भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

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पृष्ठ 1338

| १३२२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६ | | :--- | :--- |

| रियम्; श्रौतत्वे हि प्रकृतिविकारभावस्ततश्च प्राकृतधर्मग्राहित्वं विकारकर्मणो न त्विह श्रौतत्वम्; अत एव चावसथ्याग्नावेतत् कर्म विधीयते; सर्वा चावृत् स्मार्तैवेति । | श्रौत माना जायगा तो ज्योतिष्टोमकर्मके साथ इसका 'प्रकृतिविकारभाव सम्बन्ध होगा, ऐसी स्थितिमें विकारभूत कर्ममें प्राकृत [ज्योतिष्टोम] कर्मके इतिकर्तव्यतारूप धर्मोंका ग्रहण करना आवश्यक होगा; किंतु [ यहाँ परिसमूहन-परिलेपनादिका सम्बन्ध रहनेके कारण ] यह श्रौतकर्म नहीं है; अतः इस कर्मका विधान आवसथ्याग्निमें ही है। तथा इसमें समस्त आवृत् (इतिकर्तव्यता) स्मार्त ही है। | | उपसद्व्रती भूत्वा पयोव्रती सन्नित्यर्थः । औदुम्बर उदुम्बरवृक्षमये कंसे चमसे वा तस्यैव विशेषणं कंसाकारे चमसाकारे वौदुम्बर एव । आकारे तु विकल्पो नौदुम्बरत्वे । अत्र सर्वौषधं सर्वांसामोषधीनां समूहं यथासम्भवं यथाशक्ति च सर्वा ओषधीः समाहृत्य तत्र ग्राम्याणां तु दश नियमेन ग्राह्या व्रीहियवाद्या वक्ष्यमाणाः । अधिकग्रहणे तु न दोषः । ग्राम्याणां | उपसद्व्रती होकर अर्थात् पयोव्रती होकर 'औदुम्बरे'--उदुम्बरवृक्षमय कंस या चमसमें; उस प्रकृत पात्रका ही यह विशेषण है--कंसाकार अथवा चमसाकार औदुम्बरपात्रमें ही। अर्थात् विकल्प केवल आकारमें ही है औदुम्बर (गूलरका) होनेमें नहीं। उसमें सर्वौषध--सम्पूर्ण ओषधियोंके समूहको अर्थात् यथासम्भव और यथाशक्ति सभी ओषधियोंको लाकर उनमें ग्राम्य ओषधियोंमेंसे तो आगे बतायी जानेवाली व्रीहि-यवादि दश ओषधियां तो अवश्य लेनी चाहिये; अधिक लेनेमें तो कोई दोष है ही नहीं; तथा यथासम्भव |


१. प्रकृतभूत कर्म समग्र अङ्गोंसे युक्त होता है और विकारभूत कर्म अङ्गहीन होता है। श्रौत माननेसे यह ज्योतिष्टोमरूप प्रकृतिका विकार होगा।