बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 950, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें९३६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४
| ह्याध्यात्मिकान् सर्वानिव भावान् स्वेन रूपेण प्रत्यस्तमितान् सुप्तान्; अभिचाकशीति, अलुप्तया आत्मदृष्ट्या पश्यत्यवभासयतीत्यर्थः ।<br><br>शुक्रं शुद्धं ज्योतिष्मदिन्द्रियमात्रारूपम्, आदाय गृहीत्वा, पुनः कर्मणे जागरितस्थानमैत्यागच्छति, हिरण्मयो हिरण्मय इव चैतन्यज्योतिःस्वभावः, पुरुषः, एकहंसः—एक एव हन्तीत्येकहंसः—एको जाग्रत्स्वप्नेहलोकपरलोकादीन् गच्छतीत्येकहंसः ॥ ११ ॥ | के आश्रित बाह्य और आध्यात्मिक सभी भावोंको, जो अपने स्वरूपसे प्रत्यस्तमित अर्थात् सोये रहते हैं, प्रकाशित करता है। तात्पर्य यह है कि उन्हें अपनी अलुप्त आत्मदृष्टिसे देखता अर्थात् अवभासित करता है।<br><br>तथा शुक्र—शुद्ध ज्योतिष्मान् इन्द्रियमात्रारूपको ग्रहणकर वह पुनः कर्म अर्थात् जागरित स्थानमें आ जाता है। वह हिरण्मय—हिरण्मयके समान चैतन्यज्योतिःस्वरूप पुरुष एकहंस है; अकेला ही हन्ति-चलता है, इसलिये एक हंस है। वह अकेला ही जाग्रत्, स्वप्न तथा इहलोक-परलोकादिमें जाता है, इसलिये एकहंस है ॥ ११ ॥ |
प्राणेन रक्षन्नवरं कुलायं बहिष्कुलायादमृतश्चरित्वा । स ईयतेऽमृतो यत्र कामँ हिरण्मयः पुरुष एकहँसः ॥ १२ ॥
इस निकृष्ट शरीरकी प्राणसे रक्षा करता हुआ वह अमृतधर्मा शरीरसे बाहर विचरता है। वह अकेला विचरनेवाला हिरण्मय अमृत पुरुष जहां वासना होती है, वहाँ चला जाता है ॥ १२ ॥
| तथा प्राणेन पञ्चवृत्तिना रक्षन् परिपालयन्–अन्यथा मृतभ्रान्तिः स्यात, अवरं निकृष्टमनेकाशुचिसंघातत्वादत्यन्तबीभत्सम्, कुलायम् | इसी प्रकार प्राणापानादि पाँच वृत्तियोंवाले प्राणसे रक्षण-परिपालन करता हुआ, नहीं तो मरनेकी भ्रान्ति हो जाती, अतः इस अवर-निकृष्ट-अनेकों अपवित्र वस्तुओंका संघात होनेके कारण अत्यन्त बीभत्स कुलाय |