बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 309, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 309
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३०३
| संस्कृत-भाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| वायिलोककल्पनाया अनवसर एव । | इस प्रकार पुनः निर्देश किया है इसलिये यहाँ कर्मसम्बन्धी लोककी कल्पनाका तो अवसर है ही नहीं। |
| परेण च केवलविद्याविषयेण विशेषणात्—"किं प्रजया करिष्यामो येषां नोऽयमात्मायं लोकः" (बृ० उ० ४।४।२२) इति। पुत्रकर्मापरविद्याकृतेभ्यो हि लोकेभ्यो विशिनष्टि 'अयमात्मा नो लोकः' इति। "न हास्य केनचन कर्मणा लोको मीयत एषोऽस्य परमो लोकः" इति च। तैः सविशेषणैरस्यैकवाक्यता युक्ता, इहापि स्वं लोकमिति विशेषणदर्शनात्। | इसके सिवा आगेके "किं¹प्रजया करिष्यामो येषां नोऽयमात्मायं लोकः" इस केवल ज्ञानविषयक वाक्यसे उसे विशेषित भी किया गया है। यहाँ श्रुति 'अयमात्मा नो लोकः' ऐसा कहकर उसे पुत्र, कर्म और अपराविद्याद्वारा प्राप्त होनेवाले लोकोंसे पृथक् करती है। तथा यह भी कहा है "इसका यह लोक किसी भी कर्मसे नष्ट नहीं होता, यह इसका उत्कृष्ट लोक है।" उन विशेषणयुक्त वाक्योंसे इस वाक्यकी एकवाक्यता होनी चाहिये, क्योंकि यहाँ भी 'स्वं लोकम्' ऐसा विशेषण देखा जाता है। |
| अस्मात्कामयत इत्ययुक्तमिति चेत्—इह स्वो लोकः परमात्मा, तदुपासनात्स एव भवतीति स्थिते, यद्यत्कामयते तत्तदस्मादात्मनः सृजत इति तदात्मप्राप्तिव्यतिरेकेण फलवचनमयुक्तमिति चेत्, | यदि कहो कि [ऐसी बात है तो] 'इससे कामना करता है' ऐसा कहना उचित नहीं है। अर्थात् यदि ऐसी शङ्का की जाय कि यदि यहाँ स्वलोक परमात्मा ही है और उसकी उपासनासे पुरुष तद्रूप ही हो जाता है, तो ऐसा निश्चय होनेपर 'उससे जो-जो चाहता है उसी-उसीकी रचना कर लेता है' इस प्रकार आत्मप्राप्तिसे भिन्न फल बतलाना उचित नहीं है— |
१. जिन हमको केवल यह आत्मलोक ही अभीष्ट है, वे हम संतानको लेकर क्या करेंगे ?