बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
१३०८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६
| १३०८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| तैव । आयुषः क्षये हि मरणम्, न ह्येवंविदाहन्येव मर्तव्यमित्यहर्मरणकालो नियन्तुं शक्यते । न च रात्रौ प्रेताः सन्तोऽहः प्रतीक्षन्ते; "स यावत् क्षिप्येन्मनस्तावदादित्यं गच्छति" ( छा० उ० ८ । ६ । ५) इति श्रुत्यन्तरात् ।<br><br>अह्न आपूर्यमाणपक्षमहर्देवतयातिवाहिता आपूर्यमाणपक्षदेवतां प्रतिपद्यन्ते शुक्लपक्षदेवतामित्येतत् । आपूर्यमाणपक्षाद् यान् षण्मासानुदङ्ङुत्तरां दिशमादित्यः सवितैति तान् मासान् प्रतिपद्यन्ते शुक्लपक्षदेवतयातिवाहिताः सन्तः । मासानिति बहुवचनात् संघचारिण्यः षडुत्तरायणदेवताः । | देवता ही अभिप्रेत हैं [ साक्षात् दिन नहीं ] । आयुके क्षीण होनेपर ही मरण होता है, इस पञ्चाग्नि-उपासकको दिनमें ही मरना चाहिये-इस प्रकार उसके लिये दिनरूप मरणकालका नियम नहीं किया जा सकता । रात्रिमें मरे हुए उपासक [ आगे जानेके लिये ] दिनकी प्रतीक्षा करते हों-ऐसी बात भी नहीं है "जितनी देरमें मन आदित्य-के पास जाता है, उतनी ही देरमें यह आदित्यलोकमें पहुँच जाता है" इस अन्य श्रुतिसे यही सिद्ध होता है ।<br><br>'अह्न आपूर्यमाणपक्षम्'-अहर्देवता-से ऊपर ले जाये जानेपर वे आपूर्य-माणपक्षदेवताको अर्थात् शुक्लपक्ष-देवताको प्राप्त होते हैं । आपूर्यमाण-पक्षदेवतासे जिन छः महीनोंमें सूर्य उत्तर दिशाकी ओर चलता है, उन मासोंको, शुक्लपक्षदेवताद्वारा अपने अधिकारसे बाहर ऊपर पहुँचाये जानेपर, प्राप्त होते हैं ।' 'मासान्' ऐसा बहुवचन होनेके कारण छः उत्तरायण-देवता संघचारी ( मिलकर रहनेवाले ) हैं । |
ब्राह्मण २] \hfill शाङ्करभाष्यार्थे \hfill १३०९
ब्राह्मण २] \hfill शाङ्करभाष्यार्थे \hfill १३०९
| तेभ्यो मासेभ्यः षण्मासदेवता-<br>भिरतिवाहिता देवलोकाभिमा-<br>निनीं देवतां प्रतिपद्यन्ते ।<br>देवलोकादादित्यमादित्याद् वैद्युतं<br>विद्युदभिमानिनीं देवतां प्रति-<br>पद्यन्ते । विद्युद्देवतां प्राप्तान् ब्रह्म-<br>लोकवासी पुरुषो ब्रह्मणा मनसा<br>सृष्टो मानसः कश्चिदेत्यागत्य<br>ब्रह्मलोकान् गमयति । | उन मासोंसे अर्थात् छः मास-<br>देवताओंसे ऊपर ले जाये जानेपर<br>वे देवलोकाभिमानी देवताको प्राप्त<br>होते हैं। देवलोकसे आदित्यको<br>और आदित्यसे वैद्युत-विद्युदभिमानी<br>देवताको प्राप्त होते हैं। विद्युद्देव-<br>ताको प्राप्त हुए इन उपासकोंको<br>ब्रह्माके द्वारा मनसे रचा हुआ कोई<br>ब्रह्मलोकवासी मानस पुरुष आकर<br>ब्रह्मलोकोंको ले जाता है। |
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| ब्रह्मलोकानित्यधरोत्तरभूमि-<br>भेदेन भिन्ना इति गम्यन्ते, बहु-<br>वचनप्रयोगात्; उपासनतार-<br>तम्योपपत्तेश्च; ते तेन पुरुषेण<br>गमिताः सन्तःस्तेषु ब्रह्मलोकेषु<br>पराः प्रकृष्टाः सन्तः स्वयं परा-<br>वतः प्रकृष्टाः समाः संवत्सरान-<br>नेकान् वसन्ति । ब्रह्मणोऽनेकान्<br>कल्पान् वसन्तीत्यर्थः । तेषां<br>ब्रह्मलोकं गतानां नास्ति पुनरा-<br>वृत्तिरस्मिन् संसारे न पुनराग-<br>मनमिहेति शाखान्तरपाठात् । | ‘ब्रह्मलोकान्’ ऐसा बहुवचन<br>प्रयोग होनेसे ज्ञात होता है कि<br>नीचे-ऊपरकी भूमिके भेदसे ब्रह्म-<br>लोकोंमें भेद है। उपासनाके तार-<br>तम्यसे भी ऐसा भेद होना सम्भव<br>है। उस पुरुषके द्वारा पहुँचाये हुए<br>उन लोकोंमें वे स्वयं ‘पराः’—प्रकृष्ट<br>होकर ‘परावतः’ प्रकृष्ट संवत्सर<br>अर्थात् अनेक वर्षतक रहते हैं।<br>तात्पर्य यह है कि ब्रह्माके अनेकों<br>कल्पपर्यन्त रहते हैं। उन ब्रह्मलोक-<br>को गये हुए पुरुषोंकी पुनरावृत्ति<br>नहीं होती अर्थात् इस संसारमें<br>पुनरागमन नहीं होता, क्योंकि ‘इह<br>न पुनरावृत्तिः’ ऐसा दूसरी शाखा-<br>का पाठ है। |
| १३१० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६ |
| १३१० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| Sanskrit | Hindi |
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| इहेत्याकृतिमात्रग्रहणमिति चेच्छ्वोभूते पौर्णमासीमिति यद्वत्। | **पूर्व०—**किंतु 'इह' पदसे तो आकृतिमात्रका ग्रहण होता है अर्थात् केवल इसी संसारका नहीं, सामान्यतः सभी कल्पके संसारका ग्रहण होता है। जैसे 'प्रातःकाल होनेपर पौर्णमास याग करे' इस वाक्यमें सामान्यतः सभी प्रातःकालका ग्रहण होता है। |
| न, इहेतिविशेषणानर्थक्यात्। यदि हि नावर्तन्त एवेहग्रहणमनर्थकमेव स्यात्। श्वोभूते पौर्णमासीमित्यत्र पौर्णमास्याः श्वोभूतत्वमनुक्तं न ज्ञायत इति युक्तं विशेषयितुम्। न हि तत्र श्वआकृतिः शब्दार्थो विद्यत इति श्वःशब्दो निरर्थक एव प्रयुज्यते; यत्र तु विशेषणशब्दे प्रयुक्तेऽन्विष्यमाणे विशेषणफलं चेन्न गम्यते | **सिद्धान्ती—**नहीं; ऐसा माननेसे 'इह' यह विशेषण व्यर्थ हो जायगा। यदि उनकी कभी पुनरावृत्ति होती ही नहीं, तो 'इह' ( इस कल्पके संसारमें ) यह विशेषण निरर्थक ही होगा।^१ 'प्रातःकाल होनेपर पौर्णमास याग करे' इस वाक्यमें तो 'प्रातःकाल' यह विशेषण यदि शब्दतः कहा न जाय, तो अपने-आप उसका ज्ञान नहीं हो सकता; इसलिये वहाँ विशेषण लगाना उचित ही है। यदि वहाँ भी श्वः ( प्रभात ) का शब्दार्थ सामान्यतः प्रभातकाल मात्र न हो तो 'श्व' शब्दका प्रयोग भी निरर्थक ही समझा जायगा। जहाँ विशेषण शब्दका प्रयोग तो हो, पर खोजनेसे उसका कोई फल न प्रतीत हो, |
१. क्योंकि पुनरावृत्ति संसारमें ही होती है, अतः 'इह' पदका प्रयोग किये बिना भी उसका बोध हो जाता।
| ब्राह्मण २ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १३११ |
| ब्राह्मण २ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १३११ |
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| तत्र युक्तो निरर्थकत्वेनोत्स्रष्टुं विशेषणशब्दो न तु सत्यां विशेषणफलावगतौ । तस्मादस्मात्कल्पादूर्ध्वमावृत्तिर्गम्यते ॥१५॥ | वहां व्यर्थ होनेके कारण उस विशेषणका परित्याग कर देना ही उचित है, विशेषणके फलका बोध होनेपर उसको त्यागना उचित नहीं है। इसलिये [ 'इस संसारमें' ऐसा विशेषण लगानेके कारण ] यह सूचित होता है कि इस कल्पके बाद उसकी पुनरावृत्ति हो सकती है ॥१५॥¹ |
धूमयानमार्गका वर्णन तथा द्वितीय और तृतीय प्रश्नका उत्तर
अथ ये यज्ञेन दानेन तपसा लोकाञ्जयन्ति ते धूममभिसंभवन्ति धूमाद्रात्रिँ रात्रेरपक्षीयमाणपक्षमपक्षीयमाणपक्षाद् यान् षण्मासान् दक्षिणादित्य एति मासेभ्यः पितृलोकं पितृलोकाच्चन्द्रं ते चन्द्रं प्राप्यान्नं भवन्ति ताँस्तत्र देवा यथा सोमँ राजानमाप्यायस्वापक्षीयस्वेत्येवमेनाँस्तत्र भक्षयन्ति तेषां यदा तत् पर्यवैत्यथेममेवाकाशमभिनिष्पद्यन्त आकाशाद् वायुं वायोर्वृष्टिं वृष्टेः पृथिवीं ते पृथिवीं प्राप्यान्नं भवन्ति ते पुनः पुरुषाग्नौ हूयन्ते ततो योषाग्नौ जायन्ते लोकान् प्रत्युत्थायिनस्त
१. यहाँ जो ब्रह्मलोकसे पुनरागमनकी बात कही है, उससे यह नहीं समझना चाहिये कि वे फिर संसारबन्धनमें पड़ जाते हैं। उनका पुनरागमन भगवत्प्रेरणासे विश्वकी प्रवृत्तिका नियन्त्रण और संचालन करनेके लिये अथवा भगवान्की अवतार-लीलाओंके परिकररूपसे होता है। वे जन्म लेकर भी मुक्त ही रहते हैं। नारद, वसिष्ठ और अर्जुन आदि महात्मा एवं भगवत्पार्षद इसी कोटिमें कहे जा सकते हैं। इनका जन्म कर्मबन्धनसे नहीं होता, बल्कि भगवत्कार्यके संचालनके लिये होता है।
१३१२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६
| १३१२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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एवमेवानुपरिवर्तन्ते अथ य एतौ पन्थानौ न विदुस्ते कीटाः पतङ्गा यदिदं दन्दशूकम् ॥ १६ ॥
और जो यज्ञ, दान, तपके द्वारा लोकोंको जीतते हैं, वे धूम (धूमाभिमानी देवता ) को प्राप्त होते हैं। धूमसे रात्रिदेवताको, रात्रिसे अपक्षीयमाण पक्ष (कृष्णपक्षाभिमानी देवता) को, अपक्षीयमाण पक्षसे जिन छः महीनोंमें सूर्य दक्षिणकी ओर होकर जाता है, उन छः मासके देवताओंको, छः मासके देवताओंसे पितृलोकको और पितृलोकसे चन्द्रमाको प्राप्त होते हैं। चन्द्रमामें पहुँचकर वे अन्न हो जाते हैं। वहाँ जैसे ऋत्विग्गण सोम राजाको 'आप्यायस्व अपक्षीयस्व' ऐसा कहकर चमसमं भरकर पी जाते हैं, उसी प्रकार इन्हें देवगण भक्षण कर जाते हैं। जब उनके कर्म क्षीण हो जाते हैं, तो वे इस आकाशको ही प्राप्त होते हैं। आकाशसे वायुको, वायुसे वृष्टिको और वृष्टिसे पृथिवीको प्राप्त होते हैं। पृथिवीको प्राप्त होकर वे अन्न हो जाते हैं। फिर वे पुरुषरूप अग्निमें हवन किये जाते हैं। उससे वे लोकके प्रति उत्थान करनेवाले होकर स्त्रीरूप अग्निमें उत्पन्न होते हैं। वे इसी प्रकार पुनः-पुनः परिवर्तित होते रहते हैं और जो इन दोनों मार्गोंको नहीं जानते, वे कीट, पतंग और डाँस-मच्छर आदि होते हैं॥ १६॥
| अथ पुनर्ये नैवंविदुरूत्क्रान्त्याद्यग्निहोत्रसम्बन्धपदार्थषट्कस्यैव वेदितारः केवलकर्मिणो यज्ञेनाग्निहोत्रादिना दानेन बहिर्वेदि भिक्षमाणेषुद्रव्यसंविभागलक्षणेन तपसा बहिर्वेद्येव दीक्षादिव्यतिरिक्तेन कृच्छ्रचान्द्रायणादिना लोकाञ्जयन्ति, लोकानिति बहुवचनात्तत्रापि फलतारतम्यमभिप्रेतम्, | और जो इस प्रकार नहीं जानते, उत्क्रान्ति आदि अग्निहोत्रसम्बन्धी छः पदार्थोंको ही जाननेवाले केवल कर्मी हैं; तथा अग्निहोत्रादि यज्ञ, वेदीसे बाहर भिक्षा माँगनेवालोंको द्रव्य बाँटनारूप दान एवं वेदीके बाहर ही दीक्षादिसे अतिरिक्त कृच्छ्रचान्द्रायणादिरूप तपके द्वारा लोकोंको जीतते हैं, 'लोकान्' ऐसा बहुवचन होनेके कारण वहां भी फलका तारतम्य माना गया है, |
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ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थे १३१३
ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थे १३१३
| ते धूममभिसम्भवन्ति । उत्तरमार्ग इवेहापि देवता एव धूमादिशब्दवाच्याः, धूमदेवतां प्रतिपद्यन्त इत्यर्थः। आतिवाहिकत्वं च देवतानां तद्वदेव । | वे धूमको प्राप्त होते हैं। उत्तरमार्गके समान यहाँ भी देवता ही धूमादिशब्दवाच्य हैं, तात्पर्य यह है कि वे धूमदेवताको प्राप्त होते हैं। इन देवताओंकी आतिवाहिकता भी उन्हीं ( उत्तरमार्गीय देवताओं ) के समान है। | | धूमाद् रात्रिं रात्रिदेवतां ततोऽपक्षीयमाणपक्षमपक्षीयमाणपक्षदेवतां ततो यान् षण्मासान् दक्षिणां दिशमादित्य एति तान् मासदेवताविशेषान् प्रतिपद्यन्ते। | धूमसे रात्रि अर्थात् रात्रिदेवताको, वहाँसे कृष्णपक्ष यानी कृष्णपक्षाभिमानी देवताको और वहाँसे जिन छः महीनोंमें सूर्य दक्षिणदिशामें होकर चलता है, उन मासदेवताविशेषोंको प्राप्त होते हैं। | | मासेभ्यः पितृलोकं पितृलोकाच्चन्द्रम् । ते चन्द्रं प्राप्यान्नं भवन्ति तांस्तत्रान्नभूतान् यथा सोमं राजानमिह यज्ञे ऋत्विज आप्यायस्वापक्षीयस्वेति भक्षयन्त्येवमेनांश्चन्द्रं प्राप्तान् कर्मिणो भृत्यानिव स्वामिनो भक्षयन्त्युपभुञ्जते देवाः । | मासदेवताओंसे पितृलोकको और पितृलोकसे चन्द्रमाको जाते हैं। उस चन्द्रमामें पहुँचकर वे अन्न हो जाते हैं। 'तांस्तत्र अन्नभूतान्'—जिस प्रकार यहाँ यज्ञमें ऋत्विज् लोग 'आप्यायस्व अपक्षीयस्व' ऐसा कहकर सोम राजाको भक्षण करते हैं, इसी प्रकार चन्द्रमाको प्राप्त हुए इन अन्नभूत कर्मियोंको, स्वामी जिस प्रकार सेवकोंसे सेवा कराते हैं, उसी प्रकार देवतालोग भक्षण करते अर्थात् उनका उपभोग करते हैं। | | आप्यायस्वापक्षीयस्वेति न मन्त्रः किं तर्हि ? आप्याय्याप्याय्य | 'आप्यायस्व अपक्षीयस्व' यह कोई मन्त्र नहीं है; तो फिर क्या है ? तात्पर्य यह हे कि सोमको चमसमें |
बृ० उ० ८३—
१३१४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ६
| १३१४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ६ |
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| चमसस्थं भक्षणेनापक्षयं च कृत्वा पुनः पुनर्भक्षयन्तीत्यर्थः । एवं देवा अपि सोमलोके लब्धशरीरान् कर्मिण उपकरणभूतान् पुनः पुनर्विश्रामयन्तः कर्मानुरूपं फलं प्रयच्छन्तः, तद्धि तेषामाप्यायनं सोमस्याप्यायनमिवोपभुञ्जत उपकरणभूतान् देवाः । | 'आप्याय आप्याय' भर-भरकर उसका भक्षणके द्वारा अपक्षय करके पुनः-पुनः भक्षण करते हैं। इसी प्रकार जिन्हें चन्द्रलोकमें शरीर प्राप्त हुआ है, उन अपने उपकरणभूत कर्मियोंको देवता भी पुनः-पुनः विश्राम देते हुए—उन्हें कर्मानुरूप फल देते हुए, क्योंकि सोमके आप्यायनके समान यही उनका आप्यायन है—इस प्रकार [ आप्यायन करके ] उन अपने उपकरणभूत कर्मठोंका देवगण उपभोग ( उपयोग ) करते हैं। | | तेषां कर्मिणां यदा यस्मिन् काले तद् यज्ञदानादिलक्षणं सोमलोकप्रापकं कर्म पर्यवैति परिगच्छति परिक्षीयत इत्यर्थः, अथ तदेममेव प्रसिद्धमाकाशमभिनिष्पद्यन्ते । यास्ताः श्रद्धाशब्दवाच्या द्युलोकाग्नौ हुता आपः सोमाकारपरिणता याभिः सोमलोके कर्मिणामुपभोगाय शरीरमारब्धमम्मयं ताः कर्मक्षयाद्धिमपिण्ड इवातपसम्पर्कात् प्रविलीयन्ते । प्रविलीनाः सूक्ष्मा | जब अर्थात् जिस समय उन कर्मियोंका उन्हें सोमलोककी प्राप्ति करानेवाला यज्ञ-दानादिरूप कर्म 'पर्यवैति'—सब ओरसे चला जाता अर्थात् परिक्षीण हो जाता है तो फिर वे इस प्रसिद्ध आकाशको ही अभिनिष्पन्न हो जाते हैं। जो कि वह द्युलोकाग्निमें हवन किया हुआ श्रद्धाशब्दवाच्य आप सोमके आकारमें परिणत हुआ रहता है, जिसके द्वारा सोमलोकमें कर्मियोंका जलमय शरीर आरम्भ किया जाता है, वह आप कर्मोंका क्षय होनेपर, घामके सम्पर्कसे बर्फके डलेके समान, पिघल जाता है। वह पिघलकर सूक्ष्म अर्थात् |
ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३१५
ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३१५
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| आकाशभूता इव भवन्ति । तदिदमुच्यत इममेवाकाशमभिनिष्पद्यन्त इति । | आकाशभूत-सा हो जाता है । इसीसे यह कहा जाता है कि वे इस प्रसिद्ध आकाशको ही अभिनिष्पन्न होते हैं । |
| ते पुनरपि कर्मिणस्तच्छरीराः सन्तः पुरोवातादिना इतश्चामुतश्च नीयन्तेऽन्तरिक्षगास्तदाह—आकाशाद् वायुमिति । वायोर्वृष्टिं प्रतिपद्यन्ते; तदुक्तम्—पर्जन्याग्नौ सोमं राजानं जुह्वतीति । ततो वृष्टिभूता इमां पृथिवीं पतन्ति । ते पृथिवीं प्राप्य व्रीहियवाद्यन्नं भवन्ति, तदुक्तमस्मिँल्लोकेऽग्नौ वृष्टिं जुह्वति तस्या आहुत्या अन्नं सम्भवतीति । | वे आकाशशरीर हुए कर्मी फिर भी पूर्ववायु आदिसे अन्तरिक्षमें इधर-उधर ले जाये जाते हैं, इसीसे श्रुति कहती है—'आकाशसे वायुको प्राप्त होते हैं ।' 'वायुसे वृष्टिको प्राप्त होते हैं', इसीसे ऊपर कहा है--'देवगण पर्जन्याग्निमें सोम राजाको हवन करते हैं ।' वहाँसे वे वृष्टिरूप होकर पृथिवीपर गिरते हैं । पृथिवीपर पहुँचकर वे व्रीहि एवं यवादि अन्न हो जाते हैं, इसीसे कहा है--'देवतालोग इस लोकरूप अग्निमें वृष्टिको होमते हैं, उस आहुतिसे अन्न होता है ।' |
| ते पुनः पुरुषाग्नौ हूयन्तेऽन्नभूता रेतस्सिचि; ततो रेतोभूता योषाग्नौ हूयन्ते; ततो जायन्ते लोकं प्रत्युत्थायिनस्ते लोकं प्रत्युत्तिष्ठन्तोऽग्निहोत्रादिकर्मानुतिष्ठन्ति । ततो धूमादिना पुनः पुनः सोमलोकं पुनरिमं लोक- | अन्न होनेपर वे वीर्याधान करनेवाले पुरुषरूप अग्निमें हवन किये जाते हैं; फिर वीर्यरूप हुए स्त्रीरूप अग्निमें होम किये जाते हैं; तदनन्तर वे परलोकगमनके लिये उद्यत होकर जन्म लेते हैं; वे परलोकके प्रति उद्यत होकर अग्निहोत्रादि कर्मका अनुष्ठान करते हैं । फिर धूमादिके क्रमसे पुनः-पुनः सोमलोकको और पुनः इस लोकको |
| १३१६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६ |
| १३१६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| मिति। त एवं कर्मिणोऽनुपरिवर्तन्ते घटीयन्त्रवच्चक्रीभूता बंभ्रमतीत्यर्थः—उत्तरमार्गाय सद्योमुक्तये वा यावद् ब्रह्म न विदुः। "इति नु कामयमानः संसरति" इत्युक्तम्। | प्राप्त होते रहते हैं। वे कर्मीलोग इस प्रकार निरन्तर आते-जाते रहते हैं अर्थात् घटीयन्त्रके समान चक्राकार होकर घूमते रहते हैं, जबतक वे ब्रह्मको नहीं जानते तबतक उत्तरमार्ग अथवा सद्योमुक्तिके लिये इसी प्रकार भ्रमते रहते हैं। [ चतुर्थ अध्यायमें ] 'कामना करनेवाला इस प्रकार संसरित होता रहता है' ऐसा कहा भी है। |
| अथ पुनर्य उत्तरं दक्षिणं चैतौ पन्थानौ न विदुरुत्तरस्य दक्षिणस्य वा पथः प्रतिपत्तये ज्ञानं कर्म वा नानुतिष्ठन्तीत्यर्थः। ते किं भवन्ति ? इत्युच्यते—ते कीटाः पतङ्गा यदिदं यच्चेदं दन्दशूकं दंशमशकमित्येतद् भवन्ति। एवं हीयं संसारगतिः कष्टा, अस्यां निमग्नस्य पुनरुद्धार एव दुर्लभः; तथा च श्रुत्यन्तरम् — "तानीमानि क्षुद्राण्यसकृदावर्तीनि भूतानि भवन्ति जायस्व म्रियस्व" (छा० उ० ५।१०।८) इति। | और जो उत्तर या दक्षिण—इन दोनों ही मार्गोंको नहीं जानते, अर्थात् उत्तर या दक्षिण मार्गकी प्राप्तिके लिये ज्ञान अथवा कर्मका अनुष्ठान नहीं करते, वे क्या होते हैं, सो कहा जाता है। वे कीट, पतंग और जो ये दन्दशूक अर्थात् डाँस और मच्छर आदि हैं, होते हैं। इस प्रकार यह संसारगति बड़ी कष्टमयी है। इसमें डूबे हुएका पुनः उद्धार होना ही दुर्लभ है। ऐसी ही एक अन्य श्रुति भी है—"वे ये क्षुद्र और निरन्तर आने-जानेवाले जीव होते हैं, जन्म लो और मर जाओ [—ऐसा उनका तीसरा स्थान होता है]।" |
| तस्मात् सर्वोत्साहेन यथाशक्ति स्वाभाविककर्मज्ञानहानेन दक्षिणोत्तरमार्गप्रतिपत्तिसाधनं शास्त्रीयं कर्म ज्ञानं वानुतिष्ठे- | अतः स्वाभाविक कर्म और ज्ञानको छोड़कर पूर्ण उत्साहके साथ यथाशक्ति दक्षिण और उत्तरमार्गोंकी प्राप्तिके साधनभूत शास्त्रीय कर्म और |
ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ १३१७
ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ १३१७
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| दिति वाक्यार्थः। तथा चोक्तम्— “अतो वै खलु दुर्निष्प्रपतरम्” (छा० उ० ५। १०। ६) “तस्माज्जुगुप्सेत” (छा० उ० ५। १०। ८) इति श्रुत्यन्तरान्मोक्षाय प्रयतेतेत्यर्थः। अत्राप्युत्तरमार्गप्रतिपत्तिसाधन एव महान् यत्नः कर्तव्य इति गम्यते। एवमेवानुपरिवर्तन्त इत्युक्तत्वात्। | शास्त्रीय ज्ञान (उपासना) का अनुष्ठान करे—ऐसा इस वाक्यका तात्पर्य है। ऐसा ही कहा भी है—“अतः इस व्रीहि-यवादिभावसे छूटना बड़ा कठिन है” “इसलिये इससे बचता रहे” इन दूसरी श्रुतियोंसे तात्पर्य यही है कि मोक्षके लिये प्रयत्न करे। उनमें भी उत्तरमार्गकी प्राप्तिके साधनमें ही महान् यत्न करना चाहिये—ऐसा ज्ञात होता है, क्योंकि [ धूमादि मार्गके विषयमें ] यह कहा गया है कि ‘वे इस प्रकार निरन्तर आते-जाते रहते हैं।’ |
| एवं प्रश्नाः सर्वे निर्णीताः; ‘असौ वै लोकः’ इत्यारभ्य पुरुषः सम्भवति’ इति चतुर्थः प्रश्नः ‘यतिथ्यामाहुत्याम्’ इत्यादिः प्राथम्येन। पञ्चमस्तु द्वितीयत्वेन देवयानस्य वा पथः प्रतिपदं पितृयाणस्य वेति दक्षिणोत्तरमार्गप्रतिपत्तिसाधनकथनेन। तेनैव च प्रथमोऽपि। अग्नेरारभ्य केचिदर्चिः प्रति- | इस प्रकार सब प्रश्नोंका निर्णय हो गया। ‘असौ वै लोकोऽग्निर्गौतम’ यहाँसे लेकर ‘पुरुषः सम्भवति’ इस स्थलतक ‘यतिथ्यामाहुत्याम्’ इत्यादि चतुर्थ प्रश्नका पहले उत्तर दिया गया है। ‘देवयान-मार्गकी प्राप्तिका साधन तथा पितृयानका साधन क्या है? इस पञ्चम प्रश्नका दक्षिण और उत्तर मार्गकी प्राप्तिके साधन बतलाकर द्वितीय उत्तरद्वारा निर्णय किया है। उसीसे प्रथम प्रश्नका भी उत्तर हो जाता है। [ अन्त्येष्टि-संस्कारके समय ] अग्निमें डाले जानेपर फिर वहाँसे कोई अर्चिरादि मार्गको प्राप्त |
१. पहला प्रश्न था ‘क्या तू जानता है कि यह प्रजा मरकर किस प्रकार विभिन्न मार्गोंको प्राप्त होती है?’ उसका किस प्रकार निर्णय हुआ है—यह इस वाक्यसे बतलाया जाता है।
| १३१८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६ |
| १३१८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| पद्यन्ते केचिद् धूममिति विप्रतिपत्तिः । पुनरावृत्तिश्च द्वितीयः प्रश्न आकाशादिक्रमेणेमं लोकमागच्छन्तीति । तेनैवासौ लोको न सम्पूर्यते कीटपतङ्गादिप्रतिपत्तेश्च केषांचिदिति तृतीयोऽपि प्रश्नो निर्णीतः ॥ १६ ॥ | होते हैं और कोई धूमादिमार्गको—इस प्रकार उन्हें विभिन्न मार्गोंकी प्राप्ति होती है । पुनरावृत्ति दूसरा प्रश्न है; उसका 'आकाशादि क्रमसे इस लोकमें आते हैं'—इस प्रकार निर्णय किया गया है । इसीसे परलोक भरता नहीं है तथा कुछ कीट-पतंगादि योनियोंको प्राप्त हो जाते हैं—इसलिये भी वह नहीं भरता—इस प्रकार तीसरे प्रश्नका भी निर्णय हो गया है ॥ १६ ॥ |
<div align="center">इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये षष्ठाध्याये द्वितीयं कर्मविपाकब्राह्मणम् ॥ २ ॥
तृतीय ब्राह्मण
श्रीमन्थकर्म और उसकी विधि
</div>| स यः कामयेत-ज्ञानकर्मणोर्गतिरुक्ता। तत्र ज्ञानं स्वतन्त्रं कर्म तु दैवमानुषवित्तद्वयायत्तं तेन कर्मार्थं वित्तमुपार्जनीयम् । तच्चाप्रत्यवायकारिणोपायेनेति तदर्थं | 'स यः कामयेत'—ज्ञान और कर्मकी गति बतला दी गयी। इनमें ज्ञान स्वतन्त्र है, किंतु कर्म दैव और मानुष—इन दो वित्तोंके अधीन है, अतः कर्मके लिये वित्तोपार्जन करना चाहिये । वह भी, जो प्रत्यवाय न करनेवाला हो, उस मार्गसे उपार्जन करना चाहिये । अतः उसके लिये |
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३१९
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३१९
| मन्थाख्यं कर्मारभ्यते महत्त्व-<br>प्राप्तये; महत्त्वे च सत्यर्थसिद्धं<br>हि वित्तम्; तदुच्यते— | महत्त्वप्राप्तिके लिये मन्थसंज्ञक कर्म<br>आरम्भ किया जाता है। महत्त्व<br>होनेपर तो वित्त स्वतः सिद्ध ही<br>है। इसीसे कहा जाता है— |
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मन्थकर्मकी सामग्री और हवनविधि
स यः कामयेत महत् प्राप्नुयामित्युदगयन आपूर्यमाणपक्षस्य पुण्याहे द्वादशाहमुपसद्व्रती भूत्वौदुम्बरे कँसे चमसे वा सर्वौषधं फलानीति संभृत्य परिसमूह्य परिलिप्याग्निमुपसमाधाय परिस्तीर्यावृताज्यँ सँस्कृत्य पुँसा नक्षत्रेण मन्थँ संनीय जुहोति । यावन्तो देवास्त्वयि जातवेदस्तिर्यञ्चो घ्नन्ति पुरुषस्य कामान् । तेभ्योऽहं भागधेयं जुहोमि ते मा तृप्ताः सर्वैः कामैस्तर्पयन्तु स्वाहा । या तिरश्ची निपद्यतेऽहं विधरणी इति तां त्वा घृतस्य धारया यजे सँराधनीमहँ स्वाहा ॥ १ ॥
जो ऐसा चाहता हो कि मैं महत्त्व प्राप्त करूँ, वह उत्तरायणमें शुक्ल पक्षकी पुण्य तिथिपर बारह दिन उपसद्व्रती ( पयोव्रती ) होकर गूलरकी लकड़ीके कंस ( कटोरे ) या चमसमें सर्वौषध, फल तथा अन्य सामग्रियोंको एकत्रित कर, [ जहाँ हवन करना हो उस स्थानका ] १परिसमूहन एवं २परिलेपन कर अग्नि स्थापन करता है और फिर अग्निके चारों ओर कुशा बिछाकर गृह्यसूत्रोक्त विधिसे घृतका संस्कारकर जिसका नाम पुँल्लिङ्ग हो, उस [ हस्त आदि ] नक्षत्रमें मन्थको [ अपने और अग्निके ]
१. कुशोंसे बुहारना ।
२. गोबर और जलसे वेदीको लीपना ।
१३२० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६
१३२० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६
बीचमें रखकर हवन करता है। ['यावन्तो' इत्यादि प्रथम मन्त्रका अर्थ—] हे जातवेदः ! तेरे वशवर्ती जितने देवता वक्रमति होकर पुरुषकी कामनाओंका प्रतिबन्ध करते हैं, उनके उद्देश्यसे यह आज्यभाग मैं तुझमें हवन करता हूँ। वे तृप्त होकर मुझे समस्त कामनाओंसे तृप्त करें—स्वाहा¹। ['या तिरश्ची' इत्यादि द्वितीय मन्त्रका अर्थ—] 'मैं सबकी मृत्युको धारण करनेवाला हूँ' ऐसा समझकर जो कुटिलमति देवता तेरा आश्रय करके रहता है, सर्वसाधनोंकी पूर्ति करनेवाले उस देवताके लिये मैं घृतकी धारासे यजन करता हूँ—स्वाहा ॥ १ ॥
| स यः कामयेत स यो वित्तार्थी कर्मण्यधिकृतो यः कामयेत; किम् ? महन्महत्त्वं प्राप्नुयां महान् स्यामितीत्यर्थः । तत्र मन्थकर्मणो विधित्सितस्य कालोऽभिधीयते—उदगयनम् आदित्यस्य, तत्र सर्वत्र प्राप्तावापूर्यमाणपक्षस्य शुक्लपक्षस्य; तत्रापि सर्वत्र प्राप्तौ पुण्याहेऽनुकूल आत्मनः कर्मसिद्धिकर इत्यर्थः । द्वादशाहं यस्मिन् पुण्येऽनुकूले कर्म चिकीर्षति ततः प्राक् पुण्याहमेवा- | वह जो कामना करे अर्थात् वह जो वित्तार्थी और कर्मका अधिकारी कामना करे; क्या कामना करे ? महत्—महत्त्व प्राप्त करूँ अर्थात् महान् हो जाऊँ—ऐसी कामना करे ।<br><br>अब जिसका विधान करना अभीष्ट है उस मन्थकर्मका काल बतलाया जाता है—आदित्यके उदगयन—उत्तरायणमें होनेपर, उस उत्तरायणमें सर्वत्र प्राप्ति होती है, इसलिये कहते हैं 'आपूर्यमाणपक्षस्य' शुक्लपक्षकी, उसमें भी सर्वत्र प्राप्ति होनेपर कहते हैं—'पुण्याहे'—शुभ अर्थात् अपने कर्मकी सिद्धि करनेवाले दिनपर। 'द्वादशाहम्'—जिस पुण्य अर्थात् अनुकूल दिनपर कर्म करना चाहे उससे पूर्व पुण्यदिवससे ही आरम्भ |
१. जहाँ-जहाँ 'स्वाहा' आवे वहाँ आहुति देनी चाहिये।
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३२१
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३२१
| रभ्य द्वादशाहमुपसद्व्रती—उपसत्सु व्रतम्, उपसदः प्रसिद्धा ज्योतिष्टोमे। तत्र च स्तनोपचयापचयद्वारेण पयोभक्षणं तद्व्रतम्; अत्र च तत्कर्मानुपसंहारात् केवलमितिकर्त्तव्यताशून्यं पयोभक्षणमात्रमुपादीयते। | करके बारह दिनतक उपसद्व्रती—जो व्रत उपसदोंमें किया जाता है, ज्योतिष्टोम यागमें ‘उपसद्’ नामकी इष्टियां प्रसिद्ध हैं। उनमें स्तनोंके उपचय और अपचयके द्वारा दुग्धका आहार किया जाता है; वह उपसद्व्रत कहलाता है। किंतु यहां उस कर्मका उपसंहार (संग्रह) नहीं किया गया है, इसलिये केवल-¹इतिकर्त्तव्यतासे रहित पयोभक्षणमात्र ही ग्रहण किया जाता है। | | ननूपसदो व्रतमिति यदा विग्रहस्तदा सर्वमितिकर्त्तव्यतारूपं ग्राह्यं भवति तत् कस्मान्न परिगृह्यत इति ? | **शङ्का—**किंतु यदि ‘उपसद्व्रती’ इस समस्त पदका ‘उपसद्-रूप ही व्रत’ ऐसा विग्रह किया जाय तब तो सारा ही इतिकर्त्तव्यतारूप कर्म ग्रहण किया जाना चाहिये, सो वह क्यों ग्रहण नहीं किया जाता ? | | उच्यते—स्मार्त्तत्वात् कर्मणः; | **समाधान—**बतलाते हैं—मन्थकर्म स्मार्त्त होनेके कारण। यह मन्थकर्म स्मार्त्त है [अतः यहाँ वैदिक ‘उपसद्व्रत’ का ग्रहण नहीं हो सकता]। | | स्मार्तं हीदं मन्थकर्म।<br>ननु श्रुतिविहितं सत् कथं स्मार्तं भवितुमर्हति ? | **शङ्का—**किंतु श्रुतिविहित होकर भी यह स्मार्त्त कैसे हो सकता है? | | स्मृत्यनुवादिनी हि श्रुति- | **समाधान—**यह श्रुति स्मृतिका अनुवाद करनेवाली ही है²। यदि इसे |
१. अर्थात् स्तनोंके उपचय-अपचयसे रहित।
२. यदि कहें, श्रुति तो स्मृतिसे पहले प्रकट हुई है, अतः वह स्मृतिका अनुवाद कैसे कर सकती है? तो यह ठीक नहीं है, क्योंकि श्रुति त्रिकालविषयिणी है, अतः स्मृतिका अनुवाद भी उसके द्वारा सम्भव है।
| १३२२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६ |
| १३२२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६ | | :--- | :--- |
| रियम्; श्रौतत्वे हि प्रकृतिविकारभावस्ततश्च प्राकृतधर्मग्राहित्वं विकारकर्मणो न त्विह श्रौतत्वम्; अत एव चावसथ्याग्नावेतत् कर्म विधीयते; सर्वा चावृत् स्मार्तैवेति । | श्रौत माना जायगा तो ज्योतिष्टोमकर्मके साथ इसका 'प्रकृतिविकारभाव सम्बन्ध होगा, ऐसी स्थितिमें विकारभूत कर्ममें प्राकृत [ज्योतिष्टोम] कर्मके इतिकर्तव्यतारूप धर्मोंका ग्रहण करना आवश्यक होगा; किंतु [ यहाँ परिसमूहन-परिलेपनादिका सम्बन्ध रहनेके कारण ] यह श्रौतकर्म नहीं है; अतः इस कर्मका विधान आवसथ्याग्निमें ही है। तथा इसमें समस्त आवृत् (इतिकर्तव्यता) स्मार्त ही है। | | उपसद्व्रती भूत्वा पयोव्रती सन्नित्यर्थः । औदुम्बर उदुम्बरवृक्षमये कंसे चमसे वा तस्यैव विशेषणं कंसाकारे चमसाकारे वौदुम्बर एव । आकारे तु विकल्पो नौदुम्बरत्वे । अत्र सर्वौषधं सर्वांसामोषधीनां समूहं यथासम्भवं यथाशक्ति च सर्वा ओषधीः समाहृत्य तत्र ग्राम्याणां तु दश नियमेन ग्राह्या व्रीहियवाद्या वक्ष्यमाणाः । अधिकग्रहणे तु न दोषः । ग्राम्याणां | उपसद्व्रती होकर अर्थात् पयोव्रती होकर 'औदुम्बरे'--उदुम्बरवृक्षमय कंस या चमसमें; उस प्रकृत पात्रका ही यह विशेषण है--कंसाकार अथवा चमसाकार औदुम्बरपात्रमें ही। अर्थात् विकल्प केवल आकारमें ही है औदुम्बर (गूलरका) होनेमें नहीं। उसमें सर्वौषध--सम्पूर्ण ओषधियोंके समूहको अर्थात् यथासम्भव और यथाशक्ति सभी ओषधियोंको लाकर उनमें ग्राम्य ओषधियोंमेंसे तो आगे बतायी जानेवाली व्रीहि-यवादि दश ओषधियां तो अवश्य लेनी चाहिये; अधिक लेनेमें तो कोई दोष है ही नहीं; तथा यथासम्भव |
१. प्रकृतभूत कर्म समग्र अङ्गोंसे युक्त होता है और विकारभूत कर्म अङ्गहीन होता है। श्रौत माननेसे यह ज्योतिष्टोमरूप प्रकृतिका विकार होगा।
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३२३
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३२३
| शाङ्करभाष्यम् | भाषार्थ |
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| फलानि च यथासम्भवं यथाशक्ति च। इतिशब्दः समस्तसम्भारोपचयप्रदर्शनार्थः, अन्यदपि यत् सम्भरणीयं तत् सर्वं सम्भृत्येत्यर्थः। क्रमस्तत्र गृह्योक्तो द्रष्टव्यः। | और यथाशक्ति ग्राम्य फल भी लाकर। मूलमें 'इति' शब्द समस्त सामग्रीका संग्रह प्रदर्शित करनेके लिये है; तात्पर्य यह कि और भी जो संग्रह करने योग्य वस्तु हो, उसका संग्रह करके। इसका क्रम गृह्यसूत्रोंमें देखना चाहिये। |
| परिसमूहनपरिलेपने भूमिसंस्कारः। अग्निमुपसमाधायेति वचनादावसथ्येऽग्नाविति गम्यते; एकवचनादुपसमाधानश्रवणाच्च। विद्यमानस्यैवोपसमाधानम्। परिस्तीर्य दर्भानावृता, स्मार्तत्वात् कर्मणः स्थालीपाकावृत् परिगृह्यते तयाज्यं संस्कृत्य, पुंसा नक्षत्रेण पुंनाम्ना नक्षत्रेण पुण्याहसंयुक्तेन मन्थं सर्वौषधफलपिष्टं तत्रौदुम्बरे चमसे दधनि मधुनि घृते चोपसिच्यैकयोपमन्थन्योपसम्मध्य संनीय मध्ये संस्थाप्यौदुम्बरेण स्रुवेणा- | परिसमूहन और परिलेपन¹—ये भूमिके संस्कार हैं। 'अग्निमुपसमाधाय' अग्निका उपसमाधान--स्थापन कर—इस वचनसे ज्ञात होता है कि गृह्य-अग्निमें होम करे; क्योंकि यहाँ 'अग्निम्' ऐसा एकवचन है और उपसमाधान श्रुत है। विद्यमान अग्निका ही उपसमाधान होता है। दर्भोंको बिछाकर, 'आवृता'—विधिसे, यह कर्म स्मार्त है, इसलिये यहाँ स्थालीपाकरूप विधि गृहीत होती है। उससे घीका संस्कार कर, 'पुंसा नक्षत्रेण'--पुँल्लिङ्ग नामवाले नक्षत्रमें जो पुण्यतिथिसे युक्त हो मन्थको—सम्पूर्ण ओषधियोंके पिष्ट-पिण्डको उस औदुम्बर चमसमें दही, मधु और घृतमें डालकर एक मथानीसे मथकर फिर अपने और अग्निके मध्यमें स्थापित करे। फिर गूलरके स्रुवासे 'यावन्तो |
१. बुहारना और लीपना।
| १३२४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ६ |
| १३२४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ६ |
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| वापस्थान आज्यस्य जुहोत्येतैर्मन्त्रैर्यावन्तो देवा इत्यादिभिः ॥ १ ॥ | देवाः' इत्यादि मन्त्रोंसे आवापस्थानमें घृतसे हवन करे ॥ १ ॥ |
हवनके मन्त्र
ज्येष्ठाय स्वाहा श्रेष्ठाय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे सँस्रवमवनयति प्राणाय स्वाहा वसिष्ठायै स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे सँस्रवमवनयति वाचे स्वाहा प्रतिष्ठायै स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे सँस्रवमवनयति चक्षुषे स्वाहा सम्पदे स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे सँस्रवमवनयति श्रोत्राय स्वाहायतनाय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे सँस्रवमवनयति मनसे स्वाहा प्रजात्यै स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे सँस्रवमवनयति रेतसे स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे सँस्रवमवनयति ॥ २ ॥
'ज्येष्ठाय स्वाहा श्रेष्ठाय स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके संस्रवको (स्रुवामें बचे हुए घृतको) मन्थमें डाल देता है। 'प्राणाय स्वाहा, वसिष्ठायै स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके संस्रवको मन्थमें डाल देता है। 'वाचे स्वाहा प्रतिष्ठायै स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके संस्रवको मन्थमें डाल देता है। 'चक्षुषे स्वाहा सम्पदे स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके संस्रवको मन्थमें डाल देता है। 'श्रोत्राय स्वाहा आयतनाय स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके संस्रवको मन्थमें डाल देता है। 'मनसे स्वाहा प्रजात्यै स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके संस्रवको मन्थमें डाल देता है। 'रेतसे स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके संस्रवको मन्थमें डाल देता है ॥ २ ॥
अग्नये स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे सँस्रवमवनयति सोमाय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे सँस्रवमवनयति भूः स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३२५
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३२५
मन्थे सँस्रवमवनयति भुवः स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे सँस्रवमवनयति स्वः स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे सँस्रवमवनयति भूर्भुवः स्वः स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे सँस्रवमवनयति ब्रह्मणे स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे सँस्रवमवनयति क्षत्राय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे सँस्रवमवनयति भूताय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे सँस्रवमवनयति भविष्यते स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे सँस्रवमवनयति विश्वाय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे सँस्रवमवनयति सर्वाय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे सँस्रवमवनयति प्रजापतये स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे सँस्रवमवनयति ॥ ३ ॥
'अग्नये स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके संस्रवको मन्थमें डाल देता है। 'सोमाय स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके संस्रवको मन्थमें डाल देता है। 'भूः स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके संस्रवको मन्थमें डाल देता है। 'भुवः स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके संस्रवको मन्थमें डाल देता है। 'स्वः स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके संस्रवको मन्थमें डाल देता है। 'भूर्भुवःस्वः स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके संस्रवको मन्थमें डाल देता है। 'ब्रह्मणे स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करक संस्रवको मन्थमें डाल देता है। 'क्षत्राय स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके संस्रवको मन्थमें डाल देता है। 'भूताय स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके संस्रवको मन्थमें डाल देता है। 'भविष्यते स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके संस्रवको मन्थमें डाल देता है। 'विश्वाय स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके संस्रवको मन्थमें डाल देता है। 'सर्वाय स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके संस्रवको मन्थमें डाल देता है। 'प्रजापतये स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके संस्रवको मन्थमें डाल देता है ॥ ३ ॥
१३२६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६
| १३२६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| ज्येष्ठाय स्वाहा श्रेष्ठाय स्वाहे-<br>त्यारभ्य द्वे द्वे आहुती हुत्वा<br>मन्थे संस्रवमवनयति। स्रुगाव-<br>लेपनमाज्यं मन्थे संस्रावयति।<br>एतस्मादेव ज्येष्ठाय श्रेष्ठायेत्यादि-<br>प्राणलिङ्गाज्ज्येष्ठश्रेष्ठादिप्राणविद<br>एवास्मिन् कर्मण्यधिकारः। रेतस<br>इत्यारभ्यैकैकामाहुतिं हुत्वा मन्थे<br>संस्रवमवनयत्यपरयोपमन्थन्या-<br>पुनर्मथ्नाति ॥ २-३ ॥ | 'ज्येष्ठाय स्वाहा श्रेष्ठाय स्वाहा'<br>यहाँसे लेकर दो-दो आहुतियाँ हवन<br>करके संस्रवको मन्थमें डाल देता<br>है। अर्थात् स्रुवासे लगे हुए घृतको<br>मन्थमें गिरा देता है। इस 'ज्येष्ठाय<br>श्रेष्ठाय' इत्यादि प्राणके लिङ्गसे ही<br>यह निश्चय होता है कि इस कर्ममें<br>ज्येष्ठ-श्रेष्ठादिरूप प्राणोपासकका ही<br>अधिकार है। 'रेतसे स्वाहा' यहाँ-<br>से लेकर एक-एक आहुति हवन<br>करके मन्थमें संस्रव डालता है।<br>फिर दूसरी उपमथानीसे उसका<br>मन्थन करता है ॥ २-३ ॥ |
मन्थाभिमर्शका मन्त्र
अथैनमभिमृशति भ्रमदसि ज्वलदसि पूर्णमसि प्रस्तब्धमस्येकसभमसि हिङ्कृतमसि हिङ्क्रियमाणमस्युद्गीथमस्युद्गीयमानमसि श्रावितमसि प्रत्याश्रावितमस्यार्द्रे संदीप्तमसि विभूरसि प्रभूरस्यन्नमसि ज्योतिरासि निधनमसि संवर्गोऽसीति ॥ ४ ॥
इसके पश्चात् उस मन्थको 'भ्रमदसि' इत्यादि मन्त्रद्वारा स्पर्श करता है। [मन्थद्रव्यका अधिष्ठातृदेव प्राण है, इसलिये प्राणसे एकरूप होनेके कारण वह सर्वात्मक है 'भ्रमदसि' इत्यादि मन्त्रका अर्थ इस प्रकार है—] तू [प्राणरूपसे सम्पूर्ण देहोंमें] भ्रमनेवाला है, [अग्निरूपसे सर्वत्र] प्रचलित होनेवाला है, [ब्रह्मरूपसे] पूर्ण है, [आकाशरूपसे] अत्यन्त
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३२७
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३२७
स्तब्ध (निष्कम्प) है, [सबसे अविरोधी होनेके कारण] तू यह जगद्रूप एक सभाके समान है, तू ही [यज्ञके आरम्भमें प्रस्तोताके द्वारा] हिङ्कृत है, तथा [उसी प्रस्तोताद्वारा यज्ञमें] तू ही हिङ्क्रियमाण है, [यज्ञारम्भमें उद्गाताद्वारा] तू ही उच्च स्वरसे गाया जानेवाला उद्गीथ है और [यज्ञके मध्यमें उसके द्वारा] तू ही उद्गीयमान है। तू ही [अध्वर्युद्वारा] श्रावित और [आग्नीध्रद्वारा] प्रत्याश्रावित है; आर्द्र [अर्थात् मेघ] में सम्यक् प्रकारसे दीप्त है, तू विभु (विविध रूप होनेवाला) हे और प्रभु (समर्थ) है, तू [भोक्ता अग्निरूपसे] ज्योति है, [कारणरूपसे] सबका प्रलयस्थान है तथा [सबका संहार करनेवाला होनेसे] संवर्ग है ॥ ४ ॥
| अथैनमभिमृशति भ्रमदसीत्यनेन मन्त्रेण ॥ ४ ॥ | इसके पश्चात् 'भ्रमदसि' इत्यादि मन्त्रसे इसे स्पर्श करता है ॥ ४ ॥ |
मन्थको उठानेका मन्त्र
अथैनमुद्यच्छत्यामँ॒स्यामँ॒हि ते महि स हि राँजे-
शा॒नोऽधिपतिः समाँ॒ राजेशानो॑ऽधिप॑तिं करोत्विति । ५ ।
फिर 'आमंसि आमंहि' इत्यादि मन्त्रसे इसे ऊपर उठाता है। [इस मन्त्रका अर्थ—] 'आमंसि' तू सब जानता है, 'आमंहि ते महि'—मैं तेरी महिमाको अच्छी तरह जानता हूँ। वह प्राण राजा, ईशान और अधिपति है। वह मुझे राजा, ईशान और अधिपति करे ॥ ५ ॥
| अथैनमुद्यच्छति सह पात्रेण हस्ते गृह्णात्यामंस्यामंहि ते महीत्यनेन ॥ ५ ॥ | इसके पश्चात् 'आमंस्यामहि ते महि' इत्यादि मन्त्रसे उसे पात्रके सहित हाथपर ऊपर उठाता है ॥ ५ ॥ |
मन्थभक्षणकी विधि
अथैनमाचामति तत्सवितुर्वरे॑ण्यम् । मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः। माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः।