भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 47, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 47

ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ४१


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
शिरश्च प्रधानं शरीरावयवानाम् ।<br><br>अश्वस्य मेध्यस्य मेधार्हस्य यज्ञियस्योषाः शिर इति सम्बन्धः ।<br><br>कर्माङ्गस्य पशोः संस्कर्तव्यत्वात् कालादिदृष्टयः शिर आदिषु क्षिप्यन्ते । प्राजापत्यत्वं च प्रजापतिदृष्ट्यध्यारोपणात् । काल-लोकदेवतात्वाध्यारोपणं च प्रजापतित्वकरणं पशोः । एवंरूपो हि प्रजापतिः, विष्णुत्वादिकरणमिव प्रतिमादौ ।शिर है। शिर भी शरीरके अवयवोंमें प्रधान है। अतः मेध्य—मेधार्ह (यज्ञार्ह) यानी यज्ञसम्बन्धी अश्वका उषा शिर है—ऐसा इसका अन्वय है। कर्मके अङ्गभूत पशुका संस्कार किया जाना चाहिये, इसलिये उसके शिर आदिमें कालादिदृष्टियाँ की जाती हैं। उसमें प्रजापति-दृष्टिका अध्यारोप किया जाता है, इसीसे यह प्राजापत्य (प्रजापतिदेवतासम्बन्धी) है। काल, लोक और देवत्वका आरोप करना ही पशुका प्रजापतित्व सम्पादन करना है। जिस प्रकार प्रतिमादिमें विष्णुत्वादिकी प्रतिष्ठा की जाती है उसी प्रकार यह उक्तरूपसे प्रजापति है।
सूर्यश्चक्षुः शिरसोऽनन्तरत्वात् सूर्याधिदैवतत्वाच्च । वातः प्राणो वायुस्वाभाव्यात् । व्यात्तं विवृतं मुखमग्निर्वैश्वानरः । वैश्वानर इत्यग्नेर्विशेषणम् । वैश्वानरो नामाग्निर्विवृतं मुखमित्यर्थो मुखस्याग्निदैवतत्वात् । संवत्सर आत्मा, संवत्सरो द्वादशमासस्त्रि-[जिस प्रकार उषाके अनन्तर सूर्य दिखायी देता है उसी प्रकार] शिरके अनन्तर नेत्र हैं और सूर्य ही नेत्रोंका अभिमानी देव है, इसलिये सूर्य उसका नेत्र है। वायु प्राण है, क्योंकि वह वायुके-से स्वभाववाला है। वैश्वानर अग्नि व्यात्त यानी खुला हुआ मुख है। 'वैश्वानर' यह अग्निका विशेषण है। अर्थात् वैश्वानर अग्नि उसका खुला हुआ मुख है; क्योंकि मुखका अधिष्ठातृदेव अग्नि ही है। संवत्सर आत्मा है; संवत्सर बारह या तेरह महीनेका होता है,