भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 951, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 951
ब्राह्मण ३ ]शाङ्करभाष्यार्थ९३७

| नीडं शरीरम्, स्वयं तु बहिरस्तस्मात् कुलायात्, चरित्वा—यद्यपि शरीरस्थ एव स्वप्नं पश्यति तथापि तत्सम्बन्धाभावात् तत्स्थ इव आकाशो बहिश्चरित्वेत्युच्यते, अमृतः स्वयममरणधर्मा, ईयते गच्छति, यत्र कामम्—यत्र यत्र कामो विषयेषु उद्भूतवृत्तिर्भवति तं तं कामं वासनारूपेणोद्भूतं गच्छति ॥ १२ ॥ | —घोंसले अर्थात् शरीरकी रक्षा करता हुआ, किंतु स्वयं उस कुलायसे बाहर विचरकर; यद्यपि वह शरीरमें रहकर ही स्वप्न देखता है, तथापि उसके सम्बन्धसे रहित होनेके कारण तदन्तर्वर्ती आकाशके समान मानो बाहर विचरकर—ऐसा कहा जाता है, स्वयं अमृत—अमरणधर्मा रहकर ईयते—जाता है, जहाँ कामना होती है अर्थात् जहाँ-जहाँ विषयोंमें कामना उद्भूतवृत्ति रहती है, वासनारूपसे उद्भूत उस-उस काम (कामनाके विषय) के प्रति जाता है ॥ १२ ॥ |


स्वप्नान्त उच्चावचमीयमानो रूपाणि देवः कुरुते बहूनि । उतेव स्त्रीभिः सह मोदमानो जक्षदुतेवापि भयानि पश्यन् ॥ १३ ॥

वह देव स्वप्नावस्थामें ऊँच-नीच भावोंको प्राप्त होता हुआ बहुत-से रूप बना लेता है। इसी प्रकार वह स्त्रियोंके साथ आनन्द मानता हुआ, [मित्रोंके साथ] हँसता हुआ तथा [व्याघ्रादि] भय देखता हुआ-सा रहता है ॥ १३ ॥

| किञ्च स्वप्नान्ते स्वप्नस्थाने, उच्चावचम्—उच्चं देवादिभावम् अवचं तिर्यगादिभावं निकृष्टं तदुच्चावचम्, ईयमानो गम्यमानः प्राप्नुवन्, रूपाणि, देवो द्योतनावान् कुरुते निर्वर्तयति वासनारूपाणि बहून्यसंख्येयानि। उतापि | इसके सिवा स्वप्नान्तमें—स्वप्न-स्थानमें ऊँच-नीच—ऊँच देवादिभाव और नीच तिर्यगादि निकृष्टभाव—ऐसे ऊँच-नीच भावोंको प्राप्त होता हुआ वह देव—द्योतनावान् पुरुष 'बहूनि'—असंख्य वासनामय रूप बना लेता है। |