः स्यात्; असति चान्यसंसर्गे यो धर्मो यस्य दृष्टः, स तत्स्वभावत्वान्न तेन वियोगमर्हति—यथाग्नेरौष्ण्यम्, सवितुर्वा प्रभा; तस्मादनित्यसंसर्गेण मलिनत्वं तद्विशु- | विज्ञानके विषय और विषयीरूपसे प्रकाशित होनारूप जिस मलकी कल्पना की जाती है, वह भी दूसरेका संसर्ग न होनेपर सम्भव नहीं है; और जो पदार्थ है ही नहीं, उससे किसी विद्यमान वस्तुका संसर्ग हो नहीं सकता;¹ इस प्रकार यदि किसी दूसरेका संसर्ग नहीं है तो जो जिसका धर्म देखा गया है, वह उसका स्वभाव होनेके कारण उससे वियुक्त नहीं हो सकता; जैसे अग्निकी उष्णता और सूर्यकी प्रभा; अतः अनित्य वस्तुओंके संसर्गसे विज्ञानकी |
१. विज्ञानवादीके मतमें विज्ञानसे भिन्न किसी अन्य वस्तुकी सत्ता है ही नहीं, इसलिये विद्यमान वस्तु विज्ञानका किसी भी अविद्यमान पदार्थसे संसर्ग होना सर्वथा असम्भव है।