बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 308, कुल 1402 में से
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| ३०२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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| विद्यासंयोगात्कर्मैव न क्षीयत इत्यपरे वर्णयन्ति । लोकशब्दार्थं च कर्मसमवायिनं द्विधा परिकल्पयन्ति किल—एको व्याकृतावस्थः कर्माश्रयो लोको हैरण्यगर्भाख्यः, तं कर्मसमवायिनं लोकं व्याकृतं परिच्छिन्नं य उपास्ते, तस्य किल परिच्छिन्नकर्मात्मदर्शिनः कर्म क्षीयते । तमेव कर्मसमवायिनं लोकमव्याकृतावस्थं कारणरूपमापाद्य यस्त्वूपास्ते, तस्यापरिच्छिन्नकर्मात्मदर्शित्वात्तस्य कर्म न क्षीयत इति । | लोकके उपासकका कर्म ज्ञानका संयोग होनेके कारण क्षीण नहीं होता। वे कर्मसे सम्बद्ध 'लोक' शब्दका अर्थ दो प्रकारसे कल्पना करते हैं¹—उनमें एक तो व्याकृत रूपसे स्थित कर्माधीन हैरण्यगर्भ-नामक लोक है, उस कर्मसम्बन्धी व्याकृत और परिच्छिन्न लोककी जो उपासना करता है, उस परिच्छिन्नकर्मात्मदर्शीका कर्म क्षीण हो जाता है। और जो उसी कर्मसम्बन्धी लोकको अव्याकृतरूपसे स्थित अर्थात् कारणरूपको प्राप्त करके उपासना करता है, उसका वह कर्म क्षीण नहीं होता, क्योंकि वह अपरिच्छिन्नकर्मात्मदर्शी है। |
| भवतीयं शोभना कल्पना न तु श्रौती । स्वलोकशब्देन प्रकृतस्य परमात्मनोऽभिहितत्वात् । स्वं लोकमिति प्रस्तुत्य स्वशब्दं विहायात्मशब्दप्रक्षेपेण पुनस्तस्यैव प्रतिनिर्देशादात्मानमेव लोकमुपासीतेति । तत्र कर्मसम- | उनकी यह कल्पना है तो सुन्दर, परंतु श्रुतिसम्मत नहीं है, क्योंकि श्रुतिके द्वारा तो 'स्वलोक' शब्दसे प्रकरणप्राप्त परमात्माका ही प्रतिपादन किया गया है। कारण उसने 'स्वं लोकम्' इस प्रकार आरम्भ कर फिर 'स्व' शब्दको त्याग कर उसकी जगह 'आत्मा' शब्दका प्रयोग करके उसीका 'आत्मानमेव लोकमुपासीत' |
१. यहाँ मूलमें जो 'किल' शब्द है वह इस बातका द्योतक है कि उनकी यह कल्पना केवल तर्कके आधारपर है, श्रुतिसम्मत नहीं है।