बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 887, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ८७३ |
|---|
| अथाव्यतिरिक्तेनैव स्वात्मना ज्योतिषा व्यवहरति, ततोऽप्रत्यक्षेऽपि ज्योतिषि ज्योतिष्कार्यदर्शनेऽव्यतिरिक्तमेव ज्योतिरनुमेयम्; अथानियम एव—व्यतिरिक्तमव्यतिरिक्तं वा ज्योतिः पुरुषस्य व्यवहारहेतुः, ततोऽनध्यवसाय एव ज्योतिर्विषये—इत्येवं मन्वानः पृच्छति जनको याज्ञवल्क्यम्—किं ज्योतिरयं पुरुष इति । | यह अपनेसे अभिन्न ज्योतिद्वारा ही व्यवहार करता है तो ज्योतिका प्रत्यक्ष न होनेपर भी ज्योतिका कार्य देखनेपर अभिन्न ज्योतिका ही अनुमान करना होगा; यदि ऐसा मानें कि पुरुषके व्यवहारकी हेतु व्यतिरिक्त या अव्यतिरिक्त ज्योति है—इसका नियम है ही नहीं, तब तो ज्योतिके विषयमें अनिश्चय ही रहेगा—ऐसा मानकर ही जनक याज्ञवल्क्यसे पूछता है कि यह पुरुष किस ज्योतिवाला है? | | नन्वेवमनुमानकौशले जनकस्य किं प्रश्नेन, स्वयमेव कस्मान्न प्रतिपद्यत इति ? | **शङ्का—**किंतु यदि जनकमें ऐसा अनुमानकौशल है तो उसे प्रश्न करनेकी क्या आवश्यकता थी, उसने स्वयं ही [ अनुमान करके ] क्यों नहीं जान लिया ? | | सत्यमेतत्; तथापि लिङ्गलिङ्गिसम्बन्धविशेषाणामत्यन्तसौक्ष्म्याद् दुरवबोध्यतां मन्यते बहूनामपि पण्डितानाम्, किमुतैकस्य; अत एव हि धर्मसूक्ष्मनिर्णये परिषद्द्यापार इष्यते, पुरुषविशेषश्चापेक्ष्यते—दशावरा | **समाधान-**यह ठीक है; तथापि लिङ्ग और लिङ्गी [ अर्थात् व्यापक और व्याप्य ] के सम्बन्धविशेषोंकी अत्यन्त सूक्ष्मताके कारण वह उन्हें अनेकों विद्वानोंके लिये भी दुर्बोध समझता है, एककी तो बात ही क्या है; इसीसे धर्म-जैसे सूक्ष्म विषयका निर्णय करनेके लिये परिषद् व्यापार (अनेकोंकी गोष्ठी) की अपेक्षा होती है तथा विशिष्ट पुरुषकी भी अपेक्षा होती है। कम-से-कम दश पुरुषोंकी |