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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

| १०६४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |

१०६४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४
संस्कृतहिन्दी अनुवाद
धर्माधर्माविति पूर्वपक्षं कृत्वा काम एवेत्यवधारितम्। यथा च ब्राह्मणेन अयमर्थोऽवधारितः, एवं मन्त्रेणापीति बन्धं बन्धकारणं चोक्त्वोपसंहृतं प्रकरणम् 'इति नु कामयमानः' इति।साक्षात् प्रेरक धर्म और अधर्म हैं--ऐसा पूर्वपक्ष करके यह निश्चय किया गया कि काम ही उनका प्रेरक है। जिस प्रकार ब्राह्मणभागके द्वारा इस अर्थका निश्चय किया था, वैसे ही मन्त्रके द्वारा भी बन्ध और बन्धके कारणका वर्णन कर 'इति नु कामयमानः' इत्यादि पदोंसे इस प्रकरणका उपसंहार कर दिया गया।
'अथाकामयमानः' इत्यारभ्य सुषुप्तदृष्टान्तस्य दार्ष्टान्तिकभूतः सर्वात्मभावो मोक्ष उक्तः। मोक्षकारणं च आत्मकामतया यद् आप्तकामत्वमुक्तम्, तच्च सामर्थ्यान्नात्मज्ञानमन्तरेण आत्मकामतयाऽऽप्तकामत्वमिति—सामर्थ्याद् ब्रह्मविद्यैव मोक्षकारणमित्युक्तम्। अतो यद्यपि कामो मूलमित्युक्तम्, तथापि मोक्षकारणविपर्ययेण बन्धकारणमविद्या-इत्येतदप्युक्तमेव भवति।फिर 'अथाकामयमानः' इस प्रकार आरम्भ कर सुषुप्तावस्थारूप दृष्टान्तके दार्ष्टान्तिकभूत सर्वात्मभावरूप मोक्षका वर्णन किया गया। यहाँ मोक्षका कारण जो आत्मकामतत्वके द्वारा आप्तकामत्व बतलाया गया है, वह आत्मकामतद्वारा आप्तकामत्व प्रकरणकी सामर्थ्यसे आत्मज्ञानके बिना हो नहीं सकता, अतः सामर्थ्यसे ब्रह्मविद्या ही मोक्षका कारण बतलायी गयी है। इसलिये यद्यपि संसारका मूल काम है--यह बतलाया गया है, तथापि यह बात भी कही हुई हो ही जाती है कि मोक्षके कारण ज्ञानसे विपरीत अज्ञान ही बन्धनका कारण है।
अत्रापि मोक्षो मोक्षसाधनं च ब्राह्मणेनोक्तम्; तस्यैव दृढीकर-यहाँ भी मोक्ष और मोक्षका साधन--ये ब्राह्मणभागद्वारा बतलाये गये हैं।

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०६५

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०६५


णाय मन्त्र उदाह्रियते श्लोक-शब्दवाच्यः—उसीको दृढ करनेके लिये श्लोक-शब्दवाच्य मन्त्रका उल्लेख किया जाता है—

विद्वान्‌का अनुत्क्रमण

तदेष श्लोको भवति। यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः। अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुत इति। तद्यथाहिनिर्ल्वयनी वल्मीके मृता प्रत्यस्ता शयीतैवमेवेदं शरीरं शेतेऽथायमशरीरोऽमृतः प्राणो ब्रह्मैव तेज एव सोऽहं भगवते सहस्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः ॥ ७ ॥

उसी अर्थमें यह मन्त्र है—जिस समय इसके हृदयमें आश्रित सम्पूर्ण कामनाओंका नाश हो जाता है तो फिर यह मरणधर्मा अमृत हो जाता है और यहीं (इस शरीरमें ही) उसे ब्रह्मकी प्राप्ति हो जाती है। इसमें दृष्टान्त—जिस प्रकार सर्पकी कांचुली बाँबीके ऊपर मृत और सर्पद्वारा परित्यक्त हुई पड़ी रहती है, उसी प्रकार यह शरीर पड़ा रहता है और यह अशरीर अमृत प्राण तो ब्रह्म ही है—तेज ही है। तब विदेहराज जनकने कहा, 'वह मैं जनक श्रीमान्‌को सहस्र गौएँ देता हूँ' ॥ ७ ॥

तत् तस्मिन्नेवार्थे एष श्लोको मन्त्रो भवति। यदा यस्मिन् काले सर्वे समस्ताः कामाः तृष्णाप्रभेदाः प्रमुच्यन्ते, आत्मकामस्य ब्रह्मविदः समूलतो विशीर्यन्ते, ये प्रसिद्धा लोके इहामुत्रार्थाः पुत्रवित्तलोकैषणालक्षणा अस्य प्रसिद्धस्य पुरुषस्य हृदि बुद्धौ श्रिता'तत्'—उसी अर्थमें यह श्लोक यानी मन्त्र है—जब—जिस समय सर्व अर्थात् समस्त काम—तृष्णाओं के भेद सर्वथा छूट जाते हैं, आत्मकामी ब्रह्मवेत्ताकी वे समस्त कामनाएँ समूल नष्ट हो जाती हैं; जो लोकमें प्रसिद्ध पुत्रैषणा, वित्तैषणा और लोकैषणारूप ऐहिक और पारलौकिक कामनाएं इस पुरुषके हृदय—बुद्धिमें आश्रित हैं [ वे जब

१०६६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

१०६६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४
आश्रिताः—अथ तदा मर्त्यो मरणधर्मा सन्, कामवियोगात् समूलतः, अमृतो भवति ।समूल नष्ट हो जाती हैं ] तब यह मर्त्य—मरणधर्मा होनेपर भी कामनाओंका समूल नाश हो जानेके कारण अमृत हो जाता है ।
अर्थादनात्मविषयाः कामा अविद्यालक्षणा मृत्यव इत्येतदुक्तं भवति; अतो मृत्युवियोगे विद्वान् जीवन्नेव अमृतो भवति । अत्र अस्मिन्नेव शरीरे वर्तमानो ब्रह्म समश्नुते, ब्रह्मभावं मोक्षं प्रतिपद्यत इत्यर्थः । अतो मोक्षो न देशान्तरगमनाद्यपेक्षते । तस्माद् विदुषो नोत्क्रामन्ति प्राणाः, यथावस्थिता एव स्वकारणे पुरुषे समवनीयन्ते; नाममात्रं हि अवशिष्यते—इत्युक्तम् ।यहाँ अर्थतः यह बात कह दी गयी कि अनात्मविषयक कामनाएँ ही अविद्यारूप मृत्यु हैं, अतः मृत्युका वियोग हो जानेपर विद्वान् जीवित रहते हुए ही अमृत हो जाता है । वह यहाँ—इस शरीरमें ही रहता हुआ ब्रह्मको अर्थात् ब्रह्मभावरूप मोक्षको प्राप्त कर लेता है । अतः मोक्षको देशान्तरमें जाने आदिकी अपेक्षा नहीं है; इसलिये विद्वान्के प्राणोंका उत्क्रमण नहीं होता । वे जैसेके तैसे ही अपने कारण पुरुषमें पूर्णतया लीन हो जाते हैं, केवल नाममात्र ही बच रहता है--ऐसा ऊपर कहा गया है ।
कथं पुनः समवनीतेषु प्राणेषु देहे च स्वकारणे प्रलीने विद्वान् मुक्तोऽत्रैव सर्वात्मा सन् वर्तमानः पुनः पूर्ववद् देहित्वं संसारित्वलक्षणं न प्रतिपद्यते ? इत्यत्रोच्यते—तत्तत्रायं दृष्टान्तः—<br><br>यथा लोके 'अहिः सर्पः, तस्यकिंतु प्राणोंके लीन हो जानेपर तथा देहके अपने कारणमें मिल जानेपर विद्वान् किस प्रकार मुक्त होकर अर्थात् यहीं सर्वात्मा होकर विद्यमान रहते हुए पूर्ववत् पुनः संसारित्वरूप देहिभावको प्राप्त नहीं होता ? इस विषयमें अब कहा जाता है—उसमें यह दृष्टान्त है—जिस प्रकार लोकमें अहि—सर्प, उसकी

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १०६७

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १०६७


संस्कृतहिन्दी
निर्व्वयनी--निर्मोकः, सा अहिनिर्व्वयनी, वल्मीके सर्पाश्रये वल्मीकादावित्यर्थः, मृता प्रत्यस्ता प्रक्षिप्ता अनात्मभावेन सर्पेण परित्यक्ता, शयीत वर्तेत एवमेव यथायं दृष्टान्तः, इदं शरीरं सर्पस्थानीयेन मुक्तेन अनात्मभावेन परित्यक्तं मृतमिव शेते ।निर्व्वयनी—काँचुली अर्थात् सर्पकी काँचुली वल्मीक—सर्पके आश्रय यानी बाँबी आदिपर मृत और प्रत्यस्त—सर्पद्वारा अनात्मभावसे प्रक्षिप्त--परित्यक्त होकर पड़ी रहती है; इसी प्रकार जैसा कि यह दृष्टान्त है, यह शरीर सर्पस्थानीय मुक्त पुरुषके द्वारा अनात्मभावसे परित्यक्त होकर मरे हुएके समान पड़ा रहता है।
अथेतरेः सर्पस्थानीयो मुक्तः सर्वात्मभूतः सर्पवत्तत्रैव वर्तमानोऽप्यशरीर एव, न पूर्ववत् पुनः सशरीरो भवति । कामकर्मप्रयुक्तशरीरात्मभावेन हि पूर्वं सशरीरो मर्त्यश्च; तद्वियोगादथ इदानीमशरीरः, अत एव च अमृतः, प्राणः प्राणीतीति प्राणः- 'प्राणस्य प्राणम्' (४।४।१८) इति हि वक्ष्यमाणे श्लोके, "प्राणबन्धनं हि सोम्य मनः" (छा० उ० ६।८।२) इति च श्रुत्यन्तरे; प्रकरणवाक्यसामर्थ्याच्च पर एव आत्मा अत्र प्राणशब्दवाच्यः; ब्रह्मैव परमात्मैव । किं पुनस्तत् ? तेज एव विज्ञानं ज्योतिः, येनऔर उससे भिन्न जो सर्पस्थानीय सर्वात्मभूत मुक्त पुरुष है, वह सर्पके समान वहीं रहता हुआ भी अशरीर ही रहता है, पूर्ववत् पुनः शरीरयुक्त नहीं होता। वह पहले कामकर्मप्रयुक्त शरीरात्मभावसे ही सशरीर और मरणधर्मा था; उसके न रहनेसे अब वह अशरीर है और इसीलिये अमृत है; वह प्राण—प्राणक्रिया करता है, इसलिये प्राण है। 'वह प्राणका प्राण है' ऐसा आगे कहे जानेवाले मन्त्रमें और "हे सोम्य ! मन प्राणरूप बन्धनवाला है" ऐसा एक अन्य श्रुतिमें कहा भी है। प्रकरणके वाक्यका सामर्थ्यसे भी यहाँ परमात्मा ही 'प्राण' शब्दका वाच्य है। ब्रह्म ही अर्थात् परमात्मा ही है। और वह क्या है ? तेज ही है-विज्ञानरूप ज्योति ही है, जिस

१०६८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

१०६८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४

संस्कृतहिन्दी
आत्मज्योतिषा जगदवभास्यमानं प्रज्ञानेत्रं विज्ञानज्योतिष्मत् सदविभ्रंशद् वर्तते ।आत्मज्योतिसे अवभासित होता हुआ जगत् प्रज्ञानेत्र और विज्ञान-ज्योतिर्मय होकर विशेषरूपसे च्युत न होता हुआ विद्यमान रहता है ।
यः कामप्रश्नो विमोक्षार्थो याज्ञवल्क्येन वरो दत्तो जनकाय, सहेतुको बन्धमोक्षार्थलक्षणो दृष्टान्तदार्ष्टान्तिकभूतः स एष निर्णीतः सविस्तरो जनकयाज्ञवल्क्याख्यायिकारूपधारिण्या श्रुत्या; संसारविमोक्षोपाय उक्तः प्राणिभ्यः । इदानीं श्रुतिः स्वयमेवाह—विद्यानिष्क्रयार्थं जनकेनैवमुक्तमिति; कथम् ? सोऽहमेवं विमोक्षितस्त्वया भगवते तुभ्यं विद्यानिष्क्रयार्थं सहस्रं ददामि-इति ह एवं किल उवाच उक्तवान् जनको वैदेहः ।याज्ञवल्क्यने विमोक्षके लिये जनकको जो कामप्रश्नरूप वर दिया था, उस दृष्टान्तदार्ष्टान्तिकभूत बन्धमोक्षार्थलक्षण सहेतुक प्रश्नका जनक-याज्ञवल्क्य-आख्यायिकारूप-धारिणी श्रुतिने विस्तारपूर्वक निर्णय कर दिया तथा प्राणियोंको संसार-से मुक्त होनेका उपाय भी बतला दिया । अब श्रुति स्वयं ही कहती है कि इस विद्याका बदला चुकाने-के लिये जनकने इस प्रकार कहा । किस प्रकार ? आपके द्वारा इस प्रकार विमुक्त किया हुआ मैं इस विद्यादानसे उऋण होनेके लिये आप श्रीमान्‌को एक सहस्र [गौएँ] देता हूँ—ऐसा विदेहराज जनकने कहा ।
अत्र कस्माद् विमोक्षपदार्थे निर्णीते, विदेहराज्यमात्मानमेव च न निवेदयति, एकदेशोक्ताविव सहस्रमेव ददाति ? तत्र कोऽभिप्राय इति ?यहाँ मोक्षतत्त्वका निर्णय हो जानेपर भी जनक विदेहराज्य और अपनेको ही समर्पण क्यों नहीं कर देता ? उसका जैसे एकदेश ही कहा गया हो—इस प्रकार केवल सहस्र [ गौएँ ] ही क्यों देता है ? इसमें उसका क्या अभिप्राय है ?

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थे १०६६

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थे १०६६

संस्कृत (शाङ्करभाष्यम्)हिन्दी अनुवाद
अत्र केचिद् वर्णयन्ति—अध्यात्मविद्यारसिको जनकः श्रुतमप्यर्थं पुनर्मन्त्रैः शुश्रूषति; अतो न सर्वमेव निवेदयति; श्रुत्वाभिप्रेतं याज्ञवल्क्यात् पुनरन्ते निवेदयिष्यामीति हि मन्यते, यदि चात्रैव सर्वं निवेदयामि, निवृत्ताभिलाषोऽयं श्रवणादिति मत्वा, श्लोकान् न वक्ष्यति—इति च भयात् सहस्रदानं शुश्रूषालिङ्गज्ञापनायेति ।<br><br>सर्वमप्येतदसत्, पुरुषस्येव प्रमाणभूतायाः श्रुतेर्व्याजानुपपत्तेः । अर्थशेषोपपत्तेश्च—विमोक्षपदार्थे उक्तेऽपि आत्मज्ञानसाधने आत्मज्ञानशेषभूतः सर्वैषणापरित्यागः संन्यासाख्यो वक्तव्योऽर्थशेषो विद्यते; तस्माच्छ्लोकमात्रशुश्रूषाकल्पना अनृज्वी; अगति-यहां कोई-कोई ऐसा कहते हैं—जनक अध्यात्मविद्याका रसिक है, वह सुनी हुई बातको भी पुनः-पुनः मन्त्रोंके द्वारा सुनना चाहता है। इसलिये वह सारेको ही समर्पण नहीं करता। वह ऐसा समझता है कि याज्ञवल्क्यसे अपना सारा अभिमत विषय सुनकर अन्तमें सर्वस्व समर्पण करूँगा तथा उसे यह भय भी है कि यदि मैं यहीं सब कुछ दे डालूँगा तो याज्ञवल्क्यजी यह समझकर कि अब इसकी श्रवण करनेकी इच्छा निवृत्त हो गयी है, मन्त्रोंद्वारा इसका वर्णन नहीं करेंगे। अतः यह सहस्रदान उसकी शुश्रूषाके लिङ्गको सूचित करनेके लिये है।<br><br>किंतु ये सब बातें ठीक नहीं हैं; क्योंकि साधारण मनुष्योंकी भांति प्रमाणभूत श्रुतिके लिये किसी बहानेकी आवश्यकता नहीं हो सकती। इसके सिवा, अभी कुछ वक्तव्य अर्थ शेष है, इससे भी सहस्रमात्र दान संगत है। मोक्षतत्त्वका निरूपण हो जानेपर भी आत्मज्ञानका साधन और आत्मज्ञानका शेषभूत सर्वैषणात्यागरूपसंन्याससंज्ञक वक्तव्य विषय अभी अवशिष्ट है ही। अतः मन्त्रश्रवणमात्रकी इच्छाकी कल्पना करना क्लिष्ट

१०७० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

१०७०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४

| का हि गतिः पुनरुक्तार्थकल्पना; सा चायुक्ता सत्यां गतौ । न च तत् स्तुतिमात्रमित्यवोचाम । | है। एक बार कहे हुए विषयके पुनः कहनेकी कल्पना करना तो अगतिकगति है। गति रहते हुए तो वैसी कल्पना करनी उचित नहीं है। और यह [ संन्यासादि ] स्तुतिमात्र हैं नहीं—यह हम पहले कह चुके हैं। | | ननु—एवं सति 'अत ऊर्ध्वं विमोक्षायैव' इति वक्तव्यम्— | प्र०—किंतु यदि ऐसा होता तो 'इसके आगे विमोक्षके लिये ही कहिये' ऐसा कहना चाहिये था ? | | नैष दोषः; आत्मज्ञानवद् अप्रयोजकः संन्यासः पक्षे प्रतिपत्तिकर्मवत्—इति हि मन्यते; "संन्यासेन तनुं त्यजेत्" इति स्मृतेः । साधनत्वपक्षेऽपि न 'अत ऊर्ध्वं विमोक्षायैव' इति प्रश्नमर्हति, मोक्षसाधनभूतात्मज्ञानपरिपाकार्थत्वात् ॥ ७ ॥ | उ०—यहाँ यह दोष नहीं है, क्योंकि जनक ऐसा समझता है कि आत्मज्ञानके समान संन्यास मोक्षका प्रयोजक ( साक्षात् साधन ) नहीं है, १प्रतिपत्तिकर्मके समान उसका पाक्षिक अनुष्ठान किया जा सकता है, जैसा कि "संन्यासके द्वारा शरीर त्याग करे" इस स्मृतिसे सिद्ध होता है। यदि उसे ( विविदिषासंन्यासको ) साधनपक्षमें माना जाय तो भी उसके विषयमें 'इससे आगे मोक्षके लिये ही कहिये' ऐसा प्रश्न नहीं किया जा सकता; क्योंकि संन्यास तो मोक्षके ही साधनभूत आत्मज्ञानके परिपाकके लिये है ॥ ७ ॥ |

आत्मकामी ब्रह्मवेत्ताको मोक्ष प्राप्त होता है—इसमें प्रमाणभूत मन्त्र

तदेते श्लोका भवन्ति । अणुः पन्था विततः पुराणो


१. ज्ञानके साधनभूत कर्मोंको यहाँ प्रतिपत्तिकर्म कहा गया है।

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०७१

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०७१

माᳵ स्पृष्टोऽनुवित्तो मयैव । तेन धीरा अपियन्ति ब्रह्मविदः स्वर्गं लोकमित ऊर्ध्वं विमुक्ताः ॥ ८ ॥

उस विषयमें ये मन्त्र हैं—यह ज्ञानमार्ग सूक्ष्म, विस्तीर्ण और पुरातन है। वह मुझे स्पर्श किये हुए है और मैंने ही उसका फल साधक ज्ञान प्राप्त किया है। धीर ब्रह्मवेत्ता पुरुष इस लोकमें जीते-जी ही मुक्त होकर शरीर-त्यागके बाद उसी मार्गसे स्वर्गलोक अर्थात् मोक्षको प्राप्त होते हैं ॥ ८ ॥

| आत्मकामस्य ब्रह्मविदो मोक्ष इत्येतस्मिन्नर्थे मन्त्रब्राह्मणोक्ते, विस्तरप्रतिपादका एते श्लोका भवन्ति । अणुः सूक्ष्मः पन्था दुर्विज्ञेयत्वात्; विततः विस्तीर्णः, विस्पष्टतरणहेतुत्वाद्वा ‘वितरः’ इति पाठान्तरात्, मोक्षसाधनो ज्ञानमार्गः । पुराणश्चिरंतनो नित्यश्रुतिप्रकाशितत्वात्, न तार्किकबुद्धिप्रभवकुदृष्टिमार्गवदर्वाकालिकः । मां स्पृष्टो मया लब्ध इत्यर्थः; यो हि येन लभ्यते, स तं स्पृशतीव संबध्यते । तेनायं ब्रह्मविद्यालक्षणो मोक्षमार्गो मया लब्धत्वात् ‘मां स्पृष्टः’ इत्युच्यते । | आत्मकाम ब्रह्मवेत्ताका मोक्ष होता है—मन्त्र और ब्राह्मणद्वारा कहे हुए इस अर्थमें उसके विस्तारका प्रतिपादन करनेवाले ये मन्त्र हैं—यह ज्ञानमार्ग दुर्विज्ञेय होनेके कारण अणु—सूक्ष्म है तथा वितत यानी विस्तीर्ण है, अथवा जहाँ [ माध्यन्दिनी शाखाके अनुसार ‘विततः’ के स्थानमें ] ‘वितरः’ ऐसा पाठान्तर है, वहाँ विस्पष्टतरणका हेतु होनेके कारण ज्ञानमार्ग मोक्षका साधन है [—ऐसा अर्थ समझना चाहिये ] । यह पुराण अर्थात् नित्य श्रुतिद्वारा प्रकाशित होनेके कारण पुरातन है, तार्किकोंकी बुद्धिसे उत्पन्न हुए कुदृष्टिरूप मार्गोंके समान अर्वाचीन नहीं है । यह मेरे द्वारा स्पृष्ट है अर्थात् मुझे प्राप्त है । जो जिसके द्वारा प्राप्त किया जाता है, वह उसे स्पर्श-सा करता है—उससे संबद्ध होता है । इसीसे यह ब्रह्मविद्यारूप मोक्षमार्ग मुझे प्राप्त होनेके कारण ‘मुझे स्पर्श किये हुए है’ ऐसा कहा जाता है । |

१०७२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

१०७२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४

| न केवलं मया लब्धः किं त्वनुवित्तो मयैव; अनुवेदनं नाम विद्यायाः परिपाकापेक्षया फलावसानतानिष्ठाप्राप्तिः, भुजेरिव तृप्त्यवसानता; पूर्वं तु ज्ञानप्राप्तिसंबन्धमात्रमेवेति विशेषः । | मैंने इसे केवल प्राप्त ही नहीं किया है अपि तु मैंने ही इसका अनुवेदन भी किया है। विद्याके परिपाककी अपेक्षासे जो उसकी फलपर्यन्त स्थितिकी प्राप्ति है, उसे अनुवेदन कहते हैं, जैसे भोजनका पर्यवसान तृप्तिमें होनेवाला है। 'मां स्पृष्टः' इस पूर्ववाक्यमें तो केवल ज्ञानप्राप्तिका सम्बन्धमात्र ही बतलाया गया है—इतना उससे इसका अन्तर है। | | किम् असावेव मन्त्रदृगेको ब्रह्मविद्याफलं प्राप्तः, नान्यः प्राप्तवान्, येन 'अनुवित्तो मयैव' इत्यवधारयति ? | शङ्का—क्या अकेले इस मन्त्र-द्रष्टाने ही ब्रह्मविद्याका फल प्राप्त किया है, किसी दूसरेने प्राप्त नहीं किया, जिससे कि वह 'मेरेद्वारा ही अनुवित्त है' ऐसा निश्चय करता है। | | नैष दोषः, अस्याः फलम् आत्मसाक्षिकमनुत्तममिति ब्रह्मविद्यायाः स्तुतिपरत्वात्; एवं हि कृतार्थात्माभिमानकरम् आत्मप्रत्ययसाक्षिकमात्मज्ञानम्, किमतः परमन्यत् स्यात्—इति ब्रह्मविद्यां स्तौति । न तु पुनरन्यो ब्रह्मवित् तत्फलं न प्राप्नोतीति, "तद्यो यो देवानाम्" (बृ० उ० १ । ४ । १०) इति सर्वार्थश्रुतेः । | समाधान—यह कोई दोष नहीं है; क्योंकि यह वाक्य 'इस विद्याका अनुत्तम फल आत्मसाक्षिक है' इस प्रकार ब्रह्मविद्याकी स्तुति करनेवाला है। इस प्रकार आत्मज्ञान 'मैं कृतार्थ हूँ' ऐसा आत्माभिमान करनेवाला और स्वानुभवसिद्ध है, इससे बढ़कर और क्या हो सकता है?—इस प्रकार श्रुति ब्रह्मविद्याकी स्तुति करती है। कोई अन्य ब्रह्मवेत्ता इस फलको प्राप्त नहीं करता--ऐसी बात नहीं है; क्योंकि "देवताओंमेंसे जिस-जिसने उसे जाना" ऐसी सबके कृतार्थत्वका प्रतिपादन करनेवाली श्रुति है। |

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १०७३

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १०७३


तदेवाह—तेन ब्रह्मविद्या-मार्गेण धीराः प्रज्ञावन्तः—अन्येऽपि ब्रह्मविद इत्यर्थः, अपियन्ति अपिगच्छन्ति, ब्रह्मविद्याफलं मोक्षं स्वर्गं लोकम्; स्वर्गलोकशब्दस्त्रिविष्टपवाच्यपि सन्निह प्रकरणान्मोक्षाभिधायकः। इतः अस्माच्छरीरपातादूर्ध्वं जीवन्त एव विमुक्ताः सन्तः ॥ ८ ॥यही बात श्रुति बतलाती है—उस ब्रह्मविद्यारूप मार्गसे धीर—बुद्धिमान् अर्थात् दूसरे भी ब्रह्मवेत्ता ब्रह्मविद्याके फल मोक्ष—स्वर्गलोकको प्राप्त करते हैं। 'स्वर्गलोक' शब्द देवलोकका वाचक होनेपर भी यहाँ प्रकरणवश मोक्षका वाचक है। इतः--इस शरीरका पतन होनेके पश्चात् जीवित रहते हुए ही विमुक्त होकर [शरीरपातानन्तर मोक्ष प्राप्त करते हैं] ॥ ८ ॥

मोक्षमार्गके विषयमें मत-भेद

तस्मिञ्छुक्लमुत नीलमाहुः पिङ्गलँ हरितं लोहितं च । एष पन्था ब्रह्मणा हानुवित्तस्तेनैति ब्रह्मवित् पुण्यकृत्तैजसश्च ॥ ९ ॥

उस मार्गके विषयमें मतभेद है। कोई उसमें शुक्ल और कोई नीलवर्ण बतलाते हैं तथा कोई पिङ्गलवर्ण, कोई हरित और कोई लोहित कहते हैं। किंतु यह मार्ग साक्षात् ब्रह्मद्वारा अनुभूत है। उस मार्गसे पुण्य करनेवाला परमात्मतेजःस्वरूप ब्रह्मवेत्ता ही जाता है ॥ ९ ॥

तस्मिन् मोक्षसाधनमार्गे विप्रतिपत्तिर्मुमुक्षूणाम्; कथम् ? <br><br> तस्मिन्—शुक्लं शुद्धं विमलमाहुः केचिन्मुमुक्षवः; नीलम् अन्ये, पिङ्गलम् अन्ये, हरितं लोहितंउस मोक्षसाधनरूप ज्ञानमार्गमें मुमुक्षुओंका मतभेद है; किस प्रकार ? कोई मुमुक्षु तो उसमें शुक्ल शुद्ध अर्थात् निर्मल (उज्ज्वल वर्ण) बतलाते हैं, दूसरे नील वर्ण कहते हैं तथा अपनी-अपनी दृष्टिके अनुसार अन्य मुमुक्षुगण उसमें पिङ्गल, हरित और लोहित

बृ० उ० ६८—

| १०७४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४ |

१०७४बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ४

| च यथादर्शनम्। नाड्यस्तु एताः सुषुम्नाद्याः श्लेष्मादिरससम्पूर्णाः 'शुक्लस्य नीलस्य पिङ्गलस्य' (४।३।२०) इत्याद्युक्तत्वात् ।<br><br>आदित्यं वा मोक्षमार्गम् एवंविधं मन्यन्ते—"एष शुक्ल एष नीलः" ( छा० उ० ८ । ६ । १ ) इत्यादिश्रुत्यन्तरात् । दर्शनमार्गस्य च शुक्लादिवर्णासंभवात्, सर्वथापि तु प्रकृताद् ब्रह्मविद्यामार्गादन्य एते शुक्लादयः ।<br><br>ननु शुक्लः शुद्धोऽद्वैतमार्गः ।<br><br>न, नीलपीतादिशब्दैर्वर्णवाचकैः सहानुद्रवणात्; यान् शुक्लादीन् योगिनो मोक्षपथान् आहुः, न ते मोक्षमार्गाः; संसारविषया एव हि ते—"चक्षुषो वा मूर्ध्नो वान्येभ्यो वा शरीरदेशेभ्यः" ( बृ० उ० ४ । ४ । २ ) इति शरीरदेशानिःसरणसंबन्धाद् ब्रह्मादिलोकप्रापका हि ते । तस्मादयमेव मोक्षमार्गः—य आत्मकामत्वेन आप्तकामतया सर्वकामक्षये गमनानुप- | वर्ण बतलाते हैं। किंतु ये श्लेष्मादि रससे परिपूर्ण सुषुम्नादि नाडियाँ ही हैं, क्योंकि उन्हींके विषयमें 'शुक्लस्य नीलस्य पिङ्गलस्य' इत्यादि कहा गया है।<br><br>अथवा वे आदित्यरूप मोक्षमार्गको ऐसा मानते हैं, जैसा कि "यह शुक्ल है, यह नील है" इत्यादि अन्य श्रुतिमें कहा गया है। ज्ञानमार्गके तो शुक्लादि वर्ण होने असम्भव हैं; सभी प्रकार प्रकृत ब्रह्मविद्यारूप मार्गसे तो ये शुक्लादि भिन्न ही हैं।<br><br>पूर्व०—किंतु शुक्ल अर्थात् शुद्ध तो अद्वैतमार्ग हो सकता है !<br><br>सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि इसका वर्णवाचक नील-पीतादि शब्दोंके साथ उच्चारण किया गया है। योगीलोग जिन शुक्लादि मोक्षमार्गोंके विषयमें कहते हैं, वे मोक्षमार्ग नहीं हैं; उनका विषय तो संसार ही है—"चक्षुसे, मूर्धासे अथवा शरीरके किन्हीं अन्य भागोंसे" इस प्रकार शरीरके भागोंसे जीवके निकलनेका सम्बन्ध होनेके कारण वे तो ब्रह्मलोकादिकी प्राप्ति करानेवाले ही हैं। अतः जो आत्मकामतत्वके द्वारा आप्तकाम हो जानेसे सम्पूर्ण कामनाओंका |

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ [१०७५

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ [१०७५


संस्कृत-भाष्यम्भाषार्थ
पत्तौ प्रदीपनिर्वाणवच्चक्षुरादीनां कार्यकारणानामत्रैव समवनयः— इति एष ज्ञानमार्गः पन्थाः, ब्रह्मणा परमात्मस्वरूपेणैव ब्राह्मणेन त्यक्तसर्वैषणेन, अनुवित्तः। तेन ब्रह्मविद्यामार्गेण ब्रह्मविदन्यः अपि एति।क्षय हो जानेपर कहीं जाना सम्भव न होनेसे दीपकके बुझ जानेके समान चक्षु आदि देह और इन्द्रियोंका यहीं लीन हो जाना है—यही मोक्षमार्ग है। ‘एष पन्थाः’ यह ज्ञानमार्ग ब्रह्मके द्वारा अर्थात् जिसने समस्त एषणाएँ त्याग दी हैं, उस परमात्मस्वरूप ब्रह्मज्ञके द्वारा ही अनुवित्त है। उस ब्रह्मविद्यारूप मार्गसे अन्य ब्रह्मवेत्ता भी ब्रह्मको प्राप्त हो सकता है।
कीदृशो ब्रह्मवित् तेन एति ? इत्युच्यते—पूर्वं पुण्यकृद् भूत्वा पुनस्त्यक्तपुत्राद्येषणः, परमात्मतेजस्यात्मानं संयोज्य तस्मिन्प्रभिनिर्वृत्तस्तैजसश्च–आत्मभूत इहैव इत्यर्थः; ईदृशो ब्रह्मवित् तेन मार्गेण एति।उस मार्गसे किस प्रकारका ब्रह्मवेत्ता जाता है ? सो बतलाया जाता है--पहले पुण्य करनेवाला होकर फिर पुत्रादि एषणाओंसे मुक्त हो जो परमात्मतेजमें अपनेको जोड़कर उसीमें उपशान्त हो गया है अर्थात् इस शरीरमें ही उस परमात्मतेजसे सम्पन्न आत्मभूत हो गया है, ऐसा ब्रह्मवेत्ता उस मार्गसे जाता है।
न पुनः पुण्यादिसमुच्चयकारिणो ग्रहणम्, विरोधादित्यवोचाम; “अपुण्यपुण्योपरमे यं पुनर्भवनिर्भयाः। शान्ताः संन्यासिनो यान्ति तस्मै मोक्षात्मने नमः॥” (महा० शा० ४७। ५५) इति च स्मृतेः; “त्यज धर्ममधर्मं च”यहाँ ‘पुण्यकृत्’ शब्दसे पुण्यादिसमुच्चय करनेवालोंको ग्रहण नहीं किया गया; क्योंकि ज्ञान और कर्मका परस्पर विरोध है--ऐसा हम कह चुके हैं। इस विषयमें “पाप और पुण्यकी निवृत्ति होनेपर जिसे पुनर्जन्मसे निर्भय एवं शान्त संन्यासी प्राप्त करते हैं, उस मोक्षात्माको नमस्कार है” ऐसी स्मृति भी है तथा “धर्म और अधर्मका त्याग करो’

१०७६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

१०७६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४

| इत्यादिपुण्यापुण्यत्यागोपदेशात्; <br> “निराशिषमनारम्भं निर्नमस्कार- <br> मस्तुतिम्। अद्गीणं क्षीणकर्माणं <br> तं देवा ब्राह्मणं विदुः॥” <br> “नैतादृशं ब्राह्मणस्यास्ति वित्तं <br> यथैकता समता सत्यता च। <br> शीलं स्थितिर्दण्डनिधानमार्जवं <br> ततस्ततश्चोपरमः क्रियाभ्यः॥” <br> इत्यादिस्मृतिभ्यश्च। | इत्यादि प्रकारसे पुण्य पापके त्याग- <br> का भी उपदेश दिया गया है। “जो <br> सब प्रकारकी आशाओंसे रहित, <br> आरम्भ-शून्य, नमस्कार और स्तुति <br> आदि न करनेवाला, निषिद्धाचरण- <br> से रहित और क्षीणकर्मा है, उसे <br> देवगण ब्राह्मण (ब्रह्मवेत्ता) मानते <br> हैं” तथा “ब्रह्मवेत्ताका ऐसा कोई <br> धन नहीं है जैसे कि एकता, <br> समता, सत्यता, शील, स्थिति, <br> अहिंसा, सरलता और विभिन्न <br> प्रकारकी क्रियाओंसे निवृत्त होना <br> है” इत्यादि स्मृतियोंसे भी यही <br> बात सिद्ध होती है। | | उपदेक्ष्यति च इहापि तु— <br> “एष नित्यो महिमा ब्राह्मणस्य <br> न वर्धते कर्मणा नो कनीयान्” <br> (४।४।२३) इति कर्म- <br> प्रयोजनाभावे हेतुमुक्त्वा, <br> “तस्मादेवंविच्छान्तो दान्तः” <br> (४।४।२३) इत्यादिना <br> सर्वक्रियोपरमम्। तस्माद् यथा- <br> व्याख्यातमेव पुण्यकृत्त्वम्। | यहाँ भी “यह ब्रह्मवेत्ताकी <br> नित्य महिमा है, जो कर्मसे न तो <br> बढ़ती है और न घटती ही है' इस <br> प्रकार कर्मके प्रयोजनके अभावमें <br> हेतु बतलाकर “अतः इस प्रकार <br> जाननेवाला शान्त, दान्त [उपरत <br> होकर ]” इत्यादि वाक्यसे सम्पूर्ण <br> क्रियाओंसे उपरतिका उपदेश दिया <br> जायगा। अतः यहाँ जिस प्रकार <br> ऊपर व्याख्या की गयी है, वही <br> ‘पुण्यकृत्’ का स्वरूप है। | | अथवा यो ब्रह्मवित् तेन <br> एति, स पुण्यकृत् तैजसश्च— <br> इति ब्रह्मवित्स्तुतिरेषा; पुण्य- <br> कृति तैजसे च योगिनि <br> महाभाग्यं प्रसिद्धं लोके, | अथवा जो ब्रह्मवेत्ता उस मार्गसे <br> जाता है वह पुण्यकर्मा और तैजस <br> है—इस प्रकार यह ब्रह्मवेत्ताकी <br> स्तुति है। पुण्यकृत् और तैजस <br> योगीमें महाभाग्य रहता है—यह <br> लोकमें प्रसिद्ध है; अतः लोकमें |

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थे १०७७

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थे १०७७


| ताभ्यामतो ब्रह्मवित् स्तूयते प्रख्यातमहाभाग्यत्वाल्लोके ॥९॥ | प्रख्यात महाभाग्यशाली होनेके कारण इन दोनों विशेषणोंसे ब्रह्मवेत्ताकी स्तुति की जाती है ॥६॥ |

विद्या और अविद्यारत पुरुषोंकी गति

अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते ।
ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायाꣳ रताः ॥१०॥

जो अविद्या (कर्म) की उपासना करते हैं, वे अज्ञानसंज्ञक अन्धकारमें प्रवेश करते हैं और जो विद्या (कर्मकाण्डरूप त्रयीविद्या) में रत हैं, वे उनसे भी अधिक अन्धकारमें प्रवेश करते हैं ॥ १० ॥

| अन्धम् अदर्शनात्मकं तमः संसारनियामकं प्रविशन्ति प्रतिपद्यन्ते; के ? ये अविद्यां विद्यातोऽन्यां साध्यसाधनलक्षणााम् उपासते, कर्म अनुवर्तन्त इत्यर्थः। ततस्तस्मादपि भूय इव बहुतरमिव तमः प्रविशन्ति; के ? ये उ विद्यायाम्, अविद्यावस्तुप्रतिपादिकायां कर्मार्थायां त्रय्यामेव विद्यायाम्, रता अभिरताः। विधिप्रतिषेधपर एव वेदः, नान्योऽस्ति इति, उपनिषदर्थानपेक्षिण इत्यर्थः ॥ १० ॥ | अन्ध अर्थात् संसारके नियामक अदर्शनात्मक (अज्ञानरूप) अन्धकारमें प्रवेश करते हैं; कौन ? जो अविद्या—विद्यासे भिन्न साध्य-साधनरूप कर्मकी उपासना अर्थात् अनुगमन करते हैं; और उससे भी भूयः इव—मानो अधिकतर अन्धकारमें वे प्रवेश करते हैं; कौन ? जो विद्यामें अर्थात् अविद्यारूप वस्तुका प्रतिपादन करनेवाली कर्मार्था त्रयीविद्यामें रत यानी अभिनिविष्ट हैं अर्थात् जो ऐसा समझकर कि वेद तो विधि-प्रतिषेधपरक ही है, उससे भिन्न नहीं है, उपनिषदर्थकी उपेक्षा करनेवाले हैं ॥ १० ॥ |


१०७८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४

१०७८बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ४

अज्ञानियोंको प्राप्त होनेवाले अनन्द लोकोंका वर्णन

यदि ते अदर्शनलक्षणं तमः प्रविशन्ति, को दोषः ? इत्युच्यते—यदि वे अदर्शनात्मक अन्धकारमें प्रवेश करते हैं तो दोष क्या है ? यह बतलाया जाता है—

अनन्दा नाम ते लोका अन्धेन तमसावृताः ।
ताꣳस्ते प्रेत्याभिगच्छन्त्यविद्वाꣳसोऽबुधो जनाः ॥ ११

वे अनन्द (असुख) नामके लोक अन्धतमसे व्याप्त हैं; वे अविद्वान् और अज्ञानीलोग मरकर उन्हींको प्राप्त होते हैं ॥ ११ ॥

अनन्दा अनानन्दा असुखा नाम ते लोकाः, तेन अन्धेनादर्शनलक्षणेन तमसा आवृता व्याप्ताः—ते तस्याज्ञानतमसो गोचराः । तान् ते प्रेत्य मृत्वा अभिगच्छन्ति अभियान्ति; के ? ये अविद्वांसः; किं सामान्येन अविद्वत्तामात्रेण ? नेत्युच्यते—अबुधः, बुधेः अवगमनार्थस्य धातोः क्विप्प्रत्ययान्तस्य रूपम्, आत्मावगमवर्जिता इत्यर्थः; जनाः प्राकृता एव जननधर्माणो वा इत्येतत् ॥ ११ ॥अनन्द—अनानन्द अर्थात् असुख नामके वे लोक उस अन्ध—अदर्शनरूप अन्धकारसे आवृत—व्याप्त हैं; अर्थात् वे उस अज्ञानान्धकारके विषय हैं। उन्हें वे मरकर प्राप्त होते हैं; कौन ? जो अविद्वान् हैं; क्या सामान्य अविद्वत्तामात्रसे ही उन्हें प्राप्त होते हैं। नहीं; यह बतलाया जाता है—जो अबुध हैं, यह अवगत्यर्थक बुध् धातुका क्विप्-प्रत्ययान्तरूप है, अर्थात् जो आत्म-ज्ञानसे रहित हैं वे जनाः—उपर्युक्त प्राकृत लोक ही अथवा जननधर्मी [ मनुष्यादि ही उन लोकोंको प्राप्त होते हैं ] ॥ ११ ॥

आत्मज्ञकी निश्चिन्त स्थिति

आत्मानं चेद् विजानीयादयमस्मीति पूरुषः ।
किमिच्छन् कस्य कामाय शरीरमनुसंज्वरेत् ॥१२॥

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०७९

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०७९

यदि पुरुष आत्माको 'मैं यह हूँ' इस प्रकार विशेषरूपसे जान जाय तो फिर क्या इच्छा करता हुआ और किस कामनासे शरीरके पीछे संतप्त हो ? ॥ १२ ॥

संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
आत्मानं स्वं परं सर्वप्राणिमनीषितज्ञं हृत्स्थमशनायादिधर्मातीतम्, चेद् यदि, विजानीयात् सहस्रेषु कश्चित्; चेदिति आत्मविद्याया दुर्लभत्वं दर्शयति; कथम् ? अयं पर आत्मा सर्वप्राणिप्रत्ययसाक्षी, यो नेति नेतीत्याद्युक्तः, यस्मान्नान्योऽस्ति द्रष्टा श्रोता मन्ता विज्ञाता, समः सर्वभूतस्थो नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावः—अस्मि भवामि—इति; पूरुषः पुरुषः, स किमिच्छन्-तत्स्वरूपव्यतिरिक्तम् अन्यद्वस्तु फलभूतं किमिच्छन् कस्य वा अन्यस्य आत्मनो व्यतिरिक्तस्य कामाय प्रयोजनाय; न हि तस्य आत्मन एष्टव्यं फलं न चाप्यात्मनोऽन्यः अस्ति, यस्ययदि सहस्रोंमें कोई एक आत्माको--अपने परस्वरूपको--सम्पूर्ण प्राणियोंकी बुद्धिवृत्तिको जाननेवाले हृदयस्थ और क्षुधादि धर्मोंसे अतीत आत्माको विशेषरूपसे जान जाय, 'चेत्' इस निपातसे श्रुति आत्मविद्याकी दुर्लभता प्रकट करती है, किस प्रकार जान जाय ? यह पर आत्मा सम्पूर्ण प्राणियोंके प्रत्ययों (ज्ञानों) का साक्षी, जो 'नेति नेति' इत्यादि वाक्योंद्वारा कहा गया है, जिससे भिन्न कोई दूसरा द्रष्टा, श्रोता, मन्ता और विज्ञाता नहीं है तथा सम, सम्पूर्ण भूतोंमें स्थित और नित्य-शुद्ध-बुद्ध-मुक्त-स्वरूप है, वह मैं हूँ--इस प्रकार जो पुरुष [जान जाय] वह क्या इच्छा करता हुआ—उस अपने स्वरूपके अतिरिक्त किस दूसरी फलभूत वस्तुकी इच्छा करता हुआ अथवा किस आत्मासे भिन्न वस्तुकी कामना अर्थात् प्रयोजनके लिये—क्योंकि उस आत्माके लिये कोई इच्छा करनेयोग्य फल है ही नहीं और न आत्मासे भिन्न कोई अन्य पदार्थ ही है, जिसकी

१०८० बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ४

१०८० बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ४

| कामाय इच्छति, सर्वस्य आत्मभूतत्वात्; अतः किमिच्छन् कस्य कामाय शरीरमनुसंज्वरेत्, भ्रं॑शेत्, शरीरोपाधिकृतदुःखमनु दुःखी स्यात्, शरीरतापमनुतप्येत। <br><br> अनात्मदर्शिनो हि तद् व्यतिरिक्तवस्त्वन्तरेप्सोः। 'ममेदं स्यात्, पुत्रस्य इदम्, भार्याया इदम्' इत्येवमीहमानः पुनःपुनर्जननमरणप्रबन्धरूढः शरीररोगमनु रुज्यते, सर्वात्मदर्शिनस्तु तदसम्भव इत्येतदाह ॥ १२ ॥ | कामनासे वह इच्छा करे, क्योंकि वह तो सबका आत्मस्वरूप हो जाता है। अतः वह क्या इच्छा करता हुआ और किस कामनाके लिये शरीरके पीछे संतप्त—भ्रष्ट हो? अर्थात् शरीररूप उपाधिके दुःखके पीछे दुःखी हो—शरीरके तापसे अनुतप्त हो। <br><br> जो शरीरादि अनात्मोंमें आत्मबुद्धि करनेवाला है, आत्मासे भिन्न वस्तुकी इच्छा करनेवाले उस अनात्मज्ञको ही वह (अनुताप) [हो सकता है]। 'मुझे यह मिल जाय, पुत्रको यह मिल जाय, पत्नीको यह हो जाय' इस प्रकार इच्छा करता हुआ वह पुनः-पुनः जन्म-मरणपरम्परामें पड़ा रहकर शरीरके रोगके पीछे रोगी होता है। किंतु सर्वात्मदर्शीको ऐसा होना असम्भव है—यही बात श्रुति यहाँ बतलाती है ॥ १२ ॥ |

आत्माका महत्त्व

| किं च— | इसके सिवा— |

यस्यानुवित्तः प्रतिबुद्ध आत्मास्मिन् संदेहो गहने प्रविष्टः। स विश्वकृत् स हि सर्वस्य कर्ता तस्य लोकः स उ लोक एव ॥ १३ ॥

इम अनेकों अनर्थोंसे पूर्ण और विवेक-विज्ञानके विरोधी विषम

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०८१

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०८१

शरीरमें प्रविष्ट हुआ आत्मा जिस ब्राह्मणको प्राप्त और ज्ञात हो गया है, वही विश्वकृत् (कृतकृत्य) है। वही सबका कर्ता है, उसीका लोक है और स्वयं वही लोक भी है ॥ १३ ॥

| यस्य ब्राह्मणस्य, अनुवित्तः— अनुलब्धः, प्रतिबुद्धः साक्षात्कृतः, कथम् ? अहमस्मि परं ब्रह्मेत्येवं प्रत्यगात्मत्वेनावगतः; आत्मा अस्मिन् संदेहे संदेहे-अनेकानर्थसंकटोपचये, गहने विषमे-अनेकशतसहस्रविवेकविज्ञानप्रतिपक्षे विषमे प्रविष्टः; स यस्य ब्राह्मणस्यानुवित्तः प्रतिबोधेनेत्यर्थः स विश्वकृद् विश्वस्य कर्ता; <br><br> कथं विश्वकृत्त्वम्, तस्य किं विश्वकृदिति नाम इत्याशङ्क्याह—स हि यस्मात् सर्वस्य कर्ता, न नाममात्रम्; न केवलं विश्वकृत् परप्रयुक्तः सन्, किं तर्हि ? तस्य लोकः सर्वः; किमन्यो लोकः, अन्योऽसौ ? इत्युच्यते—स उ लोक एव; लोकशब्देन | जिस ब्राह्मणको आत्मा अनुवित्त अनुलब्ध और प्रतिबुद्ध-साक्षात्कृत है, किस प्रकार—'मैं परब्रह्म हूँ' इस प्रकार प्रत्यगात्मस्वरूपसे ज्ञात है; इस संदेह्य—संदेह अर्थात् अनेकों अनर्थ-समूहोंके पुञ्ज और गहन—विषम यानी विवेक-विज्ञानके अनेकों शतसहस्र प्रतिपक्षोंके कारण विषमस्थानमें प्रविष्ट हुआ जो आत्मा है, वह जिस ब्राह्मणको प्रतिबोध—साक्षात्कारके द्वारा उपलब्ध है—ऐसा इसका तात्पर्य है, वह विश्वकृत्—विश्वका कर्ता ( रचनेवाला ) है । <br><br> उसका विश्वकर्तृत्व किस प्रकार है, क्या 'विश्वकृत्' यह उसका नाम है ? ऐसी आशङ्का करके श्रुति कहती है--क्योंकि वही सबका कर्ता है, यह केवल उसका नाम ही नहीं है। वह किसी अन्यके द्वारा प्रेरित होनेसे विश्वकृत् नहीं है; तो फिर क्या बात है ? उसीका सारा लोक है। तो क्या लोक दूसरा है और वह दूसरा है ?--इसपर कहा जाता है—वही लोक भी है। यहाँ |

१०८२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

१०८२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४
आत्मा उच्यते; तस्य सर्वं आत्मा, स च सर्वस्यात्मेत्यर्थः।<br><br>य एष ब्राह्मणेन प्रत्यगात्मा प्रतिबुद्धतया अनुवित्त आत्मा अनर्थसंकटे गहने प्रविष्टः स न संसारी, किंतु पर एव; यस्माद् विश्वस्य कर्ता सर्वस्य आत्मा, तस्य च सर्वं आत्मा। 'एक एवाद्वितीयः पर एवास्मि' इत्यनुसंधातव्य इति श्लोकार्थः ॥ १३ ॥'लोक' शब्दसे आत्मा कहा गया है। तात्पर्य यह है कि सब आत्मा उसके हैं और वह सबका आत्मा है।<br><br>आत्मा अनर्थपूर्ण और गहन-शरीरमें प्रविष्ट है—इस प्रकार जिस इस प्रत्यगात्माको ब्राह्मणने साक्षात्कारके द्वारा उपलब्ध कर लिया है, वह संसारी जीव नहीं है, अपितु पर ही है; क्योंकि वह विश्वका कर्ता है, सबका आत्मा है और उसीके सब आत्मा हैं। इस मन्त्रका तात्पर्य यह है कि मैं एकमात्र अद्वितीय परात्मा ही हूँ'—ऐसा अनुसन्धान करना चाहिये ॥ १३ ॥

आत्मज्ञानके बिना होनेवाली दुर्गति

किंच—तथा—

इहैव सन्तोऽथ विद्मस्तद्वयं न चेदवेदिर्महती विनष्टिः ।
ये तद्विदुरमृतास्ते भवन्त्यथेतरे दुःखमेवापियन्ति ॥ १४॥

हम इस शरीरमें रहते हुए ही यदि उसे जान लेते हैं [ तो कृतार्थ हो गये ] यदि उसे नहीं जाना तो बड़ी हानि है। जो उसे जान लेते हैं, वे अमृत हो जाते हैं; किंतु दूसरे लोग तो दुःखको ही प्राप्त होते हैं ॥ १४ ॥

इहैव—अनेकानर्थसंकुले मन्तो भवन्तः, अज्ञानदीर्घनिद्रामोहिताः सन्तः, कथंचिदिव ब्रह्मतत्त्वम् आत्मत्वेन अथ विद्मो विजानीमः,यहीं—इस अनेकों अनर्थपूर्ण शरीरमें रहते हुए ही अर्थात् अज्ञानरूप दीर्घ निद्रासे मोहित रहते हुए ही किसी प्रकार यदि हम उस ब्रह्मतत्त्वको—प्रकरण-प्राप्त इस ब्रह्मको आत्मभावसे

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १०८३

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १०८३


संस्कृत भाष्यभाष्यार्थ
तदेतद् ब्रह्म प्रकृतम्; अहो वयं कृतार्था इत्यभिप्रायः। यदेतद् ब्रह्म विजानीमः, तद् न चेद् विदितवन्तो वयम् वेदनं वेदः, वेदोऽस्यास्तीति वेदी, वेद्येव वेदिः, न वेदिः अवेदिः, ततः अहम् अवेदिः स्याम्। यदि अवेदिः स्याम्, को दोषः स्यात् ? महती अनन्तपरिमाणा जन्म-मरणादिलक्षणा विनष्टिः—विनशनम्। अहो वयमस्मान्महतो विनाशाद् विमुक्ताः, यदद्वयं ब्रह्म विदितवन्त इत्यर्थः।जान लें तब तो अहो ! हम कृतार्थ हो गये—ऐसा इसका अभिप्राय है। हम जिस इस ब्रह्मको जानते हैं; यदि उसे हमने न जाना होता, 'वेद' का अर्थ वेदन है, जिसे वेद (ज्ञान) है, उसे वेदी कहते हैं, वेदीको ही 'वेदि' कहा गया है, जो वेदि न हो वह 'अवेदि' है,—तो इससे मैं अवेदि हो जाता। यदि मैं 'अवेदि' हो जाता तो क्या दोष होता ? महती—जन्म-मरणादिरूप अनन्त परिमाणवाली विनष्टि--क्षति होती। तात्पर्य यह है कि हमने जो अद्वय ब्रह्मतत्त्वको जान लिया है, इससे अहो ! हम महान् विनाशसे मुक्त हो गये हैं।
यथा च वयं ब्रह्म विदित्वा अस्माद् विनशनाद् विप्रमुक्ताः, एवं ये तद्विदुः, अमृतास्ते भवन्ति; ये पुनः नैवं ब्रह्म विदुः, ते इतरे ब्रह्मविद्भ्योऽन्ये अब्रह्मविद इत्यर्थः दुःखमेव जन्ममरणादिलक्षणमेव अपियन्ति प्रतिपद्यन्ते न कदाचिदप्यविदुषां ततो विनिवृत्तिरित्यर्थः; दुःखमेव हि ते आत्मत्वेनोपगच्छन्तीति ॥ १४ ॥जिस प्रकार ब्रह्मको जानकर हम इस विनाशसे सम्यक् प्रकारसे मुक्त हो गये हैं, इसी प्रकार जो उसे जानते हैं, वे अमृत हो जाते हैं। किंतु जो उसे इस प्रकार नहीं जानते, वे इतर—ब्रह्मवेत्ताओंसे भिन्न अन्य लोग अर्थात् अब्रह्मवेत्ता जन्म-मरणादिरूप दुःखको ही प्राप्त होते हैं। तात्पर्य यह है कि अज्ञानियोंकी उससे कभी निवृत्ति नहीं होती, क्योंकि वे दुःखको ही (दुःखमय शरीरको ही) आत्मभावसे ग्रहण करते हैं ॥ १४ ॥