बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
९३२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४
| ९३२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४ |
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न तत्र रथा न रथयोगा न पन्थानो भवन्त्यथ रथान् रथयोगान् पथः सृजते न तत्रानन्दा मुदः प्रमुदो भवन्त्यथानन्दान्मुदः प्रमुदः सृजते । न तत्र वेशान्ताः पुष्करिण्यः स्रवन्त्यो भवन्त्यथ वेशान्तान् पुष्करिणीः स्रवन्तीः सृजते स हि कर्ता ॥ १० ॥
उस अवस्था में न रथ हैं, न रथमें जोते जानेवाले [अश्वादि] हैं और न मार्ग ही हैं। परंतु वह रथ, रथमें जोते जानेवाले [अश्वादि] और रथके मार्गोंकी रचना कर लेता है। उस अवस्था में आनन्द, मोद और प्रमोद भी नहीं हैं, किंतु वह आनन्द, मोद और प्रमोदकी रचना कर लेता है। वहाँ छोटे-छोटे कुण्ड, सरोवर और नदियाँ नहीं हैं; वह कुण्ड, सरोवर और नदियोंकी रचना कर लेता है—वही उनका कर्ता है ॥ १० ॥
| न तत्र विषयाः स्वप्ने रथादिलक्षणाः; तथा न रथयोगाः, रथेषु युज्यन्ते इति रथयोगा अश्वादयः, तत्र न विद्यन्ते; न च पन्थानो रथमार्गा भवन्ति । अथ रथान् रथयोगान् पथश्च सृजते स्वयम् । | वहाँ—उस स्वप्नावस्था में रथादिरूप विषय नहीं हैं और न रथयोग हैं, जो रथमें जोते जाते हैं, वे रथयोग अर्थात् अश्वादि वहाँ मौजूद नहीं हैं; और न पथ-रथके मार्ग ही हैं। किंतु यह रथ, रथयोग और मार्गोंकी स्वयं रचना कर लेता है। | | कथं पुनः सृजते रथादिसाधनानां वृक्षादीनामभावे ? | शङ्का—किंतु रथादिके साधन वृक्षादिका अभाव होनेपर भी यह उनकी रचना कैसे कर लेता है ? | | उच्यते—ननूक्तम् 'अस्य लोकस्य सर्ववतो मात्रामपादाय स्वयं विहत्य स्वयं निर्माय' इति; अन्तःकरणवृत्तिरस्य लोकस्य वासना- | समाधान—बतलाते हैं, ऐसा कहा हे न कि 'इस सर्वावान् लोककी मात्राको लेकर अपनेको चेतनाशून्य कर तथा दूसरा शरीर रचकर' इत्यादि; सो अन्तःकरणकी वृत्ति ही इस |
| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९३३ |
| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९३३ |
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| मात्रा तामपादाय, रथादिवासना-<br>रूपान्तःकरणवृत्तिस्तदुपलब्धि-<br>निमित्तेन कर्मणा चोद्यमाना<br>दृश्यत्वेन व्यवतिष्ठते; तदुच्यते—<br>स्वयं निर्मायेति; तदेवाह—<br>रथादीन् सृजत इति । | लोककी वासनाकी मात्रा है, उसे<br>लेकर रथादिकी वासनारूपा जो<br>अन्तःकरणकी वृत्ति है, वह उसकी<br>उपलब्धिके निमित्तभूत कर्मसे प्रेरित<br>होकर दृश्यरूपसे स्थित होती है।<br>उसीको 'स्वयं निर्माय' इस प्रकार<br>कहा है और उसीको 'रथादीन्<br>सृजते' इन शब्दोंसे कहा है। | | न तु तत्र, करणं वा करणानु-<br>ग्राहकाणि वा आदित्यादिज्यो-<br>तींषि, तदवभास्यां वा रथादयो<br>विषया विद्यन्ते; तद्वासनामात्रं<br>तु केवलं तदुपलब्धिकर्मनिमित्त-<br>चोदितोद्भूतान्तःकरणवृत्त्याश्रयं<br>दृश्यते । तद् यस्य ज्योतिषो<br>दृश्यतेऽलुप्तदृशः, तदात्म-<br>ज्योतिस्तत्र केवलमसिमिव कोशाद्<br>विविक्तम् । | उस अवस्थामें इन्द्रिय, इन्द्रियों-<br>के अनुग्राहक आदित्यादि प्रकाश<br>अथवा उनसे प्रकाश्य रथादि विषय<br>भी नहीं हैं, उनकी उपलब्धिके हेतु-<br>भूत जो कर्म हैं, उन कर्मरूप<br>निमित्तसे प्रेरित जो अन्तःकरणकी<br>उद्भूत वृत्ति है, उसके आश्रित<br>रहनेवाली केवल उनकी वासना-<br>मात्र तो देखी जाती है। वह जिस<br>नित्यज्ञानस्वरूप ज्योतिको दिखायी<br>देती है, वह आत्मज्योति इस<br>अवस्थामें म्यानसे निकाली हुई<br>तलवारके समान शुद्ध होती है। | | तथा न तत्रानन्दाः सुखवि-<br>शेषाः, मुदो हर्षाः पुत्रादिलाभ-<br>निमित्ताः, प्रमुदस्त एव प्रकर्षो-<br>पेताः; अथ चानन्दादीन् सृजते । | इसी प्रकार उस समय आनन्द-<br>सुखविशेष, मुद्-पुत्रादिकी प्राप्तिसे<br>होनेवाले हर्ष और प्रमुद्-प्रकर्षको<br>प्राप्त हुए वे हर्ष भी नहीं हैं; किंतु<br>यह आनन्दादिको रच लेता है। | | तथा न तत्र वेशान्ताः पल्वलाः,<br>पुष्करिण्यस्तडागाः, स्रवन्त्यो नद्यो | तथा उस अवस्थामें न वेशान्त-<br>पल्वल (छोटी तलैया), न पुष्करिणी<br>तडाग और न स्रवन्ती-नदियाँ ही |
९३४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४
| ९३४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४ |
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| संस्कृत-भाष्यम् | हिन्दी-अनुवाद |
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| भवन्ति; अथ वेशान्तादीन् सृजते| वासनामात्ररूपान्, यस्मात् स हि कर्ता; तद्वासनाश्रयचित्तवृत्त्युद्भवनिमित्तकर्महेतुत्वेनेत्यवोचाम तस्य कर्तृत्वम्; न तु साक्षादेव तत्र क्रिया सम्भवति, साधनाभावात्। | है; किंतु यह उन वासनामात्ररूपी पल्वलादिकी रचना कर लेता है क्योंकि वही कर्ता है; उन विषयोंकी वासनाकी आश्रयभूता जो चित्तवृत्ति है उसके परिणामके कारण होनेवाले जो कर्म हैं, उनके कारण ही उसका कर्तृत्व बतलाया गया है, साक्षात्रूपसे ही उसमें क्रियाका होना सम्भव नहीं है; क्योंकि उसके पास क्रियाके साधनोंका अभाव है। |
| न हि कारकमन्तरेण क्रिया सम्भवति; न च तत्र हस्तपादादीनि क्रियाकारकाणि सम्भवन्ति; यत्र तु तानि विद्यन्ते जागरिते, तत्र आत्मज्योतिरवभासितैः कार्यकारणै रथादिवासनाश्रयान्तःकरणवृत्त्युद्भवनिमित्तं कर्म निर्वर्त्यते; तेनोच्यते—स हि कर्तेति; | कारकके बिना क्रियाका होना सम्भव नहीं है और वहां क्रियाके कारक हाथ-पैर आदि हैं नहीं; जहाँ जागरित-अवस्थामें वे रहते हैं वहाँ आत्मज्योतिसे प्रकाशित देह और इन्द्रियोंके द्वारा रथादिकी वासनाओंकी आश्रयभूता अन्तःकरणकी वृत्तिका उत्थानसे होनेवाला कर्म निष्पन्न हो सकता है, इसीसे ऐसा कहा जाता है कि वही कर्ता है। |
| तदुक्तम्—'आत्मनैवायं ज्योतिषास्ते पल्ययते कर्म कुरुते' इति; | और इसीसे 'वह आत्मज्योतिसे ही बैठता, इधर-उधर जाता, कर्म करता और फिर लौट आता है' |
| तत्रापि न परमार्थतः स्वतः कर्तृत्वं चैतन्यज्योतिषोऽवभासकत्वव्यतिरेकेण- यच्चैतन्यात्मज्योतिषा- | ऐसा कहा है; वहाँ भी अवभासक होनेके सिवा इस चैतन्यज्योतिका वास्तवमें स्वतः कोई कर्तृत्व नहीं है; क्योंकि आत्मा अन्तःकरणके द्वारा चैतन्यात्म- |
| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९३५ |
| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९३५ |
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| न्तःकरणद्वारेणावभासयति कार्यकारणानि, तदवभासितानि कर्मसु व्याप्रीयन्ते कार्यकारणानि, तत्र कर्तृत्वमुपचर्यत आत्मनः । यदुक्तम्—'ध्यायतीव लेलायतीव' इति, तदेवानूद्यते—'स हि कर्ता' इतीह हेत्वर्थम् ॥१०॥ | ज्योतिसे देह और इन्द्रियोंको प्रकाशित करता है और उससे प्रकाशित हुई देह और इन्द्रियां कर्ममें प्रवृत्त होती हैं, इसीसे उनमें आत्माके कर्तृत्वका उपचार किया जाता है। ऊपर जो 'मानो ध्यान करता है, मानो अत्यन्त चञ्चल होता है' ऐसा कहा है, उसीका कर्तृत्वमें हेतु दिखानेके लिये यहाँ 'वही कर्ता है' इस प्रकार अनुवाद किया गया है ॥ १० ॥ |
स्वप्नसृष्टिके विषयमें प्रमाणभूत मन्त्र
तदेते श्लोका भवन्ति । स्वप्नेन शारीरमभिप्रहत्या सुप्तः सुप्तानभिचाकशीति । शुक्रमादाय पुनरैति स्थानँ हिरण्मयः पुरुष एकहँसः ॥ ११ ॥
इस विषयमें ये श्लोक हैं—आत्मा स्वप्नके द्वारा शरीरको निश्चेष्ट कर स्वयं न सोता हुआ सोये हुए समस्त पदार्थोंको प्रकाशित करता है । वह शुद्ध-इन्द्रियमात्रारूपको लेकर पुनः जागरित स्थानमें आता है। हिरण्मय (ज्योतिःस्वरूप) पुरुष अकेला ही [ दोनों स्थानोंमें ] जानेवाला है ॥ ११ ॥
| तदेते—एतस्मिन्नुक्तेऽर्थ एते श्लोका मन्त्रा भवन्ति—<br>स्वप्नेन स्वप्नभावेन, शारीरं शरीरम्, अभिप्रहत्य निश्चेष्टमापाद्यासुप्तः स्वयमसुप्तहगादिशक्तिस्वाभाव्यात्, सुप्तान् वासनाकारोद्भूतानन्तःकरणवृत्त्याश्रयान् वा- | इस उक्त अर्थमें ये श्लोक—मन्त्र हैं—<br>स्वप्नसे—स्वप्नभावसे शारीर—शरीरको अभिप्रहत्य-निश्चेष्ट कर स्वयं अलुप्तज्ञानादिशक्तिस्वरूप होनेके कारण असुप्त रहकर सुप्त अर्थात् वासनारूपसे उद्भूत अन्तःकरणवृत्ति- |
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९३६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४
९३६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४
| ह्याध्यात्मिकान् सर्वानिव भावान् स्वेन रूपेण प्रत्यस्तमितान् सुप्तान्; अभिचाकशीति, अलुप्तया आत्मदृष्ट्या पश्यत्यवभासयतीत्यर्थः ।<br><br>शुक्रं शुद्धं ज्योतिष्मदिन्द्रियमात्रारूपम्, आदाय गृहीत्वा, पुनः कर्मणे जागरितस्थानमैत्यागच्छति, हिरण्मयो हिरण्मय इव चैतन्यज्योतिःस्वभावः, पुरुषः, एकहंसः—एक एव हन्तीत्येकहंसः—एको जाग्रत्स्वप्नेहलोकपरलोकादीन् गच्छतीत्येकहंसः ॥ ११ ॥ | के आश्रित बाह्य और आध्यात्मिक सभी भावोंको, जो अपने स्वरूपसे प्रत्यस्तमित अर्थात् सोये रहते हैं, प्रकाशित करता है। तात्पर्य यह है कि उन्हें अपनी अलुप्त आत्मदृष्टिसे देखता अर्थात् अवभासित करता है।<br><br>तथा शुक्र—शुद्ध ज्योतिष्मान् इन्द्रियमात्रारूपको ग्रहणकर वह पुनः कर्म अर्थात् जागरित स्थानमें आ जाता है। वह हिरण्मय—हिरण्मयके समान चैतन्यज्योतिःस्वरूप पुरुष एकहंस है; अकेला ही हन्ति-चलता है, इसलिये एक हंस है। वह अकेला ही जाग्रत्, स्वप्न तथा इहलोक-परलोकादिमें जाता है, इसलिये एकहंस है ॥ ११ ॥ |
प्राणेन रक्षन्नवरं कुलायं बहिष्कुलायादमृतश्चरित्वा । स ईयतेऽमृतो यत्र कामँ हिरण्मयः पुरुष एकहँसः ॥ १२ ॥
इस निकृष्ट शरीरकी प्राणसे रक्षा करता हुआ वह अमृतधर्मा शरीरसे बाहर विचरता है। वह अकेला विचरनेवाला हिरण्मय अमृत पुरुष जहां वासना होती है, वहाँ चला जाता है ॥ १२ ॥
| तथा प्राणेन पञ्चवृत्तिना रक्षन् परिपालयन्–अन्यथा मृतभ्रान्तिः स्यात, अवरं निकृष्टमनेकाशुचिसंघातत्वादत्यन्तबीभत्सम्, कुलायम् | इसी प्रकार प्राणापानादि पाँच वृत्तियोंवाले प्राणसे रक्षण-परिपालन करता हुआ, नहीं तो मरनेकी भ्रान्ति हो जाती, अतः इस अवर-निकृष्ट-अनेकों अपवित्र वस्तुओंका संघात होनेके कारण अत्यन्त बीभत्स कुलाय |
| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९३७ |
| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९३७ |
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| नीडं शरीरम्, स्वयं तु बहिरस्तस्मात् कुलायात्, चरित्वा—यद्यपि शरीरस्थ एव स्वप्नं पश्यति तथापि तत्सम्बन्धाभावात् तत्स्थ इव आकाशो बहिश्चरित्वेत्युच्यते, अमृतः स्वयममरणधर्मा, ईयते गच्छति, यत्र कामम्—यत्र यत्र कामो विषयेषु उद्भूतवृत्तिर्भवति तं तं कामं वासनारूपेणोद्भूतं गच्छति ॥ १२ ॥ | —घोंसले अर्थात् शरीरकी रक्षा करता हुआ, किंतु स्वयं उस कुलायसे बाहर विचरकर; यद्यपि वह शरीरमें रहकर ही स्वप्न देखता है, तथापि उसके सम्बन्धसे रहित होनेके कारण तदन्तर्वर्ती आकाशके समान मानो बाहर विचरकर—ऐसा कहा जाता है, स्वयं अमृत—अमरणधर्मा रहकर ईयते—जाता है, जहाँ कामना होती है अर्थात् जहाँ-जहाँ विषयोंमें कामना उद्भूतवृत्ति रहती है, वासनारूपसे उद्भूत उस-उस काम (कामनाके विषय) के प्रति जाता है ॥ १२ ॥ |
स्वप्नान्त उच्चावचमीयमानो रूपाणि देवः कुरुते बहूनि । उतेव स्त्रीभिः सह मोदमानो जक्षदुतेवापि भयानि पश्यन् ॥ १३ ॥
वह देव स्वप्नावस्थामें ऊँच-नीच भावोंको प्राप्त होता हुआ बहुत-से रूप बना लेता है। इसी प्रकार वह स्त्रियोंके साथ आनन्द मानता हुआ, [मित्रोंके साथ] हँसता हुआ तथा [व्याघ्रादि] भय देखता हुआ-सा रहता है ॥ १३ ॥
| किञ्च स्वप्नान्ते स्वप्नस्थाने, उच्चावचम्—उच्चं देवादिभावम् अवचं तिर्यगादिभावं निकृष्टं तदुच्चावचम्, ईयमानो गम्यमानः प्राप्नुवन्, रूपाणि, देवो द्योतनावान् कुरुते निर्वर्तयति वासनारूपाणि बहून्यसंख्येयानि। उतापि | इसके सिवा स्वप्नान्तमें—स्वप्न-स्थानमें ऊँच-नीच—ऊँच देवादिभाव और नीच तिर्यगादि निकृष्टभाव—ऐसे ऊँच-नीच भावोंको प्राप्त होता हुआ वह देव—द्योतनावान् पुरुष 'बहूनि'—असंख्य वासनामय रूप बना लेता है। |
९३८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| ९३८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| स्त्रीभिः सह मोदमान इव, जक्षदिव हसन्निव वयस्यैः, उतेवापि भयानि—बिभेत्येभ्य इति भयानि सिंहव्याघ्रादीनि, पश्यन्निव ॥ १३ ॥ | वह स्त्रियोंके साथ आनन्द मानता हुआ, मित्रोंके साथ हँसता हुआ और भय—जिनसे वह डर जाता है, ऐसे सिंह-व्याघ्रादि भयोंको देखता हुआ-सा रहता है ॥ १३ ॥ |
स्वप्नस्थानके विषयमें मतभेद और उसके स्वयंज्योतिष्ट्वका निश्चय
आराममस्य पश्यन्ति न तं पश्यति कश्चनेति । तं नायतं बोधयेदित्याहुः । दुर्भिषज्यँ हास्मै भवति यमेष न प्रतिपद्यते । अथो खल्वाहुर्जागरितदेश एवास्यैष इति यानि ह्येव जाग्रत् पश्यति तानि सुप्त इत्यत्रायं पुरुषः स्वयंज्योतिर्भवति सोऽहं भगवते सहस्रं ददाम्यत ऊर्ध्वं विमोक्षाय ब्रूहीति ॥ १४ ॥
सब लोग उसके आराम (क्रीडाकी सामग्री) को ही देखते हैं, उसे कोई नहीं देखता। उस सोये हुए आत्माको सहसा न जगावे—ऐसा [वैद्यलोग] कहते हैं। जिस इन्द्रियप्रदेशमें यह सोया हुआ होता है, उसमें प्राप्त न होनेसे इसका शरीर दुश्चिकित्स्य हो जाता है। इसीसे अवश्य ही कोई-कोई ऐसा कहते हैं कि यह (स्वप्नस्थान) इसका जागरितदेश ही है; क्योंकि जिन पदार्थोंको यह जागनेपर देखता है, उन्हींको सोया हुआ भी देखता है [किंतु यह ठीक नहीं है]; क्योंकि इस अवस्थामें यह पुरुष स्वयंज्योति होता है। [जनक—] वह मैं जनक श्रीमान्को सहस्र मुद्रा देता हूँ, अब आगे मुझे मोक्षके लिये उपदेश कीजिये ॥ १४ ॥
| आराममारमणमाक्रीडामनेन निर्मितां वासनारूपाम् अस्यात्मनः, पश्यन्ति सर्वे जनाः—ग्रामं नगरं स्त्रियम् अन्नाद्यमित्यादिवासनानि- | सब लोग इस आत्माके आराम—आरमण अर्थात् आक्रीडाको यानी इसकी रची हुई वासनारूप क्रीडाको देखते हैं। वे ग्राम, नगर, स्त्री और भक्ष्य अन्नरूप वासनानिर्मित |
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९३९
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९३९
| र्भितम् आक्रीडनरूपम्; न तं पश्यति तं न पश्यति कश्चन। कष्टं भो वर्ततेऽत्यन्तविविक्तं दृष्टिगोचरापन्नमपि—अहो भाग्यहीनता लोकस्य; यच्छक्यदर्शनमप्यात्मानं न पश्यति—इति लोकं प्रत्यनुक्रोशं दर्शयति श्रुतिः। अत्यन्तविविक्तः स्वयंज्योतिरात्मा स्वप्ने भवतीत्यभिप्रायः। | आक्रीडनके रूपको देखते हैं; उसे नहीं देखते—उस आत्माको कोई नहीं देखता। अहो ! बड़ा कष्ट है; जो अत्यन्त भिन्न और दृष्टिकी विषयता को प्राप्त है, जिसका दर्शन भी किया जा सकता है, उस आत्माको कोई नहीं देखता। अहो! जीवोंका कैसा दुर्भाग्य है ? इस प्रकार जीवोंके प्रति श्रुति करुणा प्रदर्शित करती है। तात्पर्य यह है कि स्वप्नावस्थामें यह स्वयंज्योति आत्मा अत्यन्त संसर्गशून्य हो जाता है। |
| तं नायतं बोधयेदित्याहुः—प्रसिद्धिरपि लोके विद्यते, स्वप्न आत्मज्योतिषो व्यतिरिक्तत्वे; कासौ? तमात्मानं सुप्तम्, आयतं सहसा भृशम्, न बोधयेत्—इत्याहुरेवं कथयन्ति चिकित्सकादयो जना लोके; नूनं ते पश्यन्ति—जाग्रद्देहादिन्द्रियद्वारतोऽपसृत्य केवलो बहिर्वर्तत इति, यत आहुः—तं नायतं बोधयेदिति। | 'तं नायतं बोधयेदित्याहुः'—स्वप्नमें आत्मज्योतिकी व्यतिरिक्तताके विषयमें लोकमें प्रसिद्धि भी है; वह प्रसिद्धि क्या है—उस सोये हुए आत्माको आयतम्—सहसा—एकाएकी न जगावे ऐसा चिकित्सकादि लोग लोकमें कहते हैं। निश्चय ही वे देखते हैं कि आत्मा जाग्रद्देहसे उसके इन्द्रियरूप द्वारसे निकलकर विशुद्धरूपसे बाहर विद्यमान है; इसीसे 'उसे सहसा न जगावे' ऐसा कहते हैं। |
| तत्र च दोषं पश्यन्ति—भृशं ह्यसौ बोध्यमानस्तानीन्द्रियद्वाराणि सहसा प्रतिबोध्यमानो न प्रतिप- | उसमें वे यह दोष भी देखते हैं—सहसा जगाये जानेपर वह एकाएकी जगाया हुआ उन इन्द्रियद्वारोंको प्राप्त |
| ९४० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४ |
| ९४० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४ |
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| संस्कृत-भाष्यम् | हिन्दी-अनुवाद |
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| द्यत इति; तदेतदाह—दुर्भिषज्यं हास्मै भवति यमेष न प्रतिपद्यते; यमिन्द्रियद्वारदेशम्—यस्माद्देशाच्छुक्रमादायापसृतस्तमिन्द्रियदेशम्—एष आत्मा पुनर्न प्रतिपद्यते, कदाचिद् व्यत्यासेनेन्द्रियमात्राः प्रवेशयति, तत आन्ध्यबाधिर्यादिदोषप्राप्तौ दुर्भिषज्यं दुःखभिषकर्मता हास्मै देहाय भवति, दुःखेन चिकित्सनीयोऽसौ देहो भवतीत्यर्थः । तस्मात् प्रसिद्ध्यापि स्वप्ने स्वयंज्योतिष्ट्वमस्य गम्यते । | नहीं हो सकता । जिस इन्द्रियद्वारदेशको—जिस देशसे कि वह शुक्र (इन्द्रियमात्रा) को लेकर हट गया था, उस इन्द्रियदेशको यह आत्मा फिर प्राप्त नहीं होता । इसीसे श्रुति कहती है, 'दुर्भिषज्यं हास्मै भवति' जिसे कि यह प्राप्त नहीं होता । जिस इन्द्रियद्वारदेशको—जिस देशसे कि यह शुक्र (इन्द्रियमात्रा) लेकर हट गया है, उस इन्द्रियदेशको यह आत्मा फिर प्राप्त नहीं होता । यदि कभी विपरीतरूपसे इन्द्रियमात्राओंको प्रविष्ट कर देता है तो अन्धत्व-बधिरत्व आदि दोषकी प्राप्ति होनेपर इस देहके लिये दुर्भिषज्य—कष्टकर वैद्यक्रिया हो जाती है, अर्थात् तब यह देह कठिनतासे चिकित्साके योग्य हो जाता है । अतः प्रसिद्धिसे भी स्वप्नमें इसकी स्वयंप्रकाशता ज्ञात होती है । |
| स्वप्नो भूत्वातिक्रान्तो मृत्यो रूपाणीति तस्मात् स्वप्ने स्वयंज्योतिरात्मा । अथो अपि खल्वन्य आहुः—जागरितदेश एवास्यैष यः स्वप्नः—न संध्यं स्थानान्तरमिहलोकपरलोकाभ्यां व्यतिरिक्तम्, किं तर्हि ? इह लोक एव जागरितदेशः । | यह स्वप्न होकर [शरीरादि] मृत्युके रूपोंसे पार हो जाता है, इसलिये स्वप्नमें आत्मा स्वयंज्योति है । इसीसे अवश्य ही कोई-कोई लोग कहते हैं कि यह जो स्वप्न है, इस आत्माका जागरितदेश ही है । इहलोक और परलोकसे भिन्न कोई संध्यस्थान नहीं है; तो फिर क्या है ? इहलोक अर्थात् जागरितदेश ही है । |
ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९४१
| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९४१ |
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| यद्येवम्, किञ्चातः ? शृण्वतो यद् भवति—यदा जागरितदेश एवायं स्वप्नः, तदायमात्मा कार्यकारणेभ्यो न व्यावृत्तस्तैर्मिश्रीभूतः, अतो न स्वयंज्योतिरात्मा—इत्यतः स्वयंज्योतिष्ट्वबाधनाय अन्ये आहुः—जागरितदेश एवास्यैष इति । तत्र च हेतुमाचक्षते—जागरितदेशत्वे यानि हि यस्माद् हस्त्यादीनि पदार्थजातानि, जाग्रज्जागरितदेशे, पश्यति लौकिकः, तान्येव सुप्तोऽपि पश्यतीति । | यदि ऐसी बात है, तो इससे क्या हुआ ? इससे जो होता है, सो सुनो—यदि यह स्वप्न जागरित देश ही है तो उस समय यह आत्मा देह और इन्द्रियोंसे पृथक् नहीं होता, उनसे मिला ही रहता है, अतः आत्मा स्वयंज्योति नहीं है, इसलिये उसके स्वयंज्योतिष्ट्वको बाधित करनेके लिये कोई लोग कहते हैं कि यह इसका जागरितदेश ही है। उसकी जागरितदेशतामें वे यह हेतु बतलाते हैं; क्योंकि लौकिक पुरुष जागरितदेशमें जिन हाथी आदि पदार्थोंको देखता है, उन्हींको वह स्वप्नमें भी देखता है। | | तदसत्, इन्द्रियोपरमात्, उपरतेषु हीन्द्रियेषु स्वप्नान् पश्यति; तस्मान्नान्यस्य ज्योतिषस्तत्र सम्भवोऽस्ति; तदुक्तम्—‘न तत्र रथा न रथयोगाः’ इत्यादि; तस्मादत्रायं पुरुषः स्वयंज्योतिर्भवत्येव । | यह ठीक नहीं है, क्योंकि उस समय इन्द्रियां उपरत हो जाती हैं । इन्द्रियोंके उपरत होनेपर ही पुरुष स्वप्न देखता है; इसलिये उस अवस्थामें किसी अन्य ज्योतिका होना तो सम्भव नहीं है, इसीसे कहा है—‘वहां न रथ हैं, न रथयोग हैं’ इत्यादि; इसलिये इस अवस्थामें यह पुरुष स्वयंज्योति होता ही है। | | स्वयंज्योतिरात्मा अस्तीति स्वप्ननिदर्शनेन प्रदर्शितम्, अति- | स्वयंज्योति आत्मा है—यह बात स्वप्नके दृष्टान्तसे दिखा दी गयी और |
९४२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४
| ९४२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४ |
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| क्रामति मृत्यो रूपाणीति च; क्रमेण संचरन्निहलोकपरलोकादीनिहलोकपरलोकादिव्यतिरिक्तः, तथा जाग्रत्स्वप्नकुलायाभ्यां व्यतिरिक्तः, तत्र च क्रमसंचारान्नित्यश्च—इत्येतत् प्रतिपादितं याज्ञवल्क्येन। अतो विद्यानिष्क्रयार्थं सहस्रं ददामीत्याह जनकः; सोऽहमेवंबोधितस्त्वया भगवते तुभ्यं सहस्रं ददामि; विमोक्षश्च कामप्रश्नो मयाभिप्रेतः; तदुपयोग्यं तादर्थ्यात्तदेकदेश एव; अतस्त्वां नियोक्ष्यामि समस्तकामप्रश्ननिर्णयश्रवणेन—विमोक्षायत ऊर्ध्वं ब्रूहीति, येन संसाराद् विप्रमुच्येयं त्वत्प्रसादात्। विमो- | यह भी दिखा दिया गया कि वह मृत्युके रूपोंको पार कर जाता है। वह क्रमशः इहलोक और परलोकादिमें संचार करता हुआ भी इहलोक और परलोकादिसे व्यतिरिक्त हे तथा जाग्रत् और स्वप्नके शरीरोंसे पृथक् है और उनमें क्रमशः संचार करनेके कारण नित्य भी है—ऐसा याज्ञवल्क्यने प्रतिपादन किया; अतः विद्यादानसे उऋण होनेके लिये जनकने 'मैं आपको सहस्र मुद्रा देता हूँ' ऐसा कहा। आपके द्वारा इस प्रकार उपदेश किये जानेपर मैं आपको सहस्र मुद्रा देता हूँ। अब मुझे अपने मनोवाञ्छित प्रश्न मोक्षके विषयमें सुनना अभीष्ट है; यह आत्मप्रत्ययका उपदेश मोक्ष या सम्यग्बोधमें उपयोगी है; अतः उसका साधन होनेके कारण यह उस यथार्थ बोधका एकदेश (अङ्ग) ही है, इसलिये समस्त इच्छित प्रश्नोंका निर्णय सुननेके द्वारा मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ; अब आगे मोक्षके लिये उपदेश कीजिये, जिससे कि आपकी कृपासे मैं संसारसे विमुक्त हो |
ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थे ९४३
ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थे ९४३
| क्षपदार्थैकदेशनिर्णयहेतोः सहस्रदानम् ॥१४॥ | जाऊँ, यह सहस्रदान तो जो विमोक्षपदार्थके एकदेशका निर्णय किया गया है, उसके लिये है ॥१४॥ |
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| यत् प्रस्तुतम्—'आत्मनैवायं ज्योतिषास्ते' इति, तत् प्रत्यक्षतः प्रतिपादितम्—अत्रायं पुरुषः स्वयंज्योतिर्भवति, इति स्वप्ने। यत्तूक्तम्—'स्वप्नो भूत्वेमं लोकमतिक्रामति मृत्यो रूपाणि' इति तत्रैतदाशङ्क्यते—मृत्यो रूपाण्येवातिक्रामति, न मृत्युम्; प्रत्यक्षं ह्येतत् स्वप्ने कार्यकारणव्यावृत्तस्यापि मोदत्रासादिदर्शनम्; तस्मान्नूनं नैवायं मृत्युमतिक्रामति। कर्मणो हि मृत्योः कार्यं मोदत्रासादि दृश्यते; यदि च मृत्युना बद्ध एवायं स्वभावतः, ततो विमोक्षो नोपपद्यते; न हि स्वभा-<br><br>(पार्श्वटिप्पणी: आत्मनो मृत्योरतिक्रान्तिराशङ्क्यते) | 'आत्मनैवायं ज्योतिषास्ते'¹ इस प्रकार जिसका प्रस्ताव किया था, उसका स्वप्नमें 'यहाँ यह पुरुष स्वयंज्योति होता है' इस प्रकार प्रत्यक्षतः प्रतिपादन कर दिया। किंतु ऐसा जो कहा कि 'यह स्वप्न होकर इस लोकको अतिक्रमण कर जाता है—मृत्युके रूपोंको पार कर जाता है' उसमें यह आशङ्का रहती है कि वह मृत्युके रूपोंको ही पार करता है, मृत्युको पार नहीं करता; स्वप्नमें देह और इन्द्रियोंसे व्यावृत्त हुए पुरुषको भी आनन्द और भय आदिका दर्शन होता है; यह बात प्रत्यक्ष भी है; अतः निश्चय ही यह मृत्युका अतिक्रमण नहीं करता।<br><br>आनन्द और भय आदि कर्म-रूप मृत्युके ही कार्य देखे जाते हैं; यदि यह जीव स्वभावतः मृत्युसे ही बँधा हुआ है तो इसका मोक्ष होना सम्भव नहीं है, क्योंकि स्वभावसे किसीकी |
¹ १. यह पुरुष अपने स्वरूपभूत ज्योतिसे ही प्रकाशित होता है।
९४४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| ९४४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| वात् कश्चिद् विमुच्यते; अथ स्वभावो न भवति मृत्युः, ततस्तस्मान्मोक्ष उपपत्स्यते । यथासौ मृत्युरात्मीयो धर्मो न भवति, तथा प्रदर्शनाय अत ऊर्ध्वं विमोक्षाय ब्रूहीत्येवं जनकेन पर्यनुयुक्तो याज्ञवल्क्यस्तद्दिदर्शयिषया प्रववृते— | भी मुक्ति नहीं हो सकती, यदि मृत्यु स्वभाव न हो तभी उससे मोक्ष होना सम्भव होगा। जिस प्रकार यह मृत्यु आत्माका धर्म नहीं है, वह दिखानेके लिये 'अब आगे मोक्षके लिये उपदेश कीजिये' इस प्रकार जनकद्वारा प्रश्न किये जानेपर याज्ञवल्क्यजी उसे दिखानेकी इच्छासे प्रवृत्त हुए। |
सुषुप्तिके भोगसे आत्माकी असङ्गता
स वा एष एतस्मिन् सम्प्रसादे रत्वा चरित्वा दृष्ट्वैव पुण्यं च पापं च । पुनः प्रतिन्यायं प्रतियोन्याद्रवति स्वप्नायैव स यत्तत्र किञ्चित् पश्यत्यनन्वागतस्तेन भवत्यसङ्गो ह्ययं पुरुष इत्येवमेवैतद् याज्ञवल्क्य सोऽहं भगवते सहस्रं ददाम्यत ऊर्ध्वं विमोक्षायैव ब्रूहीति ॥ १५ ॥
वह यह आत्मा इस सुषुप्तिमें रमण और विहार कर पुण्य और पापको केवल देखकर, जैसे आया था और जहांसे आया था, पुनः स्वप्नस्थानको ही लौट आता है। वहाँ वह जो कुछ देखता है, उससे असम्बद्ध रहता है; क्योंकि यह पुरुष असङ्ग है। [ जनक— ] 'याज्ञवल्क्य ! यह बात ऐसी ही है, मैं श्रीमान्को सहस्र मुद्रा देता हूँ, इससे आगे भी मोक्षके लिये ही उपदेश कीजिये' ॥ १५ ॥
| स वै प्रकृतः स्वयंज्योतिः पुरुषः, एष यः स्वप्ने प्रदर्शितः, एतस्मिन् सम्प्रसादे—सम्यक् प्रसी- | वह यह प्रकृत स्वयंज्योति पुरुष, जिसे कि स्वप्नावस्थामें प्रदर्शित किया है, इस सम्प्रसादमें—इसमें पुरुष |
| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९४५ |
| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९४५ |
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| दत्यस्मिन्निति सम्प्रसादः; जागरिते देहेन्द्रियव्यापारशतसन्निपातजं हित्वा कालुष्यं तेभ्यो विप्रमुक्त ईषत् प्रसीदति स्वप्ने, इह तु सुषुप्ते सम्यक् प्रसीदति—इत्यतः सुषुप्तं सम्प्रसाद उच्यते; “तीर्णो हि तदा सर्वाञ्शोकान्” (४।३।२२) इति “सलिल एको द्रष्टा” (४। ३ । ३२) इति हि वक्ष्यति सुषुप्तस्थमात्मानम् । | सम्यक् प्रकारसे प्रसादयुक्त (प्रसन्न) होता है, इसलिये सुषुप्तिको सम्प्रसाद कहते हैं; जागरित-अवस्थामें जो देह और इन्द्रियोंके सैकड़ों व्यापारोंके सम्बन्धसे हुआ क्लेश था, उसे छोड़कर उन देह और इन्द्रियोंसे मुक्त हो जानेके कारण स्वप्नमें वह थोड़ा प्रसन्न होता है, किंतु इस सुषुप्तावस्थामें वह सम्यक्तया प्रसन्न हो जाता है; इसलिए सुषुप्तिको सम्प्रसाद कहते हैं; सुषुप्तस्थ आत्माके विषयमें श्रुति “उस अवस्थामें वह सम्पूर्ण शोकोंसे पार हो जाता है” “जलमें प्रतिबिम्बके समान एक ही द्रष्टा है” ऐसा कहेगी भी।* |
* शाङ्करभाष्यमें प्रायः अनेकों जगह सुषुप्तिके दृष्टान्तसे मुक्त आत्माके स्वरूपका कुछ आभास दिया गया है; इससे कुछ लोग इस भ्रममें पड़ जाते हैं कि सुषुप्तावस्थामें स्थित और मुक्त पुरुषकी प्रायः एक ही स्थिति होती है; किन्तु ऐसा समझना भारी भूल है; मुक्त पुरुषका सभी अवस्थाओं और स्थूल, सूक्ष्म एवं कारण शरीरसे भी सदाके लिये सम्बन्ध छूट जाता है, उसके सभी मायिक बन्धनोंका अत्यन्त अभाव हो जाता है; लोकदृष्टिमें उसके शारीरिक व्यवहारोंकी प्रतीति होती रहनेपर भी मुक्त पुरुषका उनसे कुछ भी सम्पर्क नहीं रहता। परंतु सुषुप्ति एक अवस्था है, जो स्वयं बन्धन है, अतः सुषुप्त जीवकी मुक्त आत्माके साथ कोई वास्तविक समानता नहीं है। इसका दृष्टान्त इसलिये दिया जाता है कि जिस प्रकार मुक्त आत्मा सभी प्रकारके हर्ष-शोक आदि विकारोंसे सदाके लिये सम्बन्धरहित हो जाता है, उसी प्रकार सुषुप्त जीव भी कुछ क्षणके लिये हर्ष-शोक आदिकी अनुभूतिसे रहित होता है; क्योंकि उस समय वह अव्याकृत मायाके अंशभूत कारण शरीरके सहित ही ब्रह्ममें स्थित होता है, इसलिये उसे कुछ भान नहीं होता। यदि वास्तवमें मुक्तकी-सी ही उसकी स्थिति होती तो पुनः संसारमें उसका प्रत्यागमन नहीं होता, अतः सुषुप्तिके सुखको मोक्ष-सुख मानकर उसके अनुभवके लिये रात-दिन सोये पड़े रहनेकी भूल कभी नहीं करनी चाहिये।
बृ० उ० ६०—
९४६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| ९४६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| स वा एष एतस्मिन् सम्प्रसादे ।<br><br>क्रमेण सम्प्रसन्नः सन् सुषुप्ते स्थित्वा; कथं सम्प्रसन्नः ? स्वप्नात् सुषुप्तं प्रविविक्षुः स्वप्नावस्थ एव रत्वा रतिमनुभूय मित्रबन्धुजनदर्शनादिना, चरित्वा विहृत्यनेकधा चरणफलं श्रममुपलभ्येत्यर्थः, दृष्ट्वैव न कृत्वेत्यर्थः, पुण्यं च पुण्यफलम्, पापं च पापफलम्; न तु पुण्यपापयोः साक्षाद्दर्शनमस्तीत्यवोचाम; तस्मान्न पुण्यपापाभ्यामनुबद्धः; यो हि करोति पुण्यपापे, स ताभ्यामनुबध्यते; न हि दर्शनमात्रेण तदनुबद्धः स्यात् ।<br><br>तस्मात् स्वप्नो भूत्वा मृत्युमतिक्रामत्येव, न मृत्युरूपाण्येव केवलम् । अतो न मृत्योरात्मस्वभावत्वाशङ्का; मृत्युश्चेत् स्वभावोऽस्य, स्वप्नेऽपि कुर्यात्; न तु करोति; | वह यह आत्मा इस सम्प्रसादमें—क्रमशः सम्यक् प्रकारसे प्रसन्न होता हुआ इस सुषुप्तावस्था में स्थित रहकर किस प्रकार सम्यक् प्रसन्न होता हुआ ? स्वप्नसे सुषुप्तावस्था में प्रवेश करनेकी इच्छावाला आत्मा स्वप्नावस्था में रहनेपर ही मित्र और बन्धुजनोंके दर्शनादिसे रतिका अनुभव कर तथा अनेक प्रकारसे विहार कर अर्थात् उस विहारके फलस्वरूप श्रमकी उपलब्धि कर; तात्पर्य यह है कि केवल देखकर, करके नहीं [ किसे- ? ] पुण्य—पुण्यफलको और पाप—पापफलको; यह हम कह चुके हैं कि पुण्य और पापका साक्षात् दर्शन नहीं होता; इसलिये वह पुण्य-पापसे अनुबद्ध नहीं होता; जो पुरुष पुण्य पाप करता है, वही उससे अनुबद्ध होता है; केवल दर्शनमात्रसे उसका अनुबन्धन नहीं होता ।<br><br>अतः स्वप्न होकर वह मृत्युको ही पार कर जाता है, केवल मृत्युके रूपोंको ही नहीं; अतः मृत्यु आत्माका स्वभाव है—ऐसी आशङ्का नहीं हो सकती; यदि मृत्यु इसका स्वभाव होता तो यह स्वप्नमें भी [ पुण्य-पापरूप कर्म ] करता; किंतु |
ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९४७
| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९४७ |
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| स्वभावश्चेत् क्रिया स्यात्; अनिर्मोक्षतैव स्यात्; न तु स्वभावः, स्वप्नेऽभावात्; अतो विमोक्षोऽस्योपपद्यते मृत्योः पुण्यपापाभ्याम् । | यह करता नहीं है; यदि स्वभाव होता तो क्रिया भी होती और फिर इसका छुटकारा हो ही नहीं सकता था; किंतु स्वप्नमें क्रियाका अभाव होनेके कारण वह इसका स्वभाव नहीं है; इसलिये इसका पाप-पुण्यरूप मृत्युसे मोक्ष होना सम्भव ही है। | | मनु जागरितेऽस्य स्वभाव एव। | शङ्का-किंतु जागरितमें तो यह इसका स्वभाव है ही। | | न बुद्ध्याद्युपाधिकृतं हि तत्; | समाधान-नहीं यह तो बुद्धि आदि उपाधिके कारण ही है। यह | | तच्च प्रतिपादितं सादृश्यात् 'ध्यायतीव लेलायतीव' इति । | बात 'ध्यान-सा करता है, अत्यन्त चञ्चल-सा होता है' इस वाक्यमें सादृश्यद्वारा प्रतिपादित कर दी गयी है। अतः स्वप्नावस्थामें मृत्युके | | तस्मादेकान्तेनैव स्वप्ने मृत्युरूपातिक्रमणान्न स्वाभाविकत्वाशङ्का अनिर्मोक्षता वा। | रूपोंका नियमतः अतिक्रमण करनेके कारण उसके स्वाभाविकत्वकी आशङ्का अथवा आत्माके अनिर्मोक्षकी आशङ्का नहीं हो सकती। | | तत्र 'चरित्वा' इति—चरणफलं श्रममुपलभ्येत्यर्थः, ततः सम्प्रसादानुभवोत्तरकालं पुनः प्रतिन्यायं यथान्यायं यथागतम्—निश्चित आयो न्यायः, अयनमायो | वहाँ (स्वप्नावस्थामें) विहार करके अर्थात् विहारके फल श्रमको उपलब्ध करके फिर सम्प्रसादके अनुभवके पश्चात् पुनः प्रतिन्याय-यथान्याय-जिस प्रकार कि आया था निश्चित आयको न्याय कहते हैं तथा अयन-निर्गमनका नाम आय है, |
| ९४८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
| ९४८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ | | :--- | :--- |
| निर्गमनम्, पुनः पूर्वगमनवैपरीत्येन यदागमनं स प्रतिन्यायः—यथागतं पुनरागच्छतीत्यर्थः । प्रतियोनि यथास्थानम्; स्वप्नस्थानाद्धि सुषुप्तं प्रतिपन्नः सन् यथास्थानमेव पुनरागच्छति—प्रतियोनि आद्रवति, स्वप्नायैव स्वप्नस्थानायैव । | पुनः पहले जानेके विपरीत-क्रमसे अर्थात् जाकर जो फिर उलटे लौट आना है, उसे प्रतिन्याय कहते हैं। अर्थात् जिस प्रकार गया था, उसी प्रकार उलटे वापस आ जाता है। प्रतियोनि—यथास्थान। स्वप्नस्थानसे ही सुषुप्तिको प्राप्त होकर वह यथास्थान फिर आ जाता है, अर्थात् वह प्रतियोनि (यथास्थान) स्वप्न यानी स्वप्नस्थानके लिये ही लौट आता है। | | ननु स्वप्ने न करोति पुण्यपापे तयोः फलमेव पश्यतीति कथमवगम्यते ? यथा जागरिते तथा करोत्येव स्वप्नेऽपि, तुल्यत्वाद् दर्शनस्य—इत्यत आह—स आत्मा, यत् किञ्चित् तत्र स्वप्ने पश्यति पुण्यपापफलम्, अनन्वागतोऽननूबद्धस्तेन दृष्टेन भवति, नैवानुबद्धो भवति । | किंतु यह कैसे जाना गया कि वह स्वप्नमें पाप-पुण्य करता नहीं, केवल उनके फलको ही देखता है ? जिस प्रकार जागरितमें वैसे ही स्वप्नमें भी वह कर्म करता ही है, क्योंकि इन दोनों अवस्थाओंका दर्शन समान रूपसे ही होता है; ऐसी शङ्का होनेपर श्रुति कहती है—वह आत्मा स्वप्नमें जो कुछ पुण्य-पापका फल देखता है, उस देखे हुए-से वह अनन्वागत—बिना बँधा हुआ ही रहता है अर्थात् वह उससे बँधता नहीं है। | | यदि हि स्वप्ने कृतमेव तेन स्यात्, तेनानुबध्येत; स्वप्नादुत्थितोऽपि समन्वागतः स्यात्; न च तल्लोके—स्वप्नकृतकर्मणाऽन्वागत- | यदि उसने स्वप्नमें वैसा किया ही होता तो वह उससे बँध जाता और स्वप्नसे उठनेपर भी उससे संश्लिष्ट रहता; किंतु लोकमें स्वप्नमें किये हुए कर्मसे संश्लेष होनेकी प्रसिद्धि |
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ९४९
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ९४९
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
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| त्वप्रसिद्धिः; न हि स्वप्नकृतेनागसा आगस्कारिणमात्मानं मन्यते कश्चित्; न च स्वप्नदृश आगः श्रुत्वा लोकस्तं गर्हति परिहरति वा; अतोऽनन्वागत एव तेन भवति। | नहीं है; स्वप्नमें किये हुए अपराधसे कोई भी पुरुष अपनेको अपराधी नहीं मानता और लोक भी स्वप्न देखने वालेके अपराधको सुनकर उसका तिरस्कार या त्याग नहीं करता; अतः वह उससे असंश्लिष्ट ही रहता है। |
| तस्मात् स्वप्ने कुर्वन्निवोपलभ्यते, न तु क्रियास्ति परमार्थतः; ‘उतेव स्त्रीभिः सह मोदमानः’ इति श्लोक उक्तः; आख्यातारश्च स्वप्नस्य सह इवशब्देनाचक्षते—हस्तिनोऽद्य घटीकृता धावन्तीव मया दृष्टा इति; अतो न तस्य कर्तृत्वमिति। | अतः स्वप्नमें पुरुष केवल करता हुआ-सा दिखायी देता है, वस्तुतः उस समय कोई क्रिया नहीं होती। इसीसे ‘मानो वह स्त्रियोंके साथ आनन्दानुभव करता रहता है’ ऐसा मन्त्रमें कहा है। स्वप्नका वर्णन करनेवाले भी उसका ‘इव’ शब्दके साथ ही वर्णन करते हैं—‘आज मैंने हाथियोंको एकत्रित होकर दौड़ते हुए-से देखा’; इसलिये स्वप्नद्रष्टामें कर्तृत्व नहीं है। |
| कथं पुनरस्याकर्तृत्वमिति—कार्यकरणैर्मूर्त्तैः संश्लेषो मूर्त्तस्य, स तु क्रियाहेतुर्दृष्टः; न ह्यमूर्तः कश्चित् क्रियावान् दृश्यते; अमूर्त्तश्चात्मा, अतोऽसङ्गः; यस्माच्चासङ्गोऽयं पुरुषः, तस्मादनन्वागतस्तेन स्वप्नदृष्टेन; अत एव न क्रिया- | अच्छा तो इसका अकर्तृत्व किस प्रकार है? मूर्त पदार्थका जो मूर्त देह और इन्द्रिय आदिसे संश्लेष है, वही क्रियाका कारण देखा गया है; कोई भी अमूर्त पदार्थ क्रियावान् नहीं देखा जाता; और आत्मा अमूर्त है, इसलिये वह असङ्ग है; चूँकि यह पुरुष असङ्ग है, इसलिये उस स्वप्नदृष्ट पुण्य-पापसे असंश्लिष्ट है; इसीसे |
९५० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| ९५० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| कर्तृत्वमस्य कथञ्चिदुपपद्यते; कार्यकारणसंश्लेषेण हि कर्तृत्वं स्यात्; स च संश्लेषः सङ्गोऽस्य नास्ति, यतोऽसङ्गो ह्ययं पुरुषः; तस्मादमृतः। | किसी भी प्रकार इसे क्रियाका कर्तृत्व सम्भव नहीं है; देह और इन्द्रियोंके संश्लेषसे ही कर्तृत्व होता है और इस पुरुषको वह संश्लेष है नहीं, क्योंकि यह पुरुष असङ्ग है; अतः यह अमृत है। | | एवमेवैतद् याज्ञवल्क्य; सोऽहं भगवते सहस्रं ददामि; अत ऊर्ध्वं विमोक्षायैव ब्रूहि; मोक्षपदार्थैकदेशस्य कर्मप्रविवेकस्य सम्यग्दर्शितत्वात्; अत ऊर्ध्वं विमोक्षायैव ब्रूहीति ॥ १५ ॥ | [जनक—] याज्ञवल्क्य! यह बात ऐसी ही है; मैं श्रीमान्को सहस्र मुद्रा देता हूँ; अब आगे मोक्षके लिये ही वर्णन कीजिये; क्योंकि ऊपर मोक्षपदार्थके एकदेश कर्मविवेकका अच्छी तरह दिग्दर्शन करा दिया गया है, इसलिये अब आगे मोक्षके लिये ही वर्णन कीजिये ॥ १५ ॥ |
स्वप्नावस्थाके भोगोंसे आत्माकी असङ्गता
| तत्र 'असङ्गो ह्ययं पुरुषः' इत्यसङ्गताकर्तृत्वे हेतुरुक्तः; उक्तं च पूर्वम्—कर्मवशात् स ईयते यत्र काममिति; कामश्च सङ्गः; अतोऽसिद्धो हेतुरुक्तः—'असङ्गो ह्ययं पुरुषः' इति । <br><br> न त्वेतदस्ति; कथं तर्हि ? <br><br> असङ्ग एवेत्येतदुच्यते— | शङ्का—वहाँ (पूर्व मन्त्रमें) 'असङ्गो ह्ययं पुरुषः' इस वाक्यद्वारा असङ्गता ही अकर्तृत्वमें हेतु बतलायी गयी है और पहले यह भी कहा है कि यह कर्मवश जहाँ इसकी इच्छा होती वहीं चला जाता है, तथा इच्छा ही सङ्ग है, इसलिये 'क्योंकि यह पुरुष असङ्ग है' यह तो असिद्ध हेतु ही कहा गया है। <br><br> समाधान—ऐसी बात नहीं है; तो फिर यह असङ्ग ही किस प्रकार है ? सो बतलाया जाता है— |
ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९५१
| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९५१ |
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स वा एष एतस्मिन् स्वप्ने रत्वा चरित्वा दृष्ट्वैव पुण्यं च पापं च पुनः प्रतिन्यायं प्रतियोन्याद्रवति बुद्धान्तायैव स यत्तत्र किञ्चित् पश्यत्यनन्वागतस्तेन भवत्यसङ्गो ह्ययं पुरुष इत्येवमेवैतद् याज्ञवल्क्य सोऽहं भगवते सहस्रं ददाम्यत ऊर्ध्वं विमोक्षायैव ब्रूहीति ॥ १६ ॥
वह यह आत्मा इस स्वप्नावस्थामें रमण और विहार कर तथा पुण्य और पापको देखकर ही फिर जिस प्रकार आया था और जहांसे आया था उस जागरित-स्थानको ही लौट जाता है; वह वहाँ जो कुछ देखता है, उससे असंश्लिष्ट रहता है; क्योंकि यह पुरुष असङ्ग है । ( जनक— ) याज्ञवल्क्य ! यह बात ऐसी ही है । मैं श्रीमान्को सहस्र मुद्रा भेंट करता हूँ; इससे आगे आप मोक्षके लिये ही उपदेश कीजिये ॥ १६ ॥
| स वा एष एतस्मिन् स्वप्ने <br><br> स वा एष पुरुषः सम्प्रसादात् प्रत्यागतः स्वप्ने रत्वा चरित्वा यथाकामम्, दृष्ट्वैव पुण्यं च पापं च—इति सर्वं पूर्ववत्; बुद्धान्तायैव जागरितस्थानाय । तस्मादसङ्ग एवायं पुरुषः; यदि स्वप्ने सङ्गवान् स्यात् कामी, ततस्तत्सङ्गजैर्दोषैर्बुद्धान्ताय प्रत्यागतो ऽलिप्येत ॥ १६ ॥ | 'स वा एषः'—वह यह पुरुष इस स्वप्नावस्थामें सुषुप्तिसे लौटकर स्वप्नमें रमण और विहार कर इच्छानुसार पुण्य और पापको देखकर ही इत्यादि सब अर्थ पूर्ववत् समझना चाहिये बुद्धान्तायैव—जागरितस्थानके लिये ही [ लौट आता है ] । अतः यह पुरुष असङ्ग ही है । यदि यह इच्छावान् होनेके कारण स्वप्नमें सङ्गवान् होता तो जागरित-अवस्था में लौटनेपर यह उन सङ्गजनित दोषोंसे लिप्त हो जाता ॥ १६ ॥ |