भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 613, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 613

| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ६०५ | | :--- | :--- |

| अथ ते तदिन्द्रः शिरश्छेत्स्यति; अथ ते स्वं शिर आहृत्य तत्ते प्रतिधास्याव इति । | उस समय इन्द्र आपके उस मस्तकको काट देगा, फिर हम आपका निजी मस्तक लाकर उसे जोड़ देंगे।' | | तथेति तौ होपनिन्थे। तौ यदोपनिन्थे, अथास्य शिरच्छित्त्वान्यत्रोपनिदधतुः; अथाश्वस्य शिर आहृत्य तद्धास्य प्रतिदधतुः। तेन हाभ्यामनूवाच। स यदाभ्यामनूवाचाथास्य तदिन्द्रः शिरश्चिच्छेद। अथास्य स्वं शिर आहृत्य तद्धास्य प्रतिदधतुरिति। | तब 'बहुत अच्छा' ऐसा कहकर उन्होंने उनका उपनयन किया। जिस समय उनका उपनयन किया उस समय उन्होंने उनका मस्तक काटकर अन्यत्र रख दिया तथा घोड़ेका शिर लाकर उसे इनके जोड़ दिया। उससे दध्यङ्ने उन्हें उपदेश किया। जिस समय वे उन्हें उपदेश करने लगे तब इन्द्रने आकर उनका वह मस्तक काट दिया। फिर उनके अपने मस्तकको लाकर उसे उनके जोड़ दिया। | | यावत्तु प्रवर्ग्यकर्माङ्गभूतं मधु तावदेव तत्राभिहितम्, न तु कक्ष्यमात्मज्ञानाख्यम्। तत्र या आख्यायिकाभिहिता सेह स्तुत्यर्था प्रदर्श्यते। इदं वै तन्मधु दध्यङ्ङाथर्वणोऽनेन प्रपञ्चेनाश्विभ्यामुवाच। | किंतु वहाँ जितना प्रवर्ग्यका अङ्गभूत मधु है उतना ही कहा गया है, आत्मज्ञानसंज्ञक कक्ष्य मधुका वर्णन नहीं किया गया। वहाँ जो आख्यायिका कही गयी है, उसे यहाँ स्तुतिके लिये प्रदर्शित किया जाता है। उस इस मधुका इन दध्यङ्ङाथर्वणने अश्विनीकुमारोंके प्रति इस प्रकार प्रपञ्चके साथ वर्णन किया है। | | तदेतदृषिः—तदेतत् कर्म, ऋषिर्मन्त्रः, पश्यन्नुपलभमानः, | उस इस ऋषिने—ऋषि यहाँ मन्त्रका वाचक है—इस कर्मको |