बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ६०५ |
| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ६०५ | | :--- | :--- |
| अथ ते तदिन्द्रः शिरश्छेत्स्यति; अथ ते स्वं शिर आहृत्य तत्ते प्रतिधास्याव इति । | उस समय इन्द्र आपके उस मस्तकको काट देगा, फिर हम आपका निजी मस्तक लाकर उसे जोड़ देंगे।' | | तथेति तौ होपनिन्थे। तौ यदोपनिन्थे, अथास्य शिरच्छित्त्वान्यत्रोपनिदधतुः; अथाश्वस्य शिर आहृत्य तद्धास्य प्रतिदधतुः। तेन हाभ्यामनूवाच। स यदाभ्यामनूवाचाथास्य तदिन्द्रः शिरश्चिच्छेद। अथास्य स्वं शिर आहृत्य तद्धास्य प्रतिदधतुरिति। | तब 'बहुत अच्छा' ऐसा कहकर उन्होंने उनका उपनयन किया। जिस समय उनका उपनयन किया उस समय उन्होंने उनका मस्तक काटकर अन्यत्र रख दिया तथा घोड़ेका शिर लाकर उसे इनके जोड़ दिया। उससे दध्यङ्ने उन्हें उपदेश किया। जिस समय वे उन्हें उपदेश करने लगे तब इन्द्रने आकर उनका वह मस्तक काट दिया। फिर उनके अपने मस्तकको लाकर उसे उनके जोड़ दिया। | | यावत्तु प्रवर्ग्यकर्माङ्गभूतं मधु तावदेव तत्राभिहितम्, न तु कक्ष्यमात्मज्ञानाख्यम्। तत्र या आख्यायिकाभिहिता सेह स्तुत्यर्था प्रदर्श्यते। इदं वै तन्मधु दध्यङ्ङाथर्वणोऽनेन प्रपञ्चेनाश्विभ्यामुवाच। | किंतु वहाँ जितना प्रवर्ग्यका अङ्गभूत मधु है उतना ही कहा गया है, आत्मज्ञानसंज्ञक कक्ष्य मधुका वर्णन नहीं किया गया। वहाँ जो आख्यायिका कही गयी है, उसे यहाँ स्तुतिके लिये प्रदर्शित किया जाता है। उस इस मधुका इन दध्यङ्ङाथर्वणने अश्विनीकुमारोंके प्रति इस प्रकार प्रपञ्चके साथ वर्णन किया है। | | तदेतदृषिः—तदेतत् कर्म, ऋषिर्मन्त्रः, पश्यन्नुपलभमानः, | उस इस ऋषिने—ऋषि यहाँ मन्त्रका वाचक है—इस कर्मको |
६०६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २
| ६०६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| अवोचत्-उक्तवान्। कथम् ? तद्दंस इति व्यवहितेन सम्बन्धः। दंस इति कर्मणो नामधेयम्। | देखते हुए कहा। किस प्रकार कहा ? ‘तद्दंस’ इस प्रकार यहाँ ‘तत्’ और ‘दंस’ इन दूरवर्ती पदोंका अन्वय है। ‘दंस’ यह उस कर्मका नाम है। | | तच्च दंसः किंविशिष्टम् ? उग्रं क्रूरम्। वां युवयोः। हे नरा नराकारावश्विनौ। तच्च कर्म किंनिमित्तम् ? सनये लाभाय ! | वह दंस कर्म किस विशेषणसे युक्त है ? उग्र-क्रूर। वाम्-तुम दोनोंका। हे नरा-नराकार अश्विनीकुमारो ! वह कर्म किसलिये था ? सनये—लाभके लिये। | | लाभलुब्धो हि लोकेऽपि क्रूरं कर्माचरति, तथैवैतावुपलभ्येते यथा लोके। | क्योंकि लाभका लोभी पुरुष लोकमें भी क्रूर कर्म कर बैठता है। जिस प्रकार लोकमें होते हैं, वैसे ही ये दोनों भी देखे जाते हैं। | | तदाविः प्रकाशं कृणोमि करोमि यद्रहसि भवद्भ्यां कृतम्, किमिव ? इत्युच्यते—तन्यतुः पर्जन्यः, न इव। नकारस्तूपरिष्टादुपचार उपमार्थीयो वेदे, न प्रतिषेधार्थः; यथाश्वं न। अश्वमिवेति यद्वत्। | [ मन्त्र कहता है-] तुमने जो एकान्तमें किया है, उसे मैं प्रकट किये देता हूँ। किसके समान ? सो बतलाया जाता है—‘तन्यतुः’ ‘न’ अर्थात् मेघके समान। वेदमें जो नकार किसी पदके पीछे रहता है वह उपचारमात्रमें उपमाके अर्थमें होता है, निषेध अर्थमें नहीं होता। जैसे—‘अश्वं न’ यह वाक्य अश्वके समान-इस अर्थमें है, उसी प्रकार। | | तन्यतुरिव वृष्टिं यथा पर्जन्यो वृष्टिं प्रकाशयति स्तनयित्न्वादि-शब्दैः, तद्वदहं युवयोः क्रूरं कर्म आविष्कृणोमीति सम्बन्धः। | जैसे मेघ गर्जनादि शब्दोंके सहित वृष्टिको प्रकाशित करता है, उसी प्रकार मैं तुम दोनोंके क्रूर कर्मको प्रकट करता हूँ—ऐसा इसका सम्बन्ध है। |
ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ६०७
| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ६०७ |
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| नन्वश्विनोः स्तुत्यर्थौ कथमिमौ मन्त्रौ स्यातां निन्दावचनौ हीमौ। | **शङ्का-**किंतु ये दोनों मन्त्र अश्विनीकुमारोंकी स्तुतिके लिये कैसे हो सकते हैं, ये तो उनकी निन्दाको ही बतलानेवाले हैं ? | | नैष दोषः; स्तुतिरेवैषा, न निन्दावचनौ । यस्मादीदृशमप्यतिक्रूरं कर्म कुर्वतोर्युवयोनँ लोम च मीयत इति । न चान्यत्किञ्चिद्धीयत एवेति । स्तुतावेतौ भवतः । निन्दां प्रशंसां हि लौकिकाः स्मरन्ति। तथा प्रशंसारूपा च निन्दा लोके प्रसिद्धा । | **समाधान-**यह दोष नहीं है; यह उनकी स्तुति ही है, ये मन्त्र निन्दावाचक नहीं हैं; क्योंकि ऐसा क्रूर कर्म करनेपर भी तुम दोनोंका बाल भी बाँका नहीं होता और न तुम्हारी दूसरी ही कोई हानि हो रही है। अतः ये उनकी स्तुतिमें ही हैं ! लौकिक पुरुष कहीं प्रशंसाको निन्दा मानते हैं, इसी प्रकार लोकमें प्रशंसारूपा निन्दा भी प्रसिद्ध है । | | दध्यङनाम आथर्वणः। हेत्यनर्थको निपातः। यन्मधु कक्ष्यमात्मज्ञानलक्षणमाथर्वणो वां युवाभ्यामश्वस्य शीर्षणा शिरसा प्र यत् ईम् उवाच यत् प्रोवाच मधु। ईमित्यनर्थको निपातः ॥१६॥ | दध्यङ् नामके आथर्वणने—यहाँ 'ह' निरर्थक निपात है—जिस आत्मज्ञानरूप कक्ष्य—मधुका तुम्हें घोड़ेके शिरसे 'प्र यत् ईम् उवाच' प्रवचन किया था अर्थात् जिस मधुका उपदेश किया था। यहाँ 'ईम्' यह निरर्थक निपात है ॥ १६ ॥ |
इदं वै तन्मधु दध्यङ्ङाथर्वणोऽश्विभ्यामुवाच । तदेतदृषिः पश्यन्नवोचत् । आथर्वणायाश्विनौ दधीचेऽश्व्यꣳ शिरः प्रत्यैरयतम् । स वां मधु प्रवोचदृतायन्त्वाष्ट्रं यदस्रावपि कक्ष्यं वामिति ॥ १७ ॥
६०८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २
| ६०८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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उस इस मधुका दध्यङ्ङाथर्वणने अश्विनीकुमारोंको उपदेश किया। इसे देखते हुए ऋषि (मन्त्रद्रष्टा) ने कहा है—हे अश्विनीकुमारो! तुम दोनों आथर्वण दध्यङ्के लिये घोड़ेका शिर लाये। उसने सत्यपालन करते हुए तुम्हें त्वाष्ट्र (सूर्यसम्बन्धी) मधुका उपदेश किया तथा हे दस्र (शत्रुहिंसक) जो [आत्मज्ञानसम्बन्धी] कक्ष्य (गोप्य) मधु था [वह भी तुमसे कहा] ॥ १७॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
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| इदं वै तन्मध्वित्यादि पूर्ववन्मन्त्रान्तरप्रदर्शनार्थम् । तथान्यो मन्त्रस्तामेव आख्यायिकामनुसरति स्म । आथर्वणो दध्यङ् नाम, आथर्वणोऽन्यो विद्यत इत्यतो विशिनष्टि दध्यङ्नामाथर्वणः । | ‘इदं वै तन्मधु’ इत्यादि कथन पूर्ववत् अन्य मन्त्र प्रदर्शित करनेके लिये है। अर्थात् इसी प्रकार दूसरे मन्त्रने भी उसी आख्यायिकाका अनुसरण किया। दध्यङ् नामवाला आथर्वण। आथर्वण तो दूसरा भी है इसलिये ‘दध्यङ्नामक आथर्वण’ ऐसा कहकर इसे विशेषणयुक्त करते हैं। |
| तस्मै दधीच आथर्वणाय हेऽश्विनावेति मन्त्रदृशो वचनम्, अश्व्यमश्वस्य स्वभूतं शिरः, ब्राह्मणस्य शिरसिच्छिन्नेऽश्वस्य शिरश्छित्त्वा ईदृशमतिक्रूरं कर्म कृत्वा अश्व्यं शिरो ब्राह्मणं प्रति ऐरयतं गमितवन्तौ युवाम् । स चाथर्वणो वां युवाभ्यां तन्मधु प्रवोचद् यत् पूर्वं प्रतिज्ञातं वक्ष्यामीति । | हे अश्विनीकुमारो! उस दध्यङ् आथर्वणके लिये—यह मन्त्रद्रष्टा ऋषिका वचन है—तुम अश्व्य—अश्वका स्वभूत शिर अर्थात् ब्राह्मणका शिर काट देनेपर तुम अश्वका शिर काटकर, ऐसा अत्यन्त क्रूर कर्म कर उस अश्वके शिरको तुमने ब्राह्मणके पास ‘ऐरयतम्’—पहुँचाया और उस आथर्वणने तुम्हें उस मधुका उपदेश किया जिसके लिये उसने पहले यह प्रतिज्ञा की थी ‘मैं कहूँगा।’ |
| स किमर्थमेवं जीवितसन्देहमारुह्य प्रवोचत्? इत्युच्यते। ऋता- | उसने इस प्रकार जीवनके संदेहमें पड़कर भी उसका उपदेश क्यों किया, सो बतलाया जाता है— |
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६०९
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६०९
| यन् यत् पूर्वं प्रतिज्ञातं सत्यं तत् परिपालयितुमिच्छन् । जीवितादपि हि सत्यधर्मपरिपालना गुरुतरेत्येतस्य लिङ्गमेतत् ।<br><br>किं तन्न प्रवोचत् ? इत्युच्यते—त्वाष्ट्रम्, त्वष्टा आदित्यस्तस्य सम्बन्धि, यज्ञस्य शिरश्छिन्नं त्वष्टामभवत्, तत्प्रतिसन्धानार्थं प्रवर्ग्यं कर्म । तत्र प्रवर्ग्यकर्माङ्गभूतं यद् विज्ञानं तत्त्वाष्ट्रं मधु—यज्ञस्य शिरश्छेदनप्रतिसन्धानादिविषयं दर्शनं तत्त्वाष्ट्रं यन्मधु हे दस्रौ, दस्राविति परबलानामुपक्षपयितारौ शत्रूणां वा हिंसितारौ, अपि च न केवलं त्वाष्ट्रमेव मधु कर्मसम्बन्धि युवाभ्यामवोचत्, अपि च कक्ष्यं गोप्यं रहस्यं परमात्मसम्बन्धि यद् विज्ञानं मधु मधुब्राह्मणेनोक्तमध्यायद्वयप्रकाशितम्, तच्च वां युवाभ्यां प्रवोचदित्यनुवर्तते ॥ १७ ॥ | 'ऋतायन्'—जो पहले प्रतिज्ञा किया हुआ सत्य था, उसका पालन करनेके लिये । यह इस बातका सूचक है कि सत्यधर्मका पालन जीवनसे भी बढ़कर है ।<br><br>उसने किस मधुका उपदेश किया ? सो कहा जाता है—त्वाष्ट्र मधुका । त्वष्टा सूर्यको कहते हैं, उससे सम्बन्ध रखनेवाले मधुका । यज्ञका शिर काटे जानेपर वह त्वष्टा हो गया, उसके प्रतिसन्धान (जोड़ने) के लिये प्रवर्ग्य कर्म है । वहाँ प्रवर्ग्यकर्मका अङ्गभूत जो विज्ञान है, वही त्वाष्ट्र मधु है । यज्ञके शिरश्छेदनके प्रतिसन्धानादिसे सम्बद्ध जो दर्शन है, वही त्वाष्ट्र मधु है । हे दस्रौ ! दस्र अर्थात् परपक्षकी सेनाका क्षय करनेवाले अथवा शत्रुओंके हिंसको ! इसके सिवा उन्होंने तुम्हें केवल कर्मसम्बन्धी त्वाष्ट्र मधुका ही उपदेश नहीं किया, अपितु कक्ष्य—गोप्य अर्थात् जो परमात्मसम्बन्धी रहस्यभूत मधु विज्ञान था, जिसका मधुब्राह्मणद्वारा वर्णन किया गया है और जो [ तृतीय और चतुर्थ ] दो अध्यायोंमें प्रकाशित किया गया, उसका भी तुम्हें उपदेश किया । यहाँ प्रवोचत् (उपदेश किया) इस क्रियापदकी अनुवृत्ति होती है । १७ ॥ |
वृ० उ० ३६—
६१० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २
| ६१० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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इदं वै तन्मधु दध्यङ्ङाथर्वणोऽश्विभ्यामुवाच । तदेतदृषिः पश्यन्नवोचत् । पुरश्चक्रे द्विपदः पुरश्चक्रे चतुष्पदः। पुरः स पक्षी भूत्वा पुरः पुरुष आविशदिति । स वा अयं पुरुषः सर्वासु पूर्षु पुरिशयो नैनेन किञ्चनानावृतं नैनेन किञ्चनासंवृतम् ॥ १८ ॥
उस इस मधुका दध्यङ्ङाथर्वणने अश्विनीकुमारोंको उपदेश किया। इसे देखते हुए ऋषिने कहा—परमात्माने दो पैरोंवाले शरीर बनाये और चार पैरोंवाले शरीर बनाये। पहले वह पुरुष पक्षी होकर शरीरोंमें प्रविष्ट हो गया। वह यह पुरुष समस्त पुरों ( शरीरों ) में पुरिशय है। ऐसा कुछ भी नहीं है, जो पुरुषसे ढका न हो तथा ऐसा भी कुछ नहीं है, जिसमें पुरुषका प्रवेश न हुआ हो—जो पुरुषसे व्याप्त न हो ॥ १८ ॥
| इदं वै तन्मध्विति पूर्ववत् । उक्तौ द्वौ मन्त्रौ प्रवर्ग्यसम्बन्ध्याख्यायिकोपसंहर्तारौ । द्वयोः प्रवर्ग्यकर्मार्थयोरध्याययोरर्थ आख्यायिकाभूताभ्यां मन्त्राभ्यां प्रकाशितः । ब्रह्मविद्यार्थयोस्त्वध्याययोरर्थउत्तराभ्यामृग्भ्यां प्रकाशयितव्यः, इत्यतःप्रवर्तते। यत् कक्ष्यं च मधूक्तवानाथर्वणो युवाभ्यामित्युक्तम् । किं पुनस्तन्मधु ? इत्युच्यते— | ‘इदं वै तन्मधु’ इत्यादि वाक्यका अर्थ पूर्ववत् है। उपर्युक्त दो मन्त्र प्रवर्ग्यसम्बन्धी आख्यायिकाका उपसंहार करनेवाले हैं। प्रवर्ग्यकर्मसम्बन्धी दो अध्यायोंका अर्थ इन उपर्युक्त आख्यायिकाभूत दो मन्त्रोंद्वारा प्रकाशित किया गया है। ब्रह्मविद्यासम्बन्धी दो अध्यायोंका अर्थ आगेकी दो ऋचाओंद्वारा प्रकाशित करना है इसीसे श्रुति प्रवृत्त होती है। आथर्वणने तुम दोनोंसे जो कक्ष्य मधु कहा था—ऐसा ऊपर कहा गया है। वह मधु क्या था ? उसका वर्णन किया जाता है— |
| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ६११ |
| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ६११ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
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| पुरश्चक्रे, पुरः पुराणि शरीराणि, यत इयमव्याकृतव्याकरणप्रक्रिया—स परमेश्वरो नामरूपे अव्याकृते व्याकुर्वाणः प्रथमं भूरादीँल्लोकान् सृष्ट्वा चक्रे कृतवान्, द्विपदो द्विपादुपलक्षितानि मनुष्यशरीराणि पक्षिशरीराणि । तथा पुरः शरीराणि चक्रे चतुष्पदश्चतुष्पादुपलक्षितानि पशुशरीराणि । | 'पुरश्चक्रे'—पुर अर्थात् शरीर; क्योंकि यह अव्यक्तके व्यक्त होनेकी प्रक्रिया है। उसपरमेश्वरने अव्यक्त नामरूपको व्यक्त करते हुए पहले भूः आदि लोकोंकी रचना कर द्विपदोंको—दो पैरोंसे उपलक्षित मनुष्य-शरीर और पक्षिशरीरोंको 'चक्रे'—रचा। तथा चतुष्पद—चार पैरोंसे उपलक्षित पशुशरीरोंको बनाया। |
| पुरः पुरस्तात्, स ईश्वरः पक्षी लिङ्गशरीरं भूत्वा पुरः शरीराणि—पुरुष आविशदित्यस्यार्थमाचष्टे श्रुतिः—स वा अयं पुरुषः सर्वासु पूर्षु सर्वशरीरेषु पुरिशयः, पुरि शेत इति पुरिशयः सन् पुरुष इत्युच्यते । नैनेनानेन किञ्चन किञ्चिदप्यनावृतमनाच्छादितम् । तथा नैनेन किञ्चनासंवृतमन्तरननुप्रवेशितं बाह्यभूतेनान्तर्भूतेन च न अनावृतम् । एवं स एव नामरूपात्मना अन्तर्बहिर्भावेन कार्यकारणरूपेण व्यवस्थितः । पुरश्चक्रे इत्यादिमन्त्रः सङ्क्षेपत आत्मैकत्वमाचष्ट इत्यर्थः ॥१८॥ | पुरः अर्थात् पहले वह ईश्वर पक्षी—लिङ्गशरीर होकर पुरू—शरीरोंमें पुरुषरूपसे प्रविष्ट हो गया—इसी वाक्यका अर्थ श्रुति करती है—वही यह पुरुष समस्त पुरों—सम्पूर्ण शरीरोंमें पुरिशय है, पुरमें शयन करता है, अतः पुरिशय होनेके कारण वह 'पुरुष' इस प्रकार कहा जाता है। इससे कुछ भी अनावृत—अनाच्छादित नहीं है। तथा इससे कुछ भी असंवृत नहीं है, अर्थात् ऐसा कुछ भी नहीं है, जहाँ पुरुष भीतर और बाहर रहकर स्वयं प्रविष्ट—व्याप्त न हो। इस प्रकार वही नामरूपात्मक अन्तर्बाह्यभावसे देह और इन्द्रियरूपमें स्थित है। तात्पर्य यह है कि यह 'पुरश्चक्रे' इत्यादि मन्त्र संक्षेपसे आत्माके एकत्वका निरूपण करता है ॥१८॥ |
६१२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २
| ६१२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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इदं वै तन्मधु दध्यङ्ङाथर्वणोऽश्विभ्यामुवाच । तदेतदृषिः पश्यन्नवोचत् । रूपँ रूपं प्रतिरूपो बभूव तदस्य रूपं प्रतिचक्षणाय । इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते युक्ता ह्यस्य हरयः शता दशेति । अयं वै हरयोऽयं वै दश च सहस्राणि बहूनि चानन्तानि च तदेतद्ब्रह्मापूर्वमनपरमनन्तरमबाह्यमयमात्मा ब्रह्म सर्वानुभूरित्यनुशासनम् ॥ १९ ॥
उस इस मधुका दध्यङ्ङाथर्वणने अश्विनीकुमारोंको उपदेश किया। यह देखते हुए ऋषिने कहा—वह रूप-रूपके प्रतिरूप हो गया। इसका वह रूप प्रतिख्यापन (प्रकट) करनेके लिये है। ईश्वर मायासे अनेकरूप प्रतीत होता है [ शरीररूप रथमें जोड़े हुए ] इसके [ इन्द्रियरूप ] घोड़े शत और दश हैं! यह (परमेश्वर) ही हरि (इन्द्रियरूप अश्व) है; यही दश, सहस्र, अनेक और अनन्त है। वह यह ब्रह्म अपूर्व (कारणरहित), अनपर (कार्यरहित), अनन्तर (विजातीय द्रव्यसे रहित) और अबाह्य है। यह आत्मा ही सबका अनुभव करनेवाला ब्रह्म है। यही समस्त वेदान्तोंका अनुशासन (उपदेश) है॥ १९॥
| इदं वै तन्मध्वित्यादि पूर्ववत् । रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव । रूपं रूपं प्रति प्रतिरूपो रूपान्तरं बभूवेत्यर्थः । प्रतिरूपोऽनुरूपो वा यादृक्संस्थानौ मातापितरौ तत्संस्थानस्तदनुरूप एव पुत्रो जायते । न हि चतुष्पदो द्विपाज्जायते द्विपदो वा चतुष्पात् । | ‘इदं वै तन्मधु’ इत्यादि वाक्यका अर्थ पूर्ववत् है। रूप-रूपके प्रतिरूप हो गया अर्थात् रूप-रूपके प्रति उसीके समान अन्य रूपवाला हो गया। प्रतिरूप अर्थात् अनुरूप, क्योंकि माता-पिता जैसे स्वरूपवाले होते हैं वैसे ही स्वरूपवाला अर्थात् उन्हींके अनुरूप पुत्र उत्पन्न होता है; क्योंकि चतुष्पदसे द्विपद और द्विपदसे चतुष्पदकी उत्पत्ति नहीं हो सकती। सो |
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ : ६१३
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ : ६१३
| संस्कृत मूल / भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| स एव हि परमेश्वरो नामरूपे व्याकुर्वाणो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव । | नाम और रूपको व्यक्त करनेवाला वह परमेश्वर ही रूप-रूपके प्रतिरूप हो गया। |
| किमर्थं पुनः प्रतिरूपमागमनं तस्य ? इत्युच्यते—तदस्यात्मनो रूपं प्रतिचक्षणाय प्रतिख्यापनाय। यदि हि नामरूपे न व्याक्रियेते, तदा अस्यात्मनो निरुपाधिकं रूपं प्रज्ञानघनाख्यं न प्रतिख्यायेत। यदा पुनः कार्यकारणात्मना नामरूपे व्याकृते भवतः, तदास्य रूपं प्रतिख्यायेत । | किंतु उसका प्रतिरूपको प्राप्त होना किसलिये हुआ ! सो अब बतलाया जाता है—वह इस आत्माके रूपके प्रतिचक्षण—प्रतिख्यापनके लिये है, क्योंकि यदि नाम-रूपोंकी अभिव्यक्ति न होती तो इस आत्माका प्रज्ञानघनसंज्ञक निरुपाधिक रूप प्रकट नहीं हो सकता था। किंतु जिस समय कार्य-करणभावसे नाम-रूपोंकी अभिव्यक्ति होती है, तभी इसका रूप प्रकट होता है। |
| इन्द्रः परमेश्वरो मायाभिः प्रज्ञाभिः नामरूपभूतकृतमिथ्याभिमानैर्वा, न तु परमार्थतः; पुरुरूपो बहुरूप ईयते गम्यते, एकरूप एव प्रज्ञानघनः सन्—विद्याप्रज्ञाभिः। कस्मात् पुनः कारणात् ? युक्ता रथ इव वाजिनः स्वविषयप्रकाशनाय, हि यस्मादस्य हरयो हरणादिन्द्रियाणि, शता | इन्द्र—परमेश्वर मायाओंसे अर्थात् प्रज्ञासे अथवा नाम-रूप उपाधिजनित मिथ्या अभिमानसे पुरुरूप—अनेकरूप हुआ जाना जाता है, परमार्थतः अनेकरूप नहीं होता। अर्थात् वह प्रज्ञानघन एकरूप ही होते हुए अविद्याजनित प्रज्ञाओंसे अनेकरूप भासता है। किंतु ऐसा किस कारणसे होता है ! क्योंकि अपने विषयोंको प्रकाशित करनेके लिये, रथमें जुते हुए घोड़ोंके समान, इसके शत और दश हरि (इन्द्रियाँ) हैं। विषयोंको हरण करनेके कारण इन्द्रियोंका |
६१४ : बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय २
६१४ : बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय २
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| शतानि, दश च प्राणिभेदबाहुल्याच्छतानि दश च भवन्ति। तस्मादिन्द्रियविषयबाहुल्यात्तत्प्रकाशनायैव च युक्तानि तानि न आत्मप्रकाशनाय । “पराञ्चि खानि व्यतृणत् स्वयम्भूः” (२। १। १) इति हि काठके। तस्मात्तैरेव विषयस्वरूपैरीयते न प्रज्ञानघनैकरसेन स्वरूपेण । | नाम हरि है, प्राणिभेदकी बहुलताके कारण वे शत और दश हैं। अतः इन्द्रियोंके विषयोंकी बहुलता होनेके कारण वे उन्हींको प्रकाशित करनेमें नियुक्त हैं, आत्माको प्रकाशित करनेमें नहीं। कठोपनिषद्में कहा भी है कि “स्वयम्भू परमात्माने इन्द्रियोंको बहिर्मुख करके हिंसित कर दिया है।” अतः वह उन विषयरूपोंसे ही अनेकरूप भासता है, प्रज्ञानघन एकरसस्वरूपसे नहीं। |
| एवं तर्हि अयमन्यः परमेश्वरोऽन्ये हरय इत्येवं प्राप्ते उच्यते— | इस प्रकार तब तो यह परमेश्वर अन्य है और इन्द्रियाँ अन्य हैं—ऐसी आशङ्का होनेपर कहते हैं— |
| अयं वै हरयोऽयं वै दश च सहस्राणि बहूनि चानन्तानि च। | यह परमेश्वर ही इन्द्रियाँ हैं तथा यही दश, सहस्र, अनेक और अनन्त हैं, |
| प्राणिभेदस्यानन्त्यात्। किं बहुना, | क्योंकि प्राणियोंके भेदका कोई अन्त नहीं है। अधिक क्या कहा जाय, |
| तदेतद्ब्रह्म य आत्मा। अपूर्वं नास्य कारणं पूर्वं विद्यत इत्यपूर्वम्। नास्यापरं कार्यं विद्यत इत्यनपरम्। नास्य जात्यन्तरमन्तराले विद्यत इत्यनन्तरम्। तथा बहिरस्य न विद्यत इत्यबाह्यम्। | यह जो आत्मा है वही ब्रह्म है। यह अपूर्व है इसका कोई पूर्व यानी कारण नहीं है, इसलिये यह अपूर्व है। इसका अपर—कार्य नहीं है, इसलिये यह अनपर है। इसके मध्यमें कोई जात्यन्तर नहीं है, इसलिये यह अनन्तर है। तथा इसके बाहर कुछ नहीं है, इसलिये यह अबाह्य है। |
| किं पुनस्तन्निरन्तरं ब्रह्म ? अयमात्मा। कोऽसौ ? यः प्रत्य- | तो फिर वह निरन्तर ब्रह्म कौन है? यह आत्मा। आत्मा कौन |
ब्राह्मण ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ : ६१५
ब्राह्मण ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ : ६१५
| गात्मा द्रष्टा श्रोता मन्ता बोद्धा विज्ञाता सर्वानुभूः, सर्वात्मना सर्वमनुभवतीति सर्वानुभूः। इत्येतदनुशासनं सर्ववेदान्तोपदेशः। एष सर्ववेदान्तानामुपसंहृतोऽर्थः। एतदमृतमभयम्। परिसमाप्तश्च शास्त्रार्थः ॥१९॥ | है ? जो प्रत्यगात्मा द्रष्टा, श्रोता, मन्ता, बोद्धा अर्थात् जाननेवाला और सर्वानुभू है; सबको सब प्रकार अनुभव करता है, इसलिये वह सर्वानुभू है। इस प्रकार यह अनुशासन अर्थात् समस्त वेदान्तों का उपदेश है। यह सम्पूर्ण वेदान्तों-का उपसंहारभूत अर्थ है। यह अमृत और अभय है। इस प्रकार शास्त्रका अर्थ समाप्त हुआ ॥ १९ ॥ |
इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये द्वितीयाध्याये
पञ्चमं मधुब्राह्मणम् ॥ ५ ॥
षष्ठ ब्राह्मण
मधुविद्याकी सम्प्रदायपरम्परा
अथ वँशः। पौतिमाष्यो गौपवनाद्गौपवनः पौतिमाष्यात्पौतिमाष्यो गौपवनाद्गौपवनः कौशिकात्कौशिकः कौण्डिन्यात्कौण्डिन्यः शाण्डिल्याच्छाण्डिल्यः कौशिकाच्च गौतमाच्च गौतमः ॥ १ ॥ आग्निवेश्यादग्निवेश्यः शाण्डिल्याच्चानभिम्लाताच्चानभिम्लात आनभिम्लातादानभिम्लात आनभिम्लातादानभिम्लातो गौतमाद्गौतमः सैतवप्राचीनयोग्याभ्याँ सैतवप्राचीनयोग्यौ पाराशर्यात्पाराशर्यो भार-
६१६ : बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय २
६१६ : बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय २
द्वाजाद्भारद्वाजो भारद्वाजाच्च गौतमाच्च गौतमो भारद्वाजाद्भारद्वाजः पाराशर्यात्पाराशर्यो बैजवापायत्ताद्बैजवापायनः कौशिकायनेः कौशिकायनिः॥२॥ घृतकौशिकाद्धृतकौशिकः पाराशर्यायणात्पाराशर्यायणः पाराशर्यात्पाराशर्यो जातूकर्ण्याज्जातूकर्ण्य आसुरायणाच्च यास्काच्चासुरायणस्त्रैवणैस्त्रैवणिरौपजन्धनेरौपजन्धनिरासुरेरासुरिर्भारद्वाजाद्भारद्वाज आत्रेयादात्रेयो माण्टेर्माण्टिगौतमाद्गौतमो गौतमाद्गौतमो वात्स्याद्वात्स्यः शाण्डिल्याच्छाण्डिल्यः कैशोर्यात्काप्यात्कैशोर्यः काप्यः कुमारहारितात्कुमारहारितो गालवाद्गालवो विदर्भीकौण्डिन्याद्विदर्भीकौण्डिन्यो वत्सनपातो बाभ्रवाद्वत्सनपाद्बाभ्रवः पथः सौभरात्पन्थाः सौभरोऽयास्यादाङ्गिरसादयास्य आङ्गिरस आभूतेस्त्वाष्ट्रादाभूतिस्त्वाष्ट्रो विश्वरूपात्त्वाष्ट्राद्विश्वरूपस्त्वाष्ट्रोऽश्विभ्यामश्विनौ दधीच आथर्वणाद्दध्यङ्ङाथर्वणोऽथर्वणो दैवादथर्वा दैवो मृत्योःप्राध्वँसनान्मृत्युः प्राध्वँसनः प्रध्वँसनात्प्रध्वँसन एकर्षेरेकर्षिर्विप्रचित्तेर्विप्रचित्तिर्व्यष्टेर्व्यष्टिः सनारोः सनारुः सनातनात्सनातनः सनगात्सनगः परमेष्ठिनः परमेष्ठी ब्रह्मणो ब्रह्म स्वयम्भु ब्रह्मणे नमः ॥ ३ ॥
अब [मधुकाण्डका] वंश बतलाया जाता है—पौतिमाष्यने गौपवनसे, गौपवनने पौतिमाष्यसे, पौतिमाष्यने गौपवनसे, गौपवनने कौशिकसे, कौशिकने कौण्डिन्यसे, कौण्डिन्यने शाण्डिल्यसे, शाण्डिल्यने कौशिकसे और गौतमसे, गौतमने ॥१॥ आग्निवेश्यसे, आग्निवेश्यने शाण्डिल्यसे और आनभिम्लातसे,
ब्राह्मण ६] शाङ्करभाष्यार्थ ६१७
ब्राह्मण ६] शाङ्करभाष्यार्थ ६१७
आनभिम्लातने आनभिम्लातसे, आनभिम्लातने आनभिम्लातसे, आनभिम्लातने गौतमसे, गौतमने सैतव और प्राचीनयोग्यसे, सैतव और प्राचीनयोग्यने पाराशर्यसे, पाराशर्यने भारद्वाजसे, भारद्वाजने भारद्वाजसे और गौतमसे, गौतमने भारद्वाजसे, भारद्वाजने पाराशर्यसे पाराशर्यने बैजवापायनसे, वैजवापायनने कौशिकायनिसे, कौशिकायनिने ॥२॥ घृतकौशिकसे, घृतकौशिकने पराशर्यायणसे, पाराशर्यायणने पाराशर्यसे, पाराशर्यने जातूकण्यसे, जातूकण्यने आसुरायणसे और यास्कसे, आसुरायणने त्रैवणिसे, त्रैवणिने औपजन्धनिसे, औपजन्धनिने आसुरिसे, आसुरिने भारद्वाजसे, भारद्वाजने आत्रेयसे, आत्रेयने माण्टिसे, माण्टिने गौतमसे, गौतमने गौतमसे, गौतमने वात्स्यसे, वात्स्यने शाण्डिल्यसे, शाण्डिल्यने कैशोर्य काप्यसे । कैशोर्य काप्यने कुमारहारितसे, कुमारहारितने गालवसे, गालवने विदर्भीकौण्डिन्यसे विदर्भीकौण्डिन्यने वत्सनपात् बाभ्रवसे, वत्सनपात् बाभ्रवने पन्थासौभरसे, पन्थासौभरने अयास्य आङ्गिरससे, अयास्य आङ्गिरसने आभूति त्वाष्ट्रसे, आभूति त्वाष्ट्रने विश्वरूप त्वाष्ट्रसे विश्वरूप त्वाष्ट्रने अश्विनीकुमारोंसे, अश्विनीकुमारोंने दध्यङ्ङाथर्वणसे, दध्यङ्ङाथर्वणने अथर्वा दैवसे, अथर्वा दैवने मृत्यु-प्राध्वंसनसे, मृत्यु-प्राध्वंसनने प्रध्वंसनसे, प्रध्वंसनने एकर्षिसे, एकर्षिने विप्रचित्तिसे, विप्रचित्तिने व्यष्टिसे, व्यष्टिने सनारुसे, सनारुने सनातनसे, सनातनने सनगसे, सनगने परमेष्ठीसे और परमेष्ठीने ब्रह्मासे [इसे प्राप्त किया]। ब्रह्मा स्वयम्भू है, ब्रह्माको नमस्कार है ॥३॥
| अथेदानीं ब्रह्मविद्यार्थस्य मधुकाण्डस्य वंशः स्तुत्यर्थो ब्रह्मविद्यायाः । मन्त्रश्चायं स्वाध्याय्यार्थो जपार्थश्च । तत्र वंश इव वंशः-यथा वेणुवंशःपर्वणःपर्वणो हि भिद्यते तद्वदग्रात्प्रभृति आमूलप्राप्तेरयं वंशः। अध्यायचतुष्ट- | अब ब्रह्मविद्याकी स्तुतिके लिये ब्रह्मविद्या जिसका प्रयोजन है, उस मधुकाण्डका वंश बतलाया जाता है। यह मन्त्र स्वाध्याय और जपके लिये है। यह वंश वंश (बाँस) के समान है। जिस प्रकार पर्वों (पोरियों) का वंशभूत वेणु (बाँस) पर्वोंसे भिन्न है, उसी प्रकार अग्रभागसे लेकर मूलपर्यन्त यह वंश भी भिन्न |
६१८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २
६१८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २
| यस्य आचार्यपरम्पराक्रमो वंश इत्युच्यते। तत्र प्रथमान्तः शिष्यः पञ्चम्यन्तः आचार्यः । परमेष्ठी विराट्, ब्रह्मणो हिरण्यगर्भात् । ततः परम् आचार्यपरम्परा नास्ति। यत्पुनर्ब्रह्म तन्नित्यं स्वयम्भु, तस्मै ब्रह्मणे स्वयम्भुवे नमः ॥ १–३ ॥ | है। यहाँ [ब्राह्मणभागके आरम्भिक] चार अध्यायोंकी आचार्यपरम्परा 'वंश' नामसे कही गयी है। इनमें प्रथमाविभक्त्यन्त शिष्य है और पञ्चम्यन्त आचार्य है। परमेष्ठी यानी विराट्ने ब्रह्मा—हिरण्यगर्भ-से प्राप्त की। उससे आगे आचार्य-परम्परा नहीं है; क्योंकि जो ब्रह्मा है वह तो नित्य और स्वयम्भू है, उस स्वयम्भू ब्रह्माको नमस्कार है ॥ १–३ ॥ |
इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये द्वितीयाध्याये
षष्ठं वंशब्राह्मणम् ॥ ६ ॥
इति श्रीमद्गोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य
श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये
द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
तृतीय अध्याय
तृतीय अध्याय
प्रथम ब्राह्मण
याज्ञवल्कीय काण्ड
| 'जनको ह वैदेहः' इत्यादि याज्ञवल्कीयं काण्डमारभ्यते। उपपत्तिप्रधानत्वादतिक्रान्तेन मधुकाण्डेन समानार्थत्वेऽपि सति न पुनरुक्तता। मधुकाण्डं ह्यागमप्रधानम्। आगमोपपत्ती ह्यात्मैकत्वप्रकाशनाय प्रवृत्ते शक्नुतः करतलगतबिल्वमिव दर्शयितुम्। 'श्रोतव्यो मन्तव्यः' इति ह्युक्तम्। तस्मादागमार्थस्यैव परीक्षापूर्वकं निर्धारणाय याज्ञवल्कीयं काण्डमुपपत्तिप्रधानमारभ्यते। आख्यायिका तु विज्ञानस्तुत्यर्था उपायविधिपरा वा। प्रसिद्धो ह्युपायो विद्वद्भिः शास्त्रेषु च दृष्टः—दानम्। दानेन ह्युप- | अब 'जनको ह वैदेहः' इत्यादि याज्ञवल्कीय काण्ड आरम्भ किया जाता है। गत मधुकाण्डसे समानार्थता होनेपर भी यह काण्ड युक्तिप्रधान होनेके कारण इसमें पुनरुक्तिका दोष नहीं है; क्योंकि मधुकाण्ड शास्त्रप्रधान है। जब शास्त्र और युक्ति दोनों ही आत्मैकत्व प्रदर्शित करनेके लिये प्रवृत्त हों तो वे उसका हथेलीपर रखे हुए बिल्वफलके समान साक्षात्कार करा सकते हैं।<br><br>'श्रवण करना चाहिये, मनन करना चाहिये' ऐसा पहले कहा गया है; अतः शास्त्र-तात्पर्यको ही परीक्षापूर्वक निश्चय करनेके लिये यह युक्तिप्रधान याज्ञवल्कीय काण्ड आरम्भ किया जाता है। यहाँ जो आख्यायिका है, वह तो विज्ञानकी स्तुतिके लिये और उसके उपायका विधान करनेके लिये है। दान—यह इसका प्रसिद्ध उपाय है और शास्त्रोंमें भी विद्वानोंने इसे ही देखा है, क्योंकि दानसे |
६२० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३
| ६२० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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| नमन्ते प्राणिनः। प्रभूतं हिरण्यं गोसहस्रदानं चेहोपलभ्यते; तस्मादन्यपरेणापि शास्त्रेण विद्याप्राप्त्युपायदानप्रदर्शनार्था आख्यायिका आरब्धा।<br><br>अपि च तद्विद्यसंयोगस्तैश्च सह वादकरणं विद्याप्राप्त्युपायो न्यायविद्यायां दृष्टः; तच्चास्मिन्नध्याये प्राबल्येन प्रदर्श्यते। प्रत्यक्षा च विद्वत्संयोगे प्रज्ञावृद्धिः। तस्माद् विद्याप्राप्त्युपायप्रदर्शनार्थैव आख्यायिका। | प्राणी अपने प्रति विनीत हो जाते हैं। यहाँ बहुत-से सुवर्ण और सहस्र गौओंका दान देखा जाता है; अतः यहाँ शास्त्रका प्रतिपाद्य विषय दूसरा होनेपर भी यह आख्यायिका विद्याप्राप्तिके उपायभूत दानको प्रदर्शित करनेके लिये आरम्भ की गयी है।<br><br>इसके सिवा किसी विद्यामें निष्णात पुरुषोंका संयोग और उनके साथ वाद करना भी न्यायविद्यामें विद्याप्राप्तिका उपाय देखा गया है; और वह वाद इस अध्यायमें बड़ी प्रौढ़िके साथ दिखाया जाता है। विद्वानोंके संयोगसे प्रज्ञाकी वृद्धि होती है—यह तो प्रत्यक्ष ही है। अतः यह आख्यायिका विद्याप्राप्तिका उपाय प्रदर्शित करनेके लिये ही है। |
राजा जनकका सर्वश्रेष्ठ ब्रह्मवेत्ताको सहस्र गौएँ दान करनेकी घोषणा करना
ॐ जनको ह वैदेहो बहुदक्षिणेन यज्ञेनेजे तत्र ह कुरुपञ्चालानां ब्राह्मणा अभिसमेता बभूवुस्तस्य ह जनकस्य वैदेहस्य विजिज्ञासा बभूव कः स्विदेषां ब्राह्मणानामनूचानतम इति स ह गवाँ॒ सहस्रमवरुरोध दश दश पादा एकैकस्याः शृङ्गयोराबद्धा बभूवुः॥१॥
विदेहदेशमें रहनेवाले राजा जनकने एक बड़ी दक्षिणावाले यज्ञद्वारा यजन किया। उसमें कुरु और पाञ्चाल देशोंके ब्राह्मण एकत्रित हुए। उस
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थे ६२१
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थे ६२१
राजा जनकको यह जाननेकी इच्छा हुई कि इन ब्राह्मणोंमें अनुवचन (प्रवचन) करनेमें सबसे बढ़कर कौन है ? इसलिये उसने एक सहस्र गौएँ गोशालामें रोक लीं। उनमेंसे प्रत्येकके सींगोंमें दश-दश पाद सुवर्ण बँधे हुए थे ॥ १ ॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
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| जनको नाम ह किल सम्राड्राजा बभूव विदेहानाम्; तत्र भवो वैदेहः । स च बहुदक्षिणेन यज्ञेन, शाखान्तरप्रसिद्धो वा बहुदक्षिणो नाम यज्ञः, अश्वमेधो वा दक्षिणाबाहुल्याद्बहुदक्षिण इहोच्यते, तेनेजेऽयजत् । | जनक नामका सम्राट् विदेह देशका राजा था, विदेह देशमें उत्पन्न होने और रहनेके कारण उसे वैदेह कहते हैं। उसने एक बहुत दक्षिणावाले यज्ञसे, अथवा शाखान्तरमें प्रसिद्ध बहुदक्षिणनामक यज्ञसे, या अधिक दक्षिणावाला होनेसे यहाँ अश्वमेध ही बहुदक्षिण कहा गया है—उससे, यजन किया । |
| तत्र तस्मिन्यज्ञे निमन्त्रिता दर्शनकामा वा कुरूणां देशानां पञ्चालानां च ब्राह्मणाः, तेषु हि विदुषां बाहुल्यं प्रसिद्धम् अभिसमेता अभिसङ्गता बभूवुः । तत्र महान्तं विद्वत्समुदायं दृष्ट्वा तस्य ह किल जनकस्य वैदेहस्य यजमानस्य, को नु खल्वत्र ब्रह्मिष्ठ इति विशेषेण ज्ञातुमिच्छा विजिज्ञासा बभूव । कथम् ? कः स्विद् को नु खल्वेषां ब्राह्मणानाम् अनूचानतमः ? सर्वे इमेऽनूचानाः, कः स्विदेषामतिशयेनानूचान इति । | वहाँ उस यज्ञमें निमन्त्रित होकर अथवा उसे देखनेकी इच्छासे कुरु और पाञ्चाल देशोंके ब्राह्मण एकत्रित हुए, क्योंकि इन्हीं देशोंमें विद्वानोंकी बहुलता प्रसिद्ध है। वहाँ महान् विद्वत्समुदाय देखकर उस विदेहराज यजमान जनककी विशेषरूपसे यह जाननेकी इच्छा हुई कि इनमें कौन ब्रह्मिष्ठ है। कैसी इच्छा हुई ?—यह कि इन ब्राह्मणोंमें अनुवचन करनेमें सबसे अधिक समर्थ कौन है ? अनुवचन करनेवाले तो ये सभी हैं, किंतु इनमें अतिशय अनूचान ( प्रवचन करनेवाला ) कौन है ? यह उसने जानना चाहा । |
६२२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३
| ६२२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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| स ह अनूचानतमविषयोत्पन्नजिज्ञासः संस्तद्विज्ञानोपायर्थं गवां सहस्रं प्रथमवयसामवरुरोध, गोष्ठेऽवरोधं कारयामास। किंविशिष्टास्ता गावोऽवरुद्धाः ! इत्युच्यते— पलचतुर्थभागः पादः सुवर्णस्य, दश दश पादा एकैकस्या गोः शृङ्गयोराबद्धा बभूवुः । पञ्च पञ्च पादा एकैकस्मिन् शृङ्गे ॥ १ ॥ | इस प्रकार अनूचानतमविषयक जिज्ञासा उत्पन्न होनेपर उसे जाननेका उपाय करनेके लिये उसने नयी अवस्थावाली एक सहस्र गौएँ रोक लीं अर्थात् गोशालामें रोकवा दीं। वे किस विशेषणवाली गौएँ रोकी गयी थीं, सो बतलाया जाता है—पलका चतुर्थ भाग पाद होता है; ऐसे सुवर्णके दश-दश पाद एक-एक गौके सींगोंमें बाँधे हुए थे, अर्थात् एक-एक सींगमें पाँच-पाँच पाद थे ॥ १ ॥ |
याज्ञवल्क्यका गौएँ ले जानेके लिये अपने शिष्यको आज्ञा देना, ब्राह्मणोंका कोप, अश्वलका प्रश्न
तान् होवाच ब्राह्मणा भगवन्तो यो वो ब्रह्मिष्ठः स एता गा उदजतामिति । ते ह ब्राह्मणा न दधृषुरथ ह याज्ञवल्क्यः स्वमेव ब्रह्मचारिणमुवाचैताः सोम्योदज सामश्रवा३ इतिता होदाचकार ते ह ब्राह्मणाश्चुक्रुधुः कथं नो ब्रह्मिष्ठो ब्रुवीतेत्यथ ह जनकस्य वैदेहस्य होताऽश्वलो बभूव स हैनं पप्रच्छ त्वं नु खलु नो याज्ञवल्क्य ब्रह्मिष्ठोऽसी३ इति स होवाच नमो वयं ब्रह्मिष्ठाय कुर्मो गोकामा एव वयं ँ स्म इति त ँ ह तत एव प्रष्टुं दध्रे होताऽश्वलः ॥ २ ॥
उसने उनसे कहा—'पूज्य ब्राह्मणगण ! आपमें जो ब्रह्मिष्ठ हो वह इन गौओंको ले जाय।' किंतु उन ब्राह्मणोंका साहस न हुआ। तब
ब्रह्मचारियोंका...
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