बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 312, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३०६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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यह आत्मा (गृही कर्माधिकारी) समस्त जीवोंका लोक (भोग्य) है। वह जो हवन और यज्ञ करता है, उससे देवताओंका लोक होता है; जो स्वाध्याय करता है, उससे ऋषियोंका, जो पितरोंके लिये पिण्डदान करता है और संतानकी इच्छा करता है, उससे पितरोंका, जो मनुष्योंको वासस्थान और भोजन देता है, उससे मनुष्योंका और जो पशुओंको तृण एवं जलादि पहुँचाता है, उससे पशुओंका लोक होता है। इसके घरमें जो [कुत्ते-बिल्ली आदि] श्वापद, पक्षी और चींटीपर्यन्त जीव-जन्तु इसके आश्रित होकर जीवन धारण करते हैं, उससे यह उनका लोक होता है। जिस प्रकार लोकमें अपने शरीरका अविनाश चाहते हैं, उसी प्रकार ऐसा जाननेवालेका सब जीव अविनाश चाहते हैं। उस इस कर्मकी अवश्य-कर्तव्यता [पञ्चमहायज्ञप्रकरणमें] ज्ञात है और [अवदानप्रकरणमें] इसकी मीमांसा की गयी है॥ १६॥
| अथो इत्ययं वाक्योपन्यासार्थः। अयं यः प्रकृतो गृही कर्माधिकृतोऽविद्वाञ्छरीरेन्द्रियसङ्घातादिविशिष्टः पिण्ड आत्मेत्युच्यते; सर्वेषां देवादीनां पिपीलिकान्तानां भूतानां लोको भोग्य आत्मेत्यर्थः; सर्वेषां वर्णाश्रमादिविहितैः कर्मभिरुपकारित्वात्। | मूलमें 'अथो' यह निपात वाक्यका उपक्रम (आरम्भ) करनेके लिये है। यह जो कर्माधिकारी अज्ञानी गृहस्थरूप शरीरेन्द्रियसङ्घातविशिष्ट प्रकृत पिण्ड है, वह 'आत्मा' कहलाता है; वह देवताओंसे लेकर चींटीपर्यन्त समस्त प्राणियोंका लोक—भोग्य है; क्योंकि वर्णाश्रमादिविहित कर्मोंके द्वारा वह सबका उपकारी है। |
| कैः पुनः कर्मविशेषैरुपकुर्वन् केषां भूतविशेषाणां लोकः? इत्युच्यते—स गृही यज्जुहोति यद्यजते, यागो देवतामुद्दिश्य स्वत्व- | वह किन कर्मविशेषोंके द्वारा किन भूतविशेषोंका उपकार करनेके कारण उनका लोक (भोग्य) होता है? सो कहा जाता है—वह गृही जो हवन और यजन करता है—देवताके उद्देश्यसे वस्तुमें स्वत्व त्यागना याग |