बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ३०१
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ३०१
| संस्कृत-भाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| तत्कारणयोरविद्याकामयोश्चलत्वात्, कृतक्षयध्रौव्योपपत्तिः। तस्मान्न पुण्यकर्मफलपालनानन्त्याशास्त्येव। | कारणभूत अविद्या और काम चलायमान हैं, इसलिये उस कर्मफलके क्षयकी अनिवार्यता उचित ही है। अतः पुण्यकर्मफलके द्वारा अनन्तकालतक पालनकी आशा है ही नहीं। |
| अत आत्मानमेव स्वं लोकम्—<br><br>(स्वलोकशब्दार्थ-विवेचनम्) 'आत्मानम्' इति 'स्वं लोकम्' इत्यस्मिन्नर्थे, स्वं लोकमिति प्रकृतत्वात्, इह च स्वशब्दस्याप्रयोगात्— उपासीत। स य आत्मानमेव लोकमुपास्ते, तस्य किम् ? इत्युच्यते—न हास्य कर्म क्षीयते; कर्माभावादेव, इति नित्यानुवादः। यथाविदुषः कर्मक्षयलक्षणं संसारदुःखं सन्ततमेव, न तथा तदस्य विद्यत इत्यर्थः। 'मिथिलायां प्रदीप्तायां न मे दह्यति किञ्चन' इति यद्वत्। | अतः स्वलोक आत्माकी ही उपासना करे। 'आत्मानमेव लोकमुपासीत' इस वाक्यमें 'आत्मानम्' यह पद 'स्वं लोकम्' इस अर्थमें है, क्योंकि 'स्वं लोकमदृष्ट्वा' इस प्रकार 'स्व' शब्दसे प्रकरणका आरम्भ हुआ है और यहाँ 'स्व' शब्दका प्रयोग किया नहीं गया। वह जो आत्मलोककी ही उपासना करता है, उसे क्या होता है, सो बतलाते हैं—उसका कर्म क्षीण नहीं होता; क्योंकि [वस्तुतः] उस आत्मवेत्तामें कर्मका अभाव ही है, अतः यह कथन तो नित्यका अनुवादमात्र है। तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार अविद्वान्के लिये कर्मक्षयरूप संसारदुःख निरन्तर रहता है, उस प्रकार इस विद्वान्के लिये उसकी सत्ता नहीं है; जैसे कि राजा जनकने कहा था "मिथिलाके जलनेसे मेरा कुछ भी नहीं जलता।" |
| स्वात्मलोकोपासकस्य विदुषो | [भर्तृप्रपञ्चादि] कुछ अन्य व्याख्याकारोंका कथन है कि स्वात्म- |
३०२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| ३०२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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| विद्यासंयोगात्कर्मैव न क्षीयत इत्यपरे वर्णयन्ति । लोकशब्दार्थं च कर्मसमवायिनं द्विधा परिकल्पयन्ति किल—एको व्याकृतावस्थः कर्माश्रयो लोको हैरण्यगर्भाख्यः, तं कर्मसमवायिनं लोकं व्याकृतं परिच्छिन्नं य उपास्ते, तस्य किल परिच्छिन्नकर्मात्मदर्शिनः कर्म क्षीयते । तमेव कर्मसमवायिनं लोकमव्याकृतावस्थं कारणरूपमापाद्य यस्त्वूपास्ते, तस्यापरिच्छिन्नकर्मात्मदर्शित्वात्तस्य कर्म न क्षीयत इति । | लोकके उपासकका कर्म ज्ञानका संयोग होनेके कारण क्षीण नहीं होता। वे कर्मसे सम्बद्ध 'लोक' शब्दका अर्थ दो प्रकारसे कल्पना करते हैं¹—उनमें एक तो व्याकृत रूपसे स्थित कर्माधीन हैरण्यगर्भ-नामक लोक है, उस कर्मसम्बन्धी व्याकृत और परिच्छिन्न लोककी जो उपासना करता है, उस परिच्छिन्नकर्मात्मदर्शीका कर्म क्षीण हो जाता है। और जो उसी कर्मसम्बन्धी लोकको अव्याकृतरूपसे स्थित अर्थात् कारणरूपको प्राप्त करके उपासना करता है, उसका वह कर्म क्षीण नहीं होता, क्योंकि वह अपरिच्छिन्नकर्मात्मदर्शी है। |
| भवतीयं शोभना कल्पना न तु श्रौती । स्वलोकशब्देन प्रकृतस्य परमात्मनोऽभिहितत्वात् । स्वं लोकमिति प्रस्तुत्य स्वशब्दं विहायात्मशब्दप्रक्षेपेण पुनस्तस्यैव प्रतिनिर्देशादात्मानमेव लोकमुपासीतेति । तत्र कर्मसम- | उनकी यह कल्पना है तो सुन्दर, परंतु श्रुतिसम्मत नहीं है, क्योंकि श्रुतिके द्वारा तो 'स्वलोक' शब्दसे प्रकरणप्राप्त परमात्माका ही प्रतिपादन किया गया है। कारण उसने 'स्वं लोकम्' इस प्रकार आरम्भ कर फिर 'स्व' शब्दको त्याग कर उसकी जगह 'आत्मा' शब्दका प्रयोग करके उसीका 'आत्मानमेव लोकमुपासीत' |
१. यहाँ मूलमें जो 'किल' शब्द है वह इस बातका द्योतक है कि उनकी यह कल्पना केवल तर्कके आधारपर है, श्रुतिसम्मत नहीं है।
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३०३
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३०३
| संस्कृत-भाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| वायिलोककल्पनाया अनवसर एव । | इस प्रकार पुनः निर्देश किया है इसलिये यहाँ कर्मसम्बन्धी लोककी कल्पनाका तो अवसर है ही नहीं। |
| परेण च केवलविद्याविषयेण विशेषणात्—"किं प्रजया करिष्यामो येषां नोऽयमात्मायं लोकः" (बृ० उ० ४।४।२२) इति। पुत्रकर्मापरविद्याकृतेभ्यो हि लोकेभ्यो विशिनष्टि 'अयमात्मा नो लोकः' इति। "न हास्य केनचन कर्मणा लोको मीयत एषोऽस्य परमो लोकः" इति च। तैः सविशेषणैरस्यैकवाक्यता युक्ता, इहापि स्वं लोकमिति विशेषणदर्शनात्। | इसके सिवा आगेके "किं¹प्रजया करिष्यामो येषां नोऽयमात्मायं लोकः" इस केवल ज्ञानविषयक वाक्यसे उसे विशेषित भी किया गया है। यहाँ श्रुति 'अयमात्मा नो लोकः' ऐसा कहकर उसे पुत्र, कर्म और अपराविद्याद्वारा प्राप्त होनेवाले लोकोंसे पृथक् करती है। तथा यह भी कहा है "इसका यह लोक किसी भी कर्मसे नष्ट नहीं होता, यह इसका उत्कृष्ट लोक है।" उन विशेषणयुक्त वाक्योंसे इस वाक्यकी एकवाक्यता होनी चाहिये, क्योंकि यहाँ भी 'स्वं लोकम्' ऐसा विशेषण देखा जाता है। |
| अस्मात्कामयत इत्ययुक्तमिति चेत्—इह स्वो लोकः परमात्मा, तदुपासनात्स एव भवतीति स्थिते, यद्यत्कामयते तत्तदस्मादात्मनः सृजत इति तदात्मप्राप्तिव्यतिरेकेण फलवचनमयुक्तमिति चेत्, | यदि कहो कि [ऐसी बात है तो] 'इससे कामना करता है' ऐसा कहना उचित नहीं है। अर्थात् यदि ऐसी शङ्का की जाय कि यदि यहाँ स्वलोक परमात्मा ही है और उसकी उपासनासे पुरुष तद्रूप ही हो जाता है, तो ऐसा निश्चय होनेपर 'उससे जो-जो चाहता है उसी-उसीकी रचना कर लेता है' इस प्रकार आत्मप्राप्तिसे भिन्न फल बतलाना उचित नहीं है— |
१. जिन हमको केवल यह आत्मलोक ही अभीष्ट है, वे हम संतानको लेकर क्या करेंगे ?
३०४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १
| ३०४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| न; स्वलोकोपासनस्तुतिपरत्वात्; स्वस्मादेव लोकात्सर्वमिष्टं सम्पद्यत इत्यर्थः; नान्यदतः प्रार्थनीयमाप्तकामत्वात्, "आत्मनः प्राण आत्मत आशा" (छा० उ० ७। २६। १) इत्यादिश्रुत्यन्तरे यथा। | तो यह ठीक नहीं, क्योंकि यह वाक्य स्वलोककी उपासनाकी स्तुति करनेवाला है। इसका यही तात्पर्य है कि सारी इष्टसिद्धि आत्मलोकसे ही हो सकती है; इससे भिन्न और कोई वस्तु माँगने योग्य नहीं है, क्योंकि आत्मज्ञ पूर्णकाम होता है; जैसा कि "आत्मासे प्राण है, आत्मासे ही आशा है" इत्यादि अन्य श्रुतिसे सिद्ध होता है। | | सर्वात्मभावप्रदर्शनार्थो वा पूर्ववत्। यदि हि पर एवात्मा सम्पद्यते तदा युक्तः 'अस्माद्ध्येवात्मनः' इत्यात्मशब्दप्रयोगः, स्वस्मादेव प्रकृतादात्मनो लोकादित्येवमर्थः। अन्यथा 'अव्याकृतावस्थात्कर्मणो लोकात्' इति सविशेषणमवक्ष्यत् प्रकृतपरमात्मलोकव्यावृत्तये व्याकृतावस्थाव्यावृत्तये च। न ह्यस्मिन्प्रकृते | अथवा पूर्ववत् यह आत्मज्ञका सर्वात्मभाव प्रदर्शित करनेके लिये है। यदि आत्मज्ञ परमात्मा ही हो जाता है, तभी 'अस्माद्ध्येवात्मनः' इस प्रकार आत्मशब्दका प्रयोग उचित होगा। इसका अर्थ यह है कि इस स्वरूपभूत प्रकृत आत्मलोकसे। अन्यथा प्रकृत परमात्मलोक और व्याकृतावस्था (व्याकृतरूपसे स्थित ब्रह्मलोक) की व्यावृत्तिके लिये श्रुति [ लोकशब्दका ] २'अव्याकृतावस्थात्कर्मणो लोकात्' इस प्रकार विशेषणपूर्वक उल्लेख करती। अतः यहाँ 'स्व' ऐसा प्रकृत विशेषण रहते हुए, जिसकी श्रुति कोई चर्चा नहीं करती उस पर |
१. 'तस्मात्सर्वमभवत्' इस वाक्यके समान।
२. अव्याकृतरूपसे स्थित कर्मलोकसे।
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३०५
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३०५
| विशेषितेऽश्रुतान्तरालावस्था प्रतिपत्तं शक्यते ॥ १५ ॥ | और अपर ब्रह्मके मध्यकी [ अव्याकृत नामवाली ] अवस्थाको ग्रहण नहीं किया जा सकता ॥ १५ ॥ |
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कर्माधिकारी जीव किन-किन कर्मोंके कारण समस्त प्राणियोंका लोक है ?
| अथो अयं वा आत्मा। अत्राविद्वान् वर्णाश्रमाद्यभिमानो धर्मेण नियम्यमानो देवादिकर्मकर्त्तव्यतया पशुवत्परतन्त्र इत्युक्तम् । कानि पुनस्तानि कर्माणि यत्कर्त्तव्यतया पशुवत्परतन्त्रो भवति ? के वा ते देवादयो येषां कर्मभिः पशुवदुपकरोति ? इति तदुभयं प्रपञ्चयति— | अथो अयं वा आत्मा। यहाँ वर्णाश्रमादिका अभिमान रखनेवाला तथा धर्मसे नियन्त्रित अज्ञानी पुरुष देवादिसम्बन्धी कर्मकी कर्तव्यताके कारण पशुके समान परतन्त्र है—ऐसा बतलाया गया है। किंतु वे कर्म कौन-से हैं जिनकी कर्त्तव्यतासे वह पशुके समान परतन्त्र होता है ? और कौन वे देवादि हैं जिनका वह कर्मोंके द्वारा उपकार करता है ? ऐसा प्रश्न होनेपर श्रुति उन दोनोंका विस्तारपूर्वक निरूपण करती है— |
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अथो अयं वा आत्मा सर्वेषां भूतानां लोकः स यज्जुहोति यद्यजते तेन देवानां लोकोऽथ यदनुब्रूते तेन ऋषीणामथ यत्पितृभ्यो निपृणाति यत्प्रजामिच्छते तेन पितॄणामथ यन्मनुष्यान्वासयते यदेभ्योऽशनं ददाति तेन मनुष्याणामथ यत्पशुभ्यस्तृणोदकं विन्दति तेन पशूनां यदस्य गृहेषु श्वापदा वयाꣳस्या पिपीलिकाभ्य उपजीवन्ति तेन तेषां लोको यथा ह वै स्वाय लोकायारिष्टिमिच्छेदेवꣳहैवंविदे सर्वाणि भूतान्यरिष्टिमिच्छन्ति तद्वा एतद्विदितं मीमाꣳसितम् ॥ १६ ॥
बृ० उ० २०—
३०६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| ३०६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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यह आत्मा (गृही कर्माधिकारी) समस्त जीवोंका लोक (भोग्य) है। वह जो हवन और यज्ञ करता है, उससे देवताओंका लोक होता है; जो स्वाध्याय करता है, उससे ऋषियोंका, जो पितरोंके लिये पिण्डदान करता है और संतानकी इच्छा करता है, उससे पितरोंका, जो मनुष्योंको वासस्थान और भोजन देता है, उससे मनुष्योंका और जो पशुओंको तृण एवं जलादि पहुँचाता है, उससे पशुओंका लोक होता है। इसके घरमें जो [कुत्ते-बिल्ली आदि] श्वापद, पक्षी और चींटीपर्यन्त जीव-जन्तु इसके आश्रित होकर जीवन धारण करते हैं, उससे यह उनका लोक होता है। जिस प्रकार लोकमें अपने शरीरका अविनाश चाहते हैं, उसी प्रकार ऐसा जाननेवालेका सब जीव अविनाश चाहते हैं। उस इस कर्मकी अवश्य-कर्तव्यता [पञ्चमहायज्ञप्रकरणमें] ज्ञात है और [अवदानप्रकरणमें] इसकी मीमांसा की गयी है॥ १६॥
| अथो इत्ययं वाक्योपन्यासार्थः। अयं यः प्रकृतो गृही कर्माधिकृतोऽविद्वाञ्छरीरेन्द्रियसङ्घातादिविशिष्टः पिण्ड आत्मेत्युच्यते; सर्वेषां देवादीनां पिपीलिकान्तानां भूतानां लोको भोग्य आत्मेत्यर्थः; सर्वेषां वर्णाश्रमादिविहितैः कर्मभिरुपकारित्वात्। | मूलमें 'अथो' यह निपात वाक्यका उपक्रम (आरम्भ) करनेके लिये है। यह जो कर्माधिकारी अज्ञानी गृहस्थरूप शरीरेन्द्रियसङ्घातविशिष्ट प्रकृत पिण्ड है, वह 'आत्मा' कहलाता है; वह देवताओंसे लेकर चींटीपर्यन्त समस्त प्राणियोंका लोक—भोग्य है; क्योंकि वर्णाश्रमादिविहित कर्मोंके द्वारा वह सबका उपकारी है। |
| कैः पुनः कर्मविशेषैरुपकुर्वन् केषां भूतविशेषाणां लोकः? इत्युच्यते—स गृही यज्जुहोति यद्यजते, यागो देवतामुद्दिश्य स्वत्व- | वह किन कर्मविशेषोंके द्वारा किन भूतविशेषोंका उपकार करनेके कारण उनका लोक (भोग्य) होता है? सो कहा जाता है—वह गृही जो हवन और यजन करता है—देवताके उद्देश्यसे वस्तुमें स्वत्व त्यागना याग |
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ ३०७
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ ३०७
| संस्कृत-भाष्य | भाष्यार्थ |
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| परित्यागः, स एव आसेचनेनाधिको होमः तेन होमयागलक्षणेन कर्मणावश्यकर्त्तव्यत्वेन देवानां पशुवत्परतन्त्रत्वेन प्रतिबद्ध इति लोकः। | है—उसीमें जब 'आहुति देना' इतना कर्म अधिक होता है तो उसे होम कहते हैं, उस होम-यागरूप कर्मसे, उसकी अवश्यकर्तव्यताके कारण पुरुष पशुके समान देवताओंके अधीन होनेसे बँधा हुआ है—इसलिये उनका लोक (भोग्य) है। |
| अथ यदनुब्रूते स्वाध्यायमधीतेऽहरहस्तेन ऋषीणां लोकः। अथ यत्पितृभ्यो निपृणाति प्रयच्छति पिण्डोदकादि, यच्च प्रजामिच्छति प्रजार्थमुद्यमं करोति—इच्छा चोत्पत्त्युपलक्षणार्था—प्रजां चोत्पादयतीत्यर्थः, तेन कर्मणावश्यकर्त्तव्यत्वेन पितॄणां लोकः पितॄणां भोग्यत्वेन परतन्त्रो लोकः। | तथा जो अनुवचन अर्थात् नित्य-प्रति स्वाध्याय करता है, उसके कारण वह ऋषियोंका लोक है। जो पितृगणको 'निपृणाति'—पिण्डोदकादि प्रदान करता है और जो प्रजाकी इच्छा यानी संतानके लिये प्रयत्न करता है—यहाँ 'इच्छा' शब्द उत्पत्तिका उपलक्षण करानेके लिये है, तात्पर्य यह कि वह जो प्रजा उत्पन्न करता है, उस कर्मके द्वारा उसकी अवश्य-कर्तव्यताके कारण वह पितृगणका लोक अर्थात् पितरोंके भोग्यरूपसे उनका परतन्त्र लोक होता है। |
| अथ यन्मनुष्यान्वासयते भूम्युदकादिदानेन गृहे, यच्च तेभ्यो वसद्भ्योऽवसद्भ्यो वा अर्थिभ्योऽशनं ददाति, तेन मनुष्याणाम्; अथ यत्पशुभ्यस्तृणोदकं विन्दति लम्भयति, तेन पशूनाम्; यदस्य | तथा वह जो स्थान और जल आदि देकर मनुष्योंको घरमें ठहराता है तथा घरमें ठहरे हुए अथवा न ठहरे हुए भी भोजनार्थी मनुष्योंको जो भोजन देता है, उससे वह मनुष्योंका लोक है; और पशुओंको जो तृण और जल प्राप्त कराता है, उससे वह पशुओंका लोक है; एवं |
३०८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १
| ३०८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| गृहेषु श्वापदा वयांसि च पिपीलिकाभिः सह कणबलिभाण्डक्षालनाद्युपजीवन्ति, तेन तेषां लोकः। | इसके घरमें जो श्वापद, पक्षी एवं चींटी-पर्यन्त जीव-जन्तु कण, बलि तथा पात्रोंके धोवनके उपजीवी होते हैं, उससे वह उनका लोक है। | | यस्मादयमेतानि कर्माणि कुर्वन्नुपकरोति देवादिभ्यः, तस्माद्यथा ह वै लोके स्वाय लोकाय स्वस्मै देहायारिष्टिमविनाशं स्वत्वभावाप्रच्युतिमिच्छेत् स्वत्वभावप्रच्युतिभयात्पोषणरक्षणादिभिः सर्वतः परिपालयेत्, एवं हैवंविदे 'सर्वभूतभोग्योऽहमनेन प्रकारेण मया अवश्यमृणिवत्प्रतिकर्तव्यम्' इत्येवमात्मानं परिकल्पितवते सर्वाणि भूतानि देवादीनि यथोक्तानि अरिष्टिमविनाशमिच्छन्ति स्वत्वाप्रच्युत्यै सर्वतः संरक्षन्ति कुटुम्बिन इव पशून् — “तस्मादेषां तन्न प्रियम्” इत्युक्तम्। तद्वा एतत्तदेतद्यथोक्तानां कर्मणाम् ऋण- | क्योंकि इन कर्मोंको करता हुआ यह देवादिका उपकार करता है, इसलिये जिस प्रकार लोकमें अपने शरीरके लिये पुरुष अरिष्टि—अविनाश अर्थात् अपनेपनके भावकी अप्रच्युति चाहता है तथा अपनेपनके भावकी च्युतिके भयसे उसका पोषण एवं रक्षण करके सब प्रकारसे पालन करता है, उसी प्रकार इस तरह जाननेवालेका अर्थात् 'मैं समस्त भूतोंका भोग्य हूँ, मुझे ऋणीके समान इन सबका इस प्रकार अवश्य प्रतीकार करना चाहिये' इस प्रकार अपने विषयमें कल्पना करनेवालेका उपर्युक्त देवतादि समस्त भूत अरिष्टि—अविनाश चाहते हैं। जिस प्रकार कोई कुटुम्बी अपने पशुओंकी रक्षा करता है, उसी प्रकार अपने अधिकारकी अप्रच्युतिके लिये वे इसकी सब ओरसे रक्षा करते हैं; इसीसे पहले (१।४।१० मन्त्रमें) यह कहा गया है “अतः देवताओंको यह प्रिय नहीं है [ कि लोग आत्मतत्त्वको जानें ]”। वह यह अर्थात् उपर्युक्त कर्मोंका ऋणके |
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ ३०९
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ ३०९
| वदवश्यकर्तव्यत्वं पञ्चमहायज्ञप्रकरणे विदितं कर्तव्यतया मीमांसितं विचारितं चावदानप्रकरणे ॥ १६ ॥ | समान आवश्यकर्तव्यत्व पञ्चमहायज्ञप्रकरणमें विदित है तथा अवदानप्रकरणमें कर्तव्यरूपसे इसकी मीमांसा हुई है—विचार किया गया है ॥ १६ ॥ |
[प्रवृत्तिबीज-विवेचनम्]
| ब्रह्म विद्वांश्चेत्तस्मात्पशुभावात्कर्तव्यताबन्धनरूपात्प्रविमुच्यते, केनायं कारितः कर्मबन्धनाधिकारेऽवश इव प्रवर्तते, न पुनस्तद्विमोक्षणोपाये विद्याधिकार इति ।<br><br>ननूक्तं देवा रक्षन्तीति ।<br><br>बाढम्, कर्माधिकारस्वगोचरारूढानैव तेऽपि रक्षन्ति, अन्यथाकृताभ्यागमकृतनाशप्रसङ्गात् । | यदि ब्रह्मको जाननेवाला पुरुष कर्तव्यताबन्धनरूप उस पशुभावसे मुक्त होता है तो यह किसकी प्रेरणासे विवश-सा होकर कर्मबन्धनके अधिकारमें प्रवृत्त होता है तथा उससे मुक्ति पानेके उपायस्वरूप ज्ञानाधिकारमें प्रवृत्त नहीं होता ।<br><br>पूर्व०—पहले कहा जा चुका है कि देवगण उसकी रक्षा करते हैं ।^३<br><br>सिद्धान्ती—ठीक है, परंतु वे भी कर्माधिकारके द्वारा अपनी विषयताको प्राप्त हुए लोगोंकी ही रक्षा करते हैं, अन्यथा [यदि ऐसा माना जाय कि सभीकी रक्षा करते हैं तो] बिना किये कर्मकी प्राप्ति और कृतकर्मका नाश होनेका प्रसंग उपस्थित होगा । वे |
१. भूतयज्ञ, मनुष्ययज्ञ, पितृयज्ञ, देवयज्ञ और ब्रह्मयज्ञ—इन पाँच यज्ञोंका जिसमें विधान किया गया है, वह पञ्चमहायज्ञप्रकरण है ।
२. एक आहुतिकी पूर्तिके लिये लिया हुआ घृतादि हव्य अवदान कहलाता है । 'तदेतदवदयते यद्यजते स यदग्नौ जुहोति' इत्यादि अवदानप्रकरण है । अर्थात् 'जो यजन करता है यानी वह जो अग्निमें हवन करता है, वह यह अवदान करता है' इत्यादि । इसमें 'ऋणं ह वाव जायते जायमानो योऽस्ति' अर्थात् जो उत्पन्न होनेवाला है, उसे निश्चय ऋण प्राप्त होता है—इस अर्थवादद्वारा कर्मकी अवश्य-कर्तव्यताका विचार किया है ।
३. इसलिये वह नियमसे प्रवृत्तिमार्गमें ही रहता है ।
३१० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १
| ३१० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| न तु सामान्यं पुरुषमात्रं विशिष्टाधिकारानारूढम्; तस्माद्भवितव्यं तेन, येन प्रेरितोऽवश एव बहिर्मुखो भवति स्वस्माल्लोकात्। | विशिष्ट अधिकारपर आरूढ़ न हुए सामान्य पुरुषमात्रकी रक्षा नहीं करते; अतः कोई ऐसा होना चाहिये, जिससे प्रेरित होकर वह बलात्कारसे आत्मलोकसे बहिर्मुख हो जाता है। |
| नन्वविद्या सा, अविद्यावान् हि बहिर्मुखीभूतः प्रवर्तते। | पूर्व०—अच्छा तो वह अविद्या है, क्योंकि अविद्यावान् पुरुष ही बहिर्मुख होकर प्रवृत्त होता हैं। |
| सापि नैव प्रवर्तिका; वस्तुस्वरूपावर्णात्मिका हि सा; प्रवर्तकबीजत्वं तु प्रतिपद्यतेऽन्धत्वमिव गर्तादिपतनप्रवृत्तिहेतुः। | सिद्धान्ती—वह भी प्रवर्तिका नहीं है, वह तो वस्तुके स्वरूपका आवरण करनेवाली ही है। हाँ, जिस प्रकार अन्धत्व गढ़ेमें गिरनेका हेतु होता है, उसी प्रकार यह प्रवर्तकबीजरूपताको तो प्राप्त होती है। |
| एवं तर्ह्युच्यतां किं तद् यत्प्रवृत्तिहेतुरिति ? | पूर्व०—ऐसी बात है तो तुम्हीं बताओ, जो प्रवृत्तिका हेतु है, वह क्या है? |
| तदिहाभिधीयते—एषणा कामः सः, ‘स्वाभाविकीयामविद्यायां वर्तमाना बालाः पराचः कामाननुयन्ति’ इति काठकश्रुतौ, स्मृतौ च— “काम एष क्रोध एषः” (गीता ३। ३७) इत्यादि, मानवे च सर्वा प्रवृत्तिः कामहेतुक्येवेति। स एषो- | सिद्धान्ती—वह यहाँ बतलाया जाता है—वह एषणा यानी काम है। ‘स्वाभाविकी अविद्यामें रहनेवाले मूर्खलोग बाह्य कामनाओंका अनुसरण करते हैं’—ऐसा कठश्रुतिमें भी कहा है, तथा स्मृतिमें भी “यह काम, यह क्रोध” ऐसा कहा है। मानवधर्मशास्त्रमें भी सारी प्रवृत्ति कामसे ही होनेवाली है—ऐसा कहा है।¹ |
१. अकामतः क्रिया काचिद्दृश्यते न हि कस्यचित्।
यद्यद्धि कुरुते जन्तुस्तत्तत्कामस्य चेष्टितम्॥
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थे ३११
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थे ३११
| ऽर्थः सविस्तरः प्रदर्श्यत इह आ अध्यायपरिसमाप्तेः— | वही विषय यहाँ अध्यायकी समाप्तिपर्यन्त विस्तारसे प्रदर्शित किया जाता है— |
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प्रवृत्तिके बीजभूत काम और पाङ्क्तकर्मका वर्णन
आत्मैवेदमग्र आसीदेक एव सोऽकामयत जाया मे स्यादथ प्रजायेयाथ वित्तं मे स्यादथ कर्म कुर्वीयेत्येतावान्वै कामो नेच्छꣳश्च नातो भूयो विन्देत्तस्मादप्येतर्ह्येकाकी कामयते जाया मे स्यादथ प्रजायेयाथ वित्तं मे स्यादथ कर्म कुर्वीयेति स यावदप्येतेषामेकैकं न प्राप्नोत्यकृत्स्न एव तावन्मन्यते तस्यो कृत्स्नता मन एवास्यात्मा वाग्जाया प्राणः प्रजा चक्षुर्मानुषं वित्तं चक्षुषा हि तद्विन्दते श्रोत्रं दैवꣳश्रोत्रेण हि तच्छृणोत्यात्मैवास्य कर्मात्मना हि कर्म करोति स एष पाङ्क्तो यज्ञः पाङ्क्तः पशुः पाङ्क्तः पुरुषः पाङ्क्तमिदꣳ सर्वं यदिदं किञ्च तदिदꣳ सर्वमाप्नोति य एवं वेद ॥ १७ ॥
पहले एक आत्मा ही था। उसने कामना की कि 'मेरे स्त्री हो, फिर मैं प्रजारूपसे उत्पन्न होऊँ। तथा मेरे धन हो, फिर मैं कर्म करूँ।' बस इतनी ही कामना है। इच्छा करनेपर इससे अधिक कोई नहीं पाता। इसीसे अब भी एकाकी पुरुष यह कामना करता है कि मेरे स्त्री हो, फिर मैं संतानरूपसे उत्पन्न होऊँ तथा मेरे धन हो तो फिर मैं कर्म करूँ। वह जबतक इनमेंसे एक-एकको भी प्राप्त नहीं करता तबतक वह अपनेको अपूर्ण ही मानता है। उसको पूर्णता इस प्रकार होती है-मन ही इसका आत्मा है, वाणी स्त्री है, प्राण संतान है और नेत्र मानुष वित्त है, क्योंकि वह नेत्रसे ही गौ आदि मानुष वित्तको जानता है। श्रोत्र दैव-वित्त है, क्योंकि श्रोत्रसे ही वह उसे (दैववित्तको) सुनता है। आत्मा
३१२ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय १
३१२ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय १
(शरीर) ही इसका कर्म है, क्योंकि आत्मासे ही यह कर्म करता है। वह यह यज्ञ पाङ्क्त है, पशु पाङ्क्त है, पुरुष पाङ्क्त है तथा यह जो कुछ है, सब पाङ्क्त है। जो ऐसा जानता है, वह इस सभीको प्राप्त कर लेता है ॥ १७ ॥
| आत्मैवेदमग्र आसीत् । आत्मैव स्वाभाविकोऽविद्वान्कार्यकरणसङ्घातलक्षणो वर्णी, अग्रे प्राग्दारसम्बन्धात्, आत्मेत्यभिधीयते; तस्मादात्मनः पृथग्भूतं काम्यमानं जायादिभेदरूपं नासीत्; स एवैक आसीत्—जायाद्येषणाबीजभूताविद्यावानेक एवासीत् । | आत्मैवेदमग्र आसीत् । आत्मा ही अर्थात् स्वाभाविक अविद्वान् देह और इन्द्रियका संघातस्वरूप वर्णी (ब्रह्मचारी) ही अग्रे—स्त्री-सम्बन्ध होनेसे पूर्व था। इस प्रकार यहाँ [देहेन्द्रियसंघात ही] आत्मा कहा गया है। उस आत्मासे पृथग्भूत उसकी कामनाका विषय स्त्री आदि भेदरूप नहीं था। वही एक था—स्त्री आदि एषणाकी बीजभूता अविद्यासे युक्त वह अकेला ही था। | | स्वाभाविक्या स्वात्मनि कर्त्रादिकारकक्रियाफलात्मकताध्यारोपलक्षणया अविद्यावासनया वासितः सोऽकामयत कामितवान् । कथम् ? जाया कर्माधिकारहेतुभूता मे मम कर्तुः स्यात् ; तया विनाहमनधिकृत एव कर्मणि; अतः कर्माधिकारसम्पत्तये भवेज्जाया; अथाहं प्रजायेय प्रजारूपेणाहमेवोत्पद्येय । | उसने अपनेमें कर्त्रादि-कारक, क्रिया एवं कर्मात्मकताकी अध्यारोपरूपा स्वाभाविकी अविद्याजनित वासनासे युक्त होकर कामना की। किस प्रकार कामना की ? मेरे अर्थात् मुझ कर्ताके कर्माधिकारकी हेतुभूता स्त्री हो, क्योंकि उसके बिना तो मैं कर्मका अनधिकारी ही हूँ; अतः कर्माधिकारकी प्राप्तिके लिये मुझे स्त्री प्राप्त हो; फिर मैं प्रजात होऊँ अर्थात् प्रजारूपसे मैं स्वयं ही उत्पन्न होऊँ। | | अथ वित्तं मे स्यात्कर्मसाधनं गवादिलक्षणम् अथाहमभ्युदयनिः- | तथा मेरे कर्मका साधनभूत गौ आदिरूप धन हो, फिर मैं अभ्युदय |
| ब्राह्मण ४ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ३१३ |
| ब्राह्मण ४ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ३१३ |
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| संस्कृत (शाङ्करभाष्यम्) | हिन्दी (भाष्यार्थ) |
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| श्रेयस्साधनं कर्म कुर्वीय; येनाहमन्नृणी भूत्वा देवादीनां लोकान् प्राप्नुयाम्, तत्कर्म कुर्वीय; काम्यानि च पुत्रवित्तस्वर्गादिसाधनानि। एतावान्वै काम एतावद्विषयपरिच्छिन्न इत्यर्थः। | और निःश्रेयसका साधनरूप कर्म करूँ; अर्थात् वह कर्म करूँ, जिससे मैं अनृण होकर देवादिके लोकोंको प्राप्त कर सकूँ तथा पुत्र, धन और स्वर्गादिके साधन काम्य कर्म भी करूँ। इतना ही अर्थात् इतने विषयसे परिच्छिन्न ही काम है। |
| एतावानेव हि कामयितव्यो विषयो यदुत जायापुत्रवित्तकर्माणि साधनलक्षणाैषणा; लोकाश्च त्रयो मनुष्यलोकः पितृलोको देवलोक इति फलभूताः साधनैषणायाश्चास्याः। तदर्था हि जायापुत्रवित्तकर्मलक्षणा साधनैषणा, तस्मात्सा एकैवैषणा या लोकैषणा। सैकैव सत्येषणा साधनापेक्षेति द्विधा; अतोऽवधारयिष्यति "उभे ह्येते एषणे एव" (३।५।१) इति। | ये जो स्त्री, पुत्र, वित्त और कर्म हैं—बस, इतना ही कामना करनेयोग्य विषय है, यह साधनरूपा एषणा है; मनुष्यलोक, पितृलोक और देवलोक-ये तीनों लोक इस साधनैषणाके फलस्वरूप हैं। इन्हीं तीनों लोकोंके लिये जाया, पुत्र, वित्त एवं कर्मरूपा साधन-एषणा होती है; अतः यह एक ही एषणा है, जो लोकैषणा कहलाती है। वह एषणा एक होनेपर भी साधनकी अपेक्षावाली है, इसलिये दो प्रकारकी है। इसीसे श्रुति यह निश्चय करेगी कि "ये दोनों एषणाएँ ही हैं।" |
| फलार्थत्वात्सर्व्वारम्भस्य लोकैषणार्थप्राप्ता उक्तैवेति। एतावान्वा एतावानेव काम इत्यवध्रियते। | सारे आरम्भ फलके ही लिये होते हैं, अतः अर्थतः प्राप्त लोकैषणाका वर्णन कर ही दिया गया। एतावान् वै—इतना ही काम है, इस प्रकार उसीका निश्चय किया जाता है। |
| ३१४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
| ३१४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
|---|
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| भोजनेऽभिहिते तृप्तिर्न हि पृथग्विधेया, तदर्थत्वाद्भोजनस्य। ते एते एषणे साध्यसाधनलक्षणे कामः, येन प्रयुक्तोऽविद्वान्वश एव कोशकारवदात्मानं वेष्टयति—कर्ममार्ग एवात्मानं प्रणिदधद्बहिर्मुखीभूतो न स्वं लोकं प्रतिजानाति। तथा च तैत्तिरीयके— | भोजनका वर्णन कर दिये जानेपर तज्जनित तृप्तिका अलग वर्णन करनेकी आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि भोजन तो उसीके लिये होता है। वे ये साध्य-साधनरूपा एषणाएँ काम हैं, जिस (काम) से प्रेरित हुआ अज्ञानी पुरुष रेशमके कीड़ेके समान अपनेको विवश होकर लपेट लेता है तथा अपनेको कर्ममार्गमें ही अटकाये रखकर बहिर्मुख हो आत्मलोकको नहीं जान पाता। ऐसा ही तैत्तिरीयकमें भी कहा है— |
| “अग्निमुग्धो हैव धूमतान्तः स्वं लोकं न प्रतिजानाति” इति। | “जो पुरुष अग्निसम्बन्धी कर्मोंमें मुग्ध है, उसकी चरमगति धूममार्ग ही है, वह आत्मलोकको नहीं जान पाता” इत्यादि। |
| कथं पुनरेतावत्त्वमवधार्यते कामानाम्? अनन्तत्वात्। अनन्ता हि कामाः, इत्येतदाशङ्क्य हेतुमाह—यस्माद् न इच्छन् च न—इच्छन्नपि, अतोऽस्मात्फलसाधनलक्षणाद् भूयोऽधिकतरं न विन्देन्न लभेत। न हि लोके फलसाधनव्यतिरिक्तं दृष्टमदृष्टं वा लब्धव्यमस्ति। लब्धव्य- | किंतु कामनाओंकी एतावत्ता (इतनापन) कैसे निश्चय की जाती है, क्योंकि वे तो अनन्त हैं। कामनाओंका तो कोई अन्त नहीं है—ऐसी आशङ्का करके श्रुति उसका कारण बतलाती है; क्योंकि इच्छा करनेपर भी पुरुष इस फल और साधनभूत कामनासे अधिक कुछ भी प्राप्त नहीं कर सकता। लोकमें फल और साधनसे व्यतिरिक्त कोई भी दृष्ट या अदृष्ट प्राप्तव्य पदार्थ नहीं है। कामना तो किसी प्राप्तव्य विषयके लिये ही |
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ ३१५
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ ३१५
| विषयो हि कामः, तस्य चैतद्व्यतिरेकेणाभावात् युक्तं वक्तुम् 'एतावान्वै कामः' इति । | होती है और वह इसके सिवा है नहीं; इसलिये यह कहना उचित ही है कि 'बस इतना ही काम है।' |
| एतदुक्तं भवति—दृष्टार्थमदृष्टार्थं वा साध्यसाधनलक्षणम् अविद्यावत्पुरुषाधिकारविषयमेषणाद्वयं कामः, अतोऽस्माद्विदुषा व्युत्थातव्यमिति । | यहाँ कहना यह है कि दृष्ट अथवा अदृष्ट फलवाला साध्य-साधनरूप तथा अज्ञानी पुरुषके अधिकारका विषयभूत जो एषणाद्वय है, वही काम है, अतः विद्वान्को इससे ऊपर उठना चाहिये। |
| यस्मादेवमविद्वानात्मा कामी पूर्वं कामयामास, तथा पूर्वतरोऽपि, एषा लोकस्थितिः प्रजापतेश्चैवमेष सर्ग आसीत् । सोऽबिभेदविद्यया, ततः कामप्रयुक्त एकाक्यरमणोऽरत्युपघाताय स्त्रियमैच्छत्, तां समभवत्, ततः सर्गोऽयमासीदिति ह्युक्तम् । तस्मात्तत्सृष्टौ एतर्ह्येतस्मिन्नपि काले एकाकी सन्प्राग्दारक्रियातः कामयते—जाया मे स्यात्, अथ प्रजायेय अथ वित्तं मे स्यात्, अथ कर्म कुर्वीय—इत्युक्तार्थं वाक्यम्। | क्योंकि वह अविद्वान् कामी आत्मा पहले इसी प्रकार कामना करता था, अतः उससे पूर्वंतरने भी ऐसे ही कामना की होगी, क्योंकि यह लोकस्थिति है; और प्रजापतिका यह सर्ग भी इसी प्रकार हुआ है। पहले अज्ञानवश उसे भय हुआ, फिर कामसे प्रेरित होकर अकेले रति न करनेके कारण उस अरतिकी निवृत्तिके लिये उसने स्त्रीकी इच्छा की, उससे वह संयुक्त हुआ और फिर यह सृष्टि हुई-इस प्रकार पहले कहा जा चुका है। इसलिये इस समय भी उसकी सृष्टिमें स्त्रीपरिग्रहसे पूर्व एकाकी पुरुष यह कामना करता है कि मेरे स्त्री हो, फिर मैं प्रजारूपसे उत्पन्न होऊँ तथा मेरे धन हो और फिर मैं कर्म करूँ-इस प्रकार यह पूर्वोक्त अर्थवाला वाक्य है। |
३१६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| ३१६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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| स एवं कामयमानः सम्पादयंश्च जायादीन्यावत्स एतेषां यथोक्तानां जायादीनामेकैकमपि न प्राप्नोति, अकृत्स्नोऽसम्पूर्णोऽहमित्येवं तावदात्मानं मन्यते । पारिशेष्यात्समस्तानेवैतान्सम्पादयति यदा, तदा तस्य कृत्स्नता । | इस प्रकार कामना करके स्त्री आदिका सम्पादन करनेवाला यह पुरुष जबतक इन पूर्वोक्त स्त्री आदिमेंसे एकको भी प्राप्त नहीं कर लेता तबतक यह अपनेको 'मैं असम्पूर्ण हूँ' ऐसा मानता है । फलतः जब यह इन सभीका सम्पादन कर लेता है, तभी उसकी पूर्णता होती है । | | यदा तु न शक्नोति कृत्स्नतां सम्पादयितुं तदा अस्य कृत्स्नत्वसम्पादनायाह—तस्यो तस्याकृत्स्नत्वाभिमानिनः कृत्स्नता इयम् एवं भवति कथम् ? अयं कार्यकरणसङ्घातः प्रविभज्यते; तत्र मनोऽनुवृत्ति हि इतरत्सर्वं कार्यकरणजातमिति मनः प्रधानत्वादात्मैवात्मा। यथा जायादीनां कुटुम्बपतिरात्मैव तदनुकारित्वाज्जायादिचतुष्टयस्य; एवमिहापि मन आत्मा परिकल्पते कृत्स्नतायै। | किंतु जब यह उस पूर्णताका सम्पादन करनेमें समर्थ नहीं होता, उस समय उसके पूर्णत्वके सम्पादनके लिये श्रुति इस प्रकार कहती है—उस अपूर्णताके अभिमानीकी यह पूर्णता इस प्रकार होती है । किस प्रकार ?—[उसके] इस देहेन्द्रियसंधातका विभाग किया जाता है, उसमें अन्य सारा कार्यकारणसमुदाय मनका अनुसरण करनेवाला है, इसलिये प्रधान होनेके कारण उसमें मन ही आत्माके समान आत्मा है । जिस प्रकार परिवारका स्वामी स्त्री आदिका आत्मा होता है, क्योंकि [स्त्री, पुत्र, धन और कर्म—ये] चारों उसका अनुसरण करनेवाले होते हैं, उसी प्रकार यहाँ भी पूर्णताके लिये मन आत्मा है—ऐसी कल्पना की गयी है । |
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ ३१७
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ ३१७
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| तथा वाग्जाया, मनोऽनुवृत्तित्वसामान्याद्वाचः । वागिति शब्दश्चोदनादिलक्षणः, मनसा श्रोत्रद्वारेण गृह्यतेऽवधार्यते प्रयुज्यते च, इति मनसो जायेव वाक् । ताभ्यां च वाङ्मनसाभ्यां जायापतिस्थानीयाभ्यां प्रसूयते प्राणः कर्मार्थम्, इति प्राणः प्रजेव । तत्र प्राणचेष्टादिलक्षणं कर्म चक्षुर्दृष्टवित्तसाध्यं भवतीति चक्षुर्मानुषं वित्तम् । तद् द्विविधं वित्तं मानुषमितरच्च; अतो विशिनष्टीतरवित्तनिवृत्त्यर्थं मानुषमिति । गवादि हि मनुष्यसम्बन्धि वित्तं चक्षुर्ग्राह्यं कर्मसाधनम्; तस्मात्तत्स्थानीयम्, तेन सम्बन्धाच्चक्षुर्मानुषं वित्तम्; चक्षुषा हि यस्मात्तन्मानुषं वित्तं विन्दते गवाद्युपलभत इत्यर्थः । | तथा वाणी स्त्री है; क्योंकि मनका अनुवर्तन करना यह स्त्रीके साथ वाणीकी समानता है । 'वाक्' यह विधि-निषेधरूप शब्द है, यह श्रोत्रेन्द्रियद्वारा मनसे गृहीत, निश्चित और प्रयुक्त होता है, इसलिये वाक् मनकी स्त्रीके समान है । उन पति-पत्नीस्थानीय मन और वाणीसे कर्मसम्पादनके लिये प्राणका जन्म होता है, इसलिये प्राण उनकी संतानके समान है । वहाँ प्राणचेष्टादिरूप कर्म नेत्रसे दिखायी देनेवाले धनसे साध्य है, इसलिये नेत्र मानुष वित्त है । वित्त दो प्रकारका होता है—मानुष और अमानुष; अतः अमानुष वित्तकी निवृत्तिके लिये 'मानुषम्' यह विशेषण दिया गया है । गौ आदि मनुष्यसम्बन्धी वित्त नेत्रग्राह्य और कर्मका साधन है, इसलिये वह मानुष वित्तस्थानीय है । उससे सम्बन्ध रखनेके कारण नेत्र मानुष वित्त है, क्योंकि नेत्रसे ही पुरुष मानुष वित्तको यानी गौ आदिको देखता है । |
| किं पुनरितरद्वित्तम् ? श्रोत्रं दैवं | तो फिर दूसरा (अमानुष) वित्त क्या है ? 'श्रोत्र' यह दैव वित्त है, |
| देवविषयत्वाद्धिज्ञानस्य । विज्ञानं दैवं वित्तम्; तदिह श्रोत्रमेव | क्योंकि विज्ञान देवविषयक होता है । विज्ञान दैव वित्त है, यहाँ उस (विज्ञान) की सम्पत्तिका विषय श्रोत्र ही वह |
३१८ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय १
३१८ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय १
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| सम्पत्तिविषयम् । कस्मात् ? श्रोत्रेण हि यस्मात्तद्दैवं वित्तं विज्ञानं शृणोति; अतः श्रोत्राधीनत्वाद्विज्ञानस्य श्रोत्रमेव तदिति । | (दैव वित्त) है। क्यों? क्योंकि पुरुष श्रोत्रसे ही उस दैव वित्त विज्ञानको सुनता है; अतः विज्ञान श्रोत्रके अधीन होनेके कारण श्रोत्र ही वह (दैव वित्त) है। |
| किं पुनरेतैरात्मादिवित्तान्तैरिह निर्वर्त्यं कर्म ? इत्युच्यते— | किंतु इन आत्मासे लेकर वित्तपर्यन्त पदार्थोंसे निष्पन्न होनेवाला यहाँ कौन-सा कर्म है? सो बतलाया जाता है— |
| आत्मैव—आत्मेति शरीरमुच्यते । | आत्मा ही [इसका कर्म है]। 'आत्मा' शब्दसे यहाँ शरीरका कथन होता है। |
| कथं पुनरात्मा कर्मस्थानीयः? अस्य कर्महेतुत्वात् । कथं कर्महेतुत्वम् ? आत्मना हि शरीरेण यतः कर्म करोति। तस्याकृत्स्नत्वाभिमानिन एवं कृत्स्नता सम्पन्ना—यथा बाह्या जायादिलक्षणा एवम् । | किंतु यह आत्मा कर्मस्थानीय कैसे है? क्योंकि यह कर्मका हेतु है। यह कर्मका हेतु किस प्रकार है? क्योंकि इस आत्मा यानी शरीरसे ही जीव कर्म करता है। किस प्रकार जायादिरूपा बाह्य अपूर्णता है, उसी प्रकार उस शरीरकी अपूर्णताका अभिमान करनेवालेकी इस प्रकार (यानी ऐसा जाननेसे) पूर्णता निष्पन्न हो जाती है। |
| तस्मात्स एष पाङ्क्तः पञ्चभिर्निर्वृत्तः पाङ्क्तो यज्ञो दर्शनमात्रनिर्वृत्तोऽकर्मिणोऽपि । | इसलिये वह यह (आत्म-दर्शन) पाङ्क्त है; पाङ्क्त यानी पाँचके द्वारा निष्पन्न हुआ यज्ञ है। अर्थात् कर्म न करनेवालेके द्वारा भी यह केवल दृष्टिमात्रसे निष्पन्न होता है। |
| कथं पुनरस्य पञ्चत्वसम्पत्तिमात्रेण यज्ञत्वम्? उच्यते—यस्मा- | किंतु पञ्चत्वके सम्पादनमात्रसे इसका यज्ञत्व कैसे सिद्ध होता है? सो बतलाया जाता है; क्योंकि बाह्ययज्ञ |
ब्राह्मण ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३१९
ब्राह्मण ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३१९
| द्वाह्योऽपि यज्ञः पशुपुरुषसाध्यः, स च पशुः पुरुषश्च पाङ्क्त एव यथोक्तमनआदिपञ्चत्वयोगात् । तदाह—पाङ्क्तः पशुर्गवादिः, पाङ्क्तः पुरुषः—पशुत्वेऽप्यधिकृतत्वेनास्य विशेषः पुरुषस्येति पृथक्पुरुषग्रहणम् । किं बहुना ? पाङ्क्तमिदं सर्वं कर्मसाधनं फलं च, यदिदं किञ्च यत्किञ्चिदिदं सर्वम् । एवं पाङ्क्तं यज्ञमात्मानं यः सम्पादयति स तदिदं सर्वं जगदात्मत्वेनाप्नोति य एवं वेद ॥ १७ ॥ | भी पुरुष और पशुसे साध्य है और वह पुरुष एवं पशु भी उपर्युक्त मन आदि पञ्चत्वके सम्बन्धसे पाङ्क्त ही हैं। यही बात श्रुति कहती है—पशु यानी गौ आदि पाङ्क्त हैं, पुरुष पाङ्क्त है। पुरुष भी यद्यपि पशु ही है, तथापि अधिकारी होनेसे इसकी विशेषता है; इसलिये इसे अलग ग्रहण किया है। अधिक क्या ? यह कर्मका साधन और फल सभी पाङ्क्त है। तथा यह जो कुछ भी है सभी पाङ्क्त है। इस प्रकार जो अपनेको पाङ्क्तयज्ञरूपसे भावना करता है, अथवा जो इस प्रकार जानता¹ है, वह इस सम्पूर्ण जगत्को आत्मस्वरूपसे प्राप्त कर लेता है ॥ १७ ॥ |
इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये प्रथमाध्याये चतुर्थ-
सृष्ट्यादिसर्वात्मताब्राह्मणम् ॥ ४ ॥
पञ्चम ब्राह्मण
सप्तान्नसृष्टि, उसका विभाग और व्याख्या
| उपक्रमः<br>यत्सप्तान्नानि मेधया । अविद्या प्रस्तुता, तत्राविद्वानन्यां देवतामुपास्ते ‘अन्यो- | ‘यत्सप्तान्नानि मेधया’ इत्यादि मन्त्रसे पञ्चम ब्राह्मणका आरम्भ होता है। यहाँ अविद्याका प्रकरण है। तहाँ अविद्वान् ‘यह ( देवता ) अन्य |
१. यानी साध्य और साधनरूप पाङ्क्तको जानकर उसे आत्मस्वरूपसे अनुसंधान करता है।
३२० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १
३२० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १
| ऽसावन्योऽहमस्मि' इति। स वर्णाश्रमाभिमानः कर्मकर्तव्यतया नियतो जुहोत्यादिकर्मभिः कामप्रयुक्तो देवादीनामुपकुर्वन्सर्वेषां भूतानां लोक इत्युक्तम्। यथा च स्वकर्मभिरेकैकैन सर्वैर्भूतैरसौ लोको भोज्यत्वेन सृष्टः, एवमसावपि जुहोत्यादिपाङ्क्तकर्मभिः सर्वाणि भूतानि सर्वं च जगदात्मभोज्यत्वेनासृजत्। | है और मैं अन्य हूँ' इस भावनासे अन्य देवताकी उपासना करता है। वह वर्णाश्रमका अभिमान रखनेवाला पुरुष कर्मकी कर्तव्यतासे नियन्त्रित होकर कामनासे प्रेरित हो होम-यागादि कर्मोंद्वारा देवता आदिका उपकार करनेके कारण समस्त भूतोंका लोक (भोग्य) है— ऐसा पहले कहा गया। जिस प्रकार एक-एक करके सभी प्राणियोंने अपने कर्मोंद्वारा उस लोकको भोज्यरूपसे उत्पन्न किया है, उसी प्रकार उस (कर्माधिकारी) ने भी याग-होमादि पाङ्क्तकर्मोंद्वारा सम्पूर्ण भूतोंको तथा सारे संसारको अपने भोग्यरूपसे रचा। | | एवमेकैकः स्वकर्मविद्यानुरूप्येण सर्वस्य जगतो भोक्ता भोज्यं च, सर्वस्य सर्वः कर्ता कार्यं चेत्यर्थः। | इस प्रकार प्रत्येक जीव अपने कर्म और ज्ञानके अनुसार सारे जगत्का भोक्ता और भोग्य है, तात्पर्य यह है कि सभी सबके कर्ता और कार्य हैं। | | एतदेव च विद्याप्रकरणे मधुविद्यायां वक्ष्यामः—'सर्वं सर्वस्य कार्यं मधु' इत्यात्मैकत्वविज्ञाना-र्थम्। | ज्ञानके प्रकरणमें आत्मैकत्वके ज्ञानके लिये यही बात हम मधुविद्याके प्रसंगमें कहेंगे कि 'सभी सबके कार्य यानी मधु हैं।' | | यदसौ जुहोतीत्यादिना पाङ्क्तेन काम्येन कर्मणा आत्मभोज्यत्वेन जगदसृजत विज्ञानेन च, तज्जग- | उस कर्ताने जो होम-यागादि पाङ्क्त और काम्यकर्मसे तथा अपने विज्ञानके द्वारा अपने भोज्यरूपसे इस जगत्की रचना की, वह सारा जगत् कार्य- |