बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 314, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३०८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| गृहेषु श्वापदा वयांसि च पिपीलिकाभिः सह कणबलिभाण्डक्षालनाद्युपजीवन्ति, तेन तेषां लोकः। | इसके घरमें जो श्वापद, पक्षी एवं चींटी-पर्यन्त जीव-जन्तु कण, बलि तथा पात्रोंके धोवनके उपजीवी होते हैं, उससे वह उनका लोक है। | | यस्मादयमेतानि कर्माणि कुर्वन्नुपकरोति देवादिभ्यः, तस्माद्यथा ह वै लोके स्वाय लोकाय स्वस्मै देहायारिष्टिमविनाशं स्वत्वभावाप्रच्युतिमिच्छेत् स्वत्वभावप्रच्युतिभयात्पोषणरक्षणादिभिः सर्वतः परिपालयेत्, एवं हैवंविदे 'सर्वभूतभोग्योऽहमनेन प्रकारेण मया अवश्यमृणिवत्प्रतिकर्तव्यम्' इत्येवमात्मानं परिकल्पितवते सर्वाणि भूतानि देवादीनि यथोक्तानि अरिष्टिमविनाशमिच्छन्ति स्वत्वाप्रच्युत्यै सर्वतः संरक्षन्ति कुटुम्बिन इव पशून् — “तस्मादेषां तन्न प्रियम्” इत्युक्तम्। तद्वा एतत्तदेतद्यथोक्तानां कर्मणाम् ऋण- | क्योंकि इन कर्मोंको करता हुआ यह देवादिका उपकार करता है, इसलिये जिस प्रकार लोकमें अपने शरीरके लिये पुरुष अरिष्टि—अविनाश अर्थात् अपनेपनके भावकी अप्रच्युति चाहता है तथा अपनेपनके भावकी च्युतिके भयसे उसका पोषण एवं रक्षण करके सब प्रकारसे पालन करता है, उसी प्रकार इस तरह जाननेवालेका अर्थात् 'मैं समस्त भूतोंका भोग्य हूँ, मुझे ऋणीके समान इन सबका इस प्रकार अवश्य प्रतीकार करना चाहिये' इस प्रकार अपने विषयमें कल्पना करनेवालेका उपर्युक्त देवतादि समस्त भूत अरिष्टि—अविनाश चाहते हैं। जिस प्रकार कोई कुटुम्बी अपने पशुओंकी रक्षा करता है, उसी प्रकार अपने अधिकारकी अप्रच्युतिके लिये वे इसकी सब ओरसे रक्षा करते हैं; इसीसे पहले (१।४।१० मन्त्रमें) यह कहा गया है “अतः देवताओंको यह प्रिय नहीं है [ कि लोग आत्मतत्त्वको जानें ]”। वह यह अर्थात् उपर्युक्त कर्मोंका ऋणके |