भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1085, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1085

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०७१

माᳵ स्पृष्टोऽनुवित्तो मयैव । तेन धीरा अपियन्ति ब्रह्मविदः स्वर्गं लोकमित ऊर्ध्वं विमुक्ताः ॥ ८ ॥

उस विषयमें ये मन्त्र हैं—यह ज्ञानमार्ग सूक्ष्म, विस्तीर्ण और पुरातन है। वह मुझे स्पर्श किये हुए है और मैंने ही उसका फल साधक ज्ञान प्राप्त किया है। धीर ब्रह्मवेत्ता पुरुष इस लोकमें जीते-जी ही मुक्त होकर शरीर-त्यागके बाद उसी मार्गसे स्वर्गलोक अर्थात् मोक्षको प्राप्त होते हैं ॥ ८ ॥

| आत्मकामस्य ब्रह्मविदो मोक्ष इत्येतस्मिन्नर्थे मन्त्रब्राह्मणोक्ते, विस्तरप्रतिपादका एते श्लोका भवन्ति । अणुः सूक्ष्मः पन्था दुर्विज्ञेयत्वात्; विततः विस्तीर्णः, विस्पष्टतरणहेतुत्वाद्वा ‘वितरः’ इति पाठान्तरात्, मोक्षसाधनो ज्ञानमार्गः । पुराणश्चिरंतनो नित्यश्रुतिप्रकाशितत्वात्, न तार्किकबुद्धिप्रभवकुदृष्टिमार्गवदर्वाकालिकः । मां स्पृष्टो मया लब्ध इत्यर्थः; यो हि येन लभ्यते, स तं स्पृशतीव संबध्यते । तेनायं ब्रह्मविद्यालक्षणो मोक्षमार्गो मया लब्धत्वात् ‘मां स्पृष्टः’ इत्युच्यते । | आत्मकाम ब्रह्मवेत्ताका मोक्ष होता है—मन्त्र और ब्राह्मणद्वारा कहे हुए इस अर्थमें उसके विस्तारका प्रतिपादन करनेवाले ये मन्त्र हैं—यह ज्ञानमार्ग दुर्विज्ञेय होनेके कारण अणु—सूक्ष्म है तथा वितत यानी विस्तीर्ण है, अथवा जहाँ [ माध्यन्दिनी शाखाके अनुसार ‘विततः’ के स्थानमें ] ‘वितरः’ ऐसा पाठान्तर है, वहाँ विस्पष्टतरणका हेतु होनेके कारण ज्ञानमार्ग मोक्षका साधन है [—ऐसा अर्थ समझना चाहिये ] । यह पुराण अर्थात् नित्य श्रुतिद्वारा प्रकाशित होनेके कारण पुरातन है, तार्किकोंकी बुद्धिसे उत्पन्न हुए कुदृष्टिरूप मार्गोंके समान अर्वाचीन नहीं है । यह मेरे द्वारा स्पृष्ट है अर्थात् मुझे प्राप्त है । जो जिसके द्वारा प्राप्त किया जाता है, वह उसे स्पर्श-सा करता है—उससे संबद्ध होता है । इसीसे यह ब्रह्मविद्यारूप मोक्षमार्ग मुझे प्राप्त होनेके कारण ‘मुझे स्पर्श किये हुए है’ ऐसा कहा जाता है । |