बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 881, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थे ८६७
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| किमन्यदहं विद्यानिष्क्रयार्थं प्रयच्छामि, साक्षादात्मानमेव दत्तवते; अतो नमस्तेऽस्तु इमे विदेहास्तव यथेष्टं भुज्यन्ताम्; अयं चाहमस्मि दासभावे स्थितः; यथेष्टं मां राज्यं च प्रतिपद्यस्वेत्यर्थः ॥ ४ ॥ | हो । साक्षात् आत्माका ही दान करनेवाले आपको मैं इस विद्याके बदलेमें और क्या दूँ ? इसलिये आपको नमस्कार है; यह विदेह-राज्य आपका ही है, आप इसका यथेच्छ भोग करें और यह मैं भी आपके दासभावमें स्थित हूँ; तात्पर्य यह है कि मुझे और इस राज्यको आप इच्छानुसार प्राप्त करें ॥ ४ ॥ |
इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये चतुर्थाध्याये
द्वितीयं कूर्चब्राह्मणम् ॥ २ ॥
तृतीय ब्राह्मण
</div>| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| [उपक्रमः] जनकं ह वैदेहं याज्ञवल्क्यो जगामेत्यस्याभिसम्बन्धः ।<br><br>सम्बन्धः । विज्ञानमय आत्मा साक्षादपरोक्षाद् ब्रह्म सर्वान्तरः पर एव—'नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा नान्यदतोऽस्ति द्रष्टृ' इत्यादिश्रुतिभ्यः ।<br><br>स एष इह प्रविष्टो वदनादिलिङ्गः, अस्ति व्यतिरिक्त इति मधुकाण्डेऽजातशत्रुसंवादे प्राणादिकर्तृत्व- | 'जनकं ह वैदेहं याज्ञवल्क्यो जगाम' इत्यादि रूपसे आरम्भ होनेवाले ब्राह्मणका सम्बन्ध इस प्रकार है—विज्ञानमय आत्मा साक्षात् अपरोक्ष सर्वान्तर परब्रह्म ही है; जैसा कि 'इससे भिन्न कोई द्रष्टा नहीं है, इससे भिन्न कोई द्रष्टृ नहीं है' इत्यादि श्रुतियोंसे सिद्ध होता है । इस देहमें प्रविष्ट वह भाषणादि लिङ्गवाला विज्ञानात्मा शरीरसे भिन्न है—ऐसा मधुकाण्डमें अजातशत्रुके संवादमें [ गार्ग्य और काश्यके प्रश्नमें ] प्राणादिके कर्तृत्व- |