बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 949, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९३५ |
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| न्तःकरणद्वारेणावभासयति कार्यकारणानि, तदवभासितानि कर्मसु व्याप्रीयन्ते कार्यकारणानि, तत्र कर्तृत्वमुपचर्यत आत्मनः । यदुक्तम्—'ध्यायतीव लेलायतीव' इति, तदेवानूद्यते—'स हि कर्ता' इतीह हेत्वर्थम् ॥१०॥ | ज्योतिसे देह और इन्द्रियोंको प्रकाशित करता है और उससे प्रकाशित हुई देह और इन्द्रियां कर्ममें प्रवृत्त होती हैं, इसीसे उनमें आत्माके कर्तृत्वका उपचार किया जाता है। ऊपर जो 'मानो ध्यान करता है, मानो अत्यन्त चञ्चल होता है' ऐसा कहा है, उसीका कर्तृत्वमें हेतु दिखानेके लिये यहाँ 'वही कर्ता है' इस प्रकार अनुवाद किया गया है ॥ १० ॥ |
स्वप्नसृष्टिके विषयमें प्रमाणभूत मन्त्र
तदेते श्लोका भवन्ति । स्वप्नेन शारीरमभिप्रहत्या सुप्तः सुप्तानभिचाकशीति । शुक्रमादाय पुनरैति स्थानँ हिरण्मयः पुरुष एकहँसः ॥ ११ ॥
इस विषयमें ये श्लोक हैं—आत्मा स्वप्नके द्वारा शरीरको निश्चेष्ट कर स्वयं न सोता हुआ सोये हुए समस्त पदार्थोंको प्रकाशित करता है । वह शुद्ध-इन्द्रियमात्रारूपको लेकर पुनः जागरित स्थानमें आता है। हिरण्मय (ज्योतिःस्वरूप) पुरुष अकेला ही [ दोनों स्थानोंमें ] जानेवाला है ॥ ११ ॥
| तदेते—एतस्मिन्नुक्तेऽर्थ एते श्लोका मन्त्रा भवन्ति—<br>स्वप्नेन स्वप्नभावेन, शारीरं शरीरम्, अभिप्रहत्य निश्चेष्टमापाद्यासुप्तः स्वयमसुप्तहगादिशक्तिस्वाभाव्यात्, सुप्तान् वासनाकारोद्भूतानन्तःकरणवृत्त्याश्रयान् वा- | इस उक्त अर्थमें ये श्लोक—मन्त्र हैं—<br>स्वप्नसे—स्वप्नभावसे शारीर—शरीरको अभिप्रहत्य-निश्चेष्ट कर स्वयं अलुप्तज्ञानादिशक्तिस्वरूप होनेके कारण असुप्त रहकर सुप्त अर्थात् वासनारूपसे उद्भूत अन्तःकरणवृत्ति- |
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