बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 882, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ८६८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४ |
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| भोक्तृत्वप्रत्याख्यानेनाधिगतोऽपि सन् पुनः प्राणनादिलिङ्गसमुपन्यस्य औषस्तप्रश्ने प्राणनादिलिङ्गो यः सामान्येनाधिगतः 'प्राणेन प्राणिति' इत्यादिना, 'दृष्टेर्द्रष्टा' इत्यादिना ऽलुप्तशक्तिस्वभावोऽधिगतः । | भोक्तृत्वके निराकरणद्वारा ज्ञात होनेपर भी फिर औषस्त (उषस्त चाक्रायण) के प्रश्नमें जो 'प्राणसे प्राणन करता है' इत्यादि वाक्यद्वारा प्राणनादि लिङ्गका उपन्यास कर सामान्यरूपसे प्राणनादि लिङ्गवाला जाना गया है, वही 'दृष्टिका द्रष्टा है' इत्यादि वाक्यसे अलुप्तशक्तिस्वभाव ज्ञात हुआ है। | | तस्य च परोपाधिनिमित्तः संसारः—यथा रज्जूरूषरशुक्तिकागगनादिषु सर्पोदकरजतमलिनत्वादि पराध्यारोपणनिमित्तमेव, न स्वतः, तथा । | उसे [अज्ञान और उसके कार्य अन्तःकरणादि इस] अन्य उपाधिके कारण संसारकी प्राप्ति हुई है, जिस प्रकार कि रज्जु, ऊसर, शुक्ति और आकाशादिमें सर्प, जल, रजत और मलिनता आदिकी प्रतीति दूसरोंके आरोप करनेके कारण ही है, स्वतः नहीं, उसी प्रकार [यहाँ समझना चाहिये]। | | निरुपाधिको निरुपाख्यो नेति नेतीति व्यपदेश्यः साक्षादपरोक्षात् सर्वान्तर आत्मा ब्रह्माक्षरमन्तर्यामी प्रशास्ता औपनिषदः पुरुषो विज्ञानमानन्दं ब्रह्मेत्यधिगतम् । तदेव पुनरिन्धसंज्ञः प्रविविक्ताहारः, ततोऽन्तर्हृदये लिङ्गात्मा प्रविविक्ताहारतरः; ततः | इस प्रकार निरुपाधिक, निरुपाख्य (मन और वाणीका अविषय), 'नेति नेति' इस वाक्यसे निर्देश्य, साक्षात् अपरोक्ष, सर्वान्तर आत्मा, ब्रह्म, अक्षर, अन्तर्यामी, प्रशास्ता, औपनिषद पुरुष विज्ञान-आनन्दरूप ब्रह्म है—यह ज्ञात हुआ। वही फिर सूक्ष्माहार करनेवाला इन्धसंज्ञक वैश्वानर, फिर उससे भी सूक्ष्मतर आहार करनेवाला हृदयान्तर्वर्ती लिङ्गात्मा और फिर उससे भी |