बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 315, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ ३०९
| वदवश्यकर्तव्यत्वं पञ्चमहायज्ञप्रकरणे विदितं कर्तव्यतया मीमांसितं विचारितं चावदानप्रकरणे ॥ १६ ॥ | समान आवश्यकर्तव्यत्व पञ्चमहायज्ञप्रकरणमें विदित है तथा अवदानप्रकरणमें कर्तव्यरूपसे इसकी मीमांसा हुई है—विचार किया गया है ॥ १६ ॥ |
[प्रवृत्तिबीज-विवेचनम्]
| ब्रह्म विद्वांश्चेत्तस्मात्पशुभावात्कर्तव्यताबन्धनरूपात्प्रविमुच्यते, केनायं कारितः कर्मबन्धनाधिकारेऽवश इव प्रवर्तते, न पुनस्तद्विमोक्षणोपाये विद्याधिकार इति ।<br><br>ननूक्तं देवा रक्षन्तीति ।<br><br>बाढम्, कर्माधिकारस्वगोचरारूढानैव तेऽपि रक्षन्ति, अन्यथाकृताभ्यागमकृतनाशप्रसङ्गात् । | यदि ब्रह्मको जाननेवाला पुरुष कर्तव्यताबन्धनरूप उस पशुभावसे मुक्त होता है तो यह किसकी प्रेरणासे विवश-सा होकर कर्मबन्धनके अधिकारमें प्रवृत्त होता है तथा उससे मुक्ति पानेके उपायस्वरूप ज्ञानाधिकारमें प्रवृत्त नहीं होता ।<br><br>पूर्व०—पहले कहा जा चुका है कि देवगण उसकी रक्षा करते हैं ।^३<br><br>सिद्धान्ती—ठीक है, परंतु वे भी कर्माधिकारके द्वारा अपनी विषयताको प्राप्त हुए लोगोंकी ही रक्षा करते हैं, अन्यथा [यदि ऐसा माना जाय कि सभीकी रक्षा करते हैं तो] बिना किये कर्मकी प्राप्ति और कृतकर्मका नाश होनेका प्रसंग उपस्थित होगा । वे |
१. भूतयज्ञ, मनुष्ययज्ञ, पितृयज्ञ, देवयज्ञ और ब्रह्मयज्ञ—इन पाँच यज्ञोंका जिसमें विधान किया गया है, वह पञ्चमहायज्ञप्रकरण है ।
२. एक आहुतिकी पूर्तिके लिये लिया हुआ घृतादि हव्य अवदान कहलाता है । 'तदेतदवदयते यद्यजते स यदग्नौ जुहोति' इत्यादि अवदानप्रकरण है । अर्थात् 'जो यजन करता है यानी वह जो अग्निमें हवन करता है, वह यह अवदान करता है' इत्यादि । इसमें 'ऋणं ह वाव जायते जायमानो योऽस्ति' अर्थात् जो उत्पन्न होनेवाला है, उसे निश्चय ऋण प्राप्त होता है—इस अर्थवादद्वारा कर्मकी अवश्य-कर्तव्यताका विचार किया है ।
३. इसलिये वह नियमसे प्रवृत्तिमार्गमें ही रहता है ।