बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
८६२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| ८६२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
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| भोग्यत्वादेव। तदेतदन्नं चात्ता चैकं मिथुनं स्वप्ने। कथम् ? तयोरेष इन्द्राण्या इन्द्रस्य चैष संस्तवः, सम्भूय यत्र संस्तवं कुर्वाते अन्योन्यं स एष संस्तवः। कोऽसौ ? य एषोऽन्तर्हृदय आकाशः, अन्तर्हृदये हृदयस्य मांसपिण्डस्य मध्ये। | कारण विराट् अन्न है। वह यह अन्न और अत्ता स्वप्नमें एक मिथुन होते हैं। किस प्रकार ? उन इन्द्राणी और इन्द्रका यह संस्ताव है; जहाँ दोनों मिलकर एक-दूसरेका संस्तव (प्रशंसा) करते हैं, वह संस्ताव कहलाता है। वह संस्ताव क्या है ? जो कि यह हृदयान्तर्गत आकाश है। अन्तर्हृदयमें अर्थात् मांसपिण्डरूप हृदयके भीतर। |
| अथैनयोरेतद् वक्ष्यमाणमन्नं भोज्यं स्थितिहेतुः; किं तत् ? य एषोऽन्तर्हृदये लोहितपिण्डो लोहित एव पिण्डाकारापन्नो लोहितपिण्डः। अन्नं जग्धं द्वेधा परिणमते; यत् स्थूलं तदधो गच्छति; यदन्यत्तत् पुनरग्निना पच्यमानं द्वेधा परिणमते—यो मध्यमो रसः स लोहितादिक्रमेण पाञ्चभौतिकं पिण्डं शरीरमुपचिनोति, योऽणिष्ठो रसः स लोहितपिण्ड इन्द्रस्य लिङ्गात्मनो हृदये मिथुनीभूतस्य, यं तैजसमाच- | और इन दोनोंका यह आगे कहा जानेवाला अन्न-भोज्य यानी स्थितिका हेतु है, वह क्या है ? जो कि यह हृदयके भीतर लोहितपिण्ड है—पिण्डाकारको प्राप्त हुआ लोहित ही लोहितपिण्ड है। खाया हुआ अन्न दो प्रकारसे परिणत होता है; जो स्थूल होता है, वह नीचे चला जाता है और जो दूसरे प्रकारका होता है, वह पुनः अग्निसे पचाया जाकर दो प्रकारसे परिणत हो जाता है—जो मध्यम रस होता है, वह लोहितादि क्रमसे पाञ्चभौतिक पिण्डरूप शरीरको पुष्ट बनाता है और जो सूक्ष्मतम रस होता है, वह हृदयमें मिथुनभावको प्राप्त हुए लिङ्गात्मा इन्द्रका यह लोहितपिण्ड है, जिसे तैजस कहते |
ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८६३
ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८६३
| शाङ्करभाष्य | भाष्यार्थ |
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| क्षते । स तयोरिन्द्रेन्द्राण्योर्हृदये मिथुनीभूतयोःसूक्ष्मासु नाडीष्वनुप्रविष्टः स्थितिहेतुर्भवति; तदेतदुच्यते—अथैनयोरेतदन्नमित्यादि । | हैं। वह सूक्ष्म नाड़ियोंमें अनुप्रविष्ट होकर हृदयमें मिथुनभावको प्राप्त हुए उन इन्द्र और इन्द्राणीकी स्थितिका कारण होता है; यही बात 'अथैनयोरेतदन्नम्' इत्यादि वाक्यसे कही जाती है। |
| किञ्चान्यत्, अथैनयोरेतत् प्रावरणम्; भुक्तवतोः स्वपतोश्च प्रावरणं भवति लोके, तत्सामान्यं हि कल्पयति श्रुतिः; किं तदिह प्रावरणम् ? यदेतदन्तर्हृदये जालकमिव—अनेकनाडीच्छिद्रबहुलत्वाज्जालकमिव । | इसके सिवा दूसरी बात यह है—यही इन दोनोंका प्रावरण है। लोकमें भोजन करनेवालों और सोनेवालोंका प्रावरण (आच्छादन) होता है, श्रुति उसीकी समानताकी कल्पना करती है। यहाँ वह प्रावरण क्या है ? यह जो हृदयके भीतर जाल-सा है—अनेक नाड़ीछिद्रोंकी बहुलता होनेके कारण जालके समान है। |
| अथैनयोरेषा सृतिर्मार्गः, सञ्चरतोऽनयेति सञ्चरणी, स्वप्नाज्जागरितदेशागमनमार्गः; का सा सृतिः ? यैषा हृदयाद् हृदयदेशादूर्ध्वाभिमुखी सती उच्चरति नाडी; तस्याः परिमाणमिदमुच्यते—यथा लोके केशः सहस्रधा भिन्नोऽत्यन्तसूक्ष्मो भवति, एवं सूक्ष्मा अस्य देहस्य सम्बन्धिन्यो हिता नाम हिता इत्येवं ख्याता नाड्यः; ताश्चान्तर्हृदये मांसपिण्डे | और यह इनकी सृति यानी मार्ग है; इससे संचार करते हैं, इसलिये यह सञ्चरणी अर्थात् स्वप्नसे जागरित देशमें आनेका मार्ग है। वह मार्ग क्या है ? जो कि यह हृदयसे—हृदयदेशसे ऊपरकी ओर नाडी जाती है; यह उसका परिमाण बतलाया जाता है—लोकमें जिस प्रकार सहस्रों भागोंमें बाँटा हुआ केश अत्यन्त सूक्ष्म हो जाता है, इसी प्रकार इस देहसे सम्बन्ध रखनेवाली ये हिता-हिता नामसे विख्यात नाड़ियाँ सूक्ष्म होती हैं, तथा ये हृदयके भीतर मांस-पिण्डमें |
८६४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| ८६४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| प्रतिष्ठिता भवन्ति; हृदयाद् विप्ररूढास्ताः सर्वत्र कदम्बकेसरवत्; एताभिर्नाडीभिरत्यन्तसूक्ष्माभिरेतदन्नमास्रवद् गच्छदास्रवति गच्छति ।<br><br>तदेतद् देवताशरीरमनेनान्नेन दामभूतेनोपचीयमानं तिष्ठति; तस्माद् यस्मात् स्थूलेनान्नेनोपचितः पिण्डः, इदं तु देवताशरीरं लिङ्गं सूक्ष्मेणान्नेनोपचितं तिष्ठति। पिण्डोपचयकरमप्यन्नं प्रविविक्तमेव मूत्रपुरीषादिस्थूलमपेक्ष्य लिङ्गस्थितिकरं त्वन्नं ततोऽपि सूक्ष्मतरम्; अतः प्रविविक्ताहारः पिण्डः; तस्मात् प्रविविक्ताहारादपि प्रविविक्ताहारतर एष लिङ्गात्मा इवैव भवति । अस्माच्छरीराच्छरीरमेव शारीरं तस्माच्छारीरादात्मनो वैश्वानरात्तैजसः सूक्ष्मान्नेनोपचितो भवति ॥ ३ ॥ | प्रतिष्ठित हैं; कदम्ब-पुष्पकी केसरके समान ये हृदयसे सब ओर फैली हुई हैं; इन अत्यन्त सूक्ष्म नाड़ियोंसे जाता हुआ यह अन्न [ शरीरमें सर्वत्र ] जाता है ।<br><br>वह यह देवताशरीर इस रज्जुभूत अन्नसे बढ़ता ( पुष्टि पाता ) रहता है; अतः चूँकि पिण्ड स्थूल अन्नसे वृद्धिको प्राप्त होता है, यह देवताशरीररूप लिङ्गदेह सूक्ष्म अन्नसे वृद्धिको प्राप्त होता हुआ स्थित रहता है । मलमूत्रादि स्थूल भागकी अपेक्षा तो पिण्डकी वृद्धि करनेवाला अन्न भी सूक्ष्म ही है; उससे भी लिङ्गदेहकी स्थिति करनेवाला अन्न तो अत्यन्त सूक्ष्मतर है । अतः पिण्ड सूक्ष्माहारी है, उस सूक्ष्माहारीसे भी यह लिङ्गात्मा सूक्ष्मतर आहार करनेवाला ही है । इस शरीरसे—शरीर ही शारीर है, उस शारीर आत्मा वैश्वानरसे तैजस अधिक सूक्ष्म अन्नद्वारा उपचित होता है ॥ ३ ॥ |
प्राणात्मभूत विद्वान्की सर्वात्मकताका वर्णन, जनककी अभयप्राप्ति और याज्ञवल्क्यके प्रति आत्मसमर्पण
| स एष हृदयभूतस्तैजसः सूक्ष्मभूतेन प्राणेन विध्रियमाणः प्राण एव भवति । | वह यह हृदयभूत तैजस सूक्ष्मभूत प्राणसे धारण किया जाकर प्राण ही हो जाता है । |
ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ८६५
ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ८६५
तस्य प्राची दिक् प्राञ्चः प्राणा दक्षिणा दिग् दक्षिणे प्राणाः प्रतीची दिक् प्रत्यञ्चः प्राणा उदीची दिगुदञ्चः प्राणा ऊर्ध्वा दिगूर्ध्वाः प्राणा अवाची दिग्वाञ्चः प्राणाः सर्वा दिशः सर्वे प्राणाः स एष नेति नेत्यात्मागृह्यो न हि गृह्यतेऽशीर्यो न हि शीर्यतेऽसङ्गो न हि सज्यतेऽसितो न व्यथते न रिष्यत्यभयं वै जनक प्राप्तोऽसीति होवाच याज्ञवल्क्यः । स होवाच जनको वैदेहोऽभयं त्वा गच्छताद् याज्ञवल्क्य यो नो भगवन्नभयं वेदयसे नमस्तेऽस्त्विमे विदेहा अयमहमस्मि ॥ ४ ॥
उस विद्वान्के पूर्व दिशा पूर्व प्राण हैं, दक्षिण दिशा दक्षिण प्राण हैं, पश्चिम दिशा पश्चिम प्राण हैं, उत्तर दिशा उत्तर प्राण हैं, ऊपरकी दिशा ऊपरके प्राण हैं, नीचेकी दिशा नीचेके प्राण हैं और सम्पूर्ण दिशाएँ सम्पूर्ण प्राण हैं। वह यह 'नेति-नेति' रूपसे वर्णन किया हुआ आत्मा अगृह्य है, वह ग्रहण नहीं किया जाता; वह अशीर्य है, शीर्ण (नष्ट) नहीं होता, असङ्ग है, उसका सङ्ग नहीं होता; वह अबद्ध है, व्यथित नहीं होता और क्षीण नहीं होता। हे जनक ! तू निश्चय अभयको प्राप्त हो गया है—ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा। उस विदेहराज जनकने कहा, 'हे भगवन् याज्ञवल्क्य ! जिन आपने मुझे अभय ब्रह्मका ज्ञान कराया है, उन आपको अभय प्राप्त हो, आपको नमस्कार हो, ये विदेह देश और यह मैं आपके अधीन हैं ॥४॥
| तस्यास्य विदुषः क्रमेण वैश्वानरात्तैजसं प्राप्तस्य हृदयात्मानमापन्नस्य हृदयात्मनश्च प्राणात्मानमापन्नस्य प्राची दिक् प्राञ्चः प्राग्गताः प्राणाः, तथा दक्षिणा दिग् दक्षिणे प्राणाः, तथा प्रतीची | क्रमशः वैश्वानरसे तैजसको, उससे हृदयात्माको और हृदयात्मासे प्राणात्मभावको प्राप्त हुए उस इस विद्वान्के प्राची दिशा पूर्वगत प्राण हैं तथा दक्षिण दिशा दक्षिण प्राण |
बृ० उ० ५५—
८६६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| ८६६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
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| दिक् प्रत्यञ्चः प्राणाः, उदीची दिगुदञ्चः प्राणाः, ऊर्ध्वा दिगूर्ध्वाः प्राणाः, अवाची दिग्वाञ्चः प्राणाः, सर्वा दिशः सर्वे प्राणाः । | हैं; इसी प्रकार पश्चिम दिशा पश्चिम प्राण हैं, उत्तर दिशा उत्तर प्राण हैं, ऊर्ध्व दिशा ऊर्ध्व प्राण हैं; नीचेकी दिशा नीचेके प्राण हैं और सम्पूर्ण दिशाएँ सम्पूर्ण प्राण हैं। |
| एवं विद्वान् क्रमेण सर्वात्मकं प्राणमात्मत्वेनोपगतो भवति । तं सर्वात्मानं प्रत्यगात्मन्युपसंहृत्य द्रष्टुर्हि द्रष्टृभावं नेति नेत्यात्मानं तुरीयं प्रतिपद्यते । यमेष विद्वाननेन क्रमेण प्रतिपद्यते, स एष नेति नेत्यात्मेत्यादि न रिष्यतीत्यन्तं व्याख्यातमेतत् । | इस प्रकार विद्वान् क्रमशः सर्वात्मक प्राणको आत्मभावसे प्राप्त हो जाता है । उस सर्वात्माका प्रत्यगात्मामें उपसंहार कर द्रष्टाके द्रष्टृभाव अर्थात् ‘नेति नेति’ इस प्रकार निर्देश किये गये तुरीय आत्माको प्राप्त हो जाता है । इस क्रमसे यह विद्वान् जिसे प्राप्त होता है, वह यह ‘नेति नेति’ इस प्रकार निर्देश किया गया आत्मा है । ‘नेति नेति आत्मा’ इससे लेकर ‘न रिष्यति’ यहाँतककी व्याख्या पहले की जा चुकी है। |
| अभयं वै जन्ममरणादिनिमित्तभयशून्यं हे जनक प्राप्तोऽसि, इति हैवं किलोवाचोक्तवान् याज्ञवल्क्यः । तदेतदुक्तम् । अथ वै तेऽहं तद् वक्ष्यामि यत्र गमिष्यसीति । | हे जनक ! तू अभयको अर्थात् जन्म-मरणादिशून्य ब्रह्मको प्राप्त हो गया है—ऐसा निश्चय ही याज्ञवल्क्यने कहा। इस प्रकार यह कहा गया। अब तुझे यह बतलाता हूँ जहाँ कि तू जायगा। |
| स होवाच जनको वैदेहोऽभयमेव त्वा त्वामपि गच्छताद् गच्छतु यस्त्वं नोऽस्मान् हे याज्ञवल्क्य भगवन् पूजावन् अभयं ब्रह्म वेदयसे ज्ञापयसि प्रापितवानुपाधिकृताज्ञानव्यवधानापनयनेन इत्यर्थः । | उस वैदेह जनकने कहा—हे भगवन्-पूज्य याज्ञवल्क्य ! जो आप हमें अभय ब्रह्मका ज्ञान करा रहे हैं, अर्थात् उपाधिकृत अज्ञानरूप पर्देको हटाकर ब्रह्मकी प्राप्ति करा रहे हैं, उन आपको भी अभय ही प्राप्त |
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थे ८६७
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थे ८६७
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| किमन्यदहं विद्यानिष्क्रयार्थं प्रयच्छामि, साक्षादात्मानमेव दत्तवते; अतो नमस्तेऽस्तु इमे विदेहास्तव यथेष्टं भुज्यन्ताम्; अयं चाहमस्मि दासभावे स्थितः; यथेष्टं मां राज्यं च प्रतिपद्यस्वेत्यर्थः ॥ ४ ॥ | हो । साक्षात् आत्माका ही दान करनेवाले आपको मैं इस विद्याके बदलेमें और क्या दूँ ? इसलिये आपको नमस्कार है; यह विदेह-राज्य आपका ही है, आप इसका यथेच्छ भोग करें और यह मैं भी आपके दासभावमें स्थित हूँ; तात्पर्य यह है कि मुझे और इस राज्यको आप इच्छानुसार प्राप्त करें ॥ ४ ॥ |
इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये चतुर्थाध्याये
द्वितीयं कूर्चब्राह्मणम् ॥ २ ॥
तृतीय ब्राह्मण
</div>| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| [उपक्रमः] जनकं ह वैदेहं याज्ञवल्क्यो जगामेत्यस्याभिसम्बन्धः ।<br><br>सम्बन्धः । विज्ञानमय आत्मा साक्षादपरोक्षाद् ब्रह्म सर्वान्तरः पर एव—'नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा नान्यदतोऽस्ति द्रष्टृ' इत्यादिश्रुतिभ्यः ।<br><br>स एष इह प्रविष्टो वदनादिलिङ्गः, अस्ति व्यतिरिक्त इति मधुकाण्डेऽजातशत्रुसंवादे प्राणादिकर्तृत्व- | 'जनकं ह वैदेहं याज्ञवल्क्यो जगाम' इत्यादि रूपसे आरम्भ होनेवाले ब्राह्मणका सम्बन्ध इस प्रकार है—विज्ञानमय आत्मा साक्षात् अपरोक्ष सर्वान्तर परब्रह्म ही है; जैसा कि 'इससे भिन्न कोई द्रष्टा नहीं है, इससे भिन्न कोई द्रष्टृ नहीं है' इत्यादि श्रुतियोंसे सिद्ध होता है । इस देहमें प्रविष्ट वह भाषणादि लिङ्गवाला विज्ञानात्मा शरीरसे भिन्न है—ऐसा मधुकाण्डमें अजातशत्रुके संवादमें [ गार्ग्य और काश्यके प्रश्नमें ] प्राणादिके कर्तृत्व- |
८६८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४
| ८६८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४ |
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| भोक्तृत्वप्रत्याख्यानेनाधिगतोऽपि सन् पुनः प्राणनादिलिङ्गसमुपन्यस्य औषस्तप्रश्ने प्राणनादिलिङ्गो यः सामान्येनाधिगतः 'प्राणेन प्राणिति' इत्यादिना, 'दृष्टेर्द्रष्टा' इत्यादिना ऽलुप्तशक्तिस्वभावोऽधिगतः । | भोक्तृत्वके निराकरणद्वारा ज्ञात होनेपर भी फिर औषस्त (उषस्त चाक्रायण) के प्रश्नमें जो 'प्राणसे प्राणन करता है' इत्यादि वाक्यद्वारा प्राणनादि लिङ्गका उपन्यास कर सामान्यरूपसे प्राणनादि लिङ्गवाला जाना गया है, वही 'दृष्टिका द्रष्टा है' इत्यादि वाक्यसे अलुप्तशक्तिस्वभाव ज्ञात हुआ है। | | तस्य च परोपाधिनिमित्तः संसारः—यथा रज्जूरूषरशुक्तिकागगनादिषु सर्पोदकरजतमलिनत्वादि पराध्यारोपणनिमित्तमेव, न स्वतः, तथा । | उसे [अज्ञान और उसके कार्य अन्तःकरणादि इस] अन्य उपाधिके कारण संसारकी प्राप्ति हुई है, जिस प्रकार कि रज्जु, ऊसर, शुक्ति और आकाशादिमें सर्प, जल, रजत और मलिनता आदिकी प्रतीति दूसरोंके आरोप करनेके कारण ही है, स्वतः नहीं, उसी प्रकार [यहाँ समझना चाहिये]। | | निरुपाधिको निरुपाख्यो नेति नेतीति व्यपदेश्यः साक्षादपरोक्षात् सर्वान्तर आत्मा ब्रह्माक्षरमन्तर्यामी प्रशास्ता औपनिषदः पुरुषो विज्ञानमानन्दं ब्रह्मेत्यधिगतम् । तदेव पुनरिन्धसंज्ञः प्रविविक्ताहारः, ततोऽन्तर्हृदये लिङ्गात्मा प्रविविक्ताहारतरः; ततः | इस प्रकार निरुपाधिक, निरुपाख्य (मन और वाणीका अविषय), 'नेति नेति' इस वाक्यसे निर्देश्य, साक्षात् अपरोक्ष, सर्वान्तर आत्मा, ब्रह्म, अक्षर, अन्तर्यामी, प्रशास्ता, औपनिषद पुरुष विज्ञान-आनन्दरूप ब्रह्म है—यह ज्ञात हुआ। वही फिर सूक्ष्माहार करनेवाला इन्धसंज्ञक वैश्वानर, फिर उससे भी सूक्ष्मतर आहार करनेवाला हृदयान्तर्वर्ती लिङ्गात्मा और फिर उससे भी |
| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ८६९ |
| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ८६९ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
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| परेण जगदात्मा प्राणोपाधिः, ततोऽपि प्रविलाप्य जगदात्मानमुपाधिभूतं रज्ज्वादाविव सर्पादिकं विद्यया, 'स एष नेति नेति' इति साक्षात् सर्वान्तरं ब्रह्माधिगतम् । एवमभयं परिप्रापितो जनको याज्ञवल्क्येनागमतः संक्षेपतः । | सूक्ष्म प्राणोपाधिक जगदात्मा जाना गया । फिर रज्जु आदिमें सर्पादिके समान उपाधिभूत जगदात्माका भी ज्ञानद्वारा लय करके 'स एष नेति नेति' इस वाक्यद्वारा साक्षात् सर्वान्तर ब्रह्म जाना गया है । इस प्रकार संक्षेपतः शास्त्रद्वारा याज्ञवल्क्यसे जनक अभयको प्राप्त कराया गया है । |
| अत्र च जाग्रत्स्वप्नसुषुप्ततुरीयाण्युपन्यस्तान्यन्यप्रसङ्गेन—इन्धः, प्रविविक्ताहारतरः, सर्वे प्राणाः, स एष नेति नेतीति । इदानीं जाग्रत्स्वप्नादिद्वारेणैव महता तर्केण विस्तरतोऽधिगमः कर्तव्यः, अभयं प्रापयितव्यम्, सद्भावश्चात्मनो विप्रतिपत्त्याशङ्कानिराकरणद्वारेण—व्यतिरिक्तत्वं शुद्धत्वं स्वयंज्योतिष्ट्वमलुप्तशक्तिस्वरूपत्वं निरतिशयानन्दस्वाभाव्यम् अद्वैतत्वं चाधिगन्तव्यम्—इतीदमारभ्यते । आख्यायिका तु विद्यासम्प्रदानग्रहणविधिप्रकाशनार्था, विद्यास्तुतये च विशेषतः, वरदानादिसूचनात् । | यहाँ (द्वितीय ब्राह्मणमें) [उपासककी क्रममुक्तिरूप] अन्य प्रसङ्गसे 'इन्धः' 'प्रविविक्ताहारतरः' 'सर्वे प्राणाः' 'स एष नेति नेति' इत्यादि रूपसे जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीयका उल्लेख किया गया है । अब जाग्रत्, स्वप्नादिके द्वारा ही महान् तर्कसे उसका विस्तारपूर्वक बोध और अभय प्राप्त कराना है तथा विपरीत ज्ञानकी आशङ्काके निराकरणद्वारा आत्माके अस्तित्व, देहादिसे भिन्नत्व, शुद्धत्व, स्वयंप्रकाशत्व, अलुप्तशक्तिस्वरूपत्व, निरतिशयानन्दस्वभावत्व और अद्वैतत्वका भी बोध कराना है; इसीसे [आगेका ग्रन्थ] आरम्भ किया जाता है । आख्यायिका तो विद्याके दान और ग्रहणकी विधि प्रदर्शित करनेके लिये तथा विशेषतः विद्याकी स्तुतिके लिये है, वरदानादिकी सूचनासे यही बात ज्ञात होती है । |
८७० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४
| ८७० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४ |
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जनकके पास याज्ञवल्क्यका आना और राजाका पहले प्राप्त किये हुए इच्छानुसार प्रश्नरूप वरके कारण उनसे प्रश्न करना
जनकँ ह वैदेहं याज्ञवल्क्यो जगाम स मेने न वदिष्य इत्यथ ह यज्जनकश्च वैदेहो याज्ञवल्क्यश्चाग्निहोत्रे समूदाते तस्मै ह याज्ञवल्क्यो वरं ददौ स ह कामप्रश्नमेव वव्रे तँ हास्मै ददौ तँ ह सम्राडेव पूर्वं पप्रच्छ ॥ १ ॥
विदेहराज जनकके पास याज्ञवल्क्य गये। उनका विचार था मैं कुछ उपदेश नहीं करूँगा। किंतु, पहले कभी विदेहराज जनक और याज्ञवल्क्यने अग्निहोत्रके विषयमें परस्पर संवाद किया था, उस समय याज्ञवल्क्यने उसे वर दिया था और उसने इच्छानुसार प्रश्न करना ही माँगा था। यह वर याज्ञवल्क्यने उसे दे दिया था; अतः उनसे पहले राजाने ही प्रश्न किया ॥ १ ॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
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| जनकं ह वैदेहं याज्ञवल्क्यो जगाम। स च गच्छन्नेवं मेने चिन्तितवान्—न वदिष्ये किञ्चिदपि राज्ञे; गमनप्रयोजनं तु योगक्षेमार्थम्। न वदिष्य इत्येवंसंकल्पोऽपि याज्ञवल्क्यो यद् यज्जनकः पृष्टवांस्तत्तत् प्रतिपेदे; तत्र को हेतुः संकल्पितस्यान्यथाकरणे—इत्यत्राख्यायिकामाचष्टे। | विदेहराज जनकके पास याज्ञवल्क्य गये। उन्होंने जाते हुए ऐसा विचार किया—यह सोचा कि मैं राजाके प्रति कुछ उपदेश नहीं करूँगा; जानेका प्रयोजन तो योगक्षेमके लिये था। 'कुछ उपदेश नहीं करूँगा' इस प्रकार संकल्पवाले होनेपर भी याज्ञवल्क्यने जो-जो भी जनकने पूछा वह सभी बतलाया; इस प्रकार संकल्पित विचारके विरुद्ध करनेमें क्या हेतु था, इस विषयमें श्रुति आख्यायिका बतलाती है। |
| पूर्वत्र किल जनकयाज्ञवल्क्ययोः संवाद आसीदग्निहोत्रे निमित्ते। तत्र जनकस्याग्निहोत्रविषयं विज्ञा- | इससे पहले याज्ञवल्क्य और जनकका अग्निहोत्रके निमित्तसे संवाद हुआ था। उसमें जनकके अग्निहोत्र- |
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८७१
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८७१
| समुपलभ्य परितुष्टो याज्ञवल्क्यस्तस्मै जनकाय ह किल वरं ददौ; स च जनको ह कामप्रश्नमेव वरं वव्रे वृतवान्; तं च वरं हास्मै ददौ याज्ञवल्क्यः; तेन वरप्रदानसामर्थ्येन अव्याचिख्यासुमपि याज्ञवल्क्यं तूष्णीं स्थितमपि सम्म्राडेव जनकः पूर्वं पप्रच्छ । <br><br> तत्रैवानुक्तिर्ब्रह्मविद्यायाः कर्मणा विरुद्धत्वात्; विद्यायाश्च स्वातन्त्र्यात्—स्वतन्त्रा हि ब्रह्मविद्या सहकारिसाधनान्तरनिरपेक्षा पुरुषार्थसाधनेति च ॥१॥ | विषयक ज्ञानको देखकर उससे संतुष्ट हो याज्ञवल्क्यने जनकको वर दिया था, उस जनकने उस समय इच्छानुसार प्रश्न करनेका वर ही माँगा था और याज्ञवल्क्य ने उसे यह वर दे दिया था; उस वरप्रदानके सामर्थ्यसे कुछ कहनेकी इच्छावाले न होने और चुप बैठे रहनेपर भी पहले राजा जनकने ही याज्ञवल्क्यसे पूछा । <br><br> कर्मसे विरुद्ध होनेके कारण उस कर्मकाण्डके प्रसङ्गमें ही ब्रह्मविद्याका वर्णन नहीं किया गया, क्योंकि विद्या तो स्वतन्त्र है—ब्रह्मविद्या स्वतन्त्र है, अन्य सहकारी साधनकी अपेक्षासे रहित है और पुरुषार्थकी साधनभूत है ॥ १ ॥ |
पुरुषके व्यवहारमें उपयोगी पाँच ज्योतियाँ
१—आदित्यज्योति
याज्ञवल्क्य किं ज्योतिरयं पुरुष इति । आदित्यज्योतिः सम्राडिति होवाचादित्येनैवायं ज्योतिषास्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्येतीत्येवमेवैतद् याज्ञवल्क्य ॥२॥
'हे याज्ञवल्क्य ! यह पुरुष किस ज्योतिवाला है ?' 'हे सम्राट् ! यह आदित्यरूप ज्योतिवाला है'—ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा, 'यह आदित्यरूप ज्योतिसे ही बैठता, सब ओर जाता, कर्म करता और लौट जाता है । याज्ञवल्क्य ! यह बात ऐसी ही है' ॥ २ ॥
८७२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| ८७२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| हे याज्ञवल्क्येत्येवं सम्बोध्याभिमुखीकरणाय, किं ज्योतिरयं पुरुष इति—किमस्य पुरुषस्य ज्योतिर्येन ज्योतिषा व्यवहरति, सोऽयं किं ज्योतिः ? अयं प्राकृतः कार्यकारणसंघातरूपः शिरःपाण्यादिमान् पुरुषः पृच्छयते । किमयं स्वावयवसंघातबाह्येन ज्योतिरन्तरेण व्यवहरति, आहो स्वित् स्वावयवसंघातमध्यपातिना ज्योतिषा ज्योतिष्कार्यमयं पुरुषो निर्वर्तयति, इत्येतदभिप्रेत्य पृच्छति । | 'हे याज्ञवल्क्य' इस प्रकार अपने अभिमुख करनेके लिये सम्बोधन करके जनक पूछता है—यह पुरुष किस ज्योतिवाला है ? अर्थात् इस पुरुषकी ज्योति क्या है, जिस ज्योतिसे कि यह व्यवहार करता है ? (इसी अभिप्रायसे पूछता है—) सो यह पुरुष किस ज्योतिवाला है ? यहाँ इस प्राकृत देहेन्द्रियसंघातरूप शिर और हाथ आदि अवयवोंवाले पुरुषके विषयमें प्रश्न किया जाता है। क्या यह अपने अवयवोंसे बाहर रहनेवाली किसी अन्य ज्योतिसे व्यवहार करता है, अथवा अपने अवयवोंके संघातमें रहनेवाली ज्योतिसे यह पुरुष ज्योतिका कार्य पूरा करता है—इस अभिप्रायसे ही जनक पूछता है। | | किं चातः, यदि व्यतिरिक्तेन यदि वाऽव्यतिरिक्तेन ज्योतिषा ज्योतिष्कार्यं निर्वर्तयति । शृणु यत्र कारणम्—यदि व्यतिरिक्तेनैव ज्योतिषा ज्योतिष्कार्यनिर्वर्तकत्वम् अस्य स्वभावो निर्धारितो भवति, ततोऽदृष्टज्योतिष्कार्यविषयेऽप्यनुमास्यामहे व्यतिरिक्तज्योतिर्निमित्तमेवेदं कार्यमिति; | किंतु देहादि संघातसे व्यतिरिक्त अथवा अव्यतिरिक्त किसी भी प्रकारकी ज्योतिसे यह ज्योतिका कार्य पूर्ण करता हो—इससे क्या हुआ ? इसमें जो कारण है, सो सुनो—यदि इसका स्वभाव किसी व्यतिरिक्त ज्योतिसे ही ज्योतिका कार्य पूरा करनेका निश्चय किया जाय तो जहाँ ज्योति नहीं देखी गयी है, उस कार्यके विषयमें भी हम ऐसा अनुमान करेंगे कि यह कार्य किसी व्यतिरिक्त ज्योतिके कारण ही हुआ है; और यदि |
| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ८७३ |
| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ८७३ |
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| अथाव्यतिरिक्तेनैव स्वात्मना ज्योतिषा व्यवहरति, ततोऽप्रत्यक्षेऽपि ज्योतिषि ज्योतिष्कार्यदर्शनेऽव्यतिरिक्तमेव ज्योतिरनुमेयम्; अथानियम एव—व्यतिरिक्तमव्यतिरिक्तं वा ज्योतिः पुरुषस्य व्यवहारहेतुः, ततोऽनध्यवसाय एव ज्योतिर्विषये—इत्येवं मन्वानः पृच्छति जनको याज्ञवल्क्यम्—किं ज्योतिरयं पुरुष इति । | यह अपनेसे अभिन्न ज्योतिद्वारा ही व्यवहार करता है तो ज्योतिका प्रत्यक्ष न होनेपर भी ज्योतिका कार्य देखनेपर अभिन्न ज्योतिका ही अनुमान करना होगा; यदि ऐसा मानें कि पुरुषके व्यवहारकी हेतु व्यतिरिक्त या अव्यतिरिक्त ज्योति है—इसका नियम है ही नहीं, तब तो ज्योतिके विषयमें अनिश्चय ही रहेगा—ऐसा मानकर ही जनक याज्ञवल्क्यसे पूछता है कि यह पुरुष किस ज्योतिवाला है? | | नन्वेवमनुमानकौशले जनकस्य किं प्रश्नेन, स्वयमेव कस्मान्न प्रतिपद्यत इति ? | **शङ्का—**किंतु यदि जनकमें ऐसा अनुमानकौशल है तो उसे प्रश्न करनेकी क्या आवश्यकता थी, उसने स्वयं ही [ अनुमान करके ] क्यों नहीं जान लिया ? | | सत्यमेतत्; तथापि लिङ्गलिङ्गिसम्बन्धविशेषाणामत्यन्तसौक्ष्म्याद् दुरवबोध्यतां मन्यते बहूनामपि पण्डितानाम्, किमुतैकस्य; अत एव हि धर्मसूक्ष्मनिर्णये परिषद्द्यापार इष्यते, पुरुषविशेषश्चापेक्ष्यते—दशावरा | **समाधान-**यह ठीक है; तथापि लिङ्ग और लिङ्गी [ अर्थात् व्यापक और व्याप्य ] के सम्बन्धविशेषोंकी अत्यन्त सूक्ष्मताके कारण वह उन्हें अनेकों विद्वानोंके लिये भी दुर्बोध समझता है, एककी तो बात ही क्या है; इसीसे धर्म-जैसे सूक्ष्म विषयका निर्णय करनेके लिये परिषद् व्यापार (अनेकोंकी गोष्ठी) की अपेक्षा होती है तथा विशिष्ट पुरुषकी भी अपेक्षा होती है। कम-से-कम दश पुरुषोंकी |
८७४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| ८७४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| परिषत्, त्रयो वैको वेति; तस्माद् यद्यप्यनुमानकौशलं राज्ञः, तथापि तु युक्तो याज्ञवल्क्यः प्रष्टुम्, विज्ञानकौशलतारतम्योपपत्तेः पुरुषाणाम् । | परिषद् होती है, तथा [ सदाचारसम्पन्न ] तीन पुरुषोंकी और [ अध्यात्मनिष्ठ ] एक पुरुषकी भी परिषद् हो सकती है। इसलिये यद्यपि राजा में अनुमान करनेकी कुशलता है, तो भी याज्ञवल्क्यसे पूछना उचित ही है; क्योंकि पुरुषोंके विज्ञान और कौशलका तो तारतम्य होना सम्भव है। | | अथवा श्रुतिः स्वयमेव आख्यायिकाव्याजेन अनुमानमार्गमुपन्यस्य अस्मान् बोधयति पुरुषमतिमनुसरन्ती । | अथवा पुरुषकी बुद्धिका अनुसरण करनेवाली श्रुति आख्यायिकाके मिषसे अनुमानके मार्गका उल्लेख करके हमें स्वयं ही बोध करा रही है। [इसमें राजा अथवा मुनि किसीकी भी बुद्धिकी कुशलता अभिप्रेत नहीं है]। | | याज्ञवल्क्योऽपि जनकाभिप्रयाभिज्ञतया व्यतिरिक्तमात्मज्योतिर्बोधयिष्यन् जनकं व्यतिरिक्तप्रतिपादकमेव लिङ्गं प्रतिपेदे, यथा—प्रसिद्धमादित्यज्योतिः सम्राडिति होवाच । | जनकके अभिप्रायको जाननेवाले होनेसे याज्ञवल्क्यजीने भी देहादिसे व्यतिरिक्त आत्मज्योतिका बोध करानेके लिये जनकको व्यतिरिक्त ज्योतिका प्रतिपादक लिङ्ग ही बतलाया; यथा— हे सम्राट् ! वह प्रसिद्ध आदित्य ज्योतिवाला है, ऐसा उन्होंने कहा। | | कथम् ? आदित्येनैव स्वावयवसंघातव्यतिरिक्तेन चक्षुषोऽनुग्राहकेण ज्योतिषायं प्राकृतः पुरुष आस्ते उपविशति, पल्ययते पर्यति क्षेत्रमरण्यं वा तत्र गत्वा कर्म कुरुते, विपल्येति विपर्येति च यथागतम् अत्यन्तव्यतिरिक्तज्यो- | किस प्रकार आदित्य ज्योतिवाला है ? [ सो बतलाते हैं—] यह प्राकृत पुरुष अपने अवयवसंघातसे व्यतिरिक्त नेत्रेन्द्रियके अनुग्राहक आदित्यके द्वारा ही बैठता, इधर-उधर क्षेत्र या जंगलमें जाता, वहाँ जाकर कर्म-करता और जैसे गया था, वैसे लौट भी आता है। पुरुषके अत्यन्त व्यतिरिक्त ज्योतिष्ट्वकी |
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ८७५
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ८७५
| लिङ्गप्रसिद्धताप्रदर्शनार्थम् अनेकविशेषणम्; बाह्यानेकज्योतिःप्रदर्शनं च लिङ्गस्याव्यभिचारित्वप्रदर्शनार्थम् ।<br>एवमेवैतद् याज्ञवल्क्य ॥ २ ॥ | प्रसिद्धता प्रदर्शित करनेके लिये यहाँ अनेक विशेषण दिये गये हैं। और बाह्य अनेक ज्योतियोंका प्रदर्शन लिङ्गका अव्यभिचारित्व प्रदर्शित करनेके लिये है।<br>[ जनक— ] 'याज्ञवल्क्य ! यह बात ऐसी ही है' ॥ २ ॥ |
२—चन्द्रज्योति
अस्तमित आदित्ये याज्ञवल्क्य किं ज्योतिरेवायं पुरुष इति चन्द्रमा एवास्य ज्योतिर्भवतीति चन्द्रमसैवायं ज्योतिषास्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्येतीत्येवमेवैतद् याज्ञवल्क्य ॥ ३ ॥
[ जनक— ] 'हे याज्ञवल्क्य ! आदित्यके अस्त हो जानेपर यह पुरुष किस ज्योतिवाला होता है ?' [ याज्ञवल्क्य— ] 'उस समय चन्द्रमा ही उसकी ज्योति होता है, चन्द्रमारूप ज्योतिके द्वारा ही यह बैठता, इधर-उधर जाता, कर्म करता और लौट आता है।' [ जनक— ] 'हे याज्ञवल्क्य ! यह बात ऐसी ही है' ॥ ३ ॥
| तथास्तमिते आदित्ये याज्ञवल्क्य किं ज्योतिरेवायं पुरुष इति; चन्द्रमा एवास्य ज्योतिः ॥ ३ ॥ | 'तथा आदित्यके अस्त होनेपर हे याज्ञवल्क्य ! यह पुरुष किस ज्योतिवाला होता है ?' 'चन्द्रमा ही इसकी ज्योति होता है' ॥ ३ ॥ |
३—अग्निज्योति
अस्तमित आदित्ये याज्ञवल्क्य चन्द्रमस्यस्तमिते किं ज्योतिरेवायं पुरुष इत्यग्निरेवास्य ज्योति-
८७६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| ८७६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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भवतीत्यग्निनेवायं ज्योतिषास्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्येतीत्येवमेवैतद् याज्ञवल्क्य ॥ ४ ॥
'हे याज्ञवल्क्य ! आदित्यके अस्त हो जानेपर तथा चन्द्रमाके अस्त हो जानेपर यह पुरुष किस ज्योतिवाला होता है?' 'अग्नि ही इसकी ज्योति होता है। यह अग्निरूप ज्योतिके द्वारा ही बैठता, इधर-उधर जाता, कर्म करता और लौट आता है।' 'हे याज्ञवल्क्य ! यह बात ऐसी ही है' ॥४॥
| अस्तमिते आदित्ये चन्द्रमस्य-<br><br>स्तमितेऽग्निर्ज्योतिः ॥ ४ ॥ | आदित्यके अस्त होनेपर और चन्द्रमाके अस्त होनेपर अग्नि ज्योति होता है ॥ ४ ॥ |
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४-वाग्ज्योति
अस्तमित आदित्ये याज्ञवल्क्य चन्द्रमस्यस्तमिते शान्तेऽग्नौ किं ज्योतिरेवायं पुरुष इतिवागे वास्य ज्योतिर्भवतीति वाचैवायं ज्योतिषास्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्येतीति तस्माद् वै सम्राडपि यत्र स्वः पाणिर्न विनिर्ज्ञायतेऽथ यत्र वागुच्चरत्युपैव तत्र न्येतीत्येवमेवैतद् याज्ञवल्क्य ॥ ५ ॥
'हे याज्ञवल्क्य ! आदित्यके अस्त होनेपर, चन्द्रमाके अस्त होनेपर और अग्निके शान्त होनेपर यह पुरुष किस ज्योतिवाला होता है ?' 'वाक् ही इसकी ज्योति होती है। यह वाक्रूप ज्योतिके द्वारा ही बैठता, इधर-उधर जाता, कर्म करता और लौट आता है। इसीसे हे सम्राट् ! जहाँ अपना हाथ भी नहीं जाना जाता, वहाँ ज्यों ही वाणीका उच्चारण किया जाता है कि पास चला जाता है।' 'हे याज्ञवल्क्य ! यह बात ऐसी ही है' ॥ ५ ॥
| शान्तेऽग्नौ वाग्ज्योतिः; वागिति<br><br>शब्दः परिगृह्यते; शब्देन विष- | अग्निके शान्त होनेपर वाक् ज्योति है। 'वाक्' इस शब्दसे शब्द ग्रहण किया जाता है; शब्द- |
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ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थे ८७७
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थे ८७७
| येण श्रोत्रमिन्द्रियं दीप्यते; श्रोत्रेन्द्रिये सम्प्रदीप्ते मनसि विवेक उपजायते; तेन मनसा बाह्यां चेष्टां प्रतिपद्यते—"मनसा ह्येव पश्यति मनसा शृणोति" ( बृ० उ० १ । ५ । ३ ) इति ब्राह्मणम् । | रूप विषयसे श्रोत्रेन्द्रिय दीप्त होती है; श्रोत्रेन्द्रियके सम्यक् प्रकारसे दीप्त होनेपर मनमें विवेक उत्पन्न होता है; उस मनसे बाह्य चेष्टाका अनुभव करता है; “मनसे ही देखता है, मनसे सुनता है” ऐसा प्रथम अध्यायके पञ्चम ब्राह्मणका कथन है। | | कथं पुनर्वाग्ज्योतिरिति, वाचो ज्योतिष्ट्वमप्रसिद्धमित्यत आह— तस्माद् वै सम्राड् यस्माद् वाचा ज्योतिषानुगृहीतोऽयं पुरुषो व्यवहरति, तस्मात् प्रसिद्धमेतद् वाचो ज्योतिष्ट्वम्; कथम् ? अपि-यत्र यस्मिन् काले प्रावृषि प्रायेण मेघान्धकारे सर्वज्योतिःप्रत्यस्तमये स्वोऽपि पाणिर्हस्तो न विस्पष्टं निर्ज्ञायते—अथ तस्मिन् काले सर्वचेष्टानिरोधे प्राप्ते बाह्यज्योतिषोऽभावाद् यत्र वागुच्चरति, श्वा वा भषति, गर्दभो वा रौति, उपव तत्र न्येति—तेन शब्देन ज्योतिषा श्रोत्रमनसोर्नैरन्तर्यं भवति, तेन ज्योतिष्कार्यत्वं वाक् प्रतिपद्यते, तेन वाचा ज्योतिषोपन्त्येत्येव— | किंतु वाक् किस प्रकार ज्योति है ? वाक्का ज्योति होना तो प्रसिद्ध नहीं है; इसीसे श्रुति कहती है;—इसीसे हे सम्राट् ! चूँकि यह पुरुष वाणीरूप ज्योतिसे अनुगृहीत होकर व्यवहार करता है, इसलिये इस वाणीका ज्योति होना प्रसिद्ध है । किस प्रकार ? [ सो बतलाते हैं—] जब-जिस समय वर्षाकालमें मेघके अन्धकारमें प्रायः समस्त ज्योतियोंके अस्त हो जानेपर अपने हाथका भी स्पष्टतया भान नहीं होता, उस समय समस्त चेष्टाओंका निरोध प्राप्त होनेपर बाह्यज्योतियोंका अभाव होनेसे जहाँ वाणीका उच्चारण होता है, कुत्ता भोंकता है अथवा गधा रेंकता है वहीं उसके समीप पुरुष चला जाता है; उस शब्दरूप ज्योतिसे श्रोत्र ओर मनकी निरन्तरता हो जाती है, इससे वाक् ज्योतिकी |
८७८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| ८७८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| उपगच्छत्येव तत्र संनिहितो भवतीत्यर्थः; तत्र च कर्म कुरुते, विपल्येति । <br><br> तत्र वाग्ज्योतिषो ग्रहणं गन्धादीनामुपलक्षणार्थम्; गन्धादिभिरपि हि घ्राणादिष्वनुगृहीतेषु प्रवृत्तिनिवृत्त्यादयो भवन्ति; तेन तैरप्यनुग्रहो भवति कार्यकारणसंघातस्य; एवमेवैतद् याज्ञवल्क्य ॥ ५ ॥ | कार्यताको प्राप्त हो जाती है, तात्पर्य यह है कि उस वाणीरूप ज्योतिसे पुरुष उपन्येति समीप जाता अर्थात् निकटवर्ती हो जाता है और वह कर्म करता तथा पुनः लौट आता है। <br><br> जहाँ वाक्रूप ज्योतिका ग्रहण गन्धादिके उपलक्षणके लिये है; गन्धादिके द्वारा भी घ्राणादिके अनुगृहीत होनेपर प्रवृत्ति और निवृत्ति आदि होते हैं; अतः उनसे भी देहेन्द्रियसंघातका अनुग्रह होता है; [ जनक-] 'हे याज्ञवल्क्य ! यह बात ऐसी ही है' ॥ ५ ॥ |
५-आत्मज्योति
अस्तमित आदित्ये याज्ञवल्क्य चन्द्रमस्यस्तमिते शान्तेऽग्नौ शान्तायां वाचि किं ज्योतिरेवायं पुरुष इत्यात्मैवास्य ज्योतिर्भवतीत्यात्मनैवायं ज्योतिषास्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्येतीति ॥ ६ ॥
'हे याज्ञवल्क्य ! आदित्यके अस्त होनेपर, चन्द्रमाके अस्त होनेपर, अग्निके शान्त होनेपर और वाक्के भी शान्त होनेपर यह पुरुष किस ज्योतिवाला रहता है ?' 'आत्मा ही इसकी ज्योति होता है। यह आत्मज्योतिके द्वारा ही बैठता, इधर-उधर जाता, कर्म करता और फिर लौट आता है' ॥ ६ ॥
| शान्तायां पुनर्वाचि, गन्धादिष्वपि च शान्तेषु बाह्येष्वनुग्राहकेषु, सर्वप्रवृत्तिनिरोधः प्राप्तोऽस्य | वाणीके शान्त हो जानेपर तथा गन्धादि बाह्य अनुग्राहकोंके भी निवृत्त हो जानेपर इस पुरुषकी सम्पूर्ण प्रवृत्तियोंका निरोध प्राप्त होता |
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| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ८७९ |
| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ८७९ |
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| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| पुरुषस्य। एतदुक्तं भवति— जाग्रद्विषये बहिर्मुखानि करणानि चक्षुरादीन्यादित्यादिज्योतिर्भिरनुगृह्यमाणानि यदा, तदा स्फुटतरः संव्यवहारोऽस्य पुरुषस्य भवतीति; एवं तावज्जागरिते स्वावयवसंघातव्यतिरिक्तेनैव ज्योतिषा ज्योतिष्कार्यसिद्धिरस्य पुरुषस्य दृष्टा। तस्मात्ते वयं मन्यामहे—सर्वबाह्यज्योतिःप्रत्यस्तमयेऽपि स्वप्नसुषुप्तिकाले जागरिते च तादृगवस्थायां स्वावयवसंघातव्यतिरिक्तेनैव ज्योतिषा ज्योतिष्कार्यसिद्धिरस्येति, दृश्यते च स्वप्ने ज्योतिष्कार्यसिद्धिः—बन्धुसंगमनवियोगदर्शनं देशान्तरगमनादि च; सुषुप्ताच्चोत्थानम्—सुखमहमस्वाप्सं न किञ्चिदवेदिषमिति; तस्मादस्ति व्यतिरिक्तं किमपि ज्योतिः। | है। यहाँ यह कहा गया है— जिस समय जाग्रत्-अवस्थामें आदित्यादि ज्योतियोंसे अनुगृहीत होनेवाली चक्षु आदि इन्द्रियाँ बहिर्मुख होती हैं, उस समय इस पुरुषका व्यवहार स्पष्टतर होता है; इस प्रकार जाग्रत्-अवस्थामें तो इस पुरुषके ज्योतिरसम्बन्धी कार्योंकी सिद्धि अपने अवयवसंघातसे व्यतिरिक्त ज्योतिके द्वारा ही देखी गयी है; अतः हम समझते हैं कि स्वप्न और सुषुप्तिकालमें सम्पूर्ण बाह्य ज्योतियोंके अस्त हो जानेपर तथा जाग्रत्कालमें भी ऐसी अवस्था आनेपर अपने अवयवसंघातसे व्यतिरिक्त ज्योतिके द्वारा ही इस पुरुषके ज्योतिरसम्बन्धी कार्यकी सिद्धि होती है; स्वप्नमें बन्धुओंके संयोग-वियोग दिखायी देने और देशान्तरमें जाने आदि ज्योतिके कार्योंकी सिद्धि देखी ही जाती है; इसी प्रकार सुषुप्तिसे उठना और 'मैं सुखसे सोया उस समय कुछ भी भान नहीं रहा' ऐसा अनुभव भी देखा ही जाता है। अतः कोई व्यतिरिक्त ज्योति है। |
८८० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४
८८० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| किं पुनस्तच्छान्तायां वाचि ज्योतिर्भवति ? इत्युच्यते—<br><br>आत्मैवास्य ज्योतिर्भवतीति ।<br><br>आत्मेति कार्यकारणस्वावयवसंघातव्यतिरिक्तं कार्यकारणावभासकम्, आदित्यादिबाह्यज्योतिर्वत् स्वयमन्येनानवभास्यमानमभिधीयते ज्योतिः; अन्तःस्थं च तत् पारिशेष्यात्—कार्यकरणव्यतिरिक्तं तदिति तावत् सिद्धम्; यच्च कार्यकरणव्यतिरिक्तं कार्यकरणसंघातानुग्राहकं च ज्योतिस्तद् बाह्यैश्चक्षुरादिकरणैरुपलभ्यमानं दृष्टम्; न तु तथा तच्चक्षुरादिभिरुपलभ्यते, आदित्यादिज्योतिःषूपरतेषु; कार्यं तु ज्योतिषो दृश्यते यस्मात्, तस्मादात्मनैवायं ज्योतिषा आस्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्येतीति; तस्मान्नूनमन्तःस्थं ज्योतिरित्यवगम्यते । किं च आदित्यादिज्योतिर्विलक्षणं तदभौतिकं च; स एव | किंतु उस वाणीके शान्त होनेपर कौन ज्योति होती है ? सो बतलाया जाता है—उस समय आत्मा ही इस पुरुषकी ज्योति होता है। आत्मा—यह देहेन्द्रियरूप अपने अवयवसंघातसे व्यतिरिक्त, देह और इन्द्रियोंका अवभासक तथा आदित्यादि बाह्य ज्योतियोंके समान स्वयं किसी अन्यसे भासित न होनेवाली ज्योति कहा जाता है। तथा [किन्हीं बाह्य ज्योतियोंमें न होनेके कारण] वह पारिशेष्य न्यायसे अन्तःस्थ है; वह देह और इन्द्रियोंसे भिन्न है—यह तो सिद्ध ही हो चुका है; और जो ज्योति देहेन्द्रियसे भिन्न तथा देहेन्द्रियसंघातकी उपकारक होती है, वह नेत्रादि बाह्य इन्द्रियोंसे उपलब्ध होती देखी जाती है; किंतु आदित्यादि ज्योतियोंके निवृत्त हो जानेपर यह आत्मा उनकी तरह चक्षु आदिसे उपलब्ध नहीं होता; किंतु तो भी चूँकि ज्योतिका कार्य देखा ही जाता है, इसलिये यह पुरुष आत्मज्योतिसे ही बैठता, इधर उधर जाता, कर्म करता और फिर लौट आता है; अतः यह ज्ञात होता है कि निश्चय ही आत्मा अन्तःस्थ ज्योति है; यही नहीं, वह आदित्यादि ज्योतियोंसे विलक्षण और अभौतिक भी है; यही |
| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थं | ८८१ |
| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थं | ८८१ |
|---|
| हेतुर्यच्चक्षुराद्यग्राह्यत्वम्, आदित्यादिवत् । | कारण है कि वह आत्मज्योति आदित्यादिके समान चक्षु आदिसे ग्राह्य नहीं है। | | (आत्मज्योतिषोऽन्यज्योतिर्वैलक्षण्ये आक्षेप:)<br><br>न, समानजातीयेनैवोपकारदर्शनात्—यदादित्यादिविलक्षणं ज्योतिरान्तरं सिद्धमिति, एतदसत्; कस्मात् ? उपक्रियमाणसमानजातीयेनैवादित्यादिज्योतिषा कार्यकारणसंघातस्य भौतिकस्य भौतिकेनैवोपकारः क्रियमाणो दृश्यते; यथादृष्टं चेदमनुमेयम्; यदि नाम कार्यकारणार्थान्तरं तदुपकारकमादित्यादिवज्ज्योतिः, तथापि कार्यकारणसंघातसमानजातीयमेवानुमेयम्, कार्यकारणसंघातोपकारकत्वात्, आदित्यादिज्योतिर्वत् । यत् पुनरन्तःस्थत्वादप्रत्यक्षत्वाच्च वैलक्षण्यमुच्यते, तच्चक्षुरादिज्योतिर्भिरनैकान्तिकम्; यतोऽप्रत्यक्षाण्यन्तःस्थानि च चक्षुरादिज्योतींषि भौतिकान्येव । तस्मात्तत्र मनो- | पूर्व०—यह नहीं हो सकता, क्योंकि समान जातिवाले पदार्थसे ही उपकार होता देखा जाता है, आदित्यादिसे भिन्न जो आन्तर ज्योति सिद्ध की गयी है, वह ठीक नहीं है; क्यों ? क्योंकि जिनका उपकार किया जाता है, उन भौतिक देहेन्द्रियसंघातका अपने समान जातिवाले भौतिक आदित्यादि ज्योतिसे ही उपकार होता देखा जाता है; और जैसा देखा गया है, वैसा ही इसका अनुमान करना चाहिये। यदि देह और इन्द्रियोंकी उपकारक ज्योति आदित्यादिके समान उनसे कोई भिन्न पदार्थ है, तो भी उसे देहेन्द्रियसंघातसे समान जातिवाली ही अनुमान करनी चाहिये; क्योंकि आदित्यादि ज्योतियोंके समान वह देहेन्द्रियसंघातका उपकार करनेवाली है। इसके सिवा अन्तःस्थ और अप्रत्यक्ष होनेके कारण जो उसकी विलक्षणता बतलायी जाती है, वह तो नेत्रादि ज्योतियोंके द्वारा व्यभिचरित है; क्योंकि अप्रत्यक्ष और अन्तःस्थ होनेपर भी नेत्रादि ज्योतियां भौतिक ही हैं। अतः 'आत्म- |
बृ० उ० ५६—