भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 878, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 878
८६४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४
प्रतिष्ठिता भवन्ति; हृदयाद् विप्ररूढास्ताः सर्वत्र कदम्बकेसरवत्; एताभिर्नाडीभिरत्यन्तसूक्ष्माभिरेतदन्नमास्रवद् गच्छदास्रवति गच्छति ।<br><br>तदेतद् देवताशरीरमनेनान्नेन दामभूतेनोपचीयमानं तिष्ठति; तस्माद् यस्मात् स्थूलेनान्नेनोपचितः पिण्डः, इदं तु देवताशरीरं लिङ्गं सूक्ष्मेणान्नेनोपचितं तिष्ठति। पिण्डोपचयकरमप्यन्नं प्रविविक्तमेव मूत्रपुरीषादिस्थूलमपेक्ष्य लिङ्गस्थितिकरं त्वन्नं ततोऽपि सूक्ष्मतरम्; अतः प्रविविक्ताहारः पिण्डः; तस्मात् प्रविविक्ताहारादपि प्रविविक्ताहारतर एष लिङ्गात्मा इवैव भवति । अस्माच्छरीराच्छरीरमेव शारीरं तस्माच्छारीरादात्मनो वैश्वानरात्तैजसः सूक्ष्मान्नेनोपचितो भवति ॥ ३ ॥प्रतिष्ठित हैं; कदम्ब-पुष्पकी केसरके समान ये हृदयसे सब ओर फैली हुई हैं; इन अत्यन्त सूक्ष्म नाड़ियोंसे जाता हुआ यह अन्न [ शरीरमें सर्वत्र ] जाता है ।<br><br>वह यह देवताशरीर इस रज्जुभूत अन्नसे बढ़ता ( पुष्टि पाता ) रहता है; अतः चूँकि पिण्ड स्थूल अन्नसे वृद्धिको प्राप्त होता है, यह देवताशरीररूप लिङ्गदेह सूक्ष्म अन्नसे वृद्धिको प्राप्त होता हुआ स्थित रहता है । मलमूत्रादि स्थूल भागकी अपेक्षा तो पिण्डकी वृद्धि करनेवाला अन्न भी सूक्ष्म ही है; उससे भी लिङ्गदेहकी स्थिति करनेवाला अन्न तो अत्यन्त सूक्ष्मतर है । अतः पिण्ड सूक्ष्माहारी है, उस सूक्ष्माहारीसे भी यह लिङ्गात्मा सूक्ष्मतर आहार करनेवाला ही है । इस शरीरसे—शरीर ही शारीर है, उस शारीर आत्मा वैश्वानरसे तैजस अधिक सूक्ष्म अन्नद्वारा उपचित होता है ॥ ३ ॥

प्राणात्मभूत विद्वान्‌की सर्वात्मकताका वर्णन, जनककी अभयप्राप्ति और याज्ञवल्क्यके प्रति आत्मसमर्पण

स एष हृदयभूतस्तैजसः सूक्ष्मभूतेन प्राणेन विध्रियमाणः प्राण एव भवति ।वह यह हृदयभूत तैजस सूक्ष्मभूत प्राणसे धारण किया जाकर प्राण ही हो जाता है ।