भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 877, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 877

ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८६३


शाङ्करभाष्यभाष्यार्थ
क्षते । स तयोरिन्द्रेन्द्राण्योर्हृदये मिथुनीभूतयोःसूक्ष्मासु नाडीष्वनुप्रविष्टः स्थितिहेतुर्भवति; तदेतदुच्यते—अथैनयोरेतदन्नमित्यादि ।हैं। वह सूक्ष्म नाड़ियोंमें अनुप्रविष्ट होकर हृदयमें मिथुनभावको प्राप्त हुए उन इन्द्र और इन्द्राणीकी स्थितिका कारण होता है; यही बात 'अथैनयोरेतदन्नम्' इत्यादि वाक्यसे कही जाती है।
किञ्चान्यत्, अथैनयोरेतत् प्रावरणम्; भुक्तवतोः स्वपतोश्च प्रावरणं भवति लोके, तत्सामान्यं हि कल्पयति श्रुतिः; किं तदिह प्रावरणम् ? यदेतदन्तर्हृदये जालकमिव—अनेकनाडीच्छिद्रबहुलत्वाज्जालकमिव ।इसके सिवा दूसरी बात यह है—यही इन दोनोंका प्रावरण है। लोकमें भोजन करनेवालों और सोनेवालोंका प्रावरण (आच्छादन) होता है, श्रुति उसीकी समानताकी कल्पना करती है। यहाँ वह प्रावरण क्या है ? यह जो हृदयके भीतर जाल-सा है—अनेक नाड़ीछिद्रोंकी बहुलता होनेके कारण जालके समान है।
अथैनयोरेषा सृतिर्मार्गः, सञ्चरतोऽनयेति सञ्चरणी, स्वप्नाज्जागरितदेशागमनमार्गः; का सा सृतिः ? यैषा हृदयाद् हृदयदेशादूर्ध्वाभिमुखी सती उच्चरति नाडी; तस्याः परिमाणमिदमुच्यते—यथा लोके केशः सहस्रधा भिन्नोऽत्यन्तसूक्ष्मो भवति, एवं सूक्ष्मा अस्य देहस्य सम्बन्धिन्यो हिता नाम हिता इत्येवं ख्याता नाड्यः; ताश्चान्तर्हृदये मांसपिण्डेऔर यह इनकी सृति यानी मार्ग है; इससे संचार करते हैं, इसलिये यह सञ्चरणी अर्थात् स्वप्नसे जागरित देशमें आनेका मार्ग है। वह मार्ग क्या है ? जो कि यह हृदयसे—हृदयदेशसे ऊपरकी ओर नाडी जाती है; यह उसका परिमाण बतलाया जाता है—लोकमें जिस प्रकार सहस्रों भागोंमें बाँटा हुआ केश अत्यन्त सूक्ष्म हो जाता है, इसी प्रकार इस देहसे सम्बन्ध रखनेवाली ये हिता-हिता नामसे विख्यात नाड़ियाँ सूक्ष्म होती हैं, तथा ये हृदयके भीतर मांस-पिण्डमें