बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 612, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ६०४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २ |
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| सूचितम्, नाविष्कृतं मधु, तदिदं मध्विहानन्तरं निर्दिष्टम्—‘इयं पृथिवी’ ( २ । ५ । १ ) इत्यादिना। | किया गया है, किंतु प्रकट नहीं किया गया, उसी मधुका यहाँ पास ही ‘इयं पृथिवी’ इत्यादि मन्त्रोंसे निर्देश किया गया है। | | कथं तत्र प्रकरणान्ते सूचितम्— | उस प्रकरणान्तरमें इसकी किस प्रकार सूचना दी है?— | | दध्यङ् ह वा आस्यामाथर्वणो मधु नाम ब्राह्मणमुवाच। तदेतयोः प्रियं धाम तदेवैनयोरेतेनोपगच्छति। स होवाचेन्द्रेण वा उक्तोऽस्म्येतच्चेदन्यस्मा अनुब्रूयास्तत एव ते शिरश्छिन्द्यामिति। तस्माद्वै बिभेमि, यद्वै मे स शिरो न छिन्द्यात् तद्वामुपनेष्य इति। तौ होचतुरावां त्वा तस्मात् त्रास्यावहे इति। कथं मा त्रास्येथे ? इति। यदा नावुपनेष्यसे; अथ ते शिरश्छित्त्वा अन्यत्राहृत्योपनिधास्यावः; अथाश्वस्य शिर आहृत्य तत्ते प्रतिधास्यावः; तेन नावनुवक्ष्यसि। यदा नावनुवक्ष्यसि, | आथर्वण दध्यङ्ने इन दोनों (अश्विनीकुमारों) को मधुब्राह्मण सुनाया। यह इनका प्रिय धाम है; यही आगे बतलाये जानेवाले प्रकारसे उपदेश करनेके लिये ब्राह्मण इन दोनोंके पास आचार्यरूपमें उपस्थित होता है। उस दध्यङ्ङाथर्वणने कहा, ‘इन्द्रने मुझसे कहा है कि यदि तुम इसे किसी अन्यके प्रति कहोगे तो उसी समय मैं तुम्हारा मस्तक काट दूँगा। इसीसे मैं डरता हूँ, यदि वह मेरा मस्तक न काटे तो मैं तुम दोनोंका उपनयन करूँगा।’ उन्होंने कहा, ‘हम उनसे आपकी रक्षा करेंगे।’ [ दध्यङ् ] ‘किस प्रकार मेरी रक्षा करोगे ?’ [ अश्विनीकुमार ] ‘जिस समय आप हमारा उपनयन करेंगे, उस समय आपका शिर काटकर दूसरी जगह ले जाकर रख देंगे, फिर घोड़ेका शिर लाकर आपके लगा देंगे; उससे आप हमें उपदेश करेंगे। जिस समय वे आप हमें उपदेश करेंगे |