बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 895, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थं | ८८१ |
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| हेतुर्यच्चक्षुराद्यग्राह्यत्वम्, आदित्यादिवत् । | कारण है कि वह आत्मज्योति आदित्यादिके समान चक्षु आदिसे ग्राह्य नहीं है। | | (आत्मज्योतिषोऽन्यज्योतिर्वैलक्षण्ये आक्षेप:)<br><br>न, समानजातीयेनैवोपकारदर्शनात्—यदादित्यादिविलक्षणं ज्योतिरान्तरं सिद्धमिति, एतदसत्; कस्मात् ? उपक्रियमाणसमानजातीयेनैवादित्यादिज्योतिषा कार्यकारणसंघातस्य भौतिकस्य भौतिकेनैवोपकारः क्रियमाणो दृश्यते; यथादृष्टं चेदमनुमेयम्; यदि नाम कार्यकारणार्थान्तरं तदुपकारकमादित्यादिवज्ज्योतिः, तथापि कार्यकारणसंघातसमानजातीयमेवानुमेयम्, कार्यकारणसंघातोपकारकत्वात्, आदित्यादिज्योतिर्वत् । यत् पुनरन्तःस्थत्वादप्रत्यक्षत्वाच्च वैलक्षण्यमुच्यते, तच्चक्षुरादिज्योतिर्भिरनैकान्तिकम्; यतोऽप्रत्यक्षाण्यन्तःस्थानि च चक्षुरादिज्योतींषि भौतिकान्येव । तस्मात्तत्र मनो- | पूर्व०—यह नहीं हो सकता, क्योंकि समान जातिवाले पदार्थसे ही उपकार होता देखा जाता है, आदित्यादिसे भिन्न जो आन्तर ज्योति सिद्ध की गयी है, वह ठीक नहीं है; क्यों ? क्योंकि जिनका उपकार किया जाता है, उन भौतिक देहेन्द्रियसंघातका अपने समान जातिवाले भौतिक आदित्यादि ज्योतिसे ही उपकार होता देखा जाता है; और जैसा देखा गया है, वैसा ही इसका अनुमान करना चाहिये। यदि देह और इन्द्रियोंकी उपकारक ज्योति आदित्यादिके समान उनसे कोई भिन्न पदार्थ है, तो भी उसे देहेन्द्रियसंघातसे समान जातिवाली ही अनुमान करनी चाहिये; क्योंकि आदित्यादि ज्योतियोंके समान वह देहेन्द्रियसंघातका उपकार करनेवाली है। इसके सिवा अन्तःस्थ और अप्रत्यक्ष होनेके कारण जो उसकी विलक्षणता बतलायी जाती है, वह तो नेत्रादि ज्योतियोंके द्वारा व्यभिचरित है; क्योंकि अप्रत्यक्ष और अन्तःस्थ होनेपर भी नेत्रादि ज्योतियां भौतिक ही हैं। अतः 'आत्म- |
बृ० उ० ५६—