बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 46, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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वातः प्राणो व्यात्तमग्निर्वैश्वानरः संवत्सर आत्माश्वस्य मेध्यस्य । द्यौः पृष्ठमन्तरिक्षमुदरं पृथिवी पाजस्यं दिशः पार्श्वे अवान्तरदिशः पर्शव ऋतवोऽङ्गानि मासाश्चार्धमासाश्च पर्वाण्यहोरात्राणि प्रतिष्ठा नक्षत्राण्यस्थीनि नभो मांसानि । ऊवध्यं सिकताः सिन्धवो गुदा यकृच्च क्लोमानश्च पर्वता ओषधयश्च वनस्पतयश्च लोमान्युद्यन्पूर्वार्धो निम्लोचञ्जघनार्धो यद्विजृम्भते तद्विद्योतते यद्विधूनुते तत्स्तनयति यन्मेहति तद्वर्षति वागेवास्य वाक् ॥ १ ॥
ॐ उषा (ब्राह्ममुहूर्त्त) यज्ञसम्बन्धी अश्वका शिर है, सूर्य नेत्र है, वायु प्राण है, वैश्वानर अग्नि खुला हुआ मुख है और संवत्सर यज्ञीय अश्वका आत्मा है। द्युलोक उसका पीठ है, अन्तरिक्ष उदर है, पृथिवी पैर रखनेका स्थान है, दिशाएँ पार्श्वभाग हैं, अवान्तर दिशाएँ पसलियाँ हैं, ऋतुएँ अङ्ग हैं, मास और अर्द्धमास पर्व (सन्धिस्थान) हैं, दिन और रात्रि प्रतिष्ठा (पाद) हैं, नक्षत्र अस्थियाँ हैं, आकाश (आकाशस्थित मेघ) मांस हैं, बालू ऊवध्य (उदरस्थित अर्धपक्व अन्न) है, नदियाँ नाडी हैं, पर्वत यकृत् (जिगर) और हृदयगत मांसखण्ड हैं, ओषधि और वनस्पतियाँ लोम हैं, ऊपरकी ओर जाता हुआ सूर्य नाभिसे ऊपरका भाग और नीचेकी ओर जाता हुआ सूर्य कटिसे नीचेका भाग है। उसका जमुहाई लेना बिजलीका चमकना है और शरीर हिलाना मेघका गर्जन है। वह जो मूत्र त्याग करता है वही वर्षा है और वाणी ही उसकी वाणी है॥ १ ॥
| उषा इति, ब्राह्मो मुहूर्त उषाः । | ‘उषा वा’ इत्यादि। ब्राह्ममुहूर्तका नाम उषा है। | | वैशब्दः स्मरणार्थः प्रसिद्धं कालं स्मारयति । | ‘वै’ शब्द स्मरण करानेके लिये है। यह प्रसिद्ध काल-का स्मरण कराता है। | | शिरः प्राधान्यात् । | वह प्रसिद्ध उषाकाल प्रधान होनेके कारण |