भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1337, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1337

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३२१


| रभ्य द्वादशाहमुपसद्व्रती—उपसत्सु व्रतम्, उपसदः प्रसिद्धा ज्योतिष्टोमे। तत्र च स्तनोपचयापचयद्वारेण पयोभक्षणं तद्व्रतम्; अत्र च तत्कर्मानुपसंहारात् केवलमितिकर्त्तव्यताशून्यं पयोभक्षणमात्रमुपादीयते। | करके बारह दिनतक उपसद्व्रती—जो व्रत उपसदोंमें किया जाता है, ज्योतिष्टोम यागमें ‘उपसद्’ नामकी इष्टियां प्रसिद्ध हैं। उनमें स्तनोंके उपचय और अपचयके द्वारा दुग्धका आहार किया जाता है; वह उपसद्व्रत कहलाता है। किंतु यहां उस कर्मका उपसंहार (संग्रह) नहीं किया गया है, इसलिये केवल-¹इतिकर्त्तव्यतासे रहित पयोभक्षणमात्र ही ग्रहण किया जाता है। | | ननूपसदो व्रतमिति यदा विग्रहस्तदा सर्वमितिकर्त्तव्यतारूपं ग्राह्यं भवति तत् कस्मान्न परिगृह्यत इति ? | **शङ्का—**किंतु यदि ‘उपसद्व्रती’ इस समस्त पदका ‘उपसद्-रूप ही व्रत’ ऐसा विग्रह किया जाय तब तो सारा ही इतिकर्त्तव्यतारूप कर्म ग्रहण किया जाना चाहिये, सो वह क्यों ग्रहण नहीं किया जाता ? | | उच्यते—स्मार्त्तत्वात् कर्मणः; | **समाधान—**बतलाते हैं—मन्थकर्म स्मार्त्त होनेके कारण। यह मन्थकर्म स्मार्त्त है [अतः यहाँ वैदिक ‘उपसद्व्रत’ का ग्रहण नहीं हो सकता]। | | स्मार्तं हीदं मन्थकर्म।<br>ननु श्रुतिविहितं सत् कथं स्मार्तं भवितुमर्हति ? | **शङ्का—**किंतु श्रुतिविहित होकर भी यह स्मार्त्त कैसे हो सकता है? | | स्मृत्यनुवादिनी हि श्रुति- | **समाधान—**यह श्रुति स्मृतिका अनुवाद करनेवाली ही है²। यदि इसे |


१. अर्थात् स्तनोंके उपचय-अपचयसे रहित।
२. यदि कहें, श्रुति तो स्मृतिसे पहले प्रकट हुई है, अतः वह स्मृतिका अनुवाद कैसे कर सकती है? तो यह ठीक नहीं है, क्योंकि श्रुति त्रिकालविषयिणी है, अतः स्मृतिका अनुवाद भी उसके द्वारा सम्भव है।