भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1092, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1092
१०७८बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ४

अज्ञानियोंको प्राप्त होनेवाले अनन्द लोकोंका वर्णन

यदि ते अदर्शनलक्षणं तमः प्रविशन्ति, को दोषः ? इत्युच्यते—यदि वे अदर्शनात्मक अन्धकारमें प्रवेश करते हैं तो दोष क्या है ? यह बतलाया जाता है—

अनन्दा नाम ते लोका अन्धेन तमसावृताः ।
ताꣳस्ते प्रेत्याभिगच्छन्त्यविद्वाꣳसोऽबुधो जनाः ॥ ११

वे अनन्द (असुख) नामके लोक अन्धतमसे व्याप्त हैं; वे अविद्वान् और अज्ञानीलोग मरकर उन्हींको प्राप्त होते हैं ॥ ११ ॥

अनन्दा अनानन्दा असुखा नाम ते लोकाः, तेन अन्धेनादर्शनलक्षणेन तमसा आवृता व्याप्ताः—ते तस्याज्ञानतमसो गोचराः । तान् ते प्रेत्य मृत्वा अभिगच्छन्ति अभियान्ति; के ? ये अविद्वांसः; किं सामान्येन अविद्वत्तामात्रेण ? नेत्युच्यते—अबुधः, बुधेः अवगमनार्थस्य धातोः क्विप्प्रत्ययान्तस्य रूपम्, आत्मावगमवर्जिता इत्यर्थः; जनाः प्राकृता एव जननधर्माणो वा इत्येतत् ॥ ११ ॥अनन्द—अनानन्द अर्थात् असुख नामके वे लोक उस अन्ध—अदर्शनरूप अन्धकारसे आवृत—व्याप्त हैं; अर्थात् वे उस अज्ञानान्धकारके विषय हैं। उन्हें वे मरकर प्राप्त होते हैं; कौन ? जो अविद्वान् हैं; क्या सामान्य अविद्वत्तामात्रसे ही उन्हें प्राप्त होते हैं। नहीं; यह बतलाया जाता है—जो अबुध हैं, यह अवगत्यर्थक बुध् धातुका क्विप्-प्रत्ययान्तरूप है, अर्थात् जो आत्म-ज्ञानसे रहित हैं वे जनाः—उपर्युक्त प्राकृत लोक ही अथवा जननधर्मी [ मनुष्यादि ही उन लोकोंको प्राप्त होते हैं ] ॥ ११ ॥

आत्मज्ञकी निश्चिन्त स्थिति

आत्मानं चेद् विजानीयादयमस्मीति पूरुषः ।
किमिच्छन् कस्य कामाय शरीरमनुसंज्वरेत् ॥१२॥

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