बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 888, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ८७४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| परिषत्, त्रयो वैको वेति; तस्माद् यद्यप्यनुमानकौशलं राज्ञः, तथापि तु युक्तो याज्ञवल्क्यः प्रष्टुम्, विज्ञानकौशलतारतम्योपपत्तेः पुरुषाणाम् । | परिषद् होती है, तथा [ सदाचारसम्पन्न ] तीन पुरुषोंकी और [ अध्यात्मनिष्ठ ] एक पुरुषकी भी परिषद् हो सकती है। इसलिये यद्यपि राजा में अनुमान करनेकी कुशलता है, तो भी याज्ञवल्क्यसे पूछना उचित ही है; क्योंकि पुरुषोंके विज्ञान और कौशलका तो तारतम्य होना सम्भव है। | | अथवा श्रुतिः स्वयमेव आख्यायिकाव्याजेन अनुमानमार्गमुपन्यस्य अस्मान् बोधयति पुरुषमतिमनुसरन्ती । | अथवा पुरुषकी बुद्धिका अनुसरण करनेवाली श्रुति आख्यायिकाके मिषसे अनुमानके मार्गका उल्लेख करके हमें स्वयं ही बोध करा रही है। [इसमें राजा अथवा मुनि किसीकी भी बुद्धिकी कुशलता अभिप्रेत नहीं है]। | | याज्ञवल्क्योऽपि जनकाभिप्रयाभिज्ञतया व्यतिरिक्तमात्मज्योतिर्बोधयिष्यन् जनकं व्यतिरिक्तप्रतिपादकमेव लिङ्गं प्रतिपेदे, यथा—प्रसिद्धमादित्यज्योतिः सम्राडिति होवाच । | जनकके अभिप्रायको जाननेवाले होनेसे याज्ञवल्क्यजीने भी देहादिसे व्यतिरिक्त आत्मज्योतिका बोध करानेके लिये जनकको व्यतिरिक्त ज्योतिका प्रतिपादक लिङ्ग ही बतलाया; यथा— हे सम्राट् ! वह प्रसिद्ध आदित्य ज्योतिवाला है, ऐसा उन्होंने कहा। | | कथम् ? आदित्येनैव स्वावयवसंघातव्यतिरिक्तेन चक्षुषोऽनुग्राहकेण ज्योतिषायं प्राकृतः पुरुष आस्ते उपविशति, पल्ययते पर्यति क्षेत्रमरण्यं वा तत्र गत्वा कर्म कुरुते, विपल्येति विपर्येति च यथागतम् अत्यन्तव्यतिरिक्तज्यो- | किस प्रकार आदित्य ज्योतिवाला है ? [ सो बतलाते हैं—] यह प्राकृत पुरुष अपने अवयवसंघातसे व्यतिरिक्त नेत्रेन्द्रियके अनुग्राहक आदित्यके द्वारा ही बैठता, इधर-उधर क्षेत्र या जंगलमें जाता, वहाँ जाकर कर्म-करता और जैसे गया था, वैसे लौट भी आता है। पुरुषके अत्यन्त व्यतिरिक्त ज्योतिष्ट्वकी |