बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1084, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| १०७० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| का हि गतिः पुनरुक्तार्थकल्पना; सा चायुक्ता सत्यां गतौ । न च तत् स्तुतिमात्रमित्यवोचाम । | है। एक बार कहे हुए विषयके पुनः कहनेकी कल्पना करना तो अगतिकगति है। गति रहते हुए तो वैसी कल्पना करनी उचित नहीं है। और यह [ संन्यासादि ] स्तुतिमात्र हैं नहीं—यह हम पहले कह चुके हैं। | | ननु—एवं सति 'अत ऊर्ध्वं विमोक्षायैव' इति वक्तव्यम्— | प्र०—किंतु यदि ऐसा होता तो 'इसके आगे विमोक्षके लिये ही कहिये' ऐसा कहना चाहिये था ? | | नैष दोषः; आत्मज्ञानवद् अप्रयोजकः संन्यासः पक्षे प्रतिपत्तिकर्मवत्—इति हि मन्यते; "संन्यासेन तनुं त्यजेत्" इति स्मृतेः । साधनत्वपक्षेऽपि न 'अत ऊर्ध्वं विमोक्षायैव' इति प्रश्नमर्हति, मोक्षसाधनभूतात्मज्ञानपरिपाकार्थत्वात् ॥ ७ ॥ | उ०—यहाँ यह दोष नहीं है, क्योंकि जनक ऐसा समझता है कि आत्मज्ञानके समान संन्यास मोक्षका प्रयोजक ( साक्षात् साधन ) नहीं है, १प्रतिपत्तिकर्मके समान उसका पाक्षिक अनुष्ठान किया जा सकता है, जैसा कि "संन्यासके द्वारा शरीर त्याग करे" इस स्मृतिसे सिद्ध होता है। यदि उसे ( विविदिषासंन्यासको ) साधनपक्षमें माना जाय तो भी उसके विषयमें 'इससे आगे मोक्षके लिये ही कहिये' ऐसा प्रश्न नहीं किया जा सकता; क्योंकि संन्यास तो मोक्षके ही साधनभूत आत्मज्ञानके परिपाकके लिये है ॥ ७ ॥ |
आत्मकामी ब्रह्मवेत्ताको मोक्ष प्राप्त होता है—इसमें प्रमाणभूत मन्त्र
तदेते श्लोका भवन्ति । अणुः पन्था विततः पुराणो
१. ज्ञानके साधनभूत कर्मोंको यहाँ प्रतिपत्तिकर्म कहा गया है।