बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 310, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३०४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
|---|
| न; स्वलोकोपासनस्तुतिपरत्वात्; स्वस्मादेव लोकात्सर्वमिष्टं सम्पद्यत इत्यर्थः; नान्यदतः प्रार्थनीयमाप्तकामत्वात्, "आत्मनः प्राण आत्मत आशा" (छा० उ० ७। २६। १) इत्यादिश्रुत्यन्तरे यथा। | तो यह ठीक नहीं, क्योंकि यह वाक्य स्वलोककी उपासनाकी स्तुति करनेवाला है। इसका यही तात्पर्य है कि सारी इष्टसिद्धि आत्मलोकसे ही हो सकती है; इससे भिन्न और कोई वस्तु माँगने योग्य नहीं है, क्योंकि आत्मज्ञ पूर्णकाम होता है; जैसा कि "आत्मासे प्राण है, आत्मासे ही आशा है" इत्यादि अन्य श्रुतिसे सिद्ध होता है। | | सर्वात्मभावप्रदर्शनार्थो वा पूर्ववत्। यदि हि पर एवात्मा सम्पद्यते तदा युक्तः 'अस्माद्ध्येवात्मनः' इत्यात्मशब्दप्रयोगः, स्वस्मादेव प्रकृतादात्मनो लोकादित्येवमर्थः। अन्यथा 'अव्याकृतावस्थात्कर्मणो लोकात्' इति सविशेषणमवक्ष्यत् प्रकृतपरमात्मलोकव्यावृत्तये व्याकृतावस्थाव्यावृत्तये च। न ह्यस्मिन्प्रकृते | अथवा पूर्ववत् यह आत्मज्ञका सर्वात्मभाव प्रदर्शित करनेके लिये है। यदि आत्मज्ञ परमात्मा ही हो जाता है, तभी 'अस्माद्ध्येवात्मनः' इस प्रकार आत्मशब्दका प्रयोग उचित होगा। इसका अर्थ यह है कि इस स्वरूपभूत प्रकृत आत्मलोकसे। अन्यथा प्रकृत परमात्मलोक और व्याकृतावस्था (व्याकृतरूपसे स्थित ब्रह्मलोक) की व्यावृत्तिके लिये श्रुति [ लोकशब्दका ] २'अव्याकृतावस्थात्कर्मणो लोकात्' इस प्रकार विशेषणपूर्वक उल्लेख करती। अतः यहाँ 'स्व' ऐसा प्रकृत विशेषण रहते हुए, जिसकी श्रुति कोई चर्चा नहीं करती उस पर |
१. 'तस्मात्सर्वमभवत्' इस वाक्यके समान।
२. अव्याकृतरूपसे स्थित कर्मलोकसे।