भारतकोश
संग्रह पर लौटें

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ३९

ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ३९


संस्कृत मूल (शाङ्करभाष्य)हिन्दी अनुवाद
व्याकृतरूपः संसारोऽविद्याविषयः; क्रियाकारकफलात्मकतया आत्मरूपत्वेनाध्यारोपितः अविद्ययैव मूर्त्तामूर्त्ततद्वासनात्मकः। अतो विलक्षणोऽनामरूपकर्मात्मकोऽद्वयो नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावोऽपि क्रियाकारकफलभेदादिविपर्ययेणावभासते। अतोऽस्मात्क्रियाकारकफलभेदस्वरूपाद् एतावादिदमिति साध्यसाधनरूपाद्विरक्तस्य कामादिदोषकर्मबीजभूताविद्यानिवृत्तये रज्ज्वामिव सर्पविज्ञानापनयाय ब्रह्मविद्या आरभ्यते।विषय है। अविद्यासे ही मूर्त्त, अमूर्त्त और उनकी वासनारूप यह संसार क्रिया, कारक और फलरूप होनेसे आत्मभावसे आरोपित होता है। इससे भिन्न आत्मा नाम, रूप और कर्मसे रहित, अद्वितीय तथा नित्य-शुद्ध-बुद्ध-मुक्तस्वरूप होनेपर भी क्रिया, कारक और फल-भेदादि विपरीत भावसे प्रतीत होता है। अतः इस साध्य-साधनरूप एवं क्रिया, कारक और फल-भेदरूप संसारसे 'यह इतना ही है' इस प्रकार विरक्त हुए पुरुषकी कामादि दोषमय कर्मोंकी बीजभूता अविद्याकी, रज्जुमें सर्पज्ञानके बाधके समान, निवृत्ति करनेके लिये ब्रह्मविद्याका आरम्भ किया जाता है।
तत्र तावदश्वमेधविज्ञानाय 'उषा वा अश्वस्य' इत्यादि।उसमें अश्वमेधविद्याका वर्णन करनेके लिये 'उषा वा अश्वस्य' इत्यादि मन्त्र कहा जाता है।
तत्राश्वविषयमेव दर्शनमुच्यते प्राधान्यादश्वस्य। प्राधान्यं च तन्नामाङ्कितत्वात्क्रतोःप्राजापत्यत्वाच्च।अश्वमेध यज्ञमें अश्वकी प्रधानता होनेके कारण यहाँ अश्वविषयक दृष्टि ही कही गयी है। यह यज्ञ 'अश्व' नामसे अङ्कित है और इसका देवता प्रजापति है, इसीलिये इसमें अश्वकी प्रधानता मानी गयी है।

अश्वके अवयवोंमें कालादि-दृष्टि

ॐ उषा वा अश्वस्य मेध्यस्य शिरः। सूर्य्यश्चक्षु-

४० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

४०बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

वातः प्राणो व्यात्तमग्निर्वैश्वानरः संवत्सर आत्माश्वस्य मेध्यस्य । द्यौः पृष्ठमन्तरिक्षमुदरं पृथिवी पाजस्यं दिशः पार्श्वे अवान्तरदिशः पर्शव ऋतवोऽङ्गानि मासाश्चार्धमासाश्च पर्वाण्यहोरात्राणि प्रतिष्ठा नक्षत्राण्यस्थीनि नभो मांसानि । ऊवध्यं सिकताः सिन्धवो गुदा यकृच्च क्लोमानश्च पर्वता ओषधयश्च वनस्पतयश्च लोमान्युद्यन्पूर्वार्धो निम्लोचञ्जघनार्धो यद्विजृम्भते तद्विद्योतते यद्विधूनुते तत्स्तनयति यन्मेहति तद्वर्षति वागेवास्य वाक् ॥ १ ॥

ॐ उषा (ब्राह्ममुहूर्त्त) यज्ञसम्बन्धी अश्वका शिर है, सूर्य नेत्र है, वायु प्राण है, वैश्वानर अग्नि खुला हुआ मुख है और संवत्सर यज्ञीय अश्वका आत्मा है। द्युलोक उसका पीठ है, अन्तरिक्ष उदर है, पृथिवी पैर रखनेका स्थान है, दिशाएँ पार्श्वभाग हैं, अवान्तर दिशाएँ पसलियाँ हैं, ऋतुएँ अङ्ग हैं, मास और अर्द्धमास पर्व (सन्धिस्थान) हैं, दिन और रात्रि प्रतिष्ठा (पाद) हैं, नक्षत्र अस्थियाँ हैं, आकाश (आकाशस्थित मेघ) मांस हैं, बालू ऊवध्य (उदरस्थित अर्धपक्व अन्न) है, नदियाँ नाडी हैं, पर्वत यकृत् (जिगर) और हृदयगत मांसखण्ड हैं, ओषधि और वनस्पतियाँ लोम हैं, ऊपरकी ओर जाता हुआ सूर्य नाभिसे ऊपरका भाग और नीचेकी ओर जाता हुआ सूर्य कटिसे नीचेका भाग है। उसका जमुहाई लेना बिजलीका चमकना है और शरीर हिलाना मेघका गर्जन है। वह जो मूत्र त्याग करता है वही वर्षा है और वाणी ही उसकी वाणी है॥ १ ॥

| उषा इति, ब्राह्मो मुहूर्त उषाः । | ‘उषा वा’ इत्यादि। ब्राह्ममुहूर्तका नाम उषा है। | | वैशब्दः स्मरणार्थः प्रसिद्धं कालं स्मारयति । | ‘वै’ शब्द स्मरण करानेके लिये है। यह प्रसिद्ध काल-का स्मरण कराता है। | | शिरः प्राधान्यात् । | वह प्रसिद्ध उषाकाल प्रधान होनेके कारण |

ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ४१

ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ४१


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
शिरश्च प्रधानं शरीरावयवानाम् ।<br><br>अश्वस्य मेध्यस्य मेधार्हस्य यज्ञियस्योषाः शिर इति सम्बन्धः ।<br><br>कर्माङ्गस्य पशोः संस्कर्तव्यत्वात् कालादिदृष्टयः शिर आदिषु क्षिप्यन्ते । प्राजापत्यत्वं च प्रजापतिदृष्ट्यध्यारोपणात् । काल-लोकदेवतात्वाध्यारोपणं च प्रजापतित्वकरणं पशोः । एवंरूपो हि प्रजापतिः, विष्णुत्वादिकरणमिव प्रतिमादौ ।शिर है। शिर भी शरीरके अवयवोंमें प्रधान है। अतः मेध्य—मेधार्ह (यज्ञार्ह) यानी यज्ञसम्बन्धी अश्वका उषा शिर है—ऐसा इसका अन्वय है। कर्मके अङ्गभूत पशुका संस्कार किया जाना चाहिये, इसलिये उसके शिर आदिमें कालादिदृष्टियाँ की जाती हैं। उसमें प्रजापति-दृष्टिका अध्यारोप किया जाता है, इसीसे यह प्राजापत्य (प्रजापतिदेवतासम्बन्धी) है। काल, लोक और देवत्वका आरोप करना ही पशुका प्रजापतित्व सम्पादन करना है। जिस प्रकार प्रतिमादिमें विष्णुत्वादिकी प्रतिष्ठा की जाती है उसी प्रकार यह उक्तरूपसे प्रजापति है।
सूर्यश्चक्षुः शिरसोऽनन्तरत्वात् सूर्याधिदैवतत्वाच्च । वातः प्राणो वायुस्वाभाव्यात् । व्यात्तं विवृतं मुखमग्निर्वैश्वानरः । वैश्वानर इत्यग्नेर्विशेषणम् । वैश्वानरो नामाग्निर्विवृतं मुखमित्यर्थो मुखस्याग्निदैवतत्वात् । संवत्सर आत्मा, संवत्सरो द्वादशमासस्त्रि-[जिस प्रकार उषाके अनन्तर सूर्य दिखायी देता है उसी प्रकार] शिरके अनन्तर नेत्र हैं और सूर्य ही नेत्रोंका अभिमानी देव है, इसलिये सूर्य उसका नेत्र है। वायु प्राण है, क्योंकि वह वायुके-से स्वभाववाला है। वैश्वानर अग्नि व्यात्त यानी खुला हुआ मुख है। 'वैश्वानर' यह अग्निका विशेषण है। अर्थात् वैश्वानर अग्नि उसका खुला हुआ मुख है; क्योंकि मुखका अधिष्ठातृदेव अग्नि ही है। संवत्सर आत्मा है; संवत्सर बारह या तेरह महीनेका होता है,

४२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

४२बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

| योदशमासो वा, आत्मा शरीरम्। कालावयवानां च संवत्सरः शरीरम्, शरीरं चात्मा "मध्यं ह्येषा- मङ्गानामात्मा" इति श्रुतेः। अश्वस्य मेध्यस्येति सर्वत्रानु- षङ्गार्थं पुनर्वचनम्। | वह उसका आत्मा यानी शरीर है। कालके अवयवोंका संवत्सर ही शरीर है, और "इन सब अङ्गोंका मध्यभाग आत्मा है" इस श्रुतिके अनुसार शरीर ही आत्मा है। 'अश्वस्य मेध्यस्य' इसकी पुनरुक्ति इसका सबके साथ सम्बन्ध प्रदर्शित करनेके लिये है। | | द्यौः पृष्ठमूर्ध्वत्वसामान्यात्। अन्तरिक्षमुदरं सुषिरत्वसामान्यात्। पृथिवी पाजस्यं पादस्यं पाजस्य- मिति वर्णव्यत्ययेन, पादासन- स्थानमित्यर्थः। दिशश्चतस्रोऽपि पार्श्वे पार्श्वेन दिशां सम्बन्धात्। | ऊर्ध्वत्वमें समानता होनेके कारण द्युलोक उसका पृष्ठभाग है, अवकाश या छिद्ररूपतामें समानता होनेके कारण अन्तरिक्ष उदर है, पृथिवी पाजस्य–पादस्य यानी पैर रखनेका स्थान है। 'पादस्य' के वर्ण (द) का ['व्यत्ययो बहुलम्' (पा०सू० ३।१। ८५) इस सूत्रके अनुसार जकारके रूपमें] व्यत्यय होनेसे 'पाजस्य' हुआ है। चारों दिशाएँ पार्श्वभाग हैं, क्योंकि पार्श्वसे दिशाओंका सम्बन्ध है। | | पार्श्वयोर्दिशां च सङ्ख्यावैषम्या- दयुक्तमिति चेन्न, सर्वमुखत्वोप- पत्तेरश्वस्य पार्श्वभ्यामेव सर्वदिशां सम्बन्धाददोषः। अवान्तरदिश | [यदि कहो कि ] पार्श्व और दिशाओंकी ¹संख्यामें समानता न होनेके कारण ऐसा कहना उचित नहीं है तो यह ठीक नहीं, क्योंकि अश्वका मुख सभी दिशाओंकी ओर हो सकता है, अतः उसके पार्श्वोंका सभी दिशाओंसे सम्बन्ध होनेके कारण इसमें कोई दोष नहीं है। |


१. क्योंकि दिशाएँ चार हैं और पार्श्व केवल दो होते हैं।

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४३

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४३


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
आग्नेय्याद्याः पर्शवः पार्श्वस्थीनि ।<br><br>ऋतवोऽङ्गानि संवत्सरावयवत्वादङ्गसाधर्म्यात् । मासाश्चार्धमासाश्च पर्वाणि सन्धयः सन्धिसामान्यात् ।<br><br>अहोरात्राणि प्रतिष्ठाः । बहुवचनात् प्राजापत्यदैवपित्र्यमानुषाणि, प्रतिष्ठाः पादाः प्रतितिष्ठत्येतैरिति । अहोरात्रैर्हि कालात्मा प्रतितिष्ठत्यश्वश्च पादैः ।आग्नेयी आदि अवान्तर दिशाएँ पसलियाँ अर्थात् पार्श्वभागकी अस्थियाँ हैं। ऋतुएँ अङ्ग हैं, क्योंकि संवत्सरके अवयव होनेके कारण अङ्गोंसे उनकी समानता है। मास और अर्धमास पर्व—सन्धियाँ हैं; क्योंकि सन्धिसे उनकी समानता है।<br><br>दिन और रात्रि प्रतिष्ठा है। 'अहोरात्राणि' इस पदमें बहुवचन होनेके कारण प्रजापति, देवता, पितृगण और मनुष्य सभीके दिन-रात¹ प्रतिष्ठा अर्थात् पाद हैं, क्योंकि इनसे वह प्रतिष्ठित होता है। कालात्मा दिनरात्रिके द्वारा प्रतिष्ठित होता है और अश्व पैरोंके द्वारा।
नक्षत्राण्यस्थीनि शुक्लत्वसामान्यात् । नभो नभःस्था मेघा अन्तरिक्षस्योदरत्वोक्तेः, मांसान्युदकरुधिरसेचनसामान्यात् । ऊवध्यं उदरस्थमर्धजीर्णमशनं सिकताशुक्लत्वमें समानता होनेके कारण नक्षत्र अस्थियाँ हैं। आकाश अर्थात् आकाशस्थित मेघ, क्योंकि अन्तरिक्ष (आकाश) की उदररूपता कही जा चुकी है, मांस हैं, क्योंकि जलरूप रुधिर बरसानेमें उनकी मांससे समानता है। अवयवोंके बिलग-बिलग रहनेमें समानता होनेके कारण बालू ऊवध्य-

१. प्रजापतिका एक अहोरात्र दो सहस्र युगका होता है, देवताओंका अहोरात्र उत्तरायण और दक्षिणायनरूप है, पितृगणका अहोरात्र शुक्लपक्ष और कृष्ण पक्ष है तथा मनुष्यका अहोरात्र एक दिन और एक रात्रि है।

४४ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय १

४४ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय १


| विश्लिष्टावयवत्वसामान्यात् । सिन्धवः स्यन्दनसामान्यान्नद्यो गुदा नाड्यो बहुवचनाच्च । यकृच्च क्लोमानश्च हृदयस्याधस्ताद्दक्षिणोत्तरौ मांसखण्डौ । क्लोमान इति नित्यं बहुवचनमेकस्मिन्नेव । पर्वताः काठिन्यादुच्छ्रितत्वाच्च । ओषधयश्च क्षुद्राः स्थावरा वनस्पतयो महान्तो लोमानि केशाश्च यथासम्भवम् ।<br><br>उद्यन्नुद्गच्छन्भवति सविता आमध्याह्नादश्वस्य पूर्वार्धो नाभेरूर्ध्वमित्यर्थः । निम्लोचन्नस्तं यन्नामध्याह्नाज्जघनार्धोऽपरार्धः पूर्वापरत्वसाधर्म्यात् । यद्विजृम्भते गात्राणि विनामयति विक्षिपति तद्विद्योतते विद्योतनं मुखघनविदारणसामान्यात्। यद्विधूनुते गा- | उदरस्थित अर्धजीर्ण अन्न है। सिन्धु अर्थात् स्यन्दन (बहने) में समानता होनेके कारण नदियाँ गुदा-नाडियाँ हैं, क्योंकि यहाँ 'सिन्धवः' और 'गुदाः' दोनों ही पद बहुवचनान्त हैं¹। कठिन और ऊँचे उठे हुए होनेके कारण पर्वत यकृत् और क्लोमा हैं। 'यकृत्' और 'क्लोमा'—हृदयके अधोभागमें सीधे और बायें दो मांसखण्ड हैं। 'क्लोमानः' यह एकके ही अर्थमें नित्य बहुवचनान्त होता है। ओषधि—क्षुद्र स्थावर और वनस्पति—महान् स्थावर ये यथासम्भव लोम और केश हैं।<br><br>सूर्य जो मध्याह्नकालपर्यन्त उदित होता—ऊपरकी ओर जाता है वह अश्वका पूर्वार्ध यानी नाभिसे ऊपरका भाग है और निम्लोचन् अर्थात् मध्याह्नकालसे अस्तकी ओर जाता हुआ वह सूर्य जघनार्ध—अपरार्ध ( नीचेका भाग ) है, क्योंकि पूर्वत्व और अपरत्वमें उन ( उदित और अस्त होते हुए सूर्य ) की समानता है। तथा वह जो जमुहाई लेता अर्थात् अङ्गोंको फैलाता यानी उन्हें विशेषरूपसे झाड़ता है। वह बिजलीका चमकना है, क्योंकि विद्योतन और मुख एवं मेघके विदारणमें |


१. अतएव यहाँ 'गुदा' शब्द लोकप्रसिद्ध नितम्ब-अर्थका बोधक नहीं हो सकता।

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४५

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४५


| गात्राणि कम्पयति तत्स्तनयति गर्जनशब्दसामान्यात् । यन्मेहति मूत्रं करोत्यश्वस्तद्वर्षति वर्षणं तत् सेचनसामान्यात् । वागेव शब्द एवास्याश्वस्य वागिति, नात्र कल्पनेत्यर्थः ॥ १ ॥ | समानता है। तथा वह जो हिलाता अर्थात् शरीरको कम्पित करता है वह मेघका गर्जन है; क्योंकि इन दोनोंहीमें गर्जन-शब्द रहनेमें समानता है। और वह अश्व जो मूत्रत्याग करता है वही वर्षा होना है, क्योंकि भिगोनेमें इन दोनोंकी समानता है। वाक् अर्थात् शब्द ही इस अश्वकी वाणी है; तात्पर्य यह है कि यहाँ कोई कल्पना नहीं है ॥ १ ॥ |


अश्वमेधसम्बन्धी महिमासंज्ञक ग्रहादिमें अहरादिदृष्टि

| अहर्वा इति । सौवर्णराजतौ महिमाख्यौ ग्रहावश्वस्याग्रतः पृष्ठतश्च स्थाप्येते तद्विषयमिदं दर्शनम्— | ‘अहर्वा’ इत्यादि। अश्वके आगे और पीछे महिमा नामके सोने और चाँदीके दो ग्रह (यज्ञीय पात्रविशेष) रखे जाते हैं; उन्हींसे सम्बन्ध रखनेवाली यह दृष्टि है— |

अहर्वा अश्वं पुरस्तान्महिमान्वजायत तस्य पूर्वे समुद्रे योनी रात्रिरेनं पश्चान्महिमान्वजायत तस्यापरे समुद्रे योनिरेतौ वा अश्वं महिमानावभितः सम्बभूवतुः। हयो भूत्वा देवानवहद्वाजी गन्धर्वानर्वासुरानश्वो मनुष्यान् समुद्र एवास्य बन्धुः समुद्रो योनिः ॥ २ ॥

अश्वके सामने महिमारूपसे दिन प्रकट हुआ; उसकी पूर्व समुद्र योनि है। रात्रि इसके पीछे महिमारूपसे प्रकट हुई; उसकी अपर (पश्चिम) समुद्र योनि है। ये ही दोनों इस अश्वके आगे-पीछेके महिमासंज्ञक ग्रह

४६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | अध्याय १]

४६बृहदारण्यकोपनिषद्अध्याय १]

हुए। इसने हय होकर देवताओंको, वाजी होकर गन्धर्वोंको, अर्वा होकर असुरोंको और अश्व होकर मनुष्योंको वहन किया है। समुद्र ही इसका बन्धु है और समुद्र ही उद्गमस्थान है ॥ २ ॥

| अहः सौवर्णो ग्रहो दीप्ति-सामान्याद्वै। अहरश्वं पुरस्तान्महिमान्वजायतेति कथम् ? अश्वस्य प्रजापतित्वात्। प्रजापतिर्ह्यादित्यादिलक्षणोऽह्ना लक्ष्यते। अश्वं लक्षयित्वाजायत सौवर्णो महिमा ग्रहो वृक्षमन्ु विद्योतते विद्युदिति यद्वत्। तस्य ग्रहस्य पूर्वे पूर्वः समुद्रे समुद्रो योनिर्विभक्तिव्यत्ययेन। योनिरित्यासादनस्थानम्। | दीप्तिमें समानता होनेके कारण दिन ही सुवर्णमय ग्रह है। दिन ही इस अश्वके सामने महिमारूपसे प्रकट हुआ, सो किस प्रकार ? क्योंकि यह अश्व प्रजापतिरूप है; आदित्यादिरूप प्रजापति ही दिनसे लक्षित होता है। जिस प्रकार वृक्षको लक्ष्य बनाकर बिजली चमकती है उसी प्रकार इस अश्वको लक्षित कराकर दिनरूप सुवर्णमय महिमासंज्ञक ग्रह प्रकट हुआ है। उस ग्रहका 'पूर्वे समुद्रे' अर्थात् पूर्वसमुद्र योनि है। योनि अर्थात् प्राप्तिस्थान है। यहाँ [ वैदिक प्रक्रियाके अनुसार ] प्रथमा विभक्तिका सप्तमीके रूपमें व्यत्यय हुआ है, अतः 'पूर्वे समुद्रे' का 'पूर्वः समुद्रः' अर्थ किया गया है। | | तथा रात्री राजतो ग्रहो वर्णसामान्याज्जघन्यत्वसामान्याद्वा। एनमश्वं पश्चात्पृष्ठतो महिमान्वजायत, तस्यापरे समुद्रे योनिः। महिमा महत्त्वात्। अश्वस्य हि | इसी प्रकार वर्णमें और निकृष्टतामें समानता होनेके कारण रात्रि—राजत (चाँदीका) ग्रह है। यह इस अश्वके पीछेकी ओर यानी पृष्ठभागमें महिमारूपसे प्रकट हुई। उसका पश्चिमसमुद्र उद्गमस्थान है। महत्ताके कारण ये 'महिमा' कहलाते हैं। यह अश्वकी विभूति ही है कि |

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४७

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४७


विभूतिरेषा यत्सौवर्णो राजतश्च ग्रहावुभयतः स्थाप्येते। तावेतौ वै महिमानौ महिमाख्यौ ग्रहावश्वमभितः सम्बभूवतुरुक्तलक्षणावेव सम्भूतौ। इत्थमसावश्वो महत्त्वयुक्त इति पुनर्वचनं स्तुत्यर्थम्।इसके आगे-पीछे सुवर्ण और चाँदीके ग्रह (पात्रविशेष) रखे जाते हैं। वे ये महिमा अर्थात् ऊपर बतलाये हुए लक्षणोंवाले महिमासंज्ञक ग्रह ही अश्वके आगे-पीछे प्रकट हुए हैं। इस प्रकार यह अश्व महत्त्वयुक्त है—यह पुनरुक्ति अश्वकी स्तुतिके लिये है।
तथा च हयो भूत्वेत्यादि स्तुत्यर्थमेव। हयो हिनोतेर्गतिकर्मणो विशिष्टगतिरित्यर्थः। जातिविशेषो वा। देवानवहद् देवत्वमगमयत्प्रजापतित्वात्। देवानां वा वोढाभवत्।तथा 'हयो भूत्वा' इत्यादि वाक्य भी अश्वकी स्तुतिके ही लिये है। गतिकर्मक 'हि' धातुका रूप 'हय' है, अतः 'हय' का अर्थ विशिष्टगतिमान् है। अथवा 'हय' अश्वकी जातिविशेष है। हय होकर उसने देवताओंको वहन किया अर्थात् प्रजापति होनेके कारण उन्हें देवत्वको प्राप्त कराया; अथवा वह देवताओंका वाहन हुआ।
ननु निन्दैव वाहनत्वम्।शङ्का—किंतु वाहन होना तो निन्दा ही है [ स्तुतिके लिये कैसे कहा ? ]।
नैष दोषः, वाहनत्वं स्वाभाविकमश्वस्य। स्वाभाविकत्वादुच्छ्रायप्राप्तिर्देवादिसम्बन्धोऽश्वस्येति स्तुतिरेवैषा। तथा वाज्यादयो जातिविशेषाः। वाजी भूत्वासमाधान—यह कोई दोषकी बात नहीं है, अश्वका वाहन होना तो स्वाभाविक ही है। स्वाभाविक होनेके कारण देवादिसे सम्बन्ध होना तो उच्च पदकी प्राप्ति ही है, अतः यह उसकी स्तुति ही है। इसी प्रकार वाजी आदि भी जाति विशेष हैं।

४८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

४८बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

| गन्धर्वानवहदित्यनुषङ्गः । तथार्वा भूत्वासुरान् । अश्वो भूत्वा मनुष्यान्। समुद्र एवेति परमात्मा बन्धुर्बन्धनं बध्यतेऽस्मिन्निति । समुद्रो योनिः कारणमुत्पत्तिं प्रति। एवमसौ शुद्धयोनिः शुद्धस्थितिरिति स्तूयते । “अप्सु योनिर्व्वा अश्वः” इति श्रुतेः प्रसिद्ध एव वा समुद्रो योनिः ॥ २ ॥ | अतः इसका सम्बन्ध इस प्रकार है—वाजी होकर उसने गन्धर्वोंका वहन किया तथा अर्वा होकर असुरोंका और अश्व होकर मनुष्योंका वहन किया । समुद्र अर्थात् परमात्मा ही इसका बन्धु–बन्धन है, क्योंकि इसीमें यह बाँधा जाता है तथा समुद्र ही योनि यानी इसकी उत्पत्तिमें कारण है। इस प्रकार यह शुद्ध योनि और शुद्ध स्थितिवाला है—ऐसा कहकर इसकी स्तुति की जाती है। अथवा “अश्व जलमें योनिवाला है” इस श्रुतिके अनुसार प्रसिद्ध समुद्र ही इसकी योनि है ॥ २ ॥ |

इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये प्रथमाध्याये प्रथममश्वमेधब्राह्मणम् ॥ १ ॥

द्वितीय ब्राह्मण

अश्वमेधसम्बन्धी अग्निकी उत्पत्ति

| अथाग्नेरश्वमेधोपयोगिकस्योत्पत्तिरुच्यते । तद्विषयदर्शनविवक्षयैवोत्पत्तिः स्तुत्यर्था । | अब आगे अश्वमेधमें उपयोगी अग्निकी उत्पत्तिका वर्णन किया जाता है। तद्विषयक दृष्टि कहनेकी इच्छासे ही जो उसकी उत्पत्ति कही जाती है वह स्तुतिके लिये है। |

नैवेह किञ्चनाग्र आसीन्मृत्युनैवेदमावृतमासीत् ।
अशनाययाशनाया हि मृत्युस्तन्मनोऽकुरुतात्मन्वी स्यामिति । सोऽर्चन्नचरत्तस्यार्चत आपोऽजायन्तार्चते वै मे

ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ ४९

ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ ४९


कमभूदिति तदेवार्कस्यार्कत्वं कं ह वा अस्मै भवति य एवमेतदर्कस्यार्कत्वं वेद ॥ १ ॥

पहले यहाँ कुछ भी नहीं था। यह सब मृत्युसे ही आवृत था। यह अशनाया (क्षुधा) से आवृत था। अशनाया ही मृत्यु है। उसने 'मैं आत्मा (मन) से युक्त होऊँ' ऐसा मन किया। उसने अर्चन (पूजन) करते हुए आचरण किया। उसके अर्चन करनेसे आप हुआ। अर्चन करते हुए मेरे लिये क (जल) प्राप्त हुआ है, अतः यही अर्कका¹ अर्कत्व है। जो इस प्रकार अर्कके इस अर्कत्वको जानता है उसे निश्चय क (सुख) होता है ॥ १ ॥

संस्कृतहिन्दी
नैवेह किञ्चनाग्र आसीत् । इह संसारमण्डले किञ्चन किञ्चिदपि नामरूपप्रविभक्तविशेषं नैवासीद् न बभूव अग्रे प्रागुत्पत्तेर्मनआदेः ।पहले यहाँ कुछ भी नहीं था। अर्थात् मन आदिकी उत्पत्तिसे पूर्व यहाँ-इस संसारमण्डलमें किञ्चनमात्र—कुछ भी—नाम-रूपमें विभक्त हुआ कोई भी पदार्थविशेष नहीं था।
किं शून्यमेव स्यात् “नैवेह किञ्चन” इति श्रुतेः । <br><br> (सत्कारणवाद-साधनम्) <br><br> न कार्यं कारणं वासीत् । उत्पत्तेश्च, उत्पद्यते हि घटः, अतः प्रागुत्पत्तेर्घटस्य नास्तित्वम् ।शून्यवादी—तो क्या उस समय शून्य ही था, क्योंकि "यहाँ कुछ भी नहीं था" ऐसी श्रुति है। अतः कार्य या कारण कुछ भी नहीं था। इसके सिवा उत्पत्ति होनेसे भी यही सिद्ध होता है। घट उत्पन्न होता है, इसलिये उत्पत्तिसे पूर्व घटकी सत्ता नहीं होती।
ननु कारणस्य न नास्तित्वं मृत्पिण्डादिदर्शनात् । यन्नोप-सिद्धान्ती—किंतु कारणका तो अभाव नहीं होता, क्योंकि [घटोत्पत्तिसे पूर्व भी] मृत्पिण्डादि देखे

१. 'अर्चते कम् अर्कम्' अर्थात् जिसके अर्चन करनेवालेको क (जल या सुख) हो उसका नाम अर्क है। इस व्युत्पत्तिसे 'अर्क' अग्निको कहते हैं।

बृ० उ० ४—

५० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

५०बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १
संस्कृतहिन्दी
लभ्यते तस्यैव नास्तिता। अस्तु कार्यस्य न तु कारणस्य, उपलभ्यमानत्वात्।जाते हैं। जो वस्तु उपलब्ध नहीं होती उसीका अभाव होता है। अतः कार्यका अभाव भले ही रहे कारणका तो अभाव नहीं होता, क्योंकि वह तो उपलब्ध होता ही है।
न; प्रागुत्पत्तेः सर्वानुपलम्भात्। अनुपलब्धिश्चेदभावहेतुः सर्वस्य जगतः प्रागुत्पत्तेर्न कारणं कार्यं वोपलभ्यते। तस्मात्सर्वस्यैवाभावोऽस्तु।शून्यवादी-नहीं, क्योंकि उत्पत्तिसे पूर्व तो सभीकी उपलब्धि नहीं होती। यदि अनुपलब्धि ही अभावका कारण है तो उत्पत्तिसे पूर्व तो सारे जगत्का कारण या कार्य उपलब्ध नहीं होता। अतः सभीका अभाव होना चाहिये।
न; “मृत्युनैवेदमावृतमासीत्” इति श्रुतेः। यदि हि किञ्चिदपि नासीद् येनाव्रियते यच्चाव्रियते तदा नावक्ष्यत् ‘मृत्युनैवेदमावृतम्’ इति। न हि भवति गगनकुसुमच्छन्नो बन्ध्यापुत्र इति। ब्रवीति च ‘मृत्युनैवेदमावृतमासीत्’ इति, तस्माद्येनावृतं कारणेन, यच्चावृतं कार्यं प्रागुत्पत्तेस्तदुभयमासीत्, श्रुतेः प्रामाण्यादनुमेयत्वाच्च।सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि यहाँ "यह मृत्युसे ही आवृत था" ऐसी श्रुति है। यदि उस समय कुछ भी न होता तो जिससे आवृत होता है और जो आवृत होता है उसके विषयमें श्रुति यह न कहती कि 'यह मृत्युसे ही आवृत था।' वन्ध्यापुत्र आकाश-कुसुमसे आच्छादित होता हो—ऐसा कभी नहीं होता। किंतु श्रुति ऐसा कह रही है कि 'यह मृत्युसे ही आवृत था', अतः जिस कारणसे आवृत था और जो कार्य आवृत था, उत्पत्तिसे पूर्व वे दोनों ही थे, क्योंकि इसमें श्रुति प्रमाण है और ऐसा अनुमान भी किया जा सकता है।

ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५१

ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५१


अनुमीयते च प्रागुत्पत्तेः कार्यकारणयोरस्तित्वम्; कार्यस्य हि सतो जायमानस्य कारणे सत्युत्पत्तिदर्शनात्, असति चादर्शनात्। जगतोऽपि प्रागुत्पत्तेः कारणास्तित्वमनुमीयते घटादिकारणास्तित्ववत् ।उत्पत्तिसे पूर्व कार्य और कारणके अस्तित्वका अनुमान भी किया जा सकता है; क्योंकि उत्पन्न होनेवाले सत्य कार्यकी ही सत्य कारणमें उत्पत्ति देखी जाती है; असत्यमें नहीं देखी जाती। घटादिके कारणकी सत्ताके समान उत्पत्तिसे पूर्व जगत्‌के कारणकी सत्ताका भी अनुमान किया जा सकता है।^१
घटादिकारणस्याप्यसत्त्वमेव, अनुपमृद्य मृत्पिण्डादिकं घटायनुत्पत्तेरिति चेत् ?शून्यवादी—किंतु घटादिके कारणकी भी तो सत्ता नहीं है, क्योंकि मृत्पिण्डादिको नष्ट किये बिना घटादिकी उत्पत्ति ही नहीं होती—यदि ऐसा कहें तो ?^२
न; मृदादेः कारणत्वात् । मृत्सुवर्णादि हि तत्र कारणं घटरुचकादेः, न पिण्डाकारविशेषः, तदभावे भावात् । असत्यपि पिण्डाकारविशेषे मृत्सुवर्णादिकारणद्रव्यमात्रादेव घट-सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि कारण तो मृत्तिकादि हैं। घट और रुचक (कण्ठभूषण) आदिके कारण तो मृत्तिका और सुवर्णादि हैं, उनका पिण्डाकारविशेष कारण नहीं है, क्योंकि उसका अभाव होनेपर भी उन (मृत्तिकादि) की सत्ता तो रहती ही है। पिण्डाकारविशेषके न रहनेपर भी मृत्तिका और सुवर्णादि कारण-द्रव्यमात्रसे ही

१. इससे कारणकी सत्ताका अनुमान किया जाता है। अनुमानका प्रयोग इस प्रकार समझना चाहिये—'विमतं सत्पूर्वं कार्यत्वाद् घटवत्' विवादका विषयभूत जगत् सत् (कारण) पूर्वक है, क्योंकि वह कार्य है, जैसे घट।
२. अतः यह (घटरूप) दृष्टान्त साध्यविकल होनेके कारण उक्त अनुमान प्रामाणिक नहीं है।

| ५२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |

५२बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

| रुचकादिकार्योत्पत्तिर्दृश्यते । तस्मान्न पिण्डाकारविशेषो घट-रुचकादिकारणम्। असति तु मृत्सुवर्णादिद्रव्ये घटरुचकादिर्न जायत इति मृत्सुवर्णादिद्रव्यमेव कारणम्, न तु पिण्डाकारविशेषः। | घट और रुचकादि कार्यकी उत्पत्ति होती देखी जाती है । अतः घट और रुचकादिका कारण पिण्डाकार-विशेष नहीं है। मृत्तिका और सुवर्णादि द्रव्यके अभावमें घट और रुचकादिकी उत्पत्ति नहीं होती। अतः मृत्तिका और सुवर्णादि द्रव्य ही उनका कारण है, उनका पिण्डाकारविशेष कारण नहीं है। १ | | सर्वं हि कारणं कार्यमुत्पादयत्पूर्वोत्पन्नस्यात्मकर्यस्य तिरोधानं कुर्वत्कार्यान्तरमुत्पादयति, एकस्मिन्कारणे युगपदनेककार्यविरोधात् । न च पूर्वकार्योपमर्दे कारणस्य स्वात्मोपमर्दो भवति । तस्मात्पिण्डाद्युपमर्दे कार्योत्पत्तिदर्शनमहेतुः प्रागुत्पत्तेः कारणासत्त्वे । | सारे ही कारण कार्यकी उत्पत्ति करते समय अपने पूर्वोत्पन्न कार्यका लय करके ही दूसरे कार्यको उत्पन्न करते हैं, क्योंकि एक कारणमें एक साथ अनेक कार्योंकी उत्पत्ति होना विरुद्ध है। किंतु उस पूर्व कार्यका लय होनेसे ही कारणके स्वरूपका लय नहीं होता। अतः पिण्डादिका लय होनेपर कार्यकी उत्पत्ति दिखायी देना उत्पत्तिसे पूर्व कारणकी असत्ताका हेतु नहीं है। | | पिण्डादिव्यतिरेकेण मृदादेरसत्त्वादयुक्तमिति चेत्—पिण्डादिपूर्वकार्योपमर्दे मृदादिकारणं नोपमृद्यते, घटादिकार्यान्तरेऽप्यनुवर्तते इत्येतदयुक्तम्; पिण्ड- | शून्यवादी--किंतु पिण्डादिसे भिन्न मृत्तिकादिकी कोई सत्ता नहीं है, इसलिये ऐसा कहना अनुचित है। पिण्डादि पूर्व कार्यका लय होनेपर मृदादि कारणका लय नहीं होता, वह घटादि कार्यान्तरमें भी अनुवृत्त रहता है—ऐसा कहना |


१ इसलिये ऊपर दिये हुए दृष्टान्तमें साध्यवैकल्य दोष नहीं माना जा सकता।

ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ ५३

ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ ५३


घटादिव्यतिरेकेण मृदादिकारणस्यानुपलम्भादिति चेत् ?उचित नहीं है, क्योंकि पिण्ड और घटादिसे पृथक् मृत्तिकादि कारणकी उपलब्धि नहीं होती।
न, मृदादिकारणानां घटाद्युत्पत्तौ पिण्डादिनिवृत्तावनुवृत्तिदर्शनात् । सादृश्यादन्वयदर्शनं न कारणानुवृत्तेरिति चेन्न, पिण्डादिगतानां मृदाद्यवयवानामेव घटादौ प्रत्यक्षत्वेऽनुमानाभासात्सा दृश्यादिकल्पनानुपपत्तेः ।सिद्धान्ती-ऐसी बात नहीं है, क्योंकि घटादिकी उत्पत्ति होनेपर पिण्डादिकी निवृत्ति हो जानेपर भी मृत्तिकादि कारणद्रव्योंकी अनुवृत्ति देखी जाती है। यदि कहो कि समानताके कारण उनमें मृत्तिकाका अन्वय देखा जाता है, कारणकी अनुवृत्ति होनेसे नहीं—तो यह ठीक नहीं है, क्योंकि पिण्डादिगत मृत्तिकादि अवयवोंको ही घटादिमें प्रत्यक्ष देखा जाता है, इसलिये केवल अनुमानाभाससे सादृश्यादिकी कल्पना करना उचित नहीं है।
न च प्रत्यक्षानुमानयोर्विरुद्धाव्यभिचारिता, प्रत्यक्षपूर्वकत्वाद्वनुमानस्य सर्वत्रैवानाश्वासप्रसङ्गात् । यदि च क्षणिकं सर्वं तदेवेदमिति गम्यमानं तद्बुद्धेरप्यन्यतद्बुद्ध्यपेक्षत्वे तस्याइसके सिवा प्रत्यक्ष और अनुमान प्रमाणोंको अव्यभिचारिता (समञ्जसता) में विरोध भी नहीं होता, क्योंकि अनुमान प्रत्यक्षपूर्वक होता है, इसलिये [उनमें विरोध होनेपर] सभी जगह अविश्वासका प्रसंग हो जायगा। यदि 'तदेवेदम्' (यह वही है) इस प्रकार ज्ञात होनेवाला सब कुछ क्षणिक है तो उस क्षणिकत्वबुद्धिको प्रमाणित करनेके लिये भी तद्विषयक अन्य बुद्धिकी अपेक्षा होगी और उसके लिये दूसरी

५४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

५४बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १
अप्यन्यतद्बुद्ध्यपेक्षत्वमित्यनव-तद्बुद्धिकी; इस प्रकार अनवस्था प्राप्त
होनेपर [क्षणिकत्वबुद्धिको स्वतः-
स्थायां तत्सदृशमिदमित्यस्याप्रमाण मानना होगा। ऐसी दशामें]
'यह उसके समान है' यह बुद्धि
भी [ 'तदिदम्' बुद्धिके ही अन्तर्गत
अपि बुद्धेर्मृषात्वात्सर्वत्रानाश्वा-होनेसे ] मिथ्या होनेके कारण
सर्वत्र अविश्वास ही रहेगा।^१ तथा
सतैव । तदिदम्बुद्धयोरपि कर्त्र-'तदिदम्' 'यह' और 'वही'--इन
बुद्धियोंका भी, कोई कर्ता न होनेके
भावे सम्बन्धानुपपत्तिः ।कारण परस्पर सम्बन्ध होना सम्भव
नहीं होगा।^२
सादृश्यात्तत्सम्बन्ध इति चेन्न,यदि कहो कि सादृशताके कारण
इनका सम्बन्ध हो सकता है--तो
तदिदम्बुद्धयोरितरेतरविषयत्वा-यह भी ठीक नहीं, क्योंकि 'तत्'
'इदम्'-इन बुद्धियोंका इतरेतर-विष-
यत्व (भिन्न-भिन्न विषयोंको ग्रहण
नुपपत्तेः । असति चेतरेतरविष-करना) सिद्ध नहीं होता। जबतक

१. 'तत्' (वह) और 'इदम्' (यह) शब्दसे होनेवाले यावन्मात्र वस्तुज्ञानको प्रत्यभिज्ञा कहते हैं, कोई भी बुद्धि अपने विषयमें स्वतःप्रमाण नहीं होती, उसकी प्रमाणताके लिये अन्य बुद्धिकी अपेक्षा होती है—ऐसा बौद्ध मानते हैं। बौद्धोंके मतमें प्रत्यभिज्ञामात्र क्षणिक है। अतः उनकी मान्यताके अनुसार क्षणिकत्व बुद्धिको भी प्रमाणित करनेके लिये बुद्ध्यन्तरकी अपेक्षा होगी और फिर उस बुद्धिके लिये दूसरी बुद्धिकी, इस प्रकार अनवस्था दोष होगा; अतः उन्हें क्षणिकत्वादि बुद्धिको स्वतःप्रमाण मानना पड़ेगा। ऐसी दशामें सादृश्य बुद्धि भी प्रत्यभिज्ञा होनेसे क्षणिक ही हुई, इस प्रकार कहीं भी विश्वास न होगा।

२. 'तत्' और 'इदम्' ये दोनों बुद्धियाँ दो क्षणोंमें होती हैं, एक बुद्धि दूसरे क्षणमें रह नहीं सकती, अतः उसके स्वरूपका तिरोधान न हो जाय इसके लिये उन दोनोंका एक कर्ता (द्रष्टा) में सामानाधिकरण्येन सम्बन्ध मानना चाहिये। परंतु क्षणिक विज्ञानवादीके मतमें दो क्षणोंमें रहनेवाला कोई एक द्रष्टा है नहीं; अतः उन बुद्धियोंका सम्बन्ध असम्भव ही है।

ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थे ५५

ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थे ५५


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
यत्त्वे सादृश्यग्रहणानुपपत्तिः। <br><br> असत्येव सादृश्ये तद्बुद्धिरिति चेन्न, तदिदम्बुद्धयोरपि सादृश्य-बुद्धिवदसद्विषयत्वप्रसङ्गात्। <br><br> असद्विषयत्वमेव सर्वबुद्धीनामस्त्विति चेन्न, बुद्धिवुद्धेरप्यसद्विषयत्व-प्रसङ्गात्। <br><br> तदप्यस्त्विति चेन्न, सर्वबुद्धीनां मृषात्वेऽसत्यबुद्ध्य-नुपपत्तेः। <br><br> तस्मादसदेतत्सादृश्या-त्तद्बुद्धिरिति। <br><br> अतः सिद्धः प्राक्कार्योत्पत्तेः कारणसद्भावः। <br><br> कार्यस्य चाभिव्यक्तिलिङ्ग- <br> (कार्यसद्भाव-साधनम्) <br> त्वात्। कार्यस्य च सद्भावः प्रागुत्पत्तेःइन बुद्धियोंके विषय भिन्न-भिन्न न हों तबतक इनकी सदृशताका भी ग्रहण नहीं हो सकता। यदि ऐसा मानें कि विषयकी सदृशता न होनेपर भी 'यह वही है' ऐसी बुद्धि होती है तो यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि ऐसी अवस्थामें सादृश्य-बुद्धिके समान तद् और इदं-बुद्धियाँ भी असद्विषयक [अर्थात् क्षणिक या भ्रान्त] सिद्ध होंगी। यदि कहो कि सभी बुद्धियोंकी असद्वि-षयता (मिथ्यात्व) ही होने दो, तो यह भी ठीक नहीं; क्योंकि तब तो बुद्धि-बुद्धिके भी मिथ्या होनेका प्रसंग उपस्थित होगा। यदि कहो, अच्छा ऐसा ही हो, तो यह भी उचित नहीं; क्योंकि इस प्रकार जब सभी बुद्धियाँ मिथ्या होंगी तो असत्यबुद्धिका होना सम्भव नहीं होगा।^१ अतः सादृश्यसे 'यह वही है' ऐसी प्रत्यभिज्ञा होती है—यह कहना ठीक नहीं है। इसलिये कार्यकी उत्पत्तिसे पूर्व कारणकी सत्ता सिद्ध ही है। <br><br> कार्यकी भी सत्ता है, क्योंकि वह अभिव्यक्तिरूप लिङ्गवाला है। उत्पत्तिसे पूर्व कार्यकी भी सत्ता

१. क्योंकि यह सब असत् यानी शून्यरूप है—ऐसा ज्ञान तो सत्य बुद्धिसे ही हो सकता है। सत्ताशून्य बुद्धि असत्‌का भी ग्रहण कैसे करेगी?

५६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १

५६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

| सिद्धः। कथमभिव्यक्तिलिङ्गत्वादभिव्यक्तिलिङ्गमस्येति। अभिव्यक्तिः साक्षाद्विज्ञानालम्बनत्वप्राप्तिः। यद्धि लोके प्रावृतं तम आदिना घटादिवस्तु तदालोकादिना प्रावरणतिरस्कारेण विज्ञानविषयत्वं प्राप्नुवत्प्राक्सद्भावं न व्यभिचरति। तथेदमपि जगत्प्रागुत्पत्तेरित्यवगच्छामः। न ह्यविद्यमानो घट उदितेऽप्यादित्ये उपलभ्यते। | सिद्ध होती है। किस प्रकार?--अभिव्यक्तिरूप लिङ्गवाला होनेसे, क्योंकि अभिव्यक्ति ही कार्यका लिङ्ग है। साक्षात् विज्ञानालम्बनत्वको प्राप्त होनेका नाम 'अभिव्यक्ति' है। लोकमें जो घट आदि पदार्थ अन्धकारादिसे आच्छादित होता है वही उस आवरणका प्रकाशादिसे तिरस्कार होनेपर विज्ञानकी विषयताको प्राप्त होकर अपनी पूर्वकालिक सत्ताका त्याग नहीं करता। इससे हमें मालूम होता है कि इसी प्रकार उत्पत्तिसे पूर्व यह जगत् भी था; क्योंकि जो घट विद्यमान नहीं होता, उसकी उपलब्धि सूर्यके उदित होनेपर भी नहीं होती। | | न, तेऽविद्यमानत्वाभावादुपलभ्येतैवेति चेत्। न हि तव घटादिकार्यं कदाचिदप्यविद्यमानमित्युदिते आदित्ये उपलभ्येतैव मृत्पिण्डेऽसन्निहिते तमआद्यावरणे चासति विद्यमानत्वादिति चेत् ? | पूर्व०—ऐसी बात नहीं है। यदि तुम्हारे मतमें कार्य अविद्यमान नहीं है तो उसकी उपलब्धि होनी ही चाहिये। तुम्हारे मतानुसार घटादि कार्य कभी अविद्यमान तो है नहीं, इसलिये जब मृत्पिण्डकी सन्निधि न हो, और अन्धकारादिका आवरण भी न हो, उस समय सूर्योदय होनेपर उसकी उपलब्धि होनी ही चाहिये, क्योंकि वह विद्यमान ही है। |

| ब्राह्मण २ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ५७ |

ब्राह्मण २ ]शाङ्करभाष्यार्थ५७
संस्कृत मूलहिन्दी अनुवाद
न, द्विविधत्वादावरणस्य । घटादिकार्यस्य द्विविधं ह्यावरणं मृदादेरभिव्यक्तस्य तमःकुड्यादि प्राङ्‌मृदोऽभिव्यक्तेर्मृदाद्यवयवानां पिण्डादिकार्यान्तररूपेण संस्थानम् । तस्मात्प्रागुत्पत्तेर्विद्यमानस्यैव घटादिकार्यस्य आवृतत्वाद-नुपलब्धिः । नष्टोत्पन्नभावाभाव-शब्दप्रत्ययभेदस्तु अभिव्यक्ति-तिरोभावयोर्द्विविधत्वापेक्षः ।सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि आवरण दो प्रकारका है । मृत्तिकादिसे अभिव्यक्त होनेवाले घटादि कार्यका आवरण दो प्रकारका है—( १ ) अन्धकार और भित्ति आदि तथा ( २ ) मृत्तिकासे घटकी अभिव्यक्ति होनेसे पूर्व उस मृत्तिकादिके अवयवोंका पिण्डादि कार्यान्तरके रूपमें स्थित रहना । अतः उत्पत्तिसे पूर्व घटादि विद्यमान कार्यकी ही, आवृत होनेके कारण, उपलब्धि नहीं होती । नष्ट होना, उत्पन्न होना, रहना, न रहना इत्यादि शब्द और प्रत्ययोंका भेद तो अभिव्यक्ति और तिरोभाव इनकी द्विविधताकी अपेक्षासे है ।
पिण्डकपालादेरावरणवैलक्ष-ण्यादयुक्तमिति चेत् ? तमःकुड्यादि हि घटाद्यावरणं घटादिभिन्न-देशं दृष्टं न तथा घटादिभिन्न-देशे दृष्टे पिण्डकपाले । तस्मात् पिण्डकपालसंस्थानयोर्विद्यमान-स्यैव घटस्यावृतत्वाद् अनुपलब्धि-पूर्व०—किंतु पिण्ड और कपालादि तो आवरणसे भिन्न प्रकारके होते हैं, इसलिये उन्हें आवरण कहना उचित नहीं है । अन्धकार और भित्ति आदि जो घटादिके आवरण हैं, वे तो घटादिसे भिन्न देशमें देखे जाते हैं, किंतु इस प्रकार, पिण्ड और कपाल घटादिसे भिन्न देशमें नहीं देखे जाते । अतः यह कहना ठीक नहीं है कि पिण्ड और कपालके संस्थान (स्वरूप) में विद्यमान ही घटादिकी आवृत

५८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

५८बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

| रित्ययुक्तम् आवरणधर्मवैलक्षण्यादिति चेत् ? | होनेके कारण उपलब्धि नहीं होती, क्योंकि आवरणके धर्मोंसे उनमें विलक्षणता है—यदि ऐसा कहें तो ? | | न, क्षीरोदकादेः क्षीराद्यावरणेनैकदेशत्वदर्शनात् । घटादिकार्ये कपालचूर्णाद्यवयवानामन्तर्भावादनावरणत्वमिति चेन्न, विभक्तानां कार्यान्तरत्वादावरणत्वोपपत्तेः । | सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि दूधमें मिले हुए जलादिकी अपने आवरण दुग्धादिके साथ एकदेशता देखी जाती है। यदि कहो कि घटादि कार्यमें उसके कपाल एवं चूर्णादि अवयवोंका अन्तर्भाव हो जाता है, इसलिये उनका आवरण है ही नहीं—तो यह ठीक नहीं, क्योंकि विभक्त होनेपर कार्यान्तर होनेके कारण उन्हें आवरण मानना ठीक ही है। | | आवरणाभाव एव यत्नः कर्तव्य इति चेत् ? पिण्डकपालावस्थयोर्विद्यमानमेव घटादिकार्यमावृतत्वान्नोपलभ्यत इति चेद् घटादिकार्यार्थिना तदावरणविनाश एव यत्नः कर्तव्यो न घटाद्युत्पत्तौ; न चैतदस्ति, तस्माद्युक्तं विद्यमानस्यैवावृतत्वादनुपलब्धिरिति चेत् ? | **पूर्व०—**तब तो आवरणकी निवृत्ति करनेका ही प्रयत्न करना चाहिये। यदि तुम्हारे कथनानुसार पिण्ड और कपालकी अवस्थाओंमें वर्तमान घटादि कार्य ही आवृत होनेके कारण उपलब्ध नहीं होता तब तो जिसे घटादि कार्यकी आवश्यकता हो उसे उसके आवरणका नाश करनेका ही यत्न करना चाहिये, घटादिकी उत्पत्तिका नहीं; किंतु ऐसा किया नहीं जाता, इसलिये यह कहना उचित नहीं है कि आवृत होनेके कारण विद्यमान घटादिकी ही उपलब्धि नहीं होती—ऐसा कहें तो ? |