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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ [१०७५

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ [१०७५


संस्कृत-भाष्यम्भाषार्थ
पत्तौ प्रदीपनिर्वाणवच्चक्षुरादीनां कार्यकारणानामत्रैव समवनयः— इति एष ज्ञानमार्गः पन्थाः, ब्रह्मणा परमात्मस्वरूपेणैव ब्राह्मणेन त्यक्तसर्वैषणेन, अनुवित्तः। तेन ब्रह्मविद्यामार्गेण ब्रह्मविदन्यः अपि एति।क्षय हो जानेपर कहीं जाना सम्भव न होनेसे दीपकके बुझ जानेके समान चक्षु आदि देह और इन्द्रियोंका यहीं लीन हो जाना है—यही मोक्षमार्ग है। ‘एष पन्थाः’ यह ज्ञानमार्ग ब्रह्मके द्वारा अर्थात् जिसने समस्त एषणाएँ त्याग दी हैं, उस परमात्मस्वरूप ब्रह्मज्ञके द्वारा ही अनुवित्त है। उस ब्रह्मविद्यारूप मार्गसे अन्य ब्रह्मवेत्ता भी ब्रह्मको प्राप्त हो सकता है।
कीदृशो ब्रह्मवित् तेन एति ? इत्युच्यते—पूर्वं पुण्यकृद् भूत्वा पुनस्त्यक्तपुत्राद्येषणः, परमात्मतेजस्यात्मानं संयोज्य तस्मिन्प्रभिनिर्वृत्तस्तैजसश्च–आत्मभूत इहैव इत्यर्थः; ईदृशो ब्रह्मवित् तेन मार्गेण एति।उस मार्गसे किस प्रकारका ब्रह्मवेत्ता जाता है ? सो बतलाया जाता है--पहले पुण्य करनेवाला होकर फिर पुत्रादि एषणाओंसे मुक्त हो जो परमात्मतेजमें अपनेको जोड़कर उसीमें उपशान्त हो गया है अर्थात् इस शरीरमें ही उस परमात्मतेजसे सम्पन्न आत्मभूत हो गया है, ऐसा ब्रह्मवेत्ता उस मार्गसे जाता है।
न पुनः पुण्यादिसमुच्चयकारिणो ग्रहणम्, विरोधादित्यवोचाम; “अपुण्यपुण्योपरमे यं पुनर्भवनिर्भयाः। शान्ताः संन्यासिनो यान्ति तस्मै मोक्षात्मने नमः॥” (महा० शा० ४७। ५५) इति च स्मृतेः; “त्यज धर्ममधर्मं च”यहाँ ‘पुण्यकृत्’ शब्दसे पुण्यादिसमुच्चय करनेवालोंको ग्रहण नहीं किया गया; क्योंकि ज्ञान और कर्मका परस्पर विरोध है--ऐसा हम कह चुके हैं। इस विषयमें “पाप और पुण्यकी निवृत्ति होनेपर जिसे पुनर्जन्मसे निर्भय एवं शान्त संन्यासी प्राप्त करते हैं, उस मोक्षात्माको नमस्कार है” ऐसी स्मृति भी है तथा “धर्म और अधर्मका त्याग करो’

१०७६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

१०७६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४

| इत्यादिपुण्यापुण्यत्यागोपदेशात्; <br> “निराशिषमनारम्भं निर्नमस्कार- <br> मस्तुतिम्। अद्गीणं क्षीणकर्माणं <br> तं देवा ब्राह्मणं विदुः॥” <br> “नैतादृशं ब्राह्मणस्यास्ति वित्तं <br> यथैकता समता सत्यता च। <br> शीलं स्थितिर्दण्डनिधानमार्जवं <br> ततस्ततश्चोपरमः क्रियाभ्यः॥” <br> इत्यादिस्मृतिभ्यश्च। | इत्यादि प्रकारसे पुण्य पापके त्याग- <br> का भी उपदेश दिया गया है। “जो <br> सब प्रकारकी आशाओंसे रहित, <br> आरम्भ-शून्य, नमस्कार और स्तुति <br> आदि न करनेवाला, निषिद्धाचरण- <br> से रहित और क्षीणकर्मा है, उसे <br> देवगण ब्राह्मण (ब्रह्मवेत्ता) मानते <br> हैं” तथा “ब्रह्मवेत्ताका ऐसा कोई <br> धन नहीं है जैसे कि एकता, <br> समता, सत्यता, शील, स्थिति, <br> अहिंसा, सरलता और विभिन्न <br> प्रकारकी क्रियाओंसे निवृत्त होना <br> है” इत्यादि स्मृतियोंसे भी यही <br> बात सिद्ध होती है। | | उपदेक्ष्यति च इहापि तु— <br> “एष नित्यो महिमा ब्राह्मणस्य <br> न वर्धते कर्मणा नो कनीयान्” <br> (४।४।२३) इति कर्म- <br> प्रयोजनाभावे हेतुमुक्त्वा, <br> “तस्मादेवंविच्छान्तो दान्तः” <br> (४।४।२३) इत्यादिना <br> सर्वक्रियोपरमम्। तस्माद् यथा- <br> व्याख्यातमेव पुण्यकृत्त्वम्। | यहाँ भी “यह ब्रह्मवेत्ताकी <br> नित्य महिमा है, जो कर्मसे न तो <br> बढ़ती है और न घटती ही है' इस <br> प्रकार कर्मके प्रयोजनके अभावमें <br> हेतु बतलाकर “अतः इस प्रकार <br> जाननेवाला शान्त, दान्त [उपरत <br> होकर ]” इत्यादि वाक्यसे सम्पूर्ण <br> क्रियाओंसे उपरतिका उपदेश दिया <br> जायगा। अतः यहाँ जिस प्रकार <br> ऊपर व्याख्या की गयी है, वही <br> ‘पुण्यकृत्’ का स्वरूप है। | | अथवा यो ब्रह्मवित् तेन <br> एति, स पुण्यकृत् तैजसश्च— <br> इति ब्रह्मवित्स्तुतिरेषा; पुण्य- <br> कृति तैजसे च योगिनि <br> महाभाग्यं प्रसिद्धं लोके, | अथवा जो ब्रह्मवेत्ता उस मार्गसे <br> जाता है वह पुण्यकर्मा और तैजस <br> है—इस प्रकार यह ब्रह्मवेत्ताकी <br> स्तुति है। पुण्यकृत् और तैजस <br> योगीमें महाभाग्य रहता है—यह <br> लोकमें प्रसिद्ध है; अतः लोकमें |

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थे १०७७

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थे १०७७


| ताभ्यामतो ब्रह्मवित् स्तूयते प्रख्यातमहाभाग्यत्वाल्लोके ॥९॥ | प्रख्यात महाभाग्यशाली होनेके कारण इन दोनों विशेषणोंसे ब्रह्मवेत्ताकी स्तुति की जाती है ॥६॥ |

विद्या और अविद्यारत पुरुषोंकी गति

अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते ।
ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायाꣳ रताः ॥१०॥

जो अविद्या (कर्म) की उपासना करते हैं, वे अज्ञानसंज्ञक अन्धकारमें प्रवेश करते हैं और जो विद्या (कर्मकाण्डरूप त्रयीविद्या) में रत हैं, वे उनसे भी अधिक अन्धकारमें प्रवेश करते हैं ॥ १० ॥

| अन्धम् अदर्शनात्मकं तमः संसारनियामकं प्रविशन्ति प्रतिपद्यन्ते; के ? ये अविद्यां विद्यातोऽन्यां साध्यसाधनलक्षणााम् उपासते, कर्म अनुवर्तन्त इत्यर्थः। ततस्तस्मादपि भूय इव बहुतरमिव तमः प्रविशन्ति; के ? ये उ विद्यायाम्, अविद्यावस्तुप्रतिपादिकायां कर्मार्थायां त्रय्यामेव विद्यायाम्, रता अभिरताः। विधिप्रतिषेधपर एव वेदः, नान्योऽस्ति इति, उपनिषदर्थानपेक्षिण इत्यर्थः ॥ १० ॥ | अन्ध अर्थात् संसारके नियामक अदर्शनात्मक (अज्ञानरूप) अन्धकारमें प्रवेश करते हैं; कौन ? जो अविद्या—विद्यासे भिन्न साध्य-साधनरूप कर्मकी उपासना अर्थात् अनुगमन करते हैं; और उससे भी भूयः इव—मानो अधिकतर अन्धकारमें वे प्रवेश करते हैं; कौन ? जो विद्यामें अर्थात् अविद्यारूप वस्तुका प्रतिपादन करनेवाली कर्मार्था त्रयीविद्यामें रत यानी अभिनिविष्ट हैं अर्थात् जो ऐसा समझकर कि वेद तो विधि-प्रतिषेधपरक ही है, उससे भिन्न नहीं है, उपनिषदर्थकी उपेक्षा करनेवाले हैं ॥ १० ॥ |


१०७८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४

१०७८बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ४

अज्ञानियोंको प्राप्त होनेवाले अनन्द लोकोंका वर्णन

यदि ते अदर्शनलक्षणं तमः प्रविशन्ति, को दोषः ? इत्युच्यते—यदि वे अदर्शनात्मक अन्धकारमें प्रवेश करते हैं तो दोष क्या है ? यह बतलाया जाता है—

अनन्दा नाम ते लोका अन्धेन तमसावृताः ।
ताꣳस्ते प्रेत्याभिगच्छन्त्यविद्वाꣳसोऽबुधो जनाः ॥ ११

वे अनन्द (असुख) नामके लोक अन्धतमसे व्याप्त हैं; वे अविद्वान् और अज्ञानीलोग मरकर उन्हींको प्राप्त होते हैं ॥ ११ ॥

अनन्दा अनानन्दा असुखा नाम ते लोकाः, तेन अन्धेनादर्शनलक्षणेन तमसा आवृता व्याप्ताः—ते तस्याज्ञानतमसो गोचराः । तान् ते प्रेत्य मृत्वा अभिगच्छन्ति अभियान्ति; के ? ये अविद्वांसः; किं सामान्येन अविद्वत्तामात्रेण ? नेत्युच्यते—अबुधः, बुधेः अवगमनार्थस्य धातोः क्विप्प्रत्ययान्तस्य रूपम्, आत्मावगमवर्जिता इत्यर्थः; जनाः प्राकृता एव जननधर्माणो वा इत्येतत् ॥ ११ ॥अनन्द—अनानन्द अर्थात् असुख नामके वे लोक उस अन्ध—अदर्शनरूप अन्धकारसे आवृत—व्याप्त हैं; अर्थात् वे उस अज्ञानान्धकारके विषय हैं। उन्हें वे मरकर प्राप्त होते हैं; कौन ? जो अविद्वान् हैं; क्या सामान्य अविद्वत्तामात्रसे ही उन्हें प्राप्त होते हैं। नहीं; यह बतलाया जाता है—जो अबुध हैं, यह अवगत्यर्थक बुध् धातुका क्विप्-प्रत्ययान्तरूप है, अर्थात् जो आत्म-ज्ञानसे रहित हैं वे जनाः—उपर्युक्त प्राकृत लोक ही अथवा जननधर्मी [ मनुष्यादि ही उन लोकोंको प्राप्त होते हैं ] ॥ ११ ॥

आत्मज्ञकी निश्चिन्त स्थिति

आत्मानं चेद् विजानीयादयमस्मीति पूरुषः ।
किमिच्छन् कस्य कामाय शरीरमनुसंज्वरेत् ॥१२॥

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०७९

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०७९

यदि पुरुष आत्माको 'मैं यह हूँ' इस प्रकार विशेषरूपसे जान जाय तो फिर क्या इच्छा करता हुआ और किस कामनासे शरीरके पीछे संतप्त हो ? ॥ १२ ॥

संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
आत्मानं स्वं परं सर्वप्राणिमनीषितज्ञं हृत्स्थमशनायादिधर्मातीतम्, चेद् यदि, विजानीयात् सहस्रेषु कश्चित्; चेदिति आत्मविद्याया दुर्लभत्वं दर्शयति; कथम् ? अयं पर आत्मा सर्वप्राणिप्रत्ययसाक्षी, यो नेति नेतीत्याद्युक्तः, यस्मान्नान्योऽस्ति द्रष्टा श्रोता मन्ता विज्ञाता, समः सर्वभूतस्थो नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावः—अस्मि भवामि—इति; पूरुषः पुरुषः, स किमिच्छन्-तत्स्वरूपव्यतिरिक्तम् अन्यद्वस्तु फलभूतं किमिच्छन् कस्य वा अन्यस्य आत्मनो व्यतिरिक्तस्य कामाय प्रयोजनाय; न हि तस्य आत्मन एष्टव्यं फलं न चाप्यात्मनोऽन्यः अस्ति, यस्ययदि सहस्रोंमें कोई एक आत्माको--अपने परस्वरूपको--सम्पूर्ण प्राणियोंकी बुद्धिवृत्तिको जाननेवाले हृदयस्थ और क्षुधादि धर्मोंसे अतीत आत्माको विशेषरूपसे जान जाय, 'चेत्' इस निपातसे श्रुति आत्मविद्याकी दुर्लभता प्रकट करती है, किस प्रकार जान जाय ? यह पर आत्मा सम्पूर्ण प्राणियोंके प्रत्ययों (ज्ञानों) का साक्षी, जो 'नेति नेति' इत्यादि वाक्योंद्वारा कहा गया है, जिससे भिन्न कोई दूसरा द्रष्टा, श्रोता, मन्ता और विज्ञाता नहीं है तथा सम, सम्पूर्ण भूतोंमें स्थित और नित्य-शुद्ध-बुद्ध-मुक्त-स्वरूप है, वह मैं हूँ--इस प्रकार जो पुरुष [जान जाय] वह क्या इच्छा करता हुआ—उस अपने स्वरूपके अतिरिक्त किस दूसरी फलभूत वस्तुकी इच्छा करता हुआ अथवा किस आत्मासे भिन्न वस्तुकी कामना अर्थात् प्रयोजनके लिये—क्योंकि उस आत्माके लिये कोई इच्छा करनेयोग्य फल है ही नहीं और न आत्मासे भिन्न कोई अन्य पदार्थ ही है, जिसकी

१०८० बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ४

१०८० बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ४

| कामाय इच्छति, सर्वस्य आत्मभूतत्वात्; अतः किमिच्छन् कस्य कामाय शरीरमनुसंज्वरेत्, भ्रं॑शेत्, शरीरोपाधिकृतदुःखमनु दुःखी स्यात्, शरीरतापमनुतप्येत। <br><br> अनात्मदर्शिनो हि तद् व्यतिरिक्तवस्त्वन्तरेप्सोः। 'ममेदं स्यात्, पुत्रस्य इदम्, भार्याया इदम्' इत्येवमीहमानः पुनःपुनर्जननमरणप्रबन्धरूढः शरीररोगमनु रुज्यते, सर्वात्मदर्शिनस्तु तदसम्भव इत्येतदाह ॥ १२ ॥ | कामनासे वह इच्छा करे, क्योंकि वह तो सबका आत्मस्वरूप हो जाता है। अतः वह क्या इच्छा करता हुआ और किस कामनाके लिये शरीरके पीछे संतप्त—भ्रष्ट हो? अर्थात् शरीररूप उपाधिके दुःखके पीछे दुःखी हो—शरीरके तापसे अनुतप्त हो। <br><br> जो शरीरादि अनात्मोंमें आत्मबुद्धि करनेवाला है, आत्मासे भिन्न वस्तुकी इच्छा करनेवाले उस अनात्मज्ञको ही वह (अनुताप) [हो सकता है]। 'मुझे यह मिल जाय, पुत्रको यह मिल जाय, पत्नीको यह हो जाय' इस प्रकार इच्छा करता हुआ वह पुनः-पुनः जन्म-मरणपरम्परामें पड़ा रहकर शरीरके रोगके पीछे रोगी होता है। किंतु सर्वात्मदर्शीको ऐसा होना असम्भव है—यही बात श्रुति यहाँ बतलाती है ॥ १२ ॥ |

आत्माका महत्त्व

| किं च— | इसके सिवा— |

यस्यानुवित्तः प्रतिबुद्ध आत्मास्मिन् संदेहो गहने प्रविष्टः। स विश्वकृत् स हि सर्वस्य कर्ता तस्य लोकः स उ लोक एव ॥ १३ ॥

इम अनेकों अनर्थोंसे पूर्ण और विवेक-विज्ञानके विरोधी विषम

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०८१

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०८१

शरीरमें प्रविष्ट हुआ आत्मा जिस ब्राह्मणको प्राप्त और ज्ञात हो गया है, वही विश्वकृत् (कृतकृत्य) है। वही सबका कर्ता है, उसीका लोक है और स्वयं वही लोक भी है ॥ १३ ॥

| यस्य ब्राह्मणस्य, अनुवित्तः— अनुलब्धः, प्रतिबुद्धः साक्षात्कृतः, कथम् ? अहमस्मि परं ब्रह्मेत्येवं प्रत्यगात्मत्वेनावगतः; आत्मा अस्मिन् संदेहे संदेहे-अनेकानर्थसंकटोपचये, गहने विषमे-अनेकशतसहस्रविवेकविज्ञानप्रतिपक्षे विषमे प्रविष्टः; स यस्य ब्राह्मणस्यानुवित्तः प्रतिबोधेनेत्यर्थः स विश्वकृद् विश्वस्य कर्ता; <br><br> कथं विश्वकृत्त्वम्, तस्य किं विश्वकृदिति नाम इत्याशङ्क्याह—स हि यस्मात् सर्वस्य कर्ता, न नाममात्रम्; न केवलं विश्वकृत् परप्रयुक्तः सन्, किं तर्हि ? तस्य लोकः सर्वः; किमन्यो लोकः, अन्योऽसौ ? इत्युच्यते—स उ लोक एव; लोकशब्देन | जिस ब्राह्मणको आत्मा अनुवित्त अनुलब्ध और प्रतिबुद्ध-साक्षात्कृत है, किस प्रकार—'मैं परब्रह्म हूँ' इस प्रकार प्रत्यगात्मस्वरूपसे ज्ञात है; इस संदेह्य—संदेह अर्थात् अनेकों अनर्थ-समूहोंके पुञ्ज और गहन—विषम यानी विवेक-विज्ञानके अनेकों शतसहस्र प्रतिपक्षोंके कारण विषमस्थानमें प्रविष्ट हुआ जो आत्मा है, वह जिस ब्राह्मणको प्रतिबोध—साक्षात्कारके द्वारा उपलब्ध है—ऐसा इसका तात्पर्य है, वह विश्वकृत्—विश्वका कर्ता ( रचनेवाला ) है । <br><br> उसका विश्वकर्तृत्व किस प्रकार है, क्या 'विश्वकृत्' यह उसका नाम है ? ऐसी आशङ्का करके श्रुति कहती है--क्योंकि वही सबका कर्ता है, यह केवल उसका नाम ही नहीं है। वह किसी अन्यके द्वारा प्रेरित होनेसे विश्वकृत् नहीं है; तो फिर क्या बात है ? उसीका सारा लोक है। तो क्या लोक दूसरा है और वह दूसरा है ?--इसपर कहा जाता है—वही लोक भी है। यहाँ |

१०८२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

१०८२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४
आत्मा उच्यते; तस्य सर्वं आत्मा, स च सर्वस्यात्मेत्यर्थः।<br><br>य एष ब्राह्मणेन प्रत्यगात्मा प्रतिबुद्धतया अनुवित्त आत्मा अनर्थसंकटे गहने प्रविष्टः स न संसारी, किंतु पर एव; यस्माद् विश्वस्य कर्ता सर्वस्य आत्मा, तस्य च सर्वं आत्मा। 'एक एवाद्वितीयः पर एवास्मि' इत्यनुसंधातव्य इति श्लोकार्थः ॥ १३ ॥'लोक' शब्दसे आत्मा कहा गया है। तात्पर्य यह है कि सब आत्मा उसके हैं और वह सबका आत्मा है।<br><br>आत्मा अनर्थपूर्ण और गहन-शरीरमें प्रविष्ट है—इस प्रकार जिस इस प्रत्यगात्माको ब्राह्मणने साक्षात्कारके द्वारा उपलब्ध कर लिया है, वह संसारी जीव नहीं है, अपितु पर ही है; क्योंकि वह विश्वका कर्ता है, सबका आत्मा है और उसीके सब आत्मा हैं। इस मन्त्रका तात्पर्य यह है कि मैं एकमात्र अद्वितीय परात्मा ही हूँ'—ऐसा अनुसन्धान करना चाहिये ॥ १३ ॥

आत्मज्ञानके बिना होनेवाली दुर्गति

किंच—तथा—

इहैव सन्तोऽथ विद्मस्तद्वयं न चेदवेदिर्महती विनष्टिः ।
ये तद्विदुरमृतास्ते भवन्त्यथेतरे दुःखमेवापियन्ति ॥ १४॥

हम इस शरीरमें रहते हुए ही यदि उसे जान लेते हैं [ तो कृतार्थ हो गये ] यदि उसे नहीं जाना तो बड़ी हानि है। जो उसे जान लेते हैं, वे अमृत हो जाते हैं; किंतु दूसरे लोग तो दुःखको ही प्राप्त होते हैं ॥ १४ ॥

इहैव—अनेकानर्थसंकुले मन्तो भवन्तः, अज्ञानदीर्घनिद्रामोहिताः सन्तः, कथंचिदिव ब्रह्मतत्त्वम् आत्मत्वेन अथ विद्मो विजानीमः,यहीं—इस अनेकों अनर्थपूर्ण शरीरमें रहते हुए ही अर्थात् अज्ञानरूप दीर्घ निद्रासे मोहित रहते हुए ही किसी प्रकार यदि हम उस ब्रह्मतत्त्वको—प्रकरण-प्राप्त इस ब्रह्मको आत्मभावसे

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १०८३

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १०८३


संस्कृत भाष्यभाष्यार्थ
तदेतद् ब्रह्म प्रकृतम्; अहो वयं कृतार्था इत्यभिप्रायः। यदेतद् ब्रह्म विजानीमः, तद् न चेद् विदितवन्तो वयम् वेदनं वेदः, वेदोऽस्यास्तीति वेदी, वेद्येव वेदिः, न वेदिः अवेदिः, ततः अहम् अवेदिः स्याम्। यदि अवेदिः स्याम्, को दोषः स्यात् ? महती अनन्तपरिमाणा जन्म-मरणादिलक्षणा विनष्टिः—विनशनम्। अहो वयमस्मान्महतो विनाशाद् विमुक्ताः, यदद्वयं ब्रह्म विदितवन्त इत्यर्थः।जान लें तब तो अहो ! हम कृतार्थ हो गये—ऐसा इसका अभिप्राय है। हम जिस इस ब्रह्मको जानते हैं; यदि उसे हमने न जाना होता, 'वेद' का अर्थ वेदन है, जिसे वेद (ज्ञान) है, उसे वेदी कहते हैं, वेदीको ही 'वेदि' कहा गया है, जो वेदि न हो वह 'अवेदि' है,—तो इससे मैं अवेदि हो जाता। यदि मैं 'अवेदि' हो जाता तो क्या दोष होता ? महती—जन्म-मरणादिरूप अनन्त परिमाणवाली विनष्टि--क्षति होती। तात्पर्य यह है कि हमने जो अद्वय ब्रह्मतत्त्वको जान लिया है, इससे अहो ! हम महान् विनाशसे मुक्त हो गये हैं।
यथा च वयं ब्रह्म विदित्वा अस्माद् विनशनाद् विप्रमुक्ताः, एवं ये तद्विदुः, अमृतास्ते भवन्ति; ये पुनः नैवं ब्रह्म विदुः, ते इतरे ब्रह्मविद्भ्योऽन्ये अब्रह्मविद इत्यर्थः दुःखमेव जन्ममरणादिलक्षणमेव अपियन्ति प्रतिपद्यन्ते न कदाचिदप्यविदुषां ततो विनिवृत्तिरित्यर्थः; दुःखमेव हि ते आत्मत्वेनोपगच्छन्तीति ॥ १४ ॥जिस प्रकार ब्रह्मको जानकर हम इस विनाशसे सम्यक् प्रकारसे मुक्त हो गये हैं, इसी प्रकार जो उसे जानते हैं, वे अमृत हो जाते हैं। किंतु जो उसे इस प्रकार नहीं जानते, वे इतर—ब्रह्मवेत्ताओंसे भिन्न अन्य लोग अर्थात् अब्रह्मवेत्ता जन्म-मरणादिरूप दुःखको ही प्राप्त होते हैं। तात्पर्य यह है कि अज्ञानियोंकी उससे कभी निवृत्ति नहीं होती, क्योंकि वे दुःखको ही (दुःखमय शरीरको ही) आत्मभावसे ग्रहण करते हैं ॥ १४ ॥

१०८४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४

१०८४बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ४

अभेददर्शी आत्मज्ञकी निर्भयता

यदैतमनुपश्यत्यात्मानं देवमञ्जसा।
ईशानं भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते ॥१५॥

जब भूत और भविष्यके स्वामी इस प्रकाशमान अथवा कर्म-फलदाता आत्माको मनुष्य साक्षात् जान लेता है तो यह उससे अपनी रक्षा करनेकी इच्छा नहीं करता ॥ १५ ॥

यदा पुनरेतमात्मानम्, कथंचित् परमकारुणिकं कांचिदाचार्यं प्राप्य ततो लब्धप्रसादः सन्, अनुपश्चात् पश्यति साक्षात्करोति स्वमात्मानम्, देवं द्योतनवन्तं दातारं वा सर्वप्राणिकर्मफलानां यथाकर्मानुरूपम्, अञ्जसा साक्षात्, ईशानं स्वामिनं भूतभव्यस्य कालत्रयस्येत्येतत्—न ततस्तस्मादीशानाद् देवादात्मानं विशेषेण जुगुप्सते गोपायितुमिच्छति।<br><br>सर्वो हि लोक ईश्वराद् गुप्तिमिच्छति भेददर्शी; अयं त्वेकत्वदर्शी न बिभेति कुतश्चन; अतो न तदा विजुगुप्सते, यदा ईशानं देवमञ्जसा आत्मत्वेन पश्यति। न तदा निन्दति वा कंचित्,किंतु जिस समय मनुष्य किसी प्रकार किसी परम करुणामय आचार्यके पास पहुँचकर उससे प्रसाद पाकर फिर इस आत्माको देख लेता है अर्थात् इस देव—द्योतनवान् अथवा कर्मोंके अनुसार प्राणियोंके सम्पूर्ण कर्मफलोंको देनेवाले तथा भूत-भविष्यत् आदि तीनों कालोंके स्वामी अपने आत्माका साक्षात्कार कर लेता है, उसे अञ्जसा—साक्षात् जान लेता है; तो उस ईशानदेवसे अपनेको विशेषरूपसे सुरक्षित रखनेकी इच्छा नहीं करता।<br><br>भेददर्शी सभी लोग ईश्वरसे अपनी रक्षा चाहते हैं; किंतु यह अभेददर्शी किसीसे नहीं डरता; इसलिये जब यह ईशानदेवको साक्षात् आत्मरूपसे देखता है तो अपनेको सुरक्षित रखनेकी इच्छा नहीं करता अथवा ‘न विजुगुप्सते’—उस समय किसीकी निन्दा नहीं करता, क्योंकि

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०८५

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०८५

| सर्वम् आत्मानं हि पश्यति, स एवं पश्यन् कमसौ निन्द्यात् ? ॥ १५॥ | सबको अपना आत्मा ही देखता है। जो इस प्रकार देखनेवाला है, वह किसकी निन्दा करे ? ॥ १५ ॥ |

देवोंद्वारा उपास्य आयुसंज्ञक ब्रह्म

| किं च— | तथा— |

यस्मादर्वाक्संवत्सरोऽहोभिः परिवर्तते । तद्देवा ज्योतिषां ज्योतिरायुर्होपासतेऽमृतम् ॥ १६॥

जिसके नीचे संवत्सरचक्र अहोरात्रादि अवयवोंके सहित चक्कर लगाता रहता है, उस आदित्यादि ज्योतियोंके ज्योतिःस्वरूप अमृतकी देवगण ‘आयु’ इस प्रकार उपासना करते हैं ॥ १६ ॥

| यस्मादीशानाद् अर्वाक्, यस्मादन्यविषय एवेत्यर्थः, संवत्सरः कालात्मा सर्वस्य जनिमतः परिच्छेत्ता, यम् अपरिच्छिन्दन् अर्वागेव वर्तते, अहोभिः स्वावयवैः—अहोरात्रैरित्यर्थः; तद् ज्योतिषां ज्योतिः—आदित्यादिज्योतिषामप्यवभासकत्वात्, आयुरित्युपासते देवाः, अमृतं ज्योतिः—अतोऽन्यद् म्रियते, न हि ज्योतिः । सर्वस्य हि एतज्ज्योतिः आयुः; आयुर्गुणेन यस्माद् देवास्तद्-ज्योतिरुपासते, तस्मादायुष्म- | जिस ईशानसे अर्वाक् अर्थात् जिससे दूसरे ही विषयवाला संवत्सर कालात्मा—जो सम्पूर्ण उत्पन्न होनेवालोंका परिच्छेद करनेवाला है, उस (ईशान) का परिच्छेद न करता हुआ 'अहोभिः' अर्थात् अपने अवयव अहोरात्रके द्वारा उससे नीचे ही रहता है, आदित्यादि ज्योतियोंके भी प्रकाशक होनेके कारण उस ज्योतियोंके ज्योतिकी देवगण 'आयु' इस प्रकार उपासना करते हैं। वह अमृत ज्योति है, उससे अन्य ज्योति मरती है, परन्तु यह ज्योति नहीं मरती। यह ज्योति सभीकी आयु है। क्योंकि देवगण इस ज्योतिकी आयुरूप गुणके कारण उपासना करते हैं, इसलिये वे आयुष्मान् होते |

१०८६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

१०८६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४

| न्तस्ते । तस्मादायुष्कामेन आयुर्गुणेनोपास्यं ब्रह्मेत्यर्थः ॥१६॥ | हैं। अतः तात्पर्य यह है कि जिसे आयुकी इच्छा हो वह ब्रह्मकी आयुरूप गुणके द्वारा उपासना करे ॥ १६ ॥ |

सर्वाधारभूत ब्रह्मको जाननेवाला मैं अमृत ही हूँ

किं च—तथा—

यस्मिन्पञ्च पञ्चजना आकाशश्च प्रतिष्ठितः ।
तमेव मन्य आत्मानं विद्वान् ब्रह्मामृतोऽमृतम् ॥ १७ ॥

जिसमें पाँच पञ्चजन और [ अव्याकृतसंज्ञक ] आकाश भी प्रतिष्ठित है, उस आत्माको ही मैं अमृत ब्रह्म मानता हूँ। उस ब्रह्मको जाननेवाला मैं अमृत ही हूँ ॥ १७ ॥

| यस्मिन् यत्र ब्रह्मणि, पञ्च पञ्चजनाः—गन्धर्वादयः पञ्चैव संख्याता गन्धर्वाः पितरो देवा असुरा रक्षांसि—निषादपञ्चमा वा वर्णाः; आकाशश्च अव्याकृताख्यः—यस्मिन् सूत्रम् ओतं च प्रोतं च—यस्मिन् प्रतिष्ठितः; “एतस्मिन् नु खल्वक्षरे गार्ग्याकाशः” ( ३।८।११ ) इत्युक्तम्; तमेव आत्मानम् अमृतं ब्रह्म मन्ये अहम्, न चाहमात्मानं ततोऽन्यत्वेन जाने । किं तर्हि ? अमृतोऽहं ब्रह्म विद्वान् सन्; अज्ञानमात्रेण तु मर्त्योऽहमासम्; तदपगमाद् विद्वानहममृत एव ॥ १७ ॥ | जिसमें—जिस ब्रह्ममें पाँच पञ्चजन—गन्धर्वादि, क्योंकि गंधर्व पितर, देव, असुर और राक्षस—इस प्रकार वे पाँच ही गिने गये हैं, अथवा निषाद जिनमें पाँचवाँ है, वे ब्राह्मणादि वर्ण तथा अव्याकृतसंज्ञक आकाश, जिसके विषयमें 'जिसमें सूत्र ओतप्रोत है' ऐसा कहा गया है, ये सब जिसमें प्रतिष्ठित हैं, “हे गार्गि ! इस अक्षरमें ही आकाश ओतप्रोत है” ऐसा पहले कहा भी गया है, उस आत्माको ही मैं अमृत ब्रह्म मानता हूँ, उससे भिन्नरूपसे मैं आत्माको नहीं जानता। तो फिर क्या हुआ ?—उस ब्रह्मको जाननेवाला होनेसे मैं अमृत हूँ, मैं अज्ञानमात्रसे ही मरणधर्मा था, उसकी निवृत्ति हो जानेसे मैं ब्रह्मवेत्ता अमृत ही हूँ ॥ १७ ॥ |

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १०८७

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १०८७


ब्रह्मको प्राणका प्राणादि जाननेवाले ही उसे जानते हैं

किं च तेन हि चैतन्यात्मज्योतिषावभास्यमानः प्राण आत्मभूतेन प्राणिति तेन प्राणस्यापि प्राणः सः—तथा उस आत्मभूत चैतन्यात्मज्योतिसे प्रकाशित होता हुआ ही प्राण प्राणक्रिया करता है, इसलिये वह प्राणका भी प्राण है —

प्राणस्य प्राणमुत चक्षुषश्चक्षुरुत श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो ये मनो विदुः । ते निचिक्युर्ब्रह्म पुराणमग्र्यम् ॥ १८ ॥

जो उसे प्राणका प्राण, चक्षुका चक्षु, श्रोत्रका श्रोत्र तथा मनका मन जानते हैं वे उस पुरातन और अग्र्य ब्रह्मको जानते हैं ॥ १८ ॥

तं प्राणस्य प्राणम्; तथा चक्षुषोऽपि चक्षुः; उत श्रोत्रस्यापि श्रोत्रम्; ब्रह्मशक्त्यधिष्ठितानां हि चक्षुरादीनां दर्शनादिसामर्थ्यम्; स्वतः काष्ठलोष्टसमानि हि तानि चैतन्यात्मज्योतिःशून्यानि, मनसोऽपि मनः—इति ये विदुः—चक्षुरादिव्यापारानुमितास्तित्वं प्रत्यगात्मानम्, न विषयभूतं ये विदुः, ते निचिक्युः—निश्चयेन ज्ञातवन्तो ब्रह्म, पुराणं चिरन्तनम्, अग्र्यम् अग्रे भवम् । "तद्यदात्मविदो विदुः" (मु० उ० २ । २ । ९) इति ह्याथर्वणे ॥ १८ ॥उसे जो प्राणका प्राण तथा चक्षुका भी चक्षु एवं श्रोत्रका भी श्रोत्र जानते हैं;—क्योंकि ब्रह्मकी शक्तिसे अधिष्ठित चक्षु आदिमें ही दर्शनादिका सामर्थ्य है, चैतन्यात्मज्योतिसे शून्य होनेपर तो वे स्वतः काष्ठ और मिट्टीके ढेलेके समान हैं—तथा वह मनका भी मन है—इस प्रकार जो जानते हैं अर्थात् चक्षु आदिके व्यापारसे जिसके अस्तित्वका अनुमान होता है, उस प्रत्यगात्माको जो 'वह इन्द्रियोंका विषयभूत नहीं है' इस प्रकार जानते हैं उन्होंने पुराण—पुरातन और अग्र्य—आगे रहनेवाले ब्रह्मको निश्चय ही जाना है । "वह जिसे आत्मवेत्ता जानते हैं" ऐसा आथर्वण-श्रुतिमें भी कहा है ॥१८॥

१०८८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

१०८८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४

नानात्वदर्शीकी दुर्गतिका वर्णन

तद्ब्रह्मदर्शने साधनमुच्यते—उस ब्रह्मदर्शनमें साधन बतलाया जाता है—

मनसैवानुद्रष्टव्यं नेह नानास्ति किञ्चन ।
मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति ॥१९॥

ब्रह्मको आचार्योपदेशपूर्वक मनसे ही देखना चाहिये। इसमें नाना कुछ भी नहीं है। जो इसमें नानाके समान देखता है, वह मृत्युसे मृत्युको प्राप्त होता है ॥ १९ ॥

मनसैव परमार्थज्ञानसंस्कृतेन आचार्योपदेशपूर्वकं चानुद्रष्टव्यम् । तत्र च दर्शनविषये ब्रह्मणि नेह नाना अस्ति किंचन किंचिदपि । असति नानात्वे, नानात्वमध्यारोपयत्यविद्यया, स मृत्योर्मरणात्, मृत्युं मरणम् आप्नोति । कोऽसौ ? य इह नानेव पश्यति । अविद्याध्यारोपणव्यतिरेकेण नास्ति परमार्थतो द्वैतमित्यर्थः ॥ १९ ॥परमार्थज्ञानसे संस्कारयुक्त हुए मनसे ही आचार्योपदेशपूर्वक उसे देखना चाहिये । उस दर्शनके विषयभूत ब्रह्ममें नाना कुछ भी नहीं है । नानात्वके न रहते हुए ही [जो] अविद्यासे उसमें नानात्वका आरोप करता है, वह मृत्यु यानी मरणसे मृत्यु—मरणको प्राप्त होता है । वह कौन है ? जो इसमें नानाके समान देखता है । तात्पर्य यह है कि अविद्याजनित आरोपके सिवा परमार्थतः द्वैत नहीं है ॥ १९ ॥

ब्रह्मदर्शनकी विधि

यस्मादेवं तस्मात्—क्योंकि ऐसा है, इसलिये—

एकधैवानुद्रष्टव्यमेतदप्रमेयं ध्रुवम् ।
विरजः पर आकाशादज आत्मा महान्ध्रुवः ॥ २० ॥

उस ब्रह्मको [ आचार्योपदेशके ] अनन्तर एक प्रकारसे ही देखना

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०८९

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०८९


चाहिये। यह ब्रह्म अप्रमेय, ध्रुव, निर्मल, [ अव्याकृतरूप ] आकाशसे भी सूक्ष्म, अजन्मा, आत्मा, महान् और अविनाशी है ॥ २० ॥

संस्कृत भाष्यभाष्यार्थ
एकधैव एकेनैव प्रकारेण विज्ञानघनैकरसप्रकारेण आकाशवन्निरन्तरेण अनुद्रष्टव्यम्, यस्मादेतद् ब्रह्म अप्रमयम् अप्रमेयम्, सर्वैकत्वात्; अन्येन हि अन्यत् प्रमीयते; इदं त्वेकमेव, अतोऽप्रमेयम्; ध्रुवं नित्यं कूटस्थमविचालीत्यर्थः ।एकधा—एक प्रकारसे ही अर्थात् आकाशके समान निरन्तर एकमात्र विज्ञानघन रसस्वरूपसे ही अनुदर्शन करना चाहिये (आचार्योपदेशके अनन्तर देखना चाहिये ); क्योंकि यह ब्रह्म अप्रमय-अप्रमेय है, कारण ब्रह्ममें सबकी एकता है। अन्यके द्वारा ही अन्यकी प्रमिति (प्रमाबुद्धि) होती है, किंतु ब्रह्म तो एक ही है, इसलिये यह अप्रमेय है तथा ध्रुव—कूटस्थ यानी विचलित न होनेवाला है।
ननु विरुद्धमिदमुच्यते—अप्रमेयं ज्ञायत इति च; 'ज्ञायते' इति प्रमाणैर्मीयत इत्यर्थः, 'अप्रमेयम्' इति च तत्प्रतिषेधः ।शङ्का—किंतु 'ब्रह्म अप्रमेय है और वह जाना जाता है' यह कथन तो विरुद्ध है। जाना जाता है—इससे तो यही तात्पर्य है कि प्रमाणोंद्वारा उसका मान होता है और अप्रमेय—ऐसा कहनेसे उसका प्रतिषेध होता है।
नैष दोषः, अन्यवस्तुवद् अनागमप्रमाणप्रमेयत्वप्रतिषेधार्थत्वात्; यथा अन्यानि वस्तूनि आगमनिरपेक्षैः प्रमाणैर्विषयी-समाधान—यहाँ यह दोष नहीं है; क्योंकि 'अप्रमेयम्' यह विशेषण, अन्य वस्तुओंके समान उसके आगमातिरिक्त प्रमाणसे प्रमित होनेका प्रतिषेध करनेके लिये है। जिस प्रकार अन्य वस्तुएँ आगमकी अपेक्षा न रखकर अन्य प्रमाणोंका विषय

बृ० उ० ६९—

१०९० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४

१०९०बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ४

| क्रियन्ते, न तथा एतदात्मतत्त्वं प्रमाणान्तरेण विषयीकर्तुं शक्यते; सर्वस्यात्मत्वे केन कं पश्येद् विजानीयात्—इति प्रमातृप्रमाणादिव्यापारप्रतिषेधेनैव आगमोऽपि विज्ञापयति, न तु अभिधानाभिधेयलक्षणवाक्यधर्माङ्गीकरणेन; तस्मान्नागमेनापि स्वर्गमेर्वादिवत् तत् प्रतिपाद्यते; प्रतिपादयित्रात्मभूतं हि तत्; प्रतिपादयितुः प्रतिपादनस्य प्रतिपाद्यविषयत्वात्, भेदे हि सति तद् भवति । | होती हैं, उस प्रकार यह आत्मतत्त्व किसी अन्य प्रमाणद्वारा विषय नहीं किया जा सकता। सभीके आत्मा होनेपर किसके द्वारा किसे देखे अर्थात् जाने—इस प्रकार शास्त्र भी प्रमाता-प्रमाणादि व्यवहारका प्रतिषेध करके ही उसका बोध कराता है, प्रतिपाद्य-प्रतिपादकरूप वाक्यके धर्मको स्वीकार करके नहीं। अतः शास्त्र भी उसका स्वर्ग एवं मेरु आदिके समान प्रतिपादन नहीं करता; क्योंकि वह तो प्रतिपादन करनेवालेका आत्मा ही है। प्रतिपादन करनेवालेका प्रतिपादन तो प्रतिपाद्यको विषय करनेवाला होता है और यह भेद होनेपर ही सम्भव है। | | ज्ञानं च तस्मिन् परात्मभावनिवृत्तिरेव; न तस्मिन् साक्षादात्मभावः कर्तव्यः, विद्यमानत्वादात्मभावस्य; नित्यो हि आत्मभावः सर्वस्य, अतद्विषय इव प्रत्यवभासते; तस्मादतद्विषयाभासनिवृत्तिव्यतिरेकेण न तस्मिन्नात्मभावो विधीयते; अन्यात्मभावनिवृत्तौ, आत्मभावः स्वात्मनि | यहाँपर अर्थात् देहादि अनात्मवस्तुओंमें आरोपित आत्मभावकी निवृत्ति ही ब्रह्मविषयक ज्ञान है। उस (ब्रह्म) में साक्षात् आत्मभाव करनेकी आवश्यकता नहीं है; क्योंकि आत्मभाव तो उसमें विद्यमान ही है। सबका ही ब्रह्मके साथ आत्मभाव नित्य सिद्ध है, केवल अज्ञानवश वह अब्रह्मविषयक-सा प्रतीत होता है; अतः अब्रह्मविषयक आत्मावभासकी निवृत्तिके सिवा उसमें आत्मभावका विधान नहीं किया जाता। अन्यात्मभावकी निवृत्ति हो जानेपर अपने आत्मामें |

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १०९१

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १०९१


| स्वाभाविको यः, स केवलो भवतीति—आत्मा ज्ञायत इत्युच्यते; स्वतश्चाप्रमेयः प्रमाणान्तरेण न विषयीक्रियते इति उभयमप्यविरुद्धमेव । | जो स्वाभाविक आत्मभाव है, वह शुद्ध हो जाता है; इसलिये आत्मा जान लिया गया—ऐसा कहा जाता है; किंतु स्वयं वह अप्रमेय है—किसी भी अन्य प्रमाणका विषय नहीं होता; अतः उसका अप्रमेयत्व और ज्ञान दोनों विरुद्ध नहीं हैं। | | विरजो विगतरजः, रजो नाम धर्माधर्मादिमलम्, तद्रहित इत्येतत् । परः—परो व्यतिरिक्तः सूक्ष्मो व्यापी वा आकाशादपि अव्याकृताख्यात् । अजः—न जायते; जन्मप्रतिषेधाद् उत्तरेऽपि भावविकाराः प्रतिषिद्धाः, सर्वेषां जन्मादित्वात् । आत्मा, महान् परिमाणतो महत्तरः सर्वस्मात्, ध्रुवोऽविनाशी ॥ २० ॥ | विरज—रजोहीन है, रज धर्माधर्मादिरूप मलको कहते हैं, उससे रहित है। 'आकाशात्परः'—अव्याकृतसंज्ञक जो आकाश है, उससे भी पर—व्यतिरिक्त—सूक्ष्म अथवा व्यापक है। अज—जन्म नहीं लेता; जन्मका प्रतिषेध करनेसे 'अस्ति वर्धते' आदि आगेके भावविकारोंका भी प्रतिषेध हो जाता है; क्योंकि सबका आरम्भ जन्मरूप भावविकारसे ही होता है। वह आत्मा है, महान् है—परिमाणमें सबसे बड़ा है तथा ध्रुव—अविनाशी है॥ २० ॥ |


ब्रह्मनिष्ठामें अधिक शास्त्राभ्यास बाधक है

तमेव धीरो विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत ब्राह्मणः ।
नानुध्यायाद् बहूञ्छब्दान् वाचो विग्लापनँ हि तदिति

बुद्धिमान् ब्राह्मणको उसे ही जानकर उसीमें प्रज्ञा करनी चाहिये। बहुत शब्दोंका अनुध्यान (निरन्तर चिन्तन) न करे; वह तो वाणीका श्रम ही है॥ २१॥

१०९२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

१०९२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४

| तमीदृशमात्मानमेव, धीरो धीमान् विज्ञाय उपदेशतः शास्त्रतश्च, प्रज्ञां शास्त्राचार्योपदिष्टविषयां जिज्ञासापरिसमाप्तिकरीम्, कुर्वीत ब्राह्मणः—एवं प्रज्ञाकरणसाधनानि संन्यासशमदमोपरमतितिक्षासमाधानानि कुर्यादित्यर्थः ।<br><br>न अनुध्यायात्—नानुचिन्तयेत्, बहून् प्रभूतान् शब्दान्; तत्र बहुत्वप्रतिषेधात् केवलात्मैकत्वप्रतिपादकाः स्वल्पाः शब्दा अनुज्ञायन्ते, "ओमित्येवं ध्यायथ आत्मानम्" (मु० उ० २ । २ । ६) "अन्या वाचो विमुञ्चथ" (मु० उ० २ । २ । ५) इति च आथर्वणे । वाचो विग्लापनं विशेषेण ग्लानिकरं श्रमकरम्, हि यस्मात्, तद् बहुशब्दाभिध्यानमिति ॥ २१ ॥ | धीर अर्थात् बुद्धिमान् ब्राह्मण उस ऐसे आत्माको ही आचार्यके उपदेश और शास्त्रसे जानकर, शास्त्र और आचार्यने जिसके विषयका उपदेश किया है तथा जो जिज्ञासाकी सर्वथा समाप्ति कर देनेवाली है, ऐसी प्रज्ञा (बुद्धि) करे। तात्पर्य यह है कि इस प्रकारकी प्रज्ञा उत्पन्न करनेके साधन संन्यास, शम, दम, उपरति, तितिक्षा और समाधिका पालन करे।<br><br>बहुत-से शब्दोंका अनुध्यान—अनुचिन्तन न करे। यहाँ बहुत्वका प्रतिषेध करनेसे केवल आत्माका एकत्व प्रतिपादन करनेवाले थोड़े-से शब्दोंके अनुशीलनके लिये अनुमति सूचित होती है। आथर्वणश्रुतिमें भी कहा है—"आत्माका ॐ इस प्रकार ध्यान करे", "अन्य वाणीका त्याग करो" इत्यादि। क्योंकि वह अधिक शब्दोंका अनुध्यान वाणीका विग्लापन—विशेषरूपसे ग्लानि करनेवाला अर्थात् श्रम उत्पन्न करनेवाला है ॥ २१ ॥ |

आत्माके स्वरूप, उसकी उपलब्धिके साधनभूत संन्यास और आत्मज्ञकी स्थितिका प्रतिपादन

सहेतुकौ बन्धमोक्षावभिहितौ मन्त्रब्राह्मणाभ्याम्; श्लोकैश्च पुन-मन्त्र और ब्राह्मण दोनोंके द्वारा बन्ध और मोक्षका कारणसहित निरूपण किया गया; फिर मन्त्रोंके

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०९३

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०९३


| मोक्षस्वरूपं विस्तरेण प्रतिपादितम् । एवमेतस्मिन् आत्मविषये सर्वो वेदो यथोपयुक्तो भवति, तत्तथा वक्तव्यमिति तदर्थेयं कण्डिका आरभ्यते । तच्च यथा अस्मिन् प्रपाठकेऽभिहितं सप्रयोजनमनूद्य अत्रैवोपयोगः कृत्स्नस्य वेदस्य काम्यराशिवर्जितस्य—इत्येवमर्थं उक्तार्थानुवादः ‘स वा एषः’ इत्यादिः । | द्वारा विस्तारसे मोक्षके स्वरूपका प्रतिपादन किया गया । इस प्रकार इस आत्मविषयमें जिस तरह सारा वेद उपयोगी होता है, उसे उसी प्रकार बतलाना है, अतः इसी प्रयोजनसे यह कण्डिका आरम्भ की जाती है । इस प्रपाठकमें सप्रयोजन (फलयुक्त) आत्मज्ञानका जिस प्रकार निरूपण किया गया है, उसी प्रकार उसका अनुवाद करके, काम्यवेदराशिको छोड़कर शेष सम्पूर्ण वेदका इसीमें उपयोग है—यह दिखानेके लिये, ‘स वा एषः’ इत्यादि मन्त्रमें उसका अनुवाद किया गया है— |

स वा एष महानज आत्मा योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु य एषोऽन्तर्हृदय आकाशस्तस्मिञ्छेते सर्वस्य वशी सर्वस्येशानः सर्वस्याधिपतिः स न साधुना कर्मणा भूयान्नो एवासाधुना कनीयानेष सर्वेश्वर एष भूताधिपतिरेष भूतपाल एष सेतुर्विधरण एषां लोकानामसम्भेदाय तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसानाशकेनैतमेव विदित्वा मुनिर्भवति । एतमेव प्रवाजिनो लोकमिच्छन्तः प्रव्रजन्ति । एतद्ध स्म वै तत्पूर्वे विद्वाꣳसः प्रजां न कामयन्ते किं प्रजया करिष्यामो येषां नोऽयमात्मायं लोक इति ते ह स्म पुत्रैषणायाश्च वित्तैषणायाश्च लोकैषणायाश्च व्युत्थायाथ भिक्षाचर्यं चरन्ति या ह्येव

१०९४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४

१०९४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४

पुत्रैषणा सा वित्तैषणा या वित्तैषणा सा लोकैषणोभे ह्येते एषणे एव भवतः। स एष नेति नेत्यात्मागृह्यो न हि गृह्यतेऽशीर्यो न हि शीर्यतेऽसङ्गो न हि सज्यतेऽसितो न व्यथते न रिष्यत्येतमु हैवैते न तरत इत्यतः पापमकरवमित्यतः कल्याणमकरवमित्युभे उ हैवैष एते तरति नैनं कृताकृते तपतः॥ २२॥

वह यह महान् अजन्मा आत्मा, जो कि यह प्राणोंमें विज्ञानमय है, जो यह हृदयमें आकाश है, उसमें शयन करता है। वह सबको वशमें रखनेवाला, सबका शासन करनेवाला और सबका अधिपति है। वह शुभ कर्मसे बढ़ता नहीं और अशुभ कर्मसे छोटा नहीं होता। यह सर्वेश्वर है; यह भूतोंका अधिपति और भूतोंका पालन करनेवाला है। इन लोकोंकी मर्यादा भङ्ग न हो—इस प्रयोजनसे वह इनको धारण करनेवाला सेतु है। [ उपनिषदोंमें जिसके स्वरूपका दिग्दर्शन कराया गया है ] उस इस आत्माको ब्राह्मण वेदोंके स्वाध्याय, यज्ञ, दान और निष्काम तपके द्वारा जाननेकी इच्छा करते हैं। इसीको जानकर मुनि होता है। इस आत्म-लोककी ही इच्छा करते हुए त्यागी पुरुष सब कुछ त्याग कर चले जाते (संन्यासी हो जाते) हैं। इस संन्यासमें कारण यह है—पूर्ववर्ती विद्वान् संतान [ तथा सकाम कर्म आदि ] की इच्छा नहीं करते थे। [ वे सोचते थे—] हमें प्रजासे क्या लेना है ? जिन हमको कि यह आत्मलोक अभीष्ट है। अतः वे पुत्रैषणा, वित्तैषणा और लोकैषणासे व्युत्थान कर फिर भिक्षाचर्या करते थे। जो भी पुत्रैषणा है, वही वित्तैषणा है और जो वित्तैषणा है, वही लोकैषणा है। ये दोनों एषणाएँ ही हैं। वह यह ‘नेति नेति’ इस प्रकार निर्देश किया गया आत्मा अगृह्य है, वह ग्रहण नहीं किया जाता, वह अशीर्य है, उसका नाश नहीं होता, असङ्ग है, वह कहीं आसक्त नहीं होता, बँधा नहीं है, इसलिये व्यथित नहीं होता तथा उसका क्षय नहीं होता। इस आत्मज्ञको ये दोनों ( पाप-पुण्यसम्बन्धी शोक,