भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1093, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1093

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०७९

यदि पुरुष आत्माको 'मैं यह हूँ' इस प्रकार विशेषरूपसे जान जाय तो फिर क्या इच्छा करता हुआ और किस कामनासे शरीरके पीछे संतप्त हो ? ॥ १२ ॥

संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
आत्मानं स्वं परं सर्वप्राणिमनीषितज्ञं हृत्स्थमशनायादिधर्मातीतम्, चेद् यदि, विजानीयात् सहस्रेषु कश्चित्; चेदिति आत्मविद्याया दुर्लभत्वं दर्शयति; कथम् ? अयं पर आत्मा सर्वप्राणिप्रत्ययसाक्षी, यो नेति नेतीत्याद्युक्तः, यस्मान्नान्योऽस्ति द्रष्टा श्रोता मन्ता विज्ञाता, समः सर्वभूतस्थो नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावः—अस्मि भवामि—इति; पूरुषः पुरुषः, स किमिच्छन्-तत्स्वरूपव्यतिरिक्तम् अन्यद्वस्तु फलभूतं किमिच्छन् कस्य वा अन्यस्य आत्मनो व्यतिरिक्तस्य कामाय प्रयोजनाय; न हि तस्य आत्मन एष्टव्यं फलं न चाप्यात्मनोऽन्यः अस्ति, यस्ययदि सहस्रोंमें कोई एक आत्माको--अपने परस्वरूपको--सम्पूर्ण प्राणियोंकी बुद्धिवृत्तिको जाननेवाले हृदयस्थ और क्षुधादि धर्मोंसे अतीत आत्माको विशेषरूपसे जान जाय, 'चेत्' इस निपातसे श्रुति आत्मविद्याकी दुर्लभता प्रकट करती है, किस प्रकार जान जाय ? यह पर आत्मा सम्पूर्ण प्राणियोंके प्रत्ययों (ज्ञानों) का साक्षी, जो 'नेति नेति' इत्यादि वाक्योंद्वारा कहा गया है, जिससे भिन्न कोई दूसरा द्रष्टा, श्रोता, मन्ता और विज्ञाता नहीं है तथा सम, सम्पूर्ण भूतोंमें स्थित और नित्य-शुद्ध-बुद्ध-मुक्त-स्वरूप है, वह मैं हूँ--इस प्रकार जो पुरुष [जान जाय] वह क्या इच्छा करता हुआ—उस अपने स्वरूपके अतिरिक्त किस दूसरी फलभूत वस्तुकी इच्छा करता हुआ अथवा किस आत्मासे भिन्न वस्तुकी कामना अर्थात् प्रयोजनके लिये—क्योंकि उस आत्माके लिये कोई इच्छा करनेयोग्य फल है ही नहीं और न आत्मासे भिन्न कोई अन्य पदार्थ ही है, जिसकी
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