बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 313, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ ३०७
| संस्कृत-भाष्य | भाष्यार्थ |
|---|---|
| परित्यागः, स एव आसेचनेनाधिको होमः तेन होमयागलक्षणेन कर्मणावश्यकर्त्तव्यत्वेन देवानां पशुवत्परतन्त्रत्वेन प्रतिबद्ध इति लोकः। | है—उसीमें जब 'आहुति देना' इतना कर्म अधिक होता है तो उसे होम कहते हैं, उस होम-यागरूप कर्मसे, उसकी अवश्यकर्तव्यताके कारण पुरुष पशुके समान देवताओंके अधीन होनेसे बँधा हुआ है—इसलिये उनका लोक (भोग्य) है। |
| अथ यदनुब्रूते स्वाध्यायमधीतेऽहरहस्तेन ऋषीणां लोकः। अथ यत्पितृभ्यो निपृणाति प्रयच्छति पिण्डोदकादि, यच्च प्रजामिच्छति प्रजार्थमुद्यमं करोति—इच्छा चोत्पत्त्युपलक्षणार्था—प्रजां चोत्पादयतीत्यर्थः, तेन कर्मणावश्यकर्त्तव्यत्वेन पितॄणां लोकः पितॄणां भोग्यत्वेन परतन्त्रो लोकः। | तथा जो अनुवचन अर्थात् नित्य-प्रति स्वाध्याय करता है, उसके कारण वह ऋषियोंका लोक है। जो पितृगणको 'निपृणाति'—पिण्डोदकादि प्रदान करता है और जो प्रजाकी इच्छा यानी संतानके लिये प्रयत्न करता है—यहाँ 'इच्छा' शब्द उत्पत्तिका उपलक्षण करानेके लिये है, तात्पर्य यह कि वह जो प्रजा उत्पन्न करता है, उस कर्मके द्वारा उसकी अवश्य-कर्तव्यताके कारण वह पितृगणका लोक अर्थात् पितरोंके भोग्यरूपसे उनका परतन्त्र लोक होता है। |
| अथ यन्मनुष्यान्वासयते भूम्युदकादिदानेन गृहे, यच्च तेभ्यो वसद्भ्योऽवसद्भ्यो वा अर्थिभ्योऽशनं ददाति, तेन मनुष्याणाम्; अथ यत्पशुभ्यस्तृणोदकं विन्दति लम्भयति, तेन पशूनाम्; यदस्य | तथा वह जो स्थान और जल आदि देकर मनुष्योंको घरमें ठहराता है तथा घरमें ठहरे हुए अथवा न ठहरे हुए भी भोजनार्थी मनुष्योंको जो भोजन देता है, उससे वह मनुष्योंका लोक है; और पशुओंको जो तृण और जल प्राप्त कराता है, उससे वह पशुओंका लोक है; एवं |